विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
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अ० १२ ] * प्रथम अंश * ५७
| ततो यथाभिलषिता प्राप्ता ते राजपुत्रता।<br>उत्तानपादस्य गृहे जातोऽसि ध्रुव दुर्लभे॥ ८६<br>अन्येषां दुर्लभं स्थानं कुले स्वायम्भुवस्य यत्॥ ८७ | अतः हे ध्रुव! तुझको अपनी मनोवांछित राजपुत्रता प्राप्त हुई और जिन स्वायम्भुवमनुके कुलमें और किसीको स्थान मिलना अति दुर्लभ है, उन्हींके घरमें तूने उत्तानपादके यहाँ जन्म लिया॥ ८६-८७॥ |
| तस्यैतदपरं बाल येनाहं परितोषितः।<br>मामाराध्य नरो मुक्तिमवाप्नोत्यविलम्बिताम्॥ ८८<br>मय्यर्पितमना बाल किमु स्वर्गादिकं पदम्॥ ८९ | अरे बालक! [औरोंके लिये यह स्थान कितना ही दुर्लभ हो परन्तु] जिसने मुझे सन्तुष्ट किया है उसके लिये तो यह अत्यन्त तुच्छ है। मेरी आराधना करनेसे तो मोक्षपद भी तत्काल प्राप्त हो सकता है, फिर जिसका चित्त निरन्तर मुझमें ही लगा हुआ है उसके लिये स्वर्गादि लोकोंका तो कहना ही क्या है?॥ ८८-८९॥ |
| त्रैलोक्यादधिके स्थाने सर्वताराग्रहाश्रयः।<br>भविष्यति न सन्देहो मत्प्रसादाद्भवाञ्ध्रुव॥ ९० | हे ध्रुव! मेरी कृपासे तू निस्सन्देह उस स्थानमें, जो त्रिलोकीमें सबसे उत्कृष्ट है, सम्पूर्ण ग्रह और तारामण्डलका आश्रय बनेगा॥ ९०॥ |
| सूर्यात्सोमात्तथा भौमात्सोमपुत्राद्बृहस्पतेः।<br>सितार्कतनयादीनां सर्वर्क्षाणां तथा ध्रुव॥ ९१<br>सप्तर्षीणामशेषाणां ये च वैमानिकाः सुराः।<br>सर्वेषामुपरि स्थानं तव दत्तं मया ध्रुव॥ ९२ | हे ध्रुव! मैं तुझे वह ध्रुव (निश्चल) स्थान देता हूँ जो सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र और शनि आदि ग्रहों, सभी नक्षत्रों, सप्तर्षियों और सम्पूर्ण विमानचारी देवगणोंसे ऊपर है॥ ९१-९२॥ |
| केचिच्चतुर्युगं यावत्केचिन्मन्वन्तरं सुराः।<br>तिष्ठन्ति भवतो दत्ता मया वै कल्पसंस्थितिः॥ ९३ | देवताओंमेंसे कोई तो केवल चार युगतक और कोई एक मन्वन्तरतक ही रहते हैं; किन्तु तुझे मैं एक कल्पतककी स्थिति देता हूँ॥ ९३॥ |
| सुनीतिरपि ते माता त्वदासन्नातिनिर्मला।<br>विमाने तारका भूत्वा तावत्कालं निवत्स्यति॥ ९४ | तेरी माता सुनीति भी अति स्वच्छ तारारूपसे उतने ही समयतक तेरे पास एक विमानपर निवास करेगी॥ ९४॥ |
| ये च त्वां मानवाः प्रातः सायं च सुसमाहिताः।<br>कीर्त्तयिष्यन्ति तेषां च महत्पुण्यं भविष्यति॥ ९५ | और जो लोग समाहित-चित्तसे सायंकाल और प्रातःकालके समय तेरा गुण-कीर्तन करेंगे उनको महान् पुण्य होगा॥ ९५॥ |
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले— |
| एवं पूर्वं जगन्नाथाद्देवदेवाज्जनार्दनात्।<br>वरं प्राप्य ध्रुवः स्थानमध्यास्ते स महामते॥ ९६ | हे महामते! इस प्रकार पूर्वकालमें जगत्पति देवाधिदेव भगवान् जनार्दनसे वर पाकर ध्रुव उस अत्युत्तम स्थानमें स्थित हुए॥ ९६॥ |
| स्वयं शुश्रूषणाद्धर्म्यान्मातापित्रोश्च वै तथा।<br>द्वादशाक्षरमाहात्म्यात्तपसश्च प्रभावतः॥ ९७<br>तस्याभिमानमृद्धिं च महिमानं निरीक्ष्य हि।<br>देवासुराणामाचार्यः श्लोकमत्रोशना जगौ॥ ९८ | हे मुने! अपने माता-पिताकी धर्मपूर्वक सेवा करनेसे तथा द्वादशाक्षर-मन्त्रके माहात्म्य और तपके प्रभावसे उनके मान, वैभव एवं प्रभावकी वृद्धि देखकर देव और असुरोंके आचार्य शुक्रदेवने ये श्लोक कहे हैं—॥ ९७-९८॥ |
| अहोऽस्य तपसो वीर्यमहोऽस्य तपसः फलम्।<br>यदेनं पुरतः कृत्वा ध्रुवं सप्तर्षयः स्थिताः॥ ९९ | 'अहो! इस ध्रुवके तपका कैसा प्रभाव है? अहो ! इसकी तपस्याका कैसा अद्भुत फल है जो इस ध्रुवको ही आगे रखकर सप्तर्षिगण स्थित हो रहे हैं॥ ९९॥ |
| ध्रुवस्य जननी चेयं सुनीतिर्नाम सूनृता।<br>अस्याश्च महिमानं कः शक्तो वर्णयितुं भुवि॥ १०० | इसकी यह सुनीति नामवाली माता भी अवश्य ही सत्य और हितकर वचन बोलनेवाली है*। संसारमें ऐसा कौन है |
* सुनीतिने ध्रुवको पुण्योपार्जन करनेका उपदेश दिया था, जिसके आचरणसे उन्हें उत्तम लोक प्राप्त हुआ। अतएव 'सुनीति' सूनृता कही गयी है।