विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
४० * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ९
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले—विनीत देवताओंद्धारा |
|---|---|
| एवं संस्तूयमानस्तु प्रणतैरमरैर्हरिः। | इस प्रकार स्तुति किये जानेपर विश्वकर्ता भगवान् |
| प्रसन्नदृष्टिर्भगवानिदमाह स विश्वकृत् ॥ ७५ | हरि प्रसन्न होकर इस प्रकार बोले—॥ ७५ ॥ हे |
| तेजसो भवतां देवाः करिष्याम्युपबृंहणम्। | देवगण! मैं तुम्हारे तेजको फिर बढ़ाऊँगा; तुम इस |
| वदाम्यहं यत्क्रियतां भवद्भिस्तदिदं सुराः ॥ ७६ | समय मैं जो कुछ कहता हूँ वह करो ॥ ७६ ॥ तुम |
| आनीय सहिता दैत्यैः क्षीराब्धौ सकलौषधीः। | दैत्योंके साथ सम्पूर्ण ओषधियाँ लाकर अमृतके |
| प्रक्षिप्यात्रामृतार्थं ताः सकला दैत्यदानवैः। | लिये क्षीर-सागरमें डालो और मन्दराचलको मथानी |
| मन्थानं मन्दरं कृत्वा नेत्रं कृत्वा च वासुकिम् ॥ ७७ | तथा वासुकि नागको नेती बनाकर उसे दैत्य और |
| मथ्यताममृतं देवाः सहाये मय्यवस्थिते ॥ ७८ | दानवोंके सहित मेरी सहायतासे मथकर अमृत |
| सामपूर्वं च दैतेयास्तत्र साहाय्यकर्मणि। | निकालो ॥ ७७-७८ ॥ तुमलोग सामनीतिका अवलम्बन |
| सामान्यफलभोक्तारो यूयं वाच्या भविष्यथ ॥ ७९ | कर दैत्योंसे कहो कि 'इस काममें सहायता करनेसे |
| मथ्यमाने च तत्राब्धौ यत्समूत्पत्स्यतेऽमृतम्। | आपलोग भी इसके फलमें समान भाग पायेंगे' ॥ ७९ ॥ |
| तत्पानाद्बलिनो यूयममराश्च भविष्यथ ॥ ८० | समुद्रके मथनेपर उससे जो अमृत निकलेगा उसका |
| तथा चाहं करिष्यामि ते यथा त्रिदशद्विषः। | पान करनेसे तुम सबल और अमर हो जाओगे ॥ ८० ॥ |
| न प्राप्स्यन्त्यमृतं देवाः केवलं क्लेशभागिनः ॥ ८१ | हे देवगण! तुम्हारे लिये मैं ऐसी युक्ति करूँगा |
| श्रीपराशर उवाच | जिससे तुम्हारे द्वेषी दैत्योंको अमृत न मिल सकेगा |
| इत्युक्ता देवदेवेन सर्व एव तदा सुराः। | और उनके हिस्सेमें केवल समुद्र-मन्थनका क्लेश |
| सन्धानमसुरैः कृत्वा यत्नवन्तोऽमृतेऽभवन् ॥ ८२ | ही आयेगा ॥ ८१ ॥ |
| नानौषधीः समानीय देवदैतेयदानवाः। | श्रीपराशरजी बोले—तब देवदेव भगवान् |
| क्षिप्त्वा क्षीराब्धिपयसि शरदभ्रामलत्विषि ॥ ८३ | विष्णुके ऐसा कहनेपर सभी देवगण दैत्योंसे |
| मन्थानं मन्दरं कृत्वा नेत्रं कृत्वा च वासुकिम्। | सन्धि करके अमृतप्राप्तिके लिये यत्न करने लगे ॥ ८२ ॥ |
| ततो मथितुमारब्धा मैत्रेय तरसामृतम् ॥ ८४ | हे मैत्रेय! देव, दानव और दैत्योंने नाना प्रकारकी |
| विबुधाः सहिताः सर्वे यतः पुच्छं ततः कृताः। | ओषधियाँ लाकर उन्हें शरद्-ऋतुके आकाशकी-सी |
| कृष्णेन वासुकेर्दैत्याः पूर्वकाये निवेशिताः ॥ ८५ | निर्मल कान्तिवाले क्षीर-सागरके जलमें डाला और |
| ते तस्य मुखनिश्वासवह्निनापहतत्विषः। | मन्दराचलको मथानी तथा वासुकि नागको नेती बनाकर |
| निस्तेजसोऽसुराः सर्वे बभूवुरमितौजसः ॥ ८६ | बड़े वेगसे अमृत मथना आरम्भ किया ॥ ८३-८४ ॥ |
| तेनैव मुखनिश्वासवायुनास्तबलाहकैः। | भगवान्ने जिस ओर वासुकिकी पूँछ थी उस ओर |
| पुच्छप्रदेशे वर्षद्भिस्तदा चाप्यायिताः सुराः ॥ ८७ | देवताओंको तथा जिस ओर मुख था उधर दैत्योंको |
| क्षीरोदमध्ये भगवान्कूर्मरूपी स्वयं हरिः। | नियुक्त किया ॥ ८५ ॥ महातेजस्वी वासुकिके मुखसे |
| मन्थनाद्रेरधिष्ठानं भ्रमतोऽभून्महामुने ॥ ८८ | निकलते हुए निःश्वासाग्निसे झुलसकर सभी दैत्यगण |
| रूपेणान्येन देवानां मध्ये चक्रगदाधरः। | निस्तेज हो गये ॥ ८६ ॥ और उसी श्वास-वायुसे विक्षिप्त |
| चकर्ष नागराजानं दैत्यमध्येऽपरेण च ॥ ८९ | हुए मेघोंके पूँछकी ओर बरसते रहनेसे देवताओंकी |
| शक्ति बढ़ती गयी ॥ ८७ ॥ | |
| हे महामुने! भगवान् स्वयं कूर्मरूप धारण कर | |
| क्षीर-सागरमें घूमते हुए मन्दराचलके आधार हुए ॥ ८८ ॥ | |
| और वे ही चक्र-गदाधर भगवान् अपने एक अन्य | |
| रूपसे देवताओंमें और एक रूपसे दैत्योंमें मिलकर | |
| नागराजको खींचने लगे थे ॥ ८९ ॥ |
अ० ९] * प्रथम अंश * ४१
| उपर्याक्रान्तवाञ्छैलं बृहद्रूपेण केशवः।<br>तथापरेण मैत्रेय यन्न दृष्टं सुरासुरैः ॥ ९० | तथा हे मैत्रेय ! एक अन्य विशाल रूपसे जो देवता और दैत्योंको दिखायी नहीं देता था श्रीकेशवने ऊपरसे पर्वतको दबा रखा था ॥ ९० ॥ |
| तेजसा नागराजानं तथाप्यायितवान्हरिः ।<br>अन्येन तेजसा देवानुपबृंहितवान्प्रभुः ॥ ९१ | भगवान् श्रीहरि अपने तेजसे नागराज वासुकिमें बलका संचार करते थे और अपने अन्य तेजसे वे देवताओंका बल बढ़ा रहे थे ॥ ९१ ॥ |
| मथ्यमाने ततस्तस्मिन्क्षीराब्धौ देवदानवैः ।<br>हविर्धामाऽभवत्पूर्वं सुरभिः सुरपूजिता ॥ ९२ | इस प्रकार, देवता और दानवोंद्वारा क्षीर-समुद्रके मथे जानेपर पहले हवि (यज्ञ-सामग्री)-की आश्रयरूपा सुरपूजिता कामधेनु उत्पन्न हुई ॥ ९२ ॥ |
| जग्मुर्मुदं ततो देवा दानवाश्च महामुने ।<br>व्याक्षिप्तचेतसश्चैव बभूवुः स्तिमितेक्षणाः ॥ ९३ | हे महामुने ! उस समय देव और दानवगण अति आनन्दित हुए और उसकी ओर चित्त खिंच जानेसे उनकी टकटकी बँध गयी ॥ ९३ ॥ |
| किमेतदिति सिद्धानां दिवि चिन्तयतां ततः ।<br>बभूव वारुणी देवी मदाघूर्णितलोचना ॥ ९४ | फिर स्वर्गलोकमें 'यह क्या है ? यह क्या है ?' इस प्रकार चिन्ता करते हुए सिद्धोंके समक्ष मदसे घूमते हुए नेत्रोंवाली वारुणीदेवी प्रकट हुई ॥ ९४ ॥ |
| कृतावर्त्तात्ततस्तस्मात्क्षीरोदाद्वासयञ्जगत् ।<br>गन्धेन पारिजातोऽभूद्देवस्त्रीनन्दनस्तरुः ॥ ९५ | और पुनः मन्थन करनेपर उस क्षीर-सागरसे, अपनी गन्धसे त्रिलोकीको सुगन्धित करनेवाला तथा सुर-सुन्दरियोंका आनन्दवर्धक कल्पवृक्ष उत्पन्न हुआ ॥ ९५ ॥ |
| रूपौदार्यगुणोपेतस्तथा चाप्सरसां गणः ।<br>क्षीरोदधेः समुत्पन्नो मैत्रेय परमाद्भुतः ॥ ९६ | हे मैत्रेय ! तत्पश्चात् क्षीर-सागरसे रूप और उदारता आदि गुणोंसे युक्त अति अद्भुत अप्सराएँ प्रकट हुईं ॥ ९६ ॥ |
| ततः शीतांशुर्भवज्जगृहे तं महेश्वरः ।<br>जगृहुश्च विषं नागाः क्षीरोदाब्धिसमुत्थितम् ॥ ९७ | फिर चन्द्रमा प्रकट हुआ जिसे महादेवजीने ग्रहण कर लिया। इसी प्रकार क्षीर-सागरसे उत्पन्न हुए विषको नागोंने ग्रहण किया ॥ ९७ ॥ |
| ततो धन्वन्तरिर्देवः श्वेताम्बरधरस्स्वयम् ।<br>बिभ्रत्कमण्डलुं पूर्णममृतस्य समुत्थितः ॥ ९८ | फिर श्वेतवस्त्रधारी साक्षात् भगवान् धन्वन्तरिजी अमृतसे भरा कमण्डलु लिये प्रकट हुए ॥ ९८ ॥ |
| ततः स्वस्थमनस्कास्ते सर्वे दैतेयदानवाः ।<br>बभूवुर्मुदिताः सर्वे मैत्रेय मुनिभिः सह ॥ ९९ | हे मैत्रेय ! उस समय मुनिगणके सहित समस्त दैत्य और दानवगण स्वस्थ-चित्त होकर अति प्रसन्न हुए ॥ ९९ ॥ |
| ततः स्फुरत्कान्तिमती विकासिकमले स्थिता ।<br>श्रीर्देवी पयसस्तस्मादुद्भूता धृतपङ्कजा ॥ १०० | उसके पश्चात् विकसित कमलपर विराजमान स्फुटकान्तिमयी श्रीलक्ष्मीदेवी हाथोंमें कमल-पुष्प धारण किये क्षीर-समुद्रसे प्रकट हुईं ॥ १०० ॥ |
| तां तुष्टुवुर्मुदा युक्ताः श्रीसूक्तेन महर्षयः ॥ १०१ | उस समय महर्षिगण अति प्रसन्नतापूर्वक श्रीसूक्तद्वारा उनकी स्तुति करने लगे तथा |
| विश्वावसुमुखास्तस्या गन्धर्वाः पुरतो जगुः ।<br>घृताचीप्रमुखास्तत्र ननृतुश्चाप्सरोगणाः ॥ १०२ | विश्वावसु आदि गन्धर्वगण उनके सम्मुख गान और घृताची आदि अप्सराएँ नृत्य करने लगीं ॥ १०१-१०२ ॥ |
| गङ्गाद्याः सरितस्तोयैः स्नानार्थमुपतस्थिरे ।<br>दिग्गजा हेमपात्रस्थमादाय विमलं जलम् ।<br>स्नापयाञ्चक्रिरे देवीं सर्वलोकमहेश्वरीम् ॥ १०३ | उन्हें अपने जलसे स्नान करानेके लिये गंगा आदि नदियाँ स्वयं उपस्थित हुईं और दिग्गजोंने सुवर्ण-कलशोंमें भरे हुए उनके निर्मल जलसे सर्वलोक-महेश्वरी श्रीलक्ष्मीदेवीको स्नान कराया ॥ १०३ ॥ |
| क्षीरोदो रूपधृक्तस्यै मालाम्म्लानपङ्कजाम् ।<br>ददौ विभूषणान्यङ्गे विश्वकर्मा चकार ह ॥ १०४ | क्षीर-सागरने मूर्तिमान् होकर उन्हें विकसित कमल-पुष्पोंकी माला दी तथा विश्वकर्माने उनके अंग-प्रत्यंगमें विविध आभूषण पहनाये ॥ १०४ ॥ |
| दिव्यमाल्याम्बरधरा स्नाता भूषणभूषिता ।<br>पश्यतां सर्वदेवानां ययौ वक्षःस्थलं हरेः ॥ १०५ | इस प्रकार दिव्य माला और वस्त्र धारण कर, दिव्य जलसे स्नान कर, दिव्य आभूषणोंसे विभूषित हो श्रीलक्ष्मीजी सम्पूर्ण देवताओंके देखते-देखते श्रीविष्णुभगवान्के वक्षःस्थलमें विराजमान हुईं ॥ १०५ ॥ |
४२ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ९
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| तया विलोकिता देवा हरिवक्षःस्थलस्थया।<br>लक्ष्म्या मैत्रेय सहसा परां निर्वृतिमागताः॥ १०६<br>उद्वेगं परमं जग्मुर्दैत्या विष्णुपरानिमुखाः।<br>त्यक्ता लक्ष्म्या महाभाग विप्रचित्तिपुरोगमाः॥ १०७ | हे मैत्रेय! श्रीहरिके वक्षःस्थलमें विराजमान श्रीलक्ष्मीजीका दर्शन कर देवताओंको अकस्मात् अत्यन्त प्रसन्नता प्राप्त हुई॥ १०६॥ और हे महाभाग! लक्ष्मीजीसे परित्यक्त होनेके कारण भगवान् विष्णुके विरोधी विप्रचित्ति आदि दैत्यगण परम उद्विग्न (व्याकुल) हुए॥ १०७॥ तब |
| ततस्ते जगृहुर्दैत्या धन्वन्तरिकरस्थितम्।<br>कमण्डलुं महावीर्या यत्रास्तेऽमृतमुत्तमम्॥ १०८ | उन महाबलवान् दैत्योंने श्रीधन्वन्तरिजीके हाथसे वह कमण्डलु छीन लिया जिसमें अति उत्तम अमृत भरा हुआ था॥ १०८॥ अतः |
| मायया मोहयित्वा तान्विष्णुः स्त्रीरूपसंस्थितः।<br>दानवेभ्यस्तदादाय देवेभ्यः प्रददौ प्रभुः॥ १०९ | स्त्री (मोहिनी) रूपधारी भगवान् विष्णुने अपनी मायासे दानवोंको मोहित कर उनसे वह कमण्डलु लेकर देवताओंको दे दिया॥ १०९॥ |
| ततः पपुः सुरगणाः शक्राद्यास्तत्तदामृतम्।<br>उद्यतायुधनिस्त्रिंशा दैत्यास्तांश्च समभ्ययुः॥ ११० | तब इन्द्र आदि देवगण उस अमृतको पी गये; इससे दैत्यलोग अति तीखे खड्ग आदि शस्त्रोंसे सुसज्जित हो उनके ऊपर टूट पड़े॥ ११०॥ किन्तु |
| पीतेऽमृते च बलिभिर्देवैर्दैत्यचमूस्तदा।<br>बध्यमाना दिशो भेजे पातालं च विवेश वै॥ १११ | अमृत-पानके कारण बलवान् हुए देवताओंद्धारा मारी-काटी जाकर दैत्योंकी सम्पूर्ण सेना दिशा-विदिशाओंमें भाग गयी और कुछ पाताललोकमें भी चली गयी॥ १११॥ |
| ततो देवा मुदा युक्ताः शङ्खचक्रगदाभृतम्।<br>प्रणिपत्य यथापूर्वमाशासन्तत्रिविष्टपम्॥ ११२ | फिर देवगण प्रसन्नतापूर्वक शंख-चक्र-गदा-धारी भगवान्को प्रणाम कर पहलेहीके समान स्वर्गका शासन करने लगे॥ ११२॥ |
| ततः प्रसन्नभाः सूर्यः प्रययौ स्वेन वर्त्मना।<br>ज्योतींषि च यथामार्गं प्रययुर्मुरिसत्तम॥ ११३ | हे मुनिश्रेष्ठ! उस समयसे प्रखर तेजायुक्त भगवान् सूर्य अपने मार्गसे तथा अन्य तारागण भी अपने-अपने मार्गसे चलने लगे॥ ११३॥ |
| जज्वाल भगवांश्चोच्चैश्चारुदीप्तिर्विभावसुः।<br>धर्मे च सर्वभूतानां तदा मतिरजायत॥ ११४ | सुन्दर दीप्तिशाली भगवान् अग्निदेव अत्यन्त प्रज्वलित हो उठे और उसी समयसे समस्त प्राणियोंकी धर्ममें प्रवृत्ति हो गयी॥ ११४॥ |
| त्रैलोक्यं च श्रिया जुष्टं बभूव द्विजसत्तम।<br>शक्रश्च त्रिदशश्रेष्ठः पुनः श्रीमानजायत॥ ११५ | हे द्विजोत्तम! त्रिलोकी श्रीसम्पन्न हो गयी और देवताओंमें श्रेष्ठ इन्द्र भी पुनः श्रीमान् हो गये॥ ११५॥ तदनन्तर |
| सिंहासनगतः शक्रस्सम्प्राप्य त्रिदिवं पुनः।<br>देवराज्ये स्थितो देवीं तुष्टावाब्जकरां ततः॥ ११६ | इन्द्रने स्वर्गलोकमें जाकर फिरसे देवराज्यपर अधिकार पाया और राजसिंहासनपर आरूढ़ हो पद्मस्ता श्रीलक्ष्मीजीकी इस प्रकार स्तुति की॥ ११६॥ |
| इन्द्र उवाच | इन्द्र बोले- |
| नमस्ये सर्वलोकानां जननीमब्जसम्भवाम्।<br>श्रियमित्निद्रपद्माक्षीं विष्णुवक्षःस्थलस्थिताम्॥ ११७ | सम्पूर्ण लोकोंकी जननी, विकसित कमलके सदृश नेत्रोंवाली, भगवान् विष्णुके वक्षःस्थलमें विराजमान कमलोद्भवा श्रीलक्ष्मीदेवीको मैं नमस्कार करता हूँ॥ ११७॥ |
| पद्मालयां पद्मपद्मपत्रासनिभेक्षणाम्।<br>वन्दे पद्ममुखीं देवीं पद्मनाभप्रियामहम्॥ ११८ | कमल ही जिनका निवासस्थान है, कमल ही जिनके कर-कमलोंमें सुशोभित है, तथा कमल-दलके समान ही जिनके नेत्र हैं उन कमलमुखी कमलनाभ-प्रिया श्रीकमलादेवीकी मैं वन्दना करता हूँ॥ ११८॥ |
| त्वं सिद्धिस्त्वं स्वधा स्वाहा सुधा त्वं लोकपावनी।<br>सन्ध्या रात्रिः प्रभा भूतिर्मेधा श्रद्धा सरस्वती॥ ११९ | हे देवि! तुम सिद्धि हो, स्वधा हो, स्वाहा हो, सुधा हो और त्रिलोकीको पवित्र करनेवाली हो तथा तुम ही सन्ध्या, रात्रि, प्रभा, विभूति, मेधा, श्रद्धा और सरस्वती हो॥ ११९॥ |
अ० ९ ] * प्रथम अंश * ४३
यज्ञविद्या महाविद्या गुह्यविद्या च शोभने । आत्मविद्या च देवि त्वं विमुक्तिफलदायिनी ॥ १२०
आन्वीक्षिकी त्रयीवार्त्ता दण्डनीतिस्त्वमेव च। सौम्यासौम्यैर्जगद्रूपैस्त्वयैतद्देवि पूरितम्॥ १२१
का त्वन्या त्वामृते देवि सर्वयज्ञमयं वपुः। अध्यास्ते देवदेवस्य योगिचिन्त्यं गदाभृतः॥ १२२
त्वया देवि परित्यक्तं सकलं भुवनत्रयम्। विनष्टप्रायमभवत्त्वयेदानीं समेधितम्॥ १२३
दाराः पुत्रास्तथागारसुहृद्धान्यधनादिकम्। भवत्येतन्महाभागे नित्यं त्वद्वीक्षणान्नृणाम्॥ १२४
शरीरारोग्यमैश्वर्यमरिपक्षक्षयः सुखम्। देवि त्वद्दृष्टिदृष्टानां पुरुषाणां न दुर्लभम्॥ १२५
त्वं माता सर्वलोकानां देवदेवो हरिः पिता। त्वयैतद्विष्णुना चाम्ब जगद्व्याप्तं चराचरम्॥ १२६
मा नः कोशं तथा गोष्ठं मा गृहं मा परिच्छदम्। मा शरीरं कलत्रं च त्यजेथाः सर्वपावनि॥ १२७
मा पुत्रान्मा सुहृद्वर्गं मा पशून्मा विभूषणम्। त्यजेथा मम देवस्य विष्णोर्वक्षः स्थललये॥ १२८
सत्त्वेन सत्यशौचाभ्यां तथा शीलादिभिर्गुणैः। त्यज्यन्ते ते नराः सद्यः सन्त्यक्ता ये त्वयामले॥ १२९
त्वया विलोकिताः सद्यः शीलाद्यैरखिलैर्गुणैः। कुलैश्वर्यैश्च युज्यन्ते पुरुषा निर्गुणा अपि॥ १३०
स श्लाघ्यः स गुणी धन्यः स कुलीनः स बुद्धिमान्। स शूरः स च विक्रान्तो यस्त्वया देवि वीक्षितः॥ १३१
सद्यो वैगुण्यमायान्ति शीलाद्याः सकला गुणाः। पराङ्मुखी जगद्धात्री यस्य त्वं विष्णुवल्लभे॥ १३२
न ते वर्णयितुं शक्ता गुणाञ्जिह्वापि वेधसः। प्रसीद देवि पद्माक्षि मास्मांस्त्याक्षीः कदाचन॥ १३३
श्रीपराशर उवाच
एवं श्रीः संस्तुता सम्यक् प्राह देवी शतक्रतुम्। शृण्वतां सर्वदेवानां सर्वभूतस्थिता द्विज॥ १३४
हे शोभने! यज्ञ-विद्या (कर्म-काण्ड), महाविद्या (उपासना) और गुह्यविद्या (इन्द्रजाल) तुम्हीं हो तथा हे देवि! तुम्हीं मुक्ति-फलदायिनी आत्मविद्या हो॥ १२०॥
हे देवि! आन्वीक्षिकी (तर्कविद्या), वेदत्रयी, वार्त्ता (शिल्पवाणिज्यादि) और दण्डनीति (राजनीति) भी तुम्हीं हो। तुम्हींने अपने शान्त और उग्र रूपोंसे यह समस्त संसार व्याप्त किया हुआ है॥ १२१॥
हे देवि! तुम्हारे बिना और ऐसी कौन स्त्री है जो देवदेव भगवान् गदाधरके योगिजनचिन्तित सर्वयज्ञमय शरीरका आश्रय पा सके॥ १२२॥
हे देवि! तुम्हारे छोड़ देनेपर सम्पूर्ण त्रिलोकी नष्टप्राय हो गयी थी; अब तुम्हींने उसे पुनः जीवन-दान दिया है॥ १२३॥
हे महाभागे! स्त्री, पुत्र, गृह, धन, धान्य तथा सुहृद् ये सब सदा आपके दृष्टिपातसे मनुष्योंको मिलते हैं॥ १२४॥
हे देवि! तुम्हारी कृपा-दृष्टिके पात्र पुरुषोंके लिये शारीरिक आरोग्य, ऐश्वर्य, शत्रु-पक्षका नाश और सुख आदि कुछ भी दुर्लभ नहीं हैं॥ १२५॥
तुम सम्पूर्ण लोकोंकी माता हो और देवदेव भगवान् हरि पिता हैं। हे मातः! तुमसे और श्रीविष्णुभगवान्से यह सकल चराचर जगत् व्याप्त है॥ १२६॥
हे सर्वपावनि मातेश्वरि! हमारे कोश (खजाना), गोष्ठ (पशुशाला), गृह, भोगसामग्री, शरीर और स्त्री आदिको आप कभी न त्यागें अर्थात् इनमें भरपूर रहें॥ १२७॥
अयि विष्णुवक्षःस्थल निवासिनि! हमारे पुत्र, सुहृद्, पशु और भूषण आदिको आप कभी न छोड़ें॥ १२८॥
हे अमले! जिन मनुष्योंको तुम छोड़ देती हो उन्हें सत्त्व (मानसिक बल), सत्य, शौच और शील आदि गुण भी शीघ्र ही त्याग देते हैं॥ १२९॥
और तुम्हारी कृपा-दृष्टि होनेपर तो गुणहीन पुरुष भी शीघ्र ही शील आदि सम्पूर्ण गुण और कुलीनता तथा ऐश्वर्य आदिसे सम्पन्न हो जाते हैं॥ १३०॥
हे देवि! जिसपर तुम्हारी कृपा-दृष्टि है वही प्रशंसनीय है, वही गुणी है, वही धन्यभाग्य है, वही कुलीन और बुद्धिमान् है तथा वही शूरवीर और पराक्रमी है॥ १३१॥
हे विष्णुप्रिये! हे जगज्जननि! तुम जिससे विमुख हो उसके तो शील आदि सभी गुण तुरन्त अवगुणरूप हो जाते हैं॥ १३२॥
हे देवि! तुम्हारे गुणोंका वर्णन करनेमें तो श्रीब्रह्माजीकी रसना भी समर्थ नहीं है। [फिर मैं क्या कर सकता हूँ?] अतः हे कमलनयने! अब मुझपर प्रसन्न हो और मुझे कभी न छोड़ो॥ १३३॥
**श्रीपराशरजी बोले—**हे द्विज! इस प्रकार सम्यक् स्तुति किये जानेपर सर्वभूतस्थिता श्रीलक्ष्मीजी सब देवताओंके सुनते हुए इन्द्रसे इस प्रकार बोलीं॥ १३४॥
| ४४ | * श्रीविष्णुपुराण * | [ अ० ९ |
|---|
श्रीरुवाच परितुष्टास्मि देवेश स्तोत्रेणानेन ते हरे । वरं वृणीष्व यस्त्विष्टो वरदाहं तवागता ॥ १३५
इन्द्र उवाच वरदा यदि मे देवि वराहो यदि वाप्यहम् । त्रैलोक्यं न त्वया त्याज्यमेष मेऽस्तु वरः परः ॥ १३६
स्तोत्रेण यस्तथैतेन त्वां स्तोष्यत्यब्धिसम्भवे । स त्वया न परित्याज्यो द्वितीयोऽस्तु वरो मम ॥ १३७
श्रीरुवाच त्रैलोक्यं त्रिदशश्रेष्ठ न सन्त्यक्ष्यामि वासव । दत्तो वरो मया यस्ते स्तोत्राराधनतुष्टया ॥ १३८
यश्च सायं तथा प्रातः स्तोत्रेणानेन मानवः । मां स्तोष्यति न तस्याहं भविष्यामि पराङ्मुखी ॥ १३९
श्रीपराशर उवाच एवं ददौ वरं देवी देवराजाय वै पुरा । मैत्रेय श्रीमर्हाभागा स्तोत्राराधनतोषिता ॥ १४०
भृगोः ख्यातयां समुत्पन्ना श्रीः पूर्वमुदधेः पुनः । देवदानवयत्नेन प्रसूताऽमृतमन्थने ॥ १४१
एवं यदा जगत्स्वामी देवदेवो जनार्दनः । अवतारं करोत्येषा तदा श्रीस्तत्सहायिनी ॥ १४२
पुनश्च पद्मादुत्पन्ना आदित्योऽभूद्यदा हरिः । यदा तु भार्गवो रामस्तदाभूद्धरणी त्वियम् ॥ १४३
राघवत्वेऽभवत्सीता रुक्मिणी कृष्णजन्मनि । अन्येषु चावतारेषु विष्णोरेषानपायिनी ॥ १४४
देवत्वे देवदेहेयं मनुष्यत्वे च मानुषी । विष्णोर्देहानुरूपां वै करोत्येषात्मनस्तनुम् ॥ १४५
यश्चैतच्छृणुयाज्जन्म लक्ष्म्या यश्च पठेन्नरः । श्रियो न विच्युतिस्तस्य गृहे यावत्कुलत्रयम् ॥ १४६
पठ्यते येषु चैवेयं गृहेषु श्रीस्तुतिर्मुने । अलक्ष्मीः कलहाधारा न तेष्वास्ते कदाचन ॥ १४७
एतत्ते कथितं ब्रह्मन् यन्मां त्वं परिपृच्छसि । क्षीराब्धौ श्रीर्यथा जाता पूर्वं भृगुसुता सती ॥ १४८
श्रीलक्ष्मीजी बोलीं— हे देवेश्वर इन्द्र! मैं तेरे इस स्तोत्रसे अति प्रसन्न हूँ; तुझको जो अभीष्ट हो वही वर माँग ले। मैं तुझे वर देनेके लिये ही यहाँ आयी हूँ ॥ १३५ ॥
इन्द्र बोले— हे देवि! यदि आप वर देना चाहती हैं और मैं भी यदि वर पानेयोग्य हूँ तो मुझको पहला वर तो यही दीजिये कि आप इस त्रिलोकीका कभी त्याग न करें ॥ १३६ ॥ और हे समुद्रसम्भवे! दूसरा वर मुझे यह दीजिये कि जो कोई आपकी इस स्तोत्रसे स्तुति करे उसे आप कभी न त्यागें ॥ १३७ ॥
श्रीलक्ष्मीजी बोलीं— हे देवश्रेष्ठ इन्द्र! मैं अब इस त्रिलोकीको कभी न छोड़ूँगी। तेरे स्तोत्रसे प्रसन्न होकर मैं तुझे यह वर देती हूँ ॥ १३८ ॥ तथा जो कोई मनुष्य प्रातःकाल और सायंकालके समय इस स्तोत्रसे मेरी स्तुति करेगा उससे भी मैं कभी विमुख न होऊँगी ॥ १३९ ॥
श्रीपराशरजी बोले— हे मैत्रेय! इस प्रकार पूर्वकालमें महाभागा श्रीलक्ष्मीजीने देवराजकी स्तोत्ररूप आराधनासे सन्तुष्ट होकर उन्हें ये वर दिये ॥ १४० ॥ लक्ष्मीजी पहले भृगुजीके द्वारा ख्याति नामक स्त्रीसे उत्पन्न हुई थीं, फिर अमृत-मन्थनके समय देव और दानवोंके प्रयत्नसे वे समुद्रसे प्रकट हुईं ॥ १४१ ॥ इस प्रकार संसारके स्वामी देवाधिदेव श्रीविष्णुभगवान् जब-जब अवतार धारण करते हैं तभी लक्ष्मीजी उनके साथ रहती हैं ॥ १४२ ॥ जब श्रीहरि आदित्यरूप हुए तो वे पद्मासे फिर उत्पन्न हुईं [ और पद्मा कहलायीं ]। तथा जब वे परशुराम हुए तो ये पृथिवी हुईं ॥ १४३ ॥ श्रीहरिके राम होनेपर ये सीताजी हुईं और कृष्णावतारमें श्रीरुक्मिणीजी हुईं। इसी प्रकार अन्य अवतारोंमें भी ये भगवान्से कभी पृथक् नहीं होतीं ॥ १४४ ॥ भगवान्के देवरूप होनेपर ये दिव्य शरीर धारण करती हैं और मनुष्य होनेपर मानवीरूपसे प्रकट होती हैं। विष्णुभगवान्के शरीरके अनुरूप ही ये अपना शरीर भी बना लेती हैं ॥ १४५ ॥ जो मनुष्य लक्ष्मीजीके जन्मकी इस कथाको सुनेगा अथवा पढ़ेगा उसके घरमें (वर्तमान आगामी और भूत) तीनों कुलोंके रहते हुए कभी लक्ष्मीका नाश न होगा ॥ १४६ ॥ हे मुने! जिन घरोंमें लक्ष्मीजीके इस स्तोत्रका पाठ होता है उनमें कलहकी आधारभूता दरिद्रता कभी नहीं ठहर सकती ॥ १४७ ॥ हे ब्रह्मन्! तुमने जो मुझसे पूछा था कि पहले भृगुजीकी पुत्री होकर फिर लक्ष्मीजी क्षीर-समुद्रसे कैसे उत्पन्न हुईं सो मैंने तुमसे यह सब वृत्तान्त कह दिया ॥ १४८ ॥
अ० १० ] * प्रथम अंश * ४५
इति सकलविभूत्यवाप्तिहेतुः
स्तुतिरियमिन्द्रमुखोद्गता हि लक्ष्म्याः।
अनुदिनमिह पठ्यते नृभिर्यै-
र्वसति न तेषु कदाचिदप्यलक्ष्मीः ॥ १४९ ॥
इस प्रकार इन्द्रके मुखसे प्रकट हुई यह लक्ष्मीजीकी स्तुति सकल विभूतियोंकी प्राप्तिका कारण है। जो लोग इसका नित्यप्रति पाठ करेंगे उनके घरमें निर्धनता कभी नहीं रह सकेगी ॥ १४९ ॥
इति श्रीविष्णुपुराणे प्रथमेऽशे नवमोऽध्यायः॥ ९॥
दसवाँ अध्याय
भृगु, अग्नि और अग्निष्वात्तादि पितरोंकी सन्तानका वर्णन
श्रीमैत्रेय उवाच
कथितं मे त्वया सर्वं यत्पृष्टोऽसि मया मुने।
भृगुसर्गात्प्रभृत्येष सर्गो मे कथ्यतां पुनः॥ १
**श्रीमैत्रेयजी बोले—**हे मुने! मैंने आपसे जो कुछ पूछा था वह सब आपने वर्णन किया; अब भृगुजीकी सन्तानसे लेकर सम्पूर्ण सृष्टिका आप मुझसे फिर वर्णन कीजिये॥ १॥
श्रीपराशर उवाच
भृगोः ख्यात्यां समुत्पन्ना लक्ष्मीर्विष्णुपरिग्रहः।
तथा धातृविधातारौ ख्यात्यां जातौ सुतौ भृगोः॥ २
आयतिर्नियतिश्चैव मेरोः कन्ये महात्मनः।
भार्ये धातृविधात्रोस्ते तयोर्जातौ सुतावुभौ॥ ३
प्राणश्चैव मृकण्डुश्च मार्कण्डेयो मृकण्डुतः।
ततो वेदशिरा जज्ञे प्राणस्यापि सुतं शृणु॥ ४
प्राणस्य द्युतिमान्पुत्रो राजवांश्च ततोऽभवत्।
ततो वंशो महाभाग विस्तरं भार्गवो गतः॥ ५
**श्रीपराशरजी बोले—**भृगुजीके द्वारा ख्यातिसे विष्णुपत्नी लक्ष्मीजी और धाता, विधाता नामक दो पुत्र उत्पन्न हुए॥ २॥ महात्मा मेरुकी आयति और नियति-नाम्नी कन्याएँ धाता और विधाताकी स्त्रियाँ थीं; उनसे उनके प्राण और मृकण्डु नामक दो पुत्र हुए। मृकण्डुसे मार्कण्डेय और उनसे वेदशिराका जन्म हुआ। अब प्राणकी सन्तानका वर्णन सुनो॥ ३-४॥ प्राणका पुत्र द्युतिमान् और उसका पुत्र राजवान् हुआ। हे महाभाग! उस राजवान्से फिर भृगुवंशका बड़ा विस्तार हुआ॥ ५॥
पत्नी मरीचेः सम्भूतिः पौर्णमासमसूत।
विरजाः पर्वतश्चैव तस्य पुत्रौ महात्मनः॥ ६
वंशसंकीर्तने पुत्रान्वदिष्येऽहं ततो द्विज।
मरीचिकी पत्नी सम्भूतिने पौर्णमासको उत्पन्न किया। उस महात्माके विरजा और पर्वत दो पुत्र थे॥ ६॥ हे द्विज! उनके वंशका वर्णन करते समय मैं उन दोनोंकी सन्तानका वर्णन करूँगा।
स्मृतिश्चाङ्गिरसः पत्नी प्रसूता कन्यकास्तथा।
सिनीवाली कुहूश्चैव राका चानुमतिस्तथा॥ ७
अंगिराकी पत्नी स्मृति थी, उसके सिनीवाली, कुहू, राका और अनुमति नामकी कन्याएँ हुईं॥ ७॥
अनसूया तथैवात्रेर्जज्ञे निष्कल्मषान्सुतान्।
सोमं दुर्वाससं चैव दत्तात्रेयं च योगिनम्॥ ८
अत्रिकी भार्या अनसूयाने चन्द्रमा, दुर्वासा और योगी दत्तात्रेय—इन निष्पाप पुत्रोंको जन्म दिया॥ ८॥
प्रीत्यां पुलस्त्यभार्यायां दत्तोळिस्तत्सुतोऽभवत्।
पूर्वजन्मनि योऽगस्त्यः स्मृतः स्वायम्भुवेऽन्तरे॥ ९
पुलस्त्यकी स्त्री प्रीतिसे दत्तोळिका जन्म हुआ जो अपने पूर्व जन्ममें स्वायम्भुव मन्वन्तरमें अगस्त्य कहा जाता था॥ ९॥
कर्दमश्चोर्वरीयांश्च सहिष्णुश्च सुतास्त्रयः।
क्षमा तु सुषुवे भार्या पुलहस्य प्रजापतेः॥ १०
प्रजापति पुलहकी पत्नी क्षमासे कर्दम, उर्वरीयान् और सहिष्णु ये तीन पुत्र हुए॥ १०॥
४६ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ११
| क्रतोश्च सन्ततिर्भार्या वालखिल्यानसूत।<br>षष्टिपूत्रसहस्राणि मुनीनामूर्ध्वरेतसाम्।<br>अङ्गुष्ठपर्वमात्राणां ज्वलद्भास्करतेजसाम्॥ ११<br>ऊर्जायां तु वसिष्ठस्य सप्ताजायन्त वै सुताः॥ १२<br>रजो गोत्रोर्ध्वबाहुश्च सवनश्चानघस्तथा।<br>सुतपाः शुक्र इत्येते सर्वे सप्तर्षयोऽमलाः॥ १३<br>योऽसावग्न्यभिमानी स्याद् ब्रह्मणस्तनयोऽग्रजः।<br>तस्मात्स्वाहा सुताँल्लेभे त्रीनूदारौजसो द्विज॥ १४<br>पावकं पवमानं तु शुचिं चापि जलाशिनम्॥ १५<br>तेषां तु सन्ततावन्ये चत्वारिंशच्च पञ्च च।<br>कथ्यन्ते वह्नयश्चैते पितापुत्रत्रयं च यत्॥ १६<br>एवमेकोनपञ्चाशद्वह्नयः परिकीर्तिताः॥ १७<br>पितरो ब्रह्मणा सृष्टा व्याख्याता ये मया द्विज।<br>अग्निष्वात्ता बर्हिषदोऽनग्नयः साग्नयश्च ये॥ १८<br>तेभ्यः स्वधा सुते जज्ञे मेनां वै धारिणीं तथा।<br>ते उभे ब्रह्मवादिन्यौ योगिन्यावप्युभे द्विज॥ १९<br>उत्तमज्ञानसम्पन्ने सर्वैः समुदितैर्गुणैः॥ २०<br>इत्येषा दक्षकन्यानां कथितापत्यसन्ततिः।<br>श्रद्धावान्संस्मरन्नेतामनपत्यो न जायते॥ २१ | क्रतुकी सन्तति नामक भार्याने अँगूठेके पोरुओंके समान शरीरवाले तथा प्रखर सूर्यके समान तेजस्वी वालखिल्यादि साठ हजार ऊर्ध्वरेता मुनियोंको जन्म दिया॥ ११॥ वसिष्ठकी ऊर्जा नामक स्त्रीसे रज, गोत्र, ऊर्ध्वबाहु, सवन, अनघ, सुतपा और शुक्र ये सात पुत्र उत्पन्न हुए। ये निर्मल स्वभाववाले समस्त मुनिगण [तीसरे मन्वन्तरमें] सप्तर्षि हुए॥ १२-१३॥<br>हे द्विज! अग्निका अभिमानी देव, जो ब्रह्माजीका ज्येष्ठ पुत्र है, उसके द्वारा स्वाहा नामक पत्नीसे अति तेजस्वी पावक, पवमान और जलको भक्षण करनेवाला शुचि—ये तीन पुत्र हुए॥ १४-१५॥ इन तीनोंके [प्रत्येकके पन्द्रह-पन्द्रह पुत्रके क्रमसे] पैंतालीस सन्तानें हुईं। पिता अग्नि और उसके तीन पुत्रोंको मिलाकर ये सब अग्नि ही कहलाते हैं। इस प्रकार कुल उनचास (४९) अग्नि कहे गये हैं॥ १६-१७॥ हे द्विज! ब्रह्माजीद्वारा रचे गये जिन अनग्निक अग्निष्वात्ता और साग्निक बर्हिषद् आदि पितरोंके विषयमें तुमसे कहा था। उनके द्वारा स्वधाने मेना और धारिणी नामक दो कन्याएँ उत्पन्न कीं। वे दोनों ही उत्तम ज्ञानसे सम्पन्न और सभी गुणोंसे युक्त ब्रह्मवादिनी तथा योगिनी थीं॥ १८-२०॥<br>इस प्रकार यह दक्षकन्याओंकी वंशपरम्पराका वर्णन किया। जो कोई श्रद्धापूर्वक इसका स्मरण करता है वह निःसन्तान नहीं रहता॥ २१॥ |
इति श्रीविष्णुपुराणे प्रथमेंऽशे दशमोऽध्यायः॥ १०॥
ग्यारहवाँ अध्याय
ध्रुवका वनगमन और मरीचि आदि ऋषियोंसे भेंट
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले— |
|---|---|
| प्रियव्रतोत्तानपादौ मनोः स्वायंभुवस्य तु।<br>द्वौ पुत्रौ तु महावीर्यौ धर्मज्ञौ कथितौ तव॥ १<br>तयोरुत्तानपादस्य सुरुच्यामुत्तमः सुतः।<br>अभीष्टायामभूद्ब्रह्मन्पितुरत्यन्तवल्लभः॥ २<br>सुनीतिर्नाम या राज्ञस्तस्यासीन्महिषी द्विज।<br>स नातिप्रीतिमांस्तस्यामभूद्यस्या ध्रुवः सुतः॥ ३ | हे मैत्रेय! मैंने तुम्हें स्वायम्भुवमनुके प्रियव्रत एवं उत्तानपाद नामक दो महाबलवान् और धर्मज्ञ पुत्र बतलाये थे॥ १॥ हे ब्रह्मन्! उनमेंसे उत्तानपादकी प्रेयसी पत्नी सुरुचिसे पिताका अत्यन्त लाडला उत्तम नामक पुत्र हुआ॥ २॥ हे द्विज! उस राजाकी जो सुनीति नामक राजमहिषी थी उसमें उसका विशेष प्रेम न था। उसका पुत्र ध्रुव हुआ॥ ३॥ |
अ० ११ ] * प्रथम अंश * ४७
| राजासनस्थितस्याङ्कं पितुर्भ्रातरमाश्रितम्।<br>दृष्ट्वोत्तमं ध्रुवश्चक्रे तमारोढुं मनोरथम्॥ ४<br>प्रत्यक्षं भूपतिस्तस्याः सुरुच्या नाभ्यनन्दत।<br>प्रणयेनागतं पुत्रमुत्सङ्गारोहणोत्सुकम्॥ ५<br>सपत्नीतनयं दृष्ट्वा तमङ्कारोहणोत्सुकम्।<br>स्वपुत्रं च तथारूढं सुरुचिर्वाक्यमब्रवीत्॥ ६<br>क्रियते किं वृथा वत्स महानेष मनोरथः।<br>अन्यस्त्रीगर्भजातेन ह्यसम्भ्रूय ममोदरे॥ ७<br>उत्तमोत्तममप्राप्यमविवेको हि वाञ्छसि।<br>सत्यं सुतस्त्वमप्यस्य किन्तु न स्वं मया धृतः॥ ८<br>एतद्राजासनं सर्वभूतृत्संश्रयकेतनम्।<br>योग्यं ममैव पुत्रस्य किमात्मा क्लिश्यते त्वया॥ ९<br>उच्चैर्मनोरथस्तेऽयं मत्पुत्रस्येव किं वृथा।<br>सुनीत्यामात्मनो जन्म किं त्वया नावगम्यते॥ १०<br>श्रीपराशर उवाच<br>उत्सृज्य पितरं बालस्तच्छ्रुत्वा मातृभाषितम्।<br>जगाम कुपितो मातुर्निजाया द्विज मन्दिरम्॥ ११<br>तं दृष्ट्वा कुपितं पुत्रमीषत्प्रस्फुरिताधरम्।<br>सुनीतिरङ्कमारोप्य मैत्रेयेदमभाषत॥ १२<br>वत्स कः कोपहेतुस्ते कश्च त्वां नाभिनन्दति।<br>कोऽवजानाति पितरं वत्स यस्तेऽपराध्यति॥ १३<br>श्रीपराशर उवाच<br>इत्युक्तः सकलं मात्रे कथयामास तद्यथा।<br>सुरुचिः प्राह भूपालप्रत्यक्षमतिगर्विता॥ १४<br>विनिःश्वस्येति कथिते तस्मिन्युत्रेण दुर्मनाः।<br>श्वासक्षामेक्षणा दीना सुनीतिर्वाक्यमब्रवीत्॥ १५<br>सुनीतिरुवाच<br>सुरुचिः सत्यमाहेदं मन्दभाग्योऽसि पुत्रक।<br>न हि पुण्यवतां वत्स सपत्नैरेवमुच्यते॥ १६<br>नोद्वेगस्तात कर्त्तव्यः कृतं यद्भवता पुरा।<br>तत्कोऽपहर्तुं शक्नोति दातुं कश्चाकृतं त्वया॥ १७<br>तत्त्वया नात्र कर्त्तव्यं दुःखं तद्वाक्यसम्भवम्॥ १८ | एक दिन राजसिंहासनपर बैठे हुए पिताकी गोदमें अपने भाई उत्तमको बैठा देख ध्रुवकी इच्छा भी गोदमें बैठनेकी हुई॥ ४॥ किन्तु राजाने अपनी प्रेयसी सुरुचिके सामने, गोदमें चढ़नेके लिये उत्कण्ठित होकर प्रेमवश आये हुए उस पुत्रका आदर नहीं किया॥ ५॥ अपनी सौतके पुत्रको गोदमें चढ़नेके लिये उत्सुक और अपने पुत्रको गोदमें बैठा देख सुरुचि इस प्रकार कहने लगी॥ ६॥ "अरे लल्ला! बिना मेरे पेटसे उत्पन्न हुए किसी अन्य स्त्रीका पुत्र होकर भी तू व्यर्थ क्यों ऐसा बड़ा मनोरथ करता है?॥ ७॥ तू अविवेकी है, इसीलिये ऐसी अलभ्य उत्तमोत्तम वस्तुकी इच्छा करता है। यह ठीक है कि तू भी इन्हीं राजाका पुत्र है, तथापि मैंने तो तुझे अपने गर्भमें धारण नहीं किया!॥ ८॥ समस्त चक्रवर्ती राजाओंका आश्रयरूप यह राजसिंहासन तो मेरे ही पुत्रके योग्य है; तू व्यर्थ क्यों अपने चित्तको सन्ताप देता है?॥ ९॥ मेरे पुत्रके समान तुझे वृथा ही यह ऊँचा मनोरथ क्यों होता है? क्या तू नहीं जानता कि तेरा जन्म सुनीतिसे हुआ है?"॥ १०॥<br>श्रीपराशरजी बोले—हे द्विज! विमाताका ऐसा कथन सुन वह बालक कुपित हो पिताको छोड़कर अपनी माताके महलको चल दिया॥ ११॥ हे मैत्रेय! जिसके ओष्ठ कुछ-कुछ काँप रहे थे—ऐसे अपने पुत्रको क्रोधयुक्त देख सुनीतिने उसे गोदमें बिठाकर पूछा—॥ १२॥ "बेटा! तेरे क्रोधका क्या कारण है? तेरा किसने आदर नहीं किया? तेरा अपराध करके कौन तेरे पिताजीका अपमान करने चला है?"॥ १३॥<br>श्रीपराशरजी बोले—ऐसा पूछनेपर ध्रुवने अपनी मातासे वे सब बातें कह दीं जो अति गर्वीली सुरुचिने उससे पिताके सामने कही थीं॥ १४॥ अपने पुत्रके सिसक-सिसककर ऐसा कहनेपर दुःखिनी सुनीतिने खिन्नचित्त और दीर्घ निःश्वासके कारण मलिननयना होकर कहा॥ १५॥<br>सुनीति बोली—बेटा! सुरुचिने ठीक ही कहा है, अवश्य ही तू मन्दभाग्य है। हे वत्स! पुण्यवानोंसे उनके विपक्षी ऐसा नहीं कह सकते॥ १६॥ बच्चा! तू व्याकुल मत हो, क्योंकि तूने पूर्व-जन्मोंमें जो कुछ किया है उसे दूर कौन कर सकता है? और जो नहीं किया वह तुझे दे भी कौन सकता है? इसलिये तुझे उसके वाक्योंसे खेद नहीं करना चाहिये॥ १७-१८॥ |
४८ * श्रीविष्णुपुराण * [अ० ११]
राजासनं राजच्छत्रं वराश्ववरवारणाः ।
यस्य पुण्यानि तस्यैते मत्वैतच्छाम्य पुत्रक ॥ १९
अन्यजन्मकृतैः पुण्यैः सुरुच्यां सुरुचिर्नृपः ।
भार्येति प्रोच्यते चान्या मद्विधा पुण्यवर्जिता ॥ २०
पुण्योपचयसम्पन्नस्तस्याः पुत्रस्तथोत्तमः ।
मम पुत्रस्तथा जातः स्वल्पपुण्यो ध्रुवो भवान् ॥ २१
तथापि दुःखं न भवान् कर्तुमर्हति पुत्रक ।
यस्य यावत्स तेनैव स्वेन तुष्यति मानवः ॥ २२
यदि ते दुःखमत्यर्थं सुरुच्या वचसाभवत् ।
तत्पुण्योपचये यत्नं कुरु सर्वफलप्रदे ॥ २३
सुशीलो भव धर्मात्मा मैत्रः प्राणिहिते रतः ।
निम्नं यथापः प्रवणाः पात्रमायान्ति सम्पदः ॥ २४
ध्रुव उवाच
अम्ब यत्त्वमिदं प्रात्थ प्रशमाय वचो मम ।
नैतद्दुर्वचसा भिन्ने हृदये मम तिष्ठति ॥ २५
सोऽहं तथा यतिष्यामि यथा सर्वोत्तमोत्तमम् ।
स्थानं प्राप्स्याम्यशेषाणां जगतामभिपूजितम् ॥ २६
सुरुचिर्दयिता राज्ञस्तस्या जातोऽस्मि नोदरात् ।
प्रभावं पश्य मेऽम्ब त्वं वृद्धस्यापि तवोदरे ॥ २७
उत्तमः स मम भ्राता यो गर्भेण धृतस्तया ।
स राजासनमाप्नोतु पित्रा दत्तं तथास्तु तत् ॥ २८
नान्यदत्तमभीप्सामि स्थानमम्ब स्वकर्मणा ।
इच्छामि तदहं स्थानं यन्न प्राप पिता मम ॥ २९
श्रीपराशर उवाच
निर्जगाम गृहान्मातुरित्युक्त्वा मातरं ध्रुवः ।
पुराच्च निर्गम्य ततस्तद्वाह्योपवनं ययौ ॥ ३०
स ददर्श मुनींस्तत्र सप्त पूर्वागतान्ध्रुवः ।
कृष्णाजिनोत्तरीयेषु विष्टरेषु समास्थितान् ॥ ३१
स राजपुत्रस्तान्सर्वान्प्रणिपत्याभ्यभाषत ।
प्रश्रयावनतः सम्यगभिवादनपूर्वकम् ॥ ३२
ध्रुव उवाच
उत्तानपादतनयं मां निबोधत सत्तमाः ।
जातं सुनीत्यां निर्वेदाद्युष्माकं प्राप्तमन्तिकम् ॥ ३३
हे वत्स ! जिसका पुण्य होता है उसीको राजासन, राजच्छत्र तथा उत्तम-उत्तम घोड़े और हाथी आदि मिलते हैं—ऐसा जानकर तू शान्त हो जा ॥ १९ ॥ अन्य जन्मोंमें किये हुए पुण्य-कर्मोंके कारण ही सुरुचिमें राजाकी सुरुचि (प्रीति) है और पुण्यहीना होनेसे ही मुझ-जैसी स्त्री केवल भार्या (भरण करनेयोग्य) ही कही जाती है ॥ २० ॥ उसी प्रकार उसका पुत्र उत्तम भी बड़ा पुण्यपुंज-सम्पन्न है और मेरा पुत्र तू ध्रुव मेरे समान ही अल्प पुण्यवान् है ॥ २१ ॥ तथापि बेटा ! तुझे दुःखी नहीं होना चाहिये, क्योंकि जिस मनुष्यको जितना मिलता है वह अपनी ही पूँजीमें मग्न रहता है ॥ २२ ॥ और यदि सुरुचिके वाक्योंसे तुझे अत्यन्त दुःख ही हुआ है तो सर्व फलदायक पुण्यके संग्रह करनेका प्रयत्न कर ॥ २३ ॥ तू सुशील, पुण्यात्मा, प्रेमी और समस्त प्राणियोंका हितैषी बन, क्योंकि जैसे नीची भूमिकी ओर ढलकतो हुआ जल अपने-आप ही पात्रमें आ जाता है वैसे ही सत्पात्र मनुष्यके पास स्वतः ही समस्त सम्पत्तियाँ आ जाती हैं ॥ २४ ॥
ध्रुव बोला—माताजी ! तुमने मेरे चित्तको शान्त करनेके लिये जो वचन कहे हैं वे दुर्वाक्योंसे बिंधे हुए मेरे हृदयमें तनिक भी नहीं ठहरते ॥ २५ ॥ इसलिये मैं तो अब वही प्रयत्न करूँगा जिससे सम्पूर्ण लोकोंसे आदरणीय सर्वश्रेष्ठ पदको प्राप्त कर सकूँ ॥ २६ ॥ राजाकी प्रेयसी तो अवश्य सुरुचि ही है और मैंने उसके उदरसे जन्म भी नहीं लिया है, तथापि हे माता ! अपने गर्भमें बढ़े हुए मेरा प्रभाव भी तुम देखना ॥ २७ ॥ उत्तम, जिसको उसने अपने गर्भमें धारण किया है, मेरा भाई ही है । पिताका दिया हुआ राजासन वही प्राप्त करे । [ भगवान् करें ] ऐसा ही हो ॥ २८ ॥ माताजी ! मैं किसी दूसरेके दिये हुए पदका इच्छुक नहीं हूँ; मैं तो अपने पुरुषार्थसे ही उस पदकी इच्छा करता हूँ जिसको पिताजीने भी नहीं प्राप्त किया है ॥ २९ ॥
श्रीपराशरजी बोले—मातासे इस प्रकार कह ध्रुव उसके महलसे निकल पड़ा और फिर नगरसे बाहर आकर बाहरी उपवनमें पहुँचा ॥ ३० ॥
वहाँ ध्रुवने पहलेसे ही आये हुए सात मुनीश्वरोंको कृष्ण मृग-चर्मके बिछौनोंसे युक्त आसनोंपर बैठे देखा ॥ ३१ ॥ उस राजकुमारने उन सबको प्रणाम कर अति नम्रता और समुचित अभिवादनादिपूर्वक उनसे कहा ॥ ३२ ॥
ध्रुवने कहा—हे महात्माओ ! मुझे आप सुनीतिसे
अ० ११ ] * प्रथम अंश * ४९
ऋषय ऊचुः चतुःपञ्चाब्दसम्भूतो बालस्त्वं नृपनन्दन। निर्वेदकारणं किञ्चित्तव नाद्यापि वर्तते॥ ३४ न चिन्त्यं भवतः किञ्चिद्दृश्यते भूपतिः पिता। न चैवेष्टवियोगादि तव पश्याम बालक॥ ३५ शरीरे न च ते व्याधिरस्माभिरुपलक्ष्यते। निर्वेदः किंनिमित्तस्ते कथ्यतां यदि विद्यते॥ ३६
श्रीपराशर उवाच ततः स कथयामास सुरुच्या यदुदाहृतम्। तन्निशम्य ततः प्रोचुर्मुनयस्ते परस्परम्॥ ३७ अहो क्षात्रं परं तेजो बालस्यापि यदक्षमा। सपत्न्या मातुरुक्तं यद् हृदयान्नापसर्पति॥ ३८ भो भो क्षत्रियदायाद निर्वेदाद्यात्त्वयाधुना। कर्तुं व्यवसितं तन्नः कथ्यतां यदि रोचते॥ ३९ यच्च कार्यं तवास्माभिः साहाय्यममितद्युते। तदुच्यतां विवक्षुस्त्वमस्माभिरुपलक्ष्यसे॥ ४०
ध्रुव उवाच नाहमर्थमभीप्सामि न राज्यं द्विजसत्तमाः। तत्स्थानमेकमिच्छामि भुक्तं नान्येन यत्पुरा॥ ४१ एतन्मे क्रियतां सम्यक् कथ्यतां प्राप्यते यथा। स्थानमग्र्यं समस्तेभ्यः स्थानेभ्यो मुनिसत्तमाः॥ ४२
मरीचिरुवाच अनाराधितगोविन्दैर्नैरैः स्थानं नृपात्मज। न हि सम्प्राप्यते श्रेष्ठं तस्मादाराधयाच्युतम्॥ ४३
अत्रिरुवाच परः पराणां पुरुषो यस्य तुष्टो जनार्दनः। स प्राप्नोत्यक्षयं स्थानमेतत्सत्यं मयोदितम्॥ ४४
अङ्गिरा उवाच यस्यान्तः सर्वमेवेदमच्युतस्याव्ययात्मनः। तमाराधय गोविन्दं स्थानमग्र्यं यदीच्छसि॥ ४५
पुलस्त्य उवाच परं ब्रह्म परं धाम योऽसौ ब्रह्म तथा परम्। तमाराध्य हरिं याति मुक्तिमप्यतिदुर्लभाम्॥ ४६
उत्पन्न हुआ राजा उत्तानपादका पुत्र जानें। मैं आत्म-ग्लानिके कारण आपके निकट आया हूँ॥ ३३॥
ऋषि बोले- राजकुमार! अभी तो तू चार-पाँच वर्षका ही बालक है। अभी तेरे निर्वेदका कोई कारण नहीं दिखायी पड़ता॥ ३४॥ तुझे कोई चिन्ताका विषय भी नहीं है, क्योंकि अभी तेरा पिता राजा जीवित है और हे बालक! तेरी कोई इष्ट वस्तु खो गयी हो ऐसा भी हमें दिखायी नहीं देता॥ ३५॥ तथा हमें तेरे शरीरमें भी कोई व्याधि नहीं दीख पड़ती फिर बता, तेरी ग्लानिका क्या कारण है?॥ ३६॥
श्रीपराशरजी बोले- तब सुरुचिने उससे जो कुछ कहा था वह सब उसने कह सुनाया। उसे सुनकर वे ऋषिगण आपसमें इस प्रकार कहने लगे॥ ३७॥ 'अहो! क्षात्रतेज कैसा प्रबल है, जिससे बालकमें भी इतनी अक्षमा है कि अपनी विमाताका कथन उसके हृदयसे नहीं टलता'॥ ३८॥ हे क्षत्रियकुमार! इस निर्वेदके कारण तूने जो कुछ करनेका निश्चय किया है, यदि तुझे रुचे तो, वह हमलोगोंसे कह दे॥ ३९॥ और हे अतुलित तेजस्वी! यह भी बता कि हम तेरी क्या सहायता करें, क्योंकि हमें ऐसा प्रतीत होता है कि तू कुछ कहना चाहता है॥ ४०॥
ध्रुवने कहा- हे द्विजश्रेष्ठ! मुझे न तो धनकी इच्छा है और न राज्यकी; मैं तो केवल एक उसी स्थानको चाहता हूँ जिसको पहले कभी किसीने न भोगा हो॥ ४१॥ हे मुनिश्रेष्ठ! आपकी यही सहायता होगी कि आप मुझे भली प्रकार यह बता दें कि क्या करनेसे वह सबसे अग्रगण्य स्थान प्राप्त हो सकता है॥ ४२॥
मरीचि बोले- हे राजपुत्र! बिना गोविन्दकी आराधना किये मनुष्यको वह श्रेष्ठ स्थान नहीं मिल सकता; अतः तू श्रीअच्युतकी आराधना कर॥ ४३॥
अत्रि बोले- जो परा प्रकृति आदिसे भी परे हैं वे परमपुरुष जनार्दन जिससे सन्तुष्ट होते हैं उसीको वह अक्षयपद मिलता है यह मैं सत्य-सत्य कहता हूँ॥ ४४॥
अंगिरा बोले- यदि तू अग्रस्थानका इच्छुक है तो जिन अव्ययात्मा अच्युतमें यह सम्पूर्ण जगत् ओतप्रोत है, उन गोविन्दकी ही आराधना कर॥ ४५॥
पुलस्त्य बोले- जो परब्रह्म, परमधाम और परस्वरूप हैं, उन हरिकी आराधना करनेसे मनुष्य अति दुर्लभ मोक्षपदको भी प्राप्त कर लेता है॥ ४६॥
५० * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ११
| पुलह उवाच<br>ऐन्द्रमिन्द्रः परं स्थानं यमाराध्य जगत्पतिम्।<br>प्राप यज्ञपतिं विष्णुं तमाराधय सुव्रत॥ ४७ | **पुलह बोले—**हे सुव्रत! जिन जगत्पतिकी आराधनासे इन्द्रने अत्युत्तम इन्द्रपद प्राप्त किया है, तू उन यज्ञपति भगवान् विष्णुकी आराधना कर॥ ४७॥ |
| क्रतुरुवाच<br>यो यज्ञपुरुषो यज्ञो योगेशः परमः पुमान्।<br>तस्मिंस्तुष्टे यदप्राप्यं किं तदस्ति जनार्दने ॥ ४८ | **क्रतु बोले—**जो परमपुरुष यज्ञपुरुष, यज्ञ और योगेश्वर हैं, उन जनार्दनके सन्तुष्ट होनेपर कौन-सी वस्तु दुर्लभ रह सकती है?॥४८॥ |
| वसिष्ठ उवाच<br>प्राप्नोष्याराधिते विष्णौ मनसा यद्यदिच्छसि।<br>त्रैलोक्यान्तर्गतं स्थानं किमु वत्सोत्तमोत्तमम्॥ ४९ | **वसिष्ठ बोले—**हे वत्स! विष्णुभगवान्की आराधना करनेपर तू अपने मनसे जो कुछ चाहेगा वही प्राप्त कर लेगा, फिर त्रिलोकीके उत्तमोत्तम स्थानकी तो बात ही क्या है?॥ ४९॥ |
| ध्रुव उवाच<br>आराध्यः कथितो देवो भवद्भिः प्रणतस्य मे।<br>मया तत्परितोषाय यज्जप्तव्यं तदुच्यताम्॥ ५०<br>यथा चाराधनं तस्य मया कार्यं महात्मनः।<br>प्रसादसुमुखास्तन्मे कथयन्तु महर्षयः॥ ५१ | **ध्रुवने कहा—**हे महर्षिगण! मुझ विनीतको आपने आराध्यदेव तो बता दिया। अब उसको प्रसन्न करनेके लिये मुझे क्या जपना चाहिये—यह बताइये। उस महापुरुषकी मुझे जिस प्रकार आराधना करनी चाहिये, वह आपलोग मुझसे प्रसन्नतापूर्वक कहिये॥ ५०-५१॥ |
| ऋषय ऊचुः<br>राजपुत्र यथा विष्णोराराधनपरैर्नरैः।<br>कार्यमाराधनं तन्नो यथावच्छ्रोतुमर्हसि॥ ५२<br>बाह्यार्थादखिलाच्चित्तं त्याजयेत्प्रथमं नरः।<br>तस्मिन्नेव जगद्धाम्नि ततः कुर्वीत निश्चलम्॥ ५३<br>एवमेकाग्रचित्तेन तन्मयेन धृतात्मना।<br>जप्तव्यं यन्निबोधैतत्तन्नः पार्थिवनन्दनः॥ ५४<br>हिरण्यगर्भपुरुषप्रधानाव्यक्तरूपिणे।<br>ॐ नमो वासुदेवाय शुद्धज्ञानस्वरूपिणे॥ ५५<br>एतज्जजाप भगवान् जप्यं स्वायम्भुवो मनुः।<br>पितामहस्तव पुरा तस्य तुष्टो जनार्दनः॥ ५६<br>ददौ यथाभिलषितां सिद्धिं त्रैलोक्यदुर्लभाम्।<br>तथा त्वमपि गोविन्दं तोषयैतत्स्सदा जपन्॥ ५७ | **ऋषिगण बोले—**हे राजकुमार! विष्णुभगवान्की आराधनामें तत्पर पुरुषोंको जिस प्रकार उनकी उपासना करनी चाहिये वह तू हमसे यथावत् श्रवण कर ॥५२॥ मनुष्यको चाहिये कि पहले सम्पूर्ण बाह्य विषयोंसे चित्तको हटावे और उसे एकमात्र उन जगदाधारमें ही स्थिर कर दे॥ ५३॥ हे राजकुमार! इस प्रकार एकाग्रचित्त होकर तन्मयभावसे जो कुछ जपना चाहिये, वह सुन—॥५४॥ 'ॐ हिरण्यगर्भ, पुरुष, प्रधान और अव्यक्तरूप शुद्ध ज्ञानस्वरूप वासुदेवको नमस्कार है'॥ ५५॥ इस (ॐ नमो भगवते वासुदेवाय) मन्त्रको पूर्वकालमें तेरे पितामह भगवान् स्वायम्भुव मनुने जपा था। तब उनसे सन्तुष्ट होकर श्रीजनार्दनने उन्हें त्रिलोकीमें दुर्लभ मनोवांछित सिद्धि दी थी। उसी प्रकार तू भी इसका निरन्तर जप करता हुआ श्रीगोविन्दको प्रसन्न कर॥ ५६-५७॥ |
इति श्रीविष्णुपुराणे प्रथमंशे एकादशोऽध्यायः ॥ ११॥
अ० १२] \hfill * प्रथम अंश * \hfill ५१
बारहवाँ अध्याय
ध्रुवकी तपस्यासे प्रसन्न हुए भगवान्का आविर्भाव और उसे ध्रुवपद-दान
श्रीपराशर उवाच
निशम्यैतदशेषेण मैत्रेय नृपतेः सुतः।
निर्जगाम वनात्तस्मात्प्रणिपत्य स तानृषीन्॥ १
कृतकृत्यमिवात्मानं मन्यमानस्ततो द्विज।
मधुसंज्ञं महापुण्यं जगाम यमुनाटटम्॥ २
पुनश्च मधुसंज्ञेन दैत्येनाधिष्ठितं यतः।
ततो मधुवनं नाम्ना ख्यातमत्र महीतले॥ ३
हत्वा च लवणं रक्षो मधुपुत्रं महाबलम्।
शत्रुघ्नो मधुरां नाम पुरीं यत्र चकार वै॥ ४
यत्र वै देवदेवस्य सान्निध्यं हरिमेधसः।
सर्वपापहरे तस्मिंस्तपस्तीर्थे चकार सः॥ ५
मरीचिमुख्यैर्मुनिभिर्यथोद्दिष्टमभूत्तथा ।
आत्मन्यशेषदेवेशं स्थितं विष्णुममन्यत॥ ६
अनन्यचेतसस्तस्य ध्यायतो भगवान्हरिः।
सर्वभूतगतो विप्र सर्वभावगतोऽभवत्॥ ७
श्रीपराशरजी बोले— हे मैत्रेय! यह सब सुनकर राजपुत्र ध्रुव उन ऋषियोंको प्रणामकर उस वनसे चल दिया॥ १॥ और हे द्विज! अपनेको कृतकृत्य-सा मानकर वह यमुनाटटवर्ती अति पवित्र मधु नामक वनमें आया। आगे चलकर उस वनमें मधु नामक दैत्य रहने लगा था, इसलिये वह इस पृथ्वीतलमें मधुवन नामसे विख्यात हुआ॥ २-३॥ वहीं मधुके पुत्र लवण नामक महाबली राक्षसको मारकर शत्रुघ्नने मधुरा (मथुर) नामकी पुरी बसायी॥ ४॥ जिस (मधुवन)-में निरन्तर देवदेव श्रीहरिकी सन्निधि रहती है उसी सर्वपापपहारी तीर्थमें ध्रुवने तपस्या की॥ ५॥ मरीचि आदि मुनीश्वरोंने उसे जिस प्रकार उपदेश किया था उसने उसी प्रकार अपने हृदयमें विराजमान निखिलदेवेश्वर श्रीविष्णुभगवान्का ध्यान करना आरम्भ किया॥ ६॥ इस प्रकार हे विप्र! अनन्य-चित्त होकर ध्यान करते रहनेसे उसके हृदयमें सर्वभूतान्तर्यामी भगवान् हरि सर्वतोभावसे प्रकट हुए॥ ७॥
मनस्यवस्थिते तस्मिन्विष्णौ मैत्रेय योगिनः।
न शशाक धरा भारमुद्वोढुं भूतधारिणी॥ ८
वामपादस्थिते तस्मिन्ननामाद्धं मेदिनी।
द्वितीयं च नामाद्धं क्षितेर्दक्षिणतः स्थिते॥ ९
पादाङ्गुष्ठेन सम्पीय यदा स वसुधां स्थितः।
तदा समस्ता वसुधा चचाल सह पर्वतः॥ १०
नद्यो नदाः समुद्राश्च सङ्क्षोभं परमं ययुः।
तत्क्षोभादमराः क्षोभं परं जग्मुर्महामुने॥ ११
यामा नाम तदा देवा मैत्रेय परमाकुलाः।
इन्द्रेण सह सम्मन्त्र्य ध्यानभङ्गं प्रचक्रमुः॥ १२
कूष्माण्डा विविधै रूपैर्महेन्द्रेण महामुने।
समाधिभङ्गमत्यन्तमारब्धाः कर्तुमातुराः॥ १३
हे मैत्रेय! योगी ध्रुवके चित्तमें भगवान् विष्णुके स्थित हो जानेपर सर्वभूतोंको धारण करनेवाली पृथिवी उसका भार न सँभाल सकी॥ ८॥ उसके बायें चरणपर खड़े होनेसे पृथिवीका बायाँ आधा भाग झुक गया और फिर दायें चरणपर खड़े होनेसे दायाँ भाग झुक गया॥ ९॥ और जिस समय वह पैरके अँगूठेसे पृथिवीको (बीचसे) दबाकर खड़ा हुआ तो पर्वतोंके सहित समस्त भूमण्डल विचलित हो गया॥ १०॥ हे महामुने! उस समय नदी, नद और समुद्र आदि सभी अत्यन्त क्षुब्ध हो गये और उनके क्षोभसे देवताओंमें भी बड़ी हलचल मची॥ ११॥ हे मैत्रेय! तब याम नामक देवताओंने अत्यन्त व्याकुल हो इन्द्रके साथ परामर्श कर उसके ध्यानको भंग करनेका आयोजन किया॥ १२॥ हे महामुने! इन्द्रके साथ अति आतुर कूष्माण्ड नामक उपदेवताओँने नानारूप धारणकर उसकी समाधि भंग करना आरम्भ किया॥ १३॥
सुनीतिर्नाम तन्माता सास्रा तत्पुरतः स्थिता।
पुत्रेति करुणां वाचमाह मायामयी तदा॥ १४
उस समय मायाहीसे रची हुई उसकी माता सुनीति नेत्रोंमें आँसू भरे उसके सामने प्रकट हुई और 'हे पुत्र! हे पुत्र!' ऐसा कहकर करुणायुक्त वचन बोलने लगी
| ५२ | * श्रीविष्णुपुराण * | [अ० १२ |
|---|
[मूल संस्कृत श्लोक]
पुत्रकास्मान्निवर्त्तस्व शरीरात्ययदारुणात्।
निर्बन्धतो मया लब्धो बहुभिस्त्वं मनोरथैः॥ १५
दीनामेकां परित्यक्तुमनाथां न त्वमर्हसि।
सपत्नीवचनाद्वत्स अगतेस्त्वं गतिर्मम॥ १६
क्व च त्वं पञ्चवर्षीयः क्व चैतद्दारुणं तपः।
निवर्त्ततां मनः कष्टान्निर्बन्धात्फलवर्जितात्॥ १७
कालः क्रीडनकानान्ते तदन्तेऽध्ययनस्य ते।
ततः समस्तभोगानां तदन्ते चेष्यते तपः॥ १८
कालः क्रीडनकानां यस्तव बालस्य पुत्रक।
तस्मिंस्त्वमिच्छसि तपः किं नाशायात्मनो रतः॥ १९
मत्प्रीतिः परमो धर्मो वयोऽवस्थाक्रियाक्रमम्।
अनुवर्त्तस्व मा मोहान्निवर्त्तास्मादधर्मतः॥ २०
परित्यजति वत्साद्य यद्येतन्न भवांस्तपः।
त्यक्ष्याम्यहमिह प्राणांस्ततो वै पश्यतस्तव॥ २१
श्रीपराशर उवाच
तां प्रलापवतीमेवं बाष्पाकुलविलोचनाम्।
समाहितमना विष्णौ पश्यन्नपि न दृष्टवान्॥ २२
वत्स वत्स सुघोराणि रक्षांस्येतानि भीषणे।
वनेऽभ्युद्यतशस्त्राणि समायान्त्यपगम्यताम्॥ २३
इत्युक्त्वा प्रययौ साथ रक्षांस्याविर्बभूस्ततः।
अभ्युद्यतोग्रशस्त्राणि ज्वालामालाकुलैर्मुखैः॥ २४
ततो नादानतीवोग्रान्राजपुत्रस्य ते पुरः।
मुमुचुर्दीप्तशस्त्राणि भ्रामयन्तो निशाचराः॥ २५
शिवाश्च शतशो नेदुः सञ्ज्वालाकवलैर्मुखैः।
त्रासाय तस्य बालस्य योगयुक्तस्य सर्वदा॥ २६
हन्यतां हन्यतामेष छिद्यतां छिद्यतामयम्।
भक्ष्यतां भक्ष्यतां चायमित्यूचुस्ते निशाचराः॥ २७
ततो नानाविधान्नादान् सिंहोष्ट्रमकराननाः।
त्रासाय राजपुत्रस्य नेदुस्ते रजनीचराः॥ २८
रक्षांसि तानि ते नादाःशिवास्तान्यायुधानि च।
गोविन्दासक्तचित्तस्य ययुर्नेन्द्रियगोचरम्॥ २९
एकाग्रचेताः सततं विष्णुमेवात्मसंश्रयम्।
दृष्टवान्पृथिवीनाथपुत्रो नान्यं कथञ्चन॥ ३०
[हिन्दी अनुवाद]
[उसने कहा]—बेटा! तू शरीरको घुलानेवाले इस भयंकर तपका आग्रह छोड़ दे। मैंने बड़ी-बड़ी कामनाओंद्वारा तुझे प्राप्त किया है॥ १४-१५॥
अरे! मुझ अकेली, अनाथा, दुखियाको सौतके कटु वाक्योंसे छोड़ देना तुझे उचित नहीं है। बेटा! मुझ आश्रयहीनाका तो एकमात्र तू ही सहारा है॥ १६॥
कहाँ तो पाँच वर्षका तू और कहाँ तेरा यह अति उग्र तप? अरे! इस निष्फल क्लेशकारी आग्रहसे अपना मन मोड़ ले॥ १७॥
अभी तो तेरे खेलने-कूदनेका समय है, फिर अध्ययनका समय आयेगा, तदनन्तर समस्त भोगोंके भोगनेका और फिर अन्तमें तपस्या करना भी ठीक होगा॥ १८॥
बेटा! तुझ सुकुमार बालकका 'जो खेल-कूदका समय है उसीमें तू तपस्या करना चाहता है। तू इस प्रकार क्यों अपने सर्वनाशमें तत्पर हुआ है?॥ १९॥
तेरा परम धर्म तो मुझको प्रसन्न रखना ही है, अतः तू अपनी आयु और अवस्थाके अनुकूल कर्मोंमें ही लग, मोहका अनुवर्तन न कर और इस तपरूपी अधर्मसे निवृत्त हो॥ २०॥
बेटा! यदि आज तू इस तपस्याको न छोड़ेगा तो देख तेरे सामने ही मैं अपने प्राण छोड़ दूँगी॥ २१॥
श्रीपराशरजी बोले— हे मैत्रेय! भगवान् विष्णुमें चित्त स्थिर रहनेके कारण ध्रुवने उसे आँखोंमें आँसू भरकर इस प्रकार विलाप करती देखकर भी नहीं देखा॥ २२॥
तब, 'अरे बेटा! यहाँसे भाग-भाग! देख, इस महाभयंकर वनमें ये कैसे घोर राक्षस अस्त्र-शस्त्र उठाये आ रहे हैं'—ऐसा कहती हुई वह चली गयी और वहाँ जिनके मुखसे अग्निकी लपटें निकल रही थीं ऐसे अनेकों राक्षसगण अस्त्र-शस्त्र सँभाले प्रकट हो गये॥ २३-२४॥
उन राक्षसोंने अपने अति चमकीले शस्त्रोंको घुमाते हुए उस राजपुत्रके सामने बड़ा भयंकर कोलाहल किया॥ २५॥
उस नित्य-योगयुक्त बालकको भयभीत करनेके लिये अपने मुखसे अग्निकी लपटें निकालती हुई सैकड़ों स्यारियाँ घोर नाद करने लगीं॥ २६॥
वे राक्षसगण भी 'इसको मारो-मारो, काटो-काटो, खाओ-खाओ' इस प्रकार चिल्लाने लगे॥ २७॥
फिर सिंह, ऊँट और मकर आदिके-से मुखवाले वे राक्षस राजपुत्रको त्रास देनेके लिये नाना प्रकारसे गरजने लगे॥ २८॥
किन्तु उस भगवदासक्तचित्त बालकको वे राक्षस, उनके शब्द, स्यारियाँ और अस्त्र-शस्त्रादि कुछ भी दिखायी नहीं दिये॥ २९॥
वह राजपुत्र एकाग्रचित्तसे निरन्तर अपने आश्रयभूत विष्णुभगवान्को ही देखता रहा और उसने किसीकी ओर किसी भी प्रकार दृष्टिपात नहीं किया॥ ३०॥
अ० १२] * प्रथम अंश * ५३
ततः सर्वासु मायासु विलीनासु पुनः सुराः।
सङ्क्षोभं परमं जग्मुस्तत्पराभवशङ्किताः ॥ ३१
ते समेत्य जगद्योनिमनादिनिधनं हरिम्।
शरण्यं शरणं यातास्तपसा तस्य तापिताः ॥ ३२
देवा ऊचुः
देवदेव जगन्नाथ परेश पुरुषोत्तम।
ध्रुवस्य तपसा तप्तास्त्वां वयं शरणं गताः ॥ ३३
दिने दिने कलालेशैः शशाङ्कः पूर्यते यथा।
तथायं तपसा देव प्रयात्यृद्धिमहर्निशम् ॥ ३४
औत्तानपादितपसा वयमित्थं जनार्दन।
भीतास्त्वां शरणं यातास्तपसस्तं निवर्तय ॥ ३५
न विद्मः किं स शक्रत्वं सूर्यत्वं किमभीप्सति।
वित्तपाम्बुपसोमानां साभिलाषः पदेषु किम् ॥ ३६
तदस्माकं प्रसीदेश हृदयाच्छल्यमुद्धर।
उत्तानपादतनयं तपसः संनिवर्तय ॥ ३७
श्रीभगवानुवाच
नेन्द्रत्वं न च सूर्यत्वं नैवाम्बुपधनेशताम्।
प्रार्थयत्येष यं कामं तं करोम्यखिलं सुराः ॥ ३८
यात देवा यथाकामं स्वस्थानं विगतज्वराः।
निवर्त्तयाम्यहं बालं तपस्यासक्तमानसम् ॥ ३९
श्रीपराशर उवाच
इत्युक्ता देवदेवेन प्रणम्य त्रिदशास्ततः।
प्रययुः स्वानि धिष्ण्यानि शतक्रतुपुरोगमाः ॥ ४०
भगवानपि सर्वात्मा तन्मयत्वेन तोषितः।
गत्वा ध्रुवमुवाचेदं चतुर्भुजवपुर्हरिः ॥ ४१
श्रीभगवानुवाच
औत्तानपादे भद्रं ते तपसा परितोषितः।
वरदोऽहमनुप्राप्तो वरं वरय सुव्रत ॥ ४२
बाह्यार्थनिरपेक्षं ते मयि चित्तं यदाहितम्।
तुष्टोऽहं भवतस्तेन तद्वृणीष्व वरं परम् ॥ ४३
श्रीपराशर उवाच
श्रुत्वेत्थं गदितं तस्य देवदेवस्य बालकः।
उन्मीलिताक्षो ददृशे ध्यानदृष्टं हरिं पुरः ॥ ४४
तब सम्पूर्ण मायाके लीन हो जानेपर उससे हार जानेकी आशंकासे देवताओंको बड़ा भय हुआ ॥ ३१ ॥ अतः उसके तपसे सन्तप्त हो वे सब आपसमें मिलकर जगत्के आदि-कारण, शरणागतवत्सल, अनादि और अनन्त श्रीहरिकी शरणमें गये ॥ ३२ ॥
देवता बोले— हे देवाधिदेव, जगन्नाथ, परमेश्वर, पुरुषोत्तम! हम सब ध्रुवकी तपस्यासे सन्तप्त होकर आपकी शरणमें आये हैं ॥ ३३ ॥ हे देव! जिस प्रकार चन्द्रमा अपनी कलाओंसे प्रतिदिन बढ़ता है उसी प्रकार यह भी तपस्याके कारण रात-दिन उन्नत हो रहा है ॥ ३४ ॥ हे जनार्दन! इस उत्तानपादके पुत्रकी तपस्यासे भयभीत होकर हम आपकी शरणमें आये हैं, आप उसे तपसे निवृत्त कीजिये ॥ ३५ ॥ हम नहीं जानते, वह इन्द्रत्व चाहता है या सूर्यत्व अथवा उसे कुबेर, वरुण या चन्द्रमाके पदकी अभिलाषा है ॥ ३६ ॥ अतः हे ईश! आप हमपर प्रसन्न होइये और इस उत्तानपादके पुत्रको तपसे निवृत्त करके हमारे हृदयका काँटा निकालिये ॥ ३७ ॥
श्रीभगवान् बोले— हे सुरगण! उसे इन्द्र, सूर्य, वरुण अथवा कुबेर आदि किसीके पदकी अभिलाषा नहीं है, उसकी जो कुछ इच्छा है वह मैं सब पूर्ण करूँगा ॥ ३८ ॥ हे देवगण! तुम निश्चिन्त होकर इच्छानुसार अपने-अपने स्थानोंको जाओ। मैं तपस्यामें लगे हुए उस बालकको निवृत्त करता हूँ ॥ ३९ ॥
श्रीपराशरजी बोले— देवाधिदेव भगवान्के ऐसा कहनेपर इन्द्र आदि समस्त देवगण उन्हें प्रणामकर अपने-अपने स्थानोंको गये ॥ ४० ॥ सर्वात्मा भगवान् हरिने भी ध्रुवकी तन्मयतासे प्रसन्न हो उसके निकट चतुर्भुजरूपसे जाकर इस प्रकार कहा ॥ ४१ ॥
श्रीभगवान् बोले— हे उत्तानपादके पुत्र ध्रुव! तेरा कल्याण हो। मैं तेरी तपस्यासे प्रसन्न होकर तुझे वर देनेके लिये प्रकट हुआ हूँ, हे सुव्रत! तू वर माँग ॥ ४२ ॥ तूने सम्पूर्ण बाह्य विषयोंसे उपरत होकर अपने चित्तको मुझमें ही लगा दिया है। अतः मैं तुझसे अति सन्तुष्ट हूँ। अब तू अपनी इच्छानुसार श्रेष्ठ वर माँग ॥ ४३ ॥
श्रीपराशरजी बोले— देवाधिदेव भगवान्के ऐसे वचन सुनकर बालक ध्रुवने आँखें खोलीं और अपनी ध्यानावस्थामें देखे हुए भगवान् हरिको साक्षात् अपने सम्मुख खड़े देखा ॥ ४४ ॥
५४
- श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १२
| शङ्खचक्रगदाशार्ङ्गवरासिधरमच्युतम् ।<br>किरीटिनं समालोक्य जगाम शिरसा महीम् ॥ ४५ | श्रीअच्युतको किरीट तथा शंख, चक्र, गदा, शार्ङ्ग धनुष और खड्ग धारण किये देख उसने पृथिवीपर सिर रखकर प्रणाम किया ॥ ४५ ॥ और सहसा रोमांचित तथा परम भयभीत होकर उसने देवदेवकी स्तुति करनेकी इच्छा की ॥ ४६ ॥ किन्तु ‘इनकी स्तुतिके लिये मैं क्या कहूँ? क्या कहनेसे इनका स्तवन हो सकता है?’ यह न जाननेके कारण वह चित्तमें व्याकुल हो गया और अन्तमें उसने उन देवदेवकी ही शरण ली ॥ ४७ ॥ |
|---|---|
| रोमाञ्चिताङ्गः सहसा साध्वसं परमं गतः ।<br>स्तवाय देवदेवस्य स चक्रे मानसं ध्रुवः ॥ ४६ | |
| किं वदामि स्तुतावस्य केनोक्तेनास्य संस्तुतिः ।<br>इत्याकुलमतिर्देवं तमेव शरणं ययौ ॥ ४७ |
ध्रुव उवाच
| भगवन्यदि मे तोषं तपसा परमं गतः ।<br>स्तोतुं तदहमिच्छामि वरमेनं प्रयच्छ मे ॥ ४८<br>[ ब्रह्माद्यैरस्य वेदज्ञैर्ज्ञायते यस्य नो गतिः ।<br>तं त्वां कथमहं देव स्तोतुं शक्नोमि बालकः ॥<br>त्वद्भक्तिप्रवणं ह्येतत्परमेश्वर मे मनः ।<br>स्तोतुं प्रवृत्तं त्वत्पादौ तत्र प्रज्ञां प्रयच्छ मे ॥ ] | ध्रुवने कहा— भगवन्! आप यदि मेरी तपस्यासे सन्तुष्ट हैं तो मैं आपकी स्तुति करना चाहता हूँ, आप मुझे यही वर दीजिये [ जिससे मैं स्तुति कर सकूँ ] ॥ ४८ ॥ [ हे देव! जिनकी गति ब्रह्मा आदि वेदज्ञजन भी नहीं जानते; उन्हीं आपका मैं बालक कैसे स्तवन कर सकता हूँ। किन्तु हे परम प्रभो! आपकी भक्तिसे द्रवीभूत हुआ मेरा चित्त आपके चरणोंकी स्तुति करनेमें प्रवृत्त हो रहा है। अतः आप इसे उसके लिये बुद्धि प्रदान कीजिये]। |
|---|
श्रीपराशर उवाच
| शङ्खप्रान्तेन गोविन्दस्तं पस्पर्श कृताञ्जलिम् ।<br>उत्तानपादतनयं द्विजवर्य जगत्पतिः ॥ ४९ | श्रीपराशरजी बोले— हे द्विजवर्य ! तब जगत्पति श्रीगोविन्दने अपने सामने हाथ जोड़े खड़े हुए उस उत्तानपादके पुत्रको अपने (वेदमय) शंखके अन्त (वेदान्तमय) भागसे छू दिया ॥ ४९ ॥ तब तो एक क्षणमें ही वह राजकुमार प्रसन्न-मुखसे अति विनीत हो सर्वभूताधिष्ठान श्रीअच्युतकी स्तुति करने लगा ॥ ५० ॥ |
|---|---|
| अथ प्रसन्नवदनः स क्षणान्नृपनन्दनः ।<br>तुष्टाव प्रणतो भूत्वा भूतधातारमच्युतम् ॥ ५० |
ध्रुव उवाच
| भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च ।<br>भूतादिरादिप्रकृतिर्यस्य रूपं नतोऽस्मि तम् ॥ ५१ | ध्रुव बोले— पृथिवी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि, अहंकार और मूल-प्रकृति—ये सब जिनके रूप हैं उन भगवान्को मैं नमस्कार करता हूँ॥ ५१ ॥ जो अति शुद्ध, सूक्ष्म, सर्वव्यापक और प्रधानसे भी परे हैं, वह पुरुष जिनका रूप है उन गुण-भोक्ता परमपुरुषको मैं नमस्कार करता हूँ॥ ५२ ॥ हे परमेश्वर! पृथिवी आदि समस्त भूत, गन्धादि उनके गुण, बुद्धि आदि अन्तःकरण-चतुष्टय तथा प्रधान और पुरुष(जीव)-से भी परे जो सनातन पुरुष हैं, उन आप निखिलब्रह्माण्डनायकके ब्रह्मभूत शुद्धस्वरूप आत्माकी मैं शरण हूँ॥ ५३-५४॥ हे सर्वात्मन्! हे योगियोंके चिन्तनीय! व्यापक और वर्धनशील होनेके कारण आपका जो ब्रह्म नामक स्वरूप है, उस विकाररहित रूपको मैं नमस्कार करता हूँ॥ ५५ ॥ हे प्रभो! आप हजारों मस्तकोंवाले, हजारों नेत्रोंवाले और हजारों चरणोंवाले परमपुरुष हैं, आप सर्वत्र व्याप्त हैं और [ पृथिवी आदि आवरणोंके सहित ] सम्पूर्ण ब्रह्माण्डको व्याप्त कर दस गुण महाप्रमाणसे स्थित हैं ॥ ५६ ॥ |
|---|---|
| शुद्धः सूक्ष्मोऽखिलव्यापी प्रधानात्परतः पुमान् ।<br>यस्य रूपं नमस्तस्मै पुरुषाय गुणाशिने ॥ ५२ | |
| भूरादीनां समस्तानां गन्धादीनां च शाश्वतः ।<br>बुद्ध्यादीनां प्रधानस्य पुरुषस्य च यः परः ॥ ५३ | |
| तं ब्रह्मभूतमात्मानमशेषजगतः पतिम् ।<br>प्रपद्ये शरणं शुद्धं त्वद्रूपं परमेश्वर ॥ ५४ | |
| बृहत्त्वाद्वृंहणत्वाच्च यद्रूपं ब्रह्मसंज्ञितम् ।<br>तस्मै नमस्ते सर्वात्मन्योगिचिन्त्याविकारिणे ॥ ५५ | |
| सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात् ।<br>सर्वव्यापी भुवः स्पर्शादत्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम् ॥ ५६ |
अ० १२] * प्रथम अंश * ५५
यद्भूतं यच्च वै भव्यं पुरुषोत्तम तद्भवान्। त्वत्तो विराद् स्वराद् सम्राट् त्वत्तश्चाप्यधिपूरुषः ॥ ५७ अत्यरिच्यत सोऽधश्च तिर्यगूर्ध्वं च वै भुवः । त्वत्तो विश्वमिदं जातं त्वत्तो भूतभविष्यती ॥ ५८ त्वद्रूपधारिणश्चान्तर्भूतं सर्वमिदं जगत्। त्वत्तो यज्ञः सर्वहुतः पृषदाज्यं पशुर्द्विधा ॥ ५९ त्वत्तः ऋचोऽथ सामानि त्वत्तश्छन्दांसि जज्ञिरे। त्वत्तो यजूंष्यजायन्त त्वत्तोऽश्वाश्चैकतो दतः ॥ ६० गावस्त्वत्तः समुद्भूतास्त्वत्तोऽजा अवयो मृगाः । त्वन्मुखाद्ब्राह्मणास्त्वत्तो बाहोः क्षत्रमजायत ॥ ६१ वैश्यास्तवोरुजाः शूद्रास्तव पद्भ्यां समुद्गताः। अक्ष्णोः सूर्योऽनिलः प्राणाच्चन्द्रमा मनसस्तव ॥ ६२ प्राणोऽन्तःसुषिराज्जातो मुखादग्निरजायत । नाभितो गगनं द्यौश्च शिरसः समवर्तत ॥ ६३ दिशः श्रोत्रात्क्षितिः पद्भ्यां त्वत्तः सर्वमभूदिदम् ॥ ६४ न्यग्रोधः सुमहानल्पे यथा बीजे व्यवस्थितः । संयमे विश्वमखिलं बीजभूते तथा त्वयि ॥ ६५ बीजादङ्कुरसम्भूतौ न्यग्रोधस्तु समुत्थितः । विस्तारं च यथा याति त्वत्तः सृष्टौ तथा जगत् ॥ ६६ यथा हि कदली नान्या त्वक्पत्रादपि दृश्यते। एवं विश्वस्य नान्यस्त्वं त्वत्स्थायीश्वर दृश्यते ॥ ६७ ह्लादिनी सन्धिनी संवित्त्वय्येका सर्वसंस्थितौ । ह्लादतापकरी मिश्रा त्वयि नो गुणवर्जिते ॥ ६८ पृथग्भूतैकभूताय भूतभूताय ते नमः । प्रभूतभूतभूताय तुभ्यं भूतात्मने नमः ॥ ६९ व्यक्तं प्रधानपुरुषौ विराद् सम्राट् स्वराद् तथा । विभाव्यतेऽन्तःकरणे पुरुषेष्वक्षयो भवान् ॥ ७० सर्वस्मिन्सर्वभूतस्त्वं सर्वः सर्वस्वरूपधृक् । सर्वं त्वत्तस्ततश्च त्वं नमः सर्वात्मनेऽस्तु ते ॥ ७१
हे पुरुषोत्तम ! भूत और भविष्यत् जो कुछ पदार्थ हैं वे सब आप ही हैं तथा विराट्, स्वराट्, सम्राट् और अधिपूरुष (ब्रह्मा) आदि भी सब आपहीसे उत्पन्न हुए हैं ॥ ५७ ॥ वे ही आप इस पृथिवीके नीचे-ऊपर और इधर-उधर सब ओर बढ़े हुए हैं। यह सम्पूर्ण जगत् आपहीसे उत्पन्न हुआ है तथा आपहीसे भूत और भविष्यत् हुए हैं ॥ ५८ ॥ यह सम्पूर्ण जगत् आपके स्वरूपभूत ब्रह्माण्डके अन्तर्गत है [फिर आपके अन्तर्गत होनेकी तो बात ही क्या है] जिसमें सभी पुरोडाशोंका हवन होता है वह यज्ञ, पृषदाज्य (दधि और घृत) तथा [ग्राम्य और वन्य] दो प्रकारके पशु आपहीसे उत्पन्न हुए हैं ॥ ५९ ॥ आपहीसे ऋक्, साम और गायत्री आदि छन्द प्रकट हुए हैं, आपहीसे यजुर्वेदका प्रादुर्भाव हुआ है और आपहीसे अश्व तथा एक ओर दाँतवाले महिष आदि जीव उत्पन्न हुए हैं ॥ ६० ॥ आपहीसे गौओं, बकरियों, भेड़ों और मृगोंकी उत्पत्ति हुई है; आपहीके मुखसे ब्राह्मण, बाहुओंसे क्षत्रिय, जंघाओंसे वैश्य और चरणोंसे शूद्र प्रकट हुए हैं तथा आपहीके नेत्रोंसे सूर्य, प्राणसे वायु, मनसे चन्द्रमा, भीतरी छिद्र (नासारन्ध्र)-से प्राण, मुखसे अग्नि, नाभिसे आकाश, सिरसे स्वर्ग, श्रोत्रसे दिशाएँ और चरणोंसे पृथिवी आदि उत्पन्न हुए हैं; इस प्रकार हे प्रभो ! यह सम्पूर्ण जगत् आपहीसे प्रकट हुआ है ॥ ६१–६४ ॥ जिस प्रकार नन्हेंसे बीजमें बड़ा भारी वट-वृक्ष रहता है उसी प्रकार प्रलय-कालमें यह सम्पूर्ण जगत् बीज-स्वरूप आपहीमें लीन रहता है ॥ ६५ ॥ जिस प्रकार बीजसे अंकुररूपमें प्रकट हुआ वट-वृक्ष बढ़कर अत्यन्त विस्तारवाला हो जाता है उसी प्रकार सृष्टिकालमें यह जगत् आपहीसे प्रकट होकर फैल जाता है ॥ ६६ ॥ हे ईश्वर ! जिस प्रकार केलेका पौधा छिलके और पत्तोंसे अलग दिखायी नहीं देता उसी प्रकार जगत्से आप पृथक् नहीं हैं, वह आपहीमें स्थित देखा जाता है ॥ ६७ ॥ सबके आधारभूत आपमें ह्लादिनी (निरन्तर आह्लादित करनेवाली) और सन्धिनी (विच्छेदरहित) संवित् (विद्याशक्ति) अभिन्नरूपसे रहती हैं। आपमें (विषयजन्य) आह्लाद या ताप देनेवाली (सात्त्विकी या तामसी) अथवा उभयमिश्रा (राजसी) कोई भी संवित् नहीं है, क्योंकि आप निर्गुण हैं ॥ ६८ ॥ आप [कार्यदृष्टिसे] पृथक्-रूप और [कारणदृष्टिसे] एकरूप हैं। आप ही भूतसूक्ष्म हैं और आप ही नाना जीवरूप हैं। हे भूतान्तरात्मन् ! ऐसे आपको मैं नमस्कार करता हूँ ॥ ६९ ॥ [योगियोंके द्वारा] अन्तःकरणमें आप ही महत्तत्त्व, प्रधान, पुरुष, विराट्, सम्राट् और स्वराट् आदि रूपोंसे भावना किये जाते हैं और [क्षयशील] पुरुषोंमें आप नित्य अक्षय हैं ॥ ७० ॥ आकाशादि सर्वभूतोंमें सार अर्थात् उनके गुणरूप आप ही हैं; समस्त रूपोंको धारण
५६ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १२
सर्वात्मकोऽसि सर्वेश सर्वभूतस्थितो यतः।
कथयामि ततः किं ते सर्वं वेत्सि हृदि स्थितम् ॥ ७२
सर्वात्मन्सर्वभूतेश सर्वसत्त्वसमुद्भव।
सर्वभूतो भवान्वेत्ति सर्वसत्त्वमनोरथम् ॥ ७३
यो मे मनोरथो नाथ सफलः स त्वया कृतः।
तपश्च तप्तं सफलं यद्दृष्टोऽसि जगत्पते ॥ ७४
श्रीभगवानुवाच
तपसस्तत्फलं प्राप्तं यद्दृष्टोऽहं त्वया ध्रुव।
मद्दर्शनं हि विफलं राजपुत्र न जायते ॥ ७५
वरं वरय तस्मात्त्वं यथाभिमतमात्मनः।
सर्वं सम्पद्यते पुंसां मयि दृष्टिपथं गते ॥ ७६
ध्रुव उवाच
भगवन्भूतभव्येश सर्वस्यास्ते भवान् हृदि।
किमज्ञातं तव ब्रह्मन्मनसा यन्मयेक्षितम् ॥ ७७
तथापि तुभ्यं देवेश कथयिष्यामि यन्मया।
प्रार्थ्यते दुर्विनीतेन हृदयेनातिदुर्लभम् ॥ ७८
किं वा सर्वजगत्स्रष्टः प्रसन्ने त्वयि दुर्लभम्।
त्वत्प्रसादफलं भुङ्क्ते त्रैलोक्यं मघवानपि ॥ ७९
नैतद्राजासनं योग्यमजातस्य ममोदरात्।
इतिगर्वादवोचन्मां सपत्नी मातुरुच्चकैः ॥ ८०
आधारभूतं जगतः सर्वेषामुत्तमोत्तमम्।
प्रार्थयामि प्रभो स्थानं त्वत्प्रसादादतोऽव्ययम् ॥ ८१
श्रीभगवानुवाच
यत्त्वया प्रार्थ्यते स्थानमेतत्प्राप्स्यसि वै भवान्।
त्वयाऽहं तोषितः पूर्वमन्यजन्मनि बालक ॥ ८२
त्वमासीर्ब्राह्मणः पूर्वं मय्येकाग्रमतिः सदा।
मातापित्रोश्च शुश्रूषुर्निजधर्मानुपालकः ॥ ८३
कालेन गच्छता मित्रं राजपुत्रस्तवाभवत्।
यौवनेऽखिलभोगाढ्यो दर्शनीयोज्ज्वलाकृतिः ॥ ८४
तत्सङ्गात्तस्य तामृद्धिमवलोक्यातिदुर्लभाम्।
भवेयं राजपुत्रोऽहमिति वाञ्छा त्वया कृता ॥ ८५
करनेवाले होनेसे सब कुछ आप ही हैं; सब कुछ आपहीसे हुआ है; अतएव सबके द्वारा आप ही हो रहे हैं इसलिये आप सर्वात्माको नमस्कार है ॥ ७१ ॥ हे सर्वेश्वर ! आप सर्वात्मक हैं; क्योंकि सम्पूर्ण भूतोंमें व्याप्त हैं; अतः मैं आपसे क्या कहूँ? आप स्वयं ही सब हृदयस्थित बातोंको जानते हैं॥ ७२॥ हे सर्वात्मन्! हे सर्वभूतेश्वर ! हे सब भूतोंके आदि-स्थान ! आप सर्वभूतरूपसे सभी प्राणियोंके मनोरथोंको जानते हैं ॥ ७३ ॥ हे नाथ ! मेरा जो कुछ मनोरथ था वह तो आपने सफल कर दिया और हे जगत्पते ! मेरी तपस्या भी सफल हो गयी, क्योंकि मुझे आपका साक्षात् दर्शन प्राप्त हुआ ॥ ७४॥
श्रीभगवान् बोले— हे ध्रुव ! तुमको मेरा साक्षात् दर्शन प्राप्त हुआ, इससे अवश्य ही तेरी तपस्या तो सफल हो गयी; परन्तु हे राजकुमार ! मेरा दर्शन भी तो कभी निष्फल नहीं होता ॥ ७५ ॥ इसलिये तुझको जिस वरकी इच्छा हो वह माँग ले। मेरा दर्शन हो जानेपर पुरुषको सभी कुछ प्राप्त हो सकता है ॥ ७६ ॥
ध्रुव बोले— हे भूतभव्येश्वर भगवन् ! आप सभीके अन्तःकरणोंमें विराजमान हैं। हे ब्रह्मन्! मेरे मनकी जो कुछ अभिलाषा है वह क्या आपसे छिपी हुई है ? ॥ ७७ ॥ तो भी, हे देवेश्वर ! मैं दुर्विनीत जिस अति दुर्लभ वस्तुकी हृदयसे इच्छा करता हूँ उसे आपकी आज्ञानुसार आपके प्रति निवेदन करूँगा ॥ ७८ ॥ हे समस्त संसारको रचनेवाले परमेश्वर ! आपके प्रसन्न होनेपर (संसारमें) क्या दुर्लभ है? इन्द्र भी आपके कृपाकटाक्षके फलरूपसे ही त्रिलोकीको भोगता है ॥ ७९ ॥
प्रभो ! मेरी सौतेली माताने गर्वसे अति बढ़-बढ़कर मुझसे यह कहा था कि 'जो मेरे उदरसे उत्पन्न नहीं है उसके योग्य यह राजासन नहीं है' ॥ ८० ॥ अतः हे प्रभो ! आपके प्रसादसे मैं उस सर्वोत्तम एवं अव्यय स्थानको प्राप्त करना चाहता हूँ जो सम्पूर्ण विश्वका आधारभूत हो ॥ ८१ ॥
श्रीभगवान् बोले— अरे बालक ! तूने अपने पूर्वजन्ममें भी मुझे सन्तुष्ट किया था, इसलिये तू जिस स्थानकी इच्छा करता है उसे अवश्य प्राप्त करेगा ॥ ८२ ॥ पूर्व जन्ममें तू एक ब्राह्मण था और मुझमें निरन्तर एकाग्रचित्त रहनेवाला, माता-पिताका सेवक तथा स्वधर्मका पालन करनेवाला था ॥ ८३ ॥ कालान्तरमें एक राजपुत्र तेरा मित्र हो गया। वह अपनी युवावस्थामें सम्पूर्ण भोगोंसे सम्पन्न और अति दर्शनीय रूपलावण्ययुक्त था ॥ ८४ ॥ उसके संगसे उसके दुर्लभ वैभवको देखकर तेरी ऐसी इच्छा हुई कि 'मैं भी राजपुत्र होऊँ' ॥ ८५ ॥
अ० १२ ] * प्रथम अंश * ५७
| ततो यथाभिलषिता प्राप्ता ते राजपुत्रता।<br>उत्तानपादस्य गृहे जातोऽसि ध्रुव दुर्लभे॥ ८६<br>अन्येषां दुर्लभं स्थानं कुले स्वायम्भुवस्य यत्॥ ८७ | अतः हे ध्रुव! तुझको अपनी मनोवांछित राजपुत्रता प्राप्त हुई और जिन स्वायम्भुवमनुके कुलमें और किसीको स्थान मिलना अति दुर्लभ है, उन्हींके घरमें तूने उत्तानपादके यहाँ जन्म लिया॥ ८६-८७॥ |
| तस्यैतदपरं बाल येनाहं परितोषितः।<br>मामाराध्य नरो मुक्तिमवाप्नोत्यविलम्बिताम्॥ ८८<br>मय्यर्पितमना बाल किमु स्वर्गादिकं पदम्॥ ८९ | अरे बालक! [औरोंके लिये यह स्थान कितना ही दुर्लभ हो परन्तु] जिसने मुझे सन्तुष्ट किया है उसके लिये तो यह अत्यन्त तुच्छ है। मेरी आराधना करनेसे तो मोक्षपद भी तत्काल प्राप्त हो सकता है, फिर जिसका चित्त निरन्तर मुझमें ही लगा हुआ है उसके लिये स्वर्गादि लोकोंका तो कहना ही क्या है?॥ ८८-८९॥ |
| त्रैलोक्यादधिके स्थाने सर्वताराग्रहाश्रयः।<br>भविष्यति न सन्देहो मत्प्रसादाद्भवाञ्ध्रुव॥ ९० | हे ध्रुव! मेरी कृपासे तू निस्सन्देह उस स्थानमें, जो त्रिलोकीमें सबसे उत्कृष्ट है, सम्पूर्ण ग्रह और तारामण्डलका आश्रय बनेगा॥ ९०॥ |
| सूर्यात्सोमात्तथा भौमात्सोमपुत्राद्बृहस्पतेः।<br>सितार्कतनयादीनां सर्वर्क्षाणां तथा ध्रुव॥ ९१<br>सप्तर्षीणामशेषाणां ये च वैमानिकाः सुराः।<br>सर्वेषामुपरि स्थानं तव दत्तं मया ध्रुव॥ ९२ | हे ध्रुव! मैं तुझे वह ध्रुव (निश्चल) स्थान देता हूँ जो सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र और शनि आदि ग्रहों, सभी नक्षत्रों, सप्तर्षियों और सम्पूर्ण विमानचारी देवगणोंसे ऊपर है॥ ९१-९२॥ |
| केचिच्चतुर्युगं यावत्केचिन्मन्वन्तरं सुराः।<br>तिष्ठन्ति भवतो दत्ता मया वै कल्पसंस्थितिः॥ ९३ | देवताओंमेंसे कोई तो केवल चार युगतक और कोई एक मन्वन्तरतक ही रहते हैं; किन्तु तुझे मैं एक कल्पतककी स्थिति देता हूँ॥ ९३॥ |
| सुनीतिरपि ते माता त्वदासन्नातिनिर्मला।<br>विमाने तारका भूत्वा तावत्कालं निवत्स्यति॥ ९४ | तेरी माता सुनीति भी अति स्वच्छ तारारूपसे उतने ही समयतक तेरे पास एक विमानपर निवास करेगी॥ ९४॥ |
| ये च त्वां मानवाः प्रातः सायं च सुसमाहिताः।<br>कीर्त्तयिष्यन्ति तेषां च महत्पुण्यं भविष्यति॥ ९५ | और जो लोग समाहित-चित्तसे सायंकाल और प्रातःकालके समय तेरा गुण-कीर्तन करेंगे उनको महान् पुण्य होगा॥ ९५॥ |
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले— |
| एवं पूर्वं जगन्नाथाद्देवदेवाज्जनार्दनात्।<br>वरं प्राप्य ध्रुवः स्थानमध्यास्ते स महामते॥ ९६ | हे महामते! इस प्रकार पूर्वकालमें जगत्पति देवाधिदेव भगवान् जनार्दनसे वर पाकर ध्रुव उस अत्युत्तम स्थानमें स्थित हुए॥ ९६॥ |
| स्वयं शुश्रूषणाद्धर्म्यान्मातापित्रोश्च वै तथा।<br>द्वादशाक्षरमाहात्म्यात्तपसश्च प्रभावतः॥ ९७<br>तस्याभिमानमृद्धिं च महिमानं निरीक्ष्य हि।<br>देवासुराणामाचार्यः श्लोकमत्रोशना जगौ॥ ९८ | हे मुने! अपने माता-पिताकी धर्मपूर्वक सेवा करनेसे तथा द्वादशाक्षर-मन्त्रके माहात्म्य और तपके प्रभावसे उनके मान, वैभव एवं प्रभावकी वृद्धि देखकर देव और असुरोंके आचार्य शुक्रदेवने ये श्लोक कहे हैं—॥ ९७-९८॥ |
| अहोऽस्य तपसो वीर्यमहोऽस्य तपसः फलम्।<br>यदेनं पुरतः कृत्वा ध्रुवं सप्तर्षयः स्थिताः॥ ९९ | 'अहो! इस ध्रुवके तपका कैसा प्रभाव है? अहो ! इसकी तपस्याका कैसा अद्भुत फल है जो इस ध्रुवको ही आगे रखकर सप्तर्षिगण स्थित हो रहे हैं॥ ९९॥ |
| ध्रुवस्य जननी चेयं सुनीतिर्नाम सूनृता।<br>अस्याश्च महिमानं कः शक्तो वर्णयितुं भुवि॥ १०० | इसकी यह सुनीति नामवाली माता भी अवश्य ही सत्य और हितकर वचन बोलनेवाली है*। संसारमें ऐसा कौन है |
* सुनीतिने ध्रुवको पुण्योपार्जन करनेका उपदेश दिया था, जिसके आचरणसे उन्हें उत्तम लोक प्राप्त हुआ। अतएव 'सुनीति' सूनृता कही गयी है।
५८ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १३
| त्रैलोक्याश्रयतां प्राप्तं परं स्थानं स्थिरायति।<br>स्थानं प्राप्ता परं धृत्वा या कुक्षिविवरे ध्रुवम्॥ १०१<br>यश्चैतत्कीर्त्तयेन्नित्यं ध्रुवस्यारोहणं दिवि।<br>सर्वपापविनिर्मुक्तः स्वर्गलोके महीयते॥ १०२<br>स्थानभ्रंशं न चाप्नोति दिवि वा यदि वा भुवि।<br>सर्वकल्याणसंयुक्तो दीर्घकालं स जीवति॥ १०३ | जो इसकी महिमाका वर्णन कर सके? जिसने अपनी कोखमें उस ध्रुवको धारण करके त्रिलोकीका आश्रयभूत अति उत्तम स्थान प्राप्त कर लिया, जो भविष्यमें भी स्थिर रहनेवाला है'॥ १००-१०१ ॥<br>जो व्यक्ति ध्रुवके इस दिव्यलोक-प्राप्तिके प्रसंगका कीर्तन करता है वह सब पापोंसे मुक्त होकर स्वर्गलोकमें पूजित होता है॥ १०२॥ वह स्वर्गमें रहे अथवा पृथिवीमें, कभी अपने स्थानसे च्युत नहीं होता तथा समस्त मंगलोंसे भरपूर रहकर बहुत कालतक जीवित रहता है॥ १०३॥ |
|---|
इति श्रीविष्णुपुराणे प्रथमऽंशे द्वादशोऽध्यायः॥ १२॥
तेरहवाँ अध्याय
राजा वेन और पृथुका चरित्र
श्रीपराशर उवाच
| ध्रुवाच्छिष्टं च भव्यं च भव्याच्छम्भुर्व्यजायत।<br>शिष्टेराधत्त सुच्छाया पञ्चपुत्रानकल्मषान्॥ १<br>रिपुं रिपुञ्जयं विप्रं वृकलं वृकतेजसम्।<br>रिपोराधत्त बृहती चाक्षुषं सर्वतेजसम्॥ २<br>अजीजनत्पुष्करिण्यां वारुण्यां चाक्षुषो मनुम्।<br>प्रजापतेरात्मजायां वीरणस्य महात्मनः॥ ३<br>मनोरजायन्त दश नड्वलायां महौजसः।<br>कन्यायां तपतां श्रेष्ठ वैराजस्य प्रजापतेः॥ ४<br>कुरुः पुरुः शतद्युम्नस्तपस्वी सत्यवाञ्छुचिः।<br>अग्निष्टोमोऽतिरात्रश्च सुद्युम्नश्चेति ते नव।<br>अभिमन्युश्च दशमो नड्वलायां महौजसः॥ ५<br>कुरोरजनयत्पुत्रान् षडाग्नेयी महाप्रभान्।<br>अङ्गं सुमनसं ख्यातिं क्रतुमङ्गिरसं शिबिम्॥ ६<br>अङ्गात्सुनीथापत्यं वै वेनमेकमजायत।<br>प्रजार्थमृषयस्तस्य ममन्थुर्दक्षिणं करम्॥ ७<br>वेनस्य पाणौ मथिते सम्बभूव महामुने।<br>वैन्यो नाम महीपालो यः पृथुः परिकीर्त्तितः॥ ८<br>येन दुग्धा मही पूर्वं प्रजानां हितकारणात्॥ ९ | श्रीपराशरजी बोले—हे मैत्रेय! ध्रुवसे [उसकी पत्नीने] शिष्टि और भव्यको उत्पन्न किया और भव्यसे शम्भुका जन्म हुआ तथा शिष्टिके द्वारा उसकी पत्नी सुच्छायाने रिपु, रिपुंजय, विप्र, वृकल और वृकतेजा नामक पाँच निष्पाप पुत्र उत्पन्न किये। उनमेंसे रिपुके द्वारा बृहतीके गर्भसे महातेजस्वी चाक्षुषका जन्म हुआ॥ १-२॥ चाक्षुषने अपनी भार्या पुष्करणीसे, जो वरुण-कुलमें उत्पन्न और महात्मा वीरण प्रजापतिकी पुत्री थी, मनुको उत्पन्न किया [जो छठे मन्वन्तरके अधिपति हुए]॥ ३॥ तपस्वियोंमें श्रेष्ठ मनुसे वैराज प्रजापतिकी पुत्री नड्वलाके गर्भमें दस महातेजस्वी पुत्र उत्पन्न हुए॥ ४॥ नड्वलासे कुरु, पुरु, शतद्युम्न, तपस्वी, सत्यवान्, शुचि, अग्निष्टोम, अतिरात्र तथा नवाँ सुद्युम्न और दसवाँ अभिमन्यु इन महातेजस्वी पुत्रोंका जन्म हुआ॥ ५॥ कुरुके द्वारा उसकी पत्नी आग्नेयीने अंग, सुमना, ख्याति, क्रतु, अंगिरा और शिबि इन छः परम तेजस्वी पुत्रोंको उत्पन्न किया॥ ६॥ अंगसे सुनीथाके वेन नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। ऋषियोंने उस (वेन)-के दाहिने हाथका सन्तानके लिये मन्थन किया था॥ ७॥ हे महामुने! वेनके हाथका मन्थन करनेपर उससे वैन्य नामक महीपाल उत्पन्न हुए जो पृथु नामसे विख्यात हैं और जिन्होंने प्रजाके हितके लिये पूर्वकालमें पृथिवीको दुहा था॥ ८-९॥ |
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अ० १३ ] * प्रथम अंश * ५९
श्रीमैत्रेय उवाच किमर्थं मथितः पाणिर्वेनस्य परमर्षिभिः। यत्र जज्ञे महावीर्यः स पृथुर्मुविसत्तम ॥ १० श्रीपराशर उवाच सुनीथा नाम या कन्या मृत्योः प्रथमतॊऽभवत्। अङ्गस्य भार्या सा दत्ता तस्यां वेनो व्यजायत ॥ ११ स मातामहदोषेण तेन मृत्योः सुतात्मजः। निसर्गादेव मैत्रेय दुष्ट एव व्यजायत ॥ १२ अभिषिक्तो यदा राज्ये स वेनः परमर्षिभिः। घोषयामास स तदा पृथिव्यां पृथिवीपतिः ॥ १३ न यष्टव्यं न दातव्यं न होतव्यं कथञ्चन। भोक्ता यज्ञस्य कस्त्वन्यो ह्यहं यज्ञपतिः प्रभुः ॥ १४ ततस्तमृषयः पूर्वं सम्पूज्य पृथिवीपतिम्। ऊचुः सामकलं वाक्यं मैत्रेय समुपस्थिताः ॥ १५ ऋषय ऊचुः भो भो राजन् शृणुष्व त्वं यद्वदाम महीपते। राज्यदेहोपकाराय प्रजानां च हितं परम् ॥ १६ दीर्घसत्रेण देवेशं सर्वयज्ञेश्वरं हरिम्। पूजयिष्याम भद्रं ते तस्यांशस्ते भविष्यति ॥ १७ यज्ञेन यज्ञपुरुषो विष्णुः सम्प्रीणितो नृप। अस्माभिर्भवतः कामान्सर्वानेव प्रदास्यति ॥ १८ यज्ञैर्यज्ञेश्वरो येषां राष्ट्रे सम्पूज्यते हरिः। तेषां सर्वेप्सितावाप्तिं ददाति नृप भूभृताम् ॥ १९ वेन उवाच मत्तः कोऽभ्यधिकोऽन्योऽस्ति कश्चाराध्यो ममापरः। कोऽयं हरिरिति ख्यातो यो वो यज्ञेश्वरो मतः ॥ २० ब्रह्मा जनार्दनः शम्भुरिन्द्रो वायुर्यमो रविः। हुतभुग्वरुणो धाता पूषा भूमिर्निशाकरः ॥ २१ एते चान्ये च ये देवाः शापानुग्रहकारिणः। नृपस्यैते शरीरस्थाः सर्वदेवमयो नृपः ॥ २२ एवं ज्ञात्वा मयाज्ञप्तं यद्यथा क्रियतां तथा। न दातव्यं न यष्टव्यं न होतव्यं च भो द्विजाः ॥ २३ भर्तृशुश्रूषणं धर्मो यथा स्त्रीणां परो मतः। ममाज्ञापालनं धर्मो भवतां च तथा द्विजाः ॥ २४
श्रीमैत्रेयजी बोले—हे मुनिश्रेष्ठ! परमर्षियोंने वेनके हाथको क्यों मथा जिससे महापराक्रमी पृथुका जन्म हुआ ? ॥ १०॥ श्रीपराशरजी बोले—हे मुने! मृत्युकी सुनीथा नामवाली जो प्रथम पुत्री थी वह अंगको पत्नीरूपसे दी (व्याही) गयी थी। उसीसे वेनका जन्म हुआ ॥ ११ ॥ हे मैत्रेय! वह मृत्युकी कन्याका पुत्र अपने मातामह (नाना)-के दोषसे स्वभावसे ही दुष्ट प्रकृति हुआ ॥ १२ ॥ उस वेनका जिस समय महर्षियोंद्वारा राजपद्पर अभिषेक हुआ उसी समय उस पृथिवीपतिने संसारभरमें यह घोषणा कर दी कि 'भगवान्, यज्ञपुरुष मैं ही हूँ, मुझसे अतिरिक्त यज्ञका भोक्ता और स्वामी हो ही कौन सकता है? इसलिये कभी कोई यज्ञ, दान और हवन आदि न करे' ॥ १३-१४ ॥ हे मैत्रेय! तब ऋषियोंने उस पृथिवीपतिके पास उपस्थित हो पहले उसकी खूब प्रशंसा कर सान्त्वनायुक्त मधुर वाणीसे कहा ॥ १५ ॥ ऋषिगण बोले—हे राजन्! हे पृथिवीपते! तुम्हारे राज्य और देहके उपकार तथा प्रजाके हितके लिये हम जो बात कहते हैं, सुनो ॥ १६॥ तुम्हारा कल्याण हो; देखो, हम बड़े-बड़े यज्ञोंद्वारा जो सर्व-यज्ञेश्वर देवाधिपति भगवान् हरिका पूजन करेंगे उसके फलमेंसे तुमको भी [छठा] भाग मिलेगा ॥ १७ ॥ हे नृप! इस प्रकार यज्ञोंके द्वारा यज्ञपुरुष भगवान् विष्णु प्रसन्न होकर हमलोगोंके साथ तुम्हारी भी सकल कामनाएँ पूर्ण करेंगे ॥ १८ ॥ हे राजन् जिन राजाओंके राज्यमें यज्ञेश्वर भगवान् हरिका यज्ञोंद्वारा पूजन किया जाता है, वे उनकी सभी कामनाओंको पूर्ण कर देते हैं ॥ १९॥ वेन बोला—मुझसे भी बढ़कर ऐसा और कौन है जो मेरा भी पूजनीय है? जिसे तुम यज्ञेश्वर मानते हो वह 'हरि' कहलानेवाला कौन है? ॥ २०॥ ब्रह्मा, विष्णु, महादेव, इन्द्र, वायु, यम, सूर्य, अग्नि, वरुण, धाता, पूषा, पृथिवी और चन्द्रमा तथा इनके अतिरिक्त और भी जितने देवता शाप और कृपा करनेमें समर्थ हैं वे सभी राजाके शरीरमें निवास करते हैं, इस प्रकार राजा सर्वदेवमय है ॥ २१-२२ ॥ हे ब्राह्मणो ! ऐसा जानकर मैंने जैसी जो कुछ आज्ञा की है वैसा ही करो। देखो, कोई भी दान, यज्ञ और हवन आदि न करे ॥ २३ ॥ हे द्विजगण! स्त्रीका परमधर्म जैसे अपने पतिकी सेवा करना ही माना गया है वैसे ही आपलोगोंका धर्म भी मेरी आज्ञाका पालन करना ही है ॥ २४ ॥