विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
अ० १२ ] * प्रथम अंश * ५७
| ततो यथाभिलषिता प्राप्ता ते राजपुत्रता।<br>उत्तानपादस्य गृहे जातोऽसि ध्रुव दुर्लभे॥ ८६<br>अन्येषां दुर्लभं स्थानं कुले स्वायम्भुवस्य यत्॥ ८७ | अतः हे ध्रुव! तुझको अपनी मनोवांछित राजपुत्रता प्राप्त हुई और जिन स्वायम्भुवमनुके कुलमें और किसीको स्थान मिलना अति दुर्लभ है, उन्हींके घरमें तूने उत्तानपादके यहाँ जन्म लिया॥ ८६-८७॥ |
| तस्यैतदपरं बाल येनाहं परितोषितः।<br>मामाराध्य नरो मुक्तिमवाप्नोत्यविलम्बिताम्॥ ८८<br>मय्यर्पितमना बाल किमु स्वर्गादिकं पदम्॥ ८९ | अरे बालक! [औरोंके लिये यह स्थान कितना ही दुर्लभ हो परन्तु] जिसने मुझे सन्तुष्ट किया है उसके लिये तो यह अत्यन्त तुच्छ है। मेरी आराधना करनेसे तो मोक्षपद भी तत्काल प्राप्त हो सकता है, फिर जिसका चित्त निरन्तर मुझमें ही लगा हुआ है उसके लिये स्वर्गादि लोकोंका तो कहना ही क्या है?॥ ८८-८९॥ |
| त्रैलोक्यादधिके स्थाने सर्वताराग्रहाश्रयः।<br>भविष्यति न सन्देहो मत्प्रसादाद्भवाञ्ध्रुव॥ ९० | हे ध्रुव! मेरी कृपासे तू निस्सन्देह उस स्थानमें, जो त्रिलोकीमें सबसे उत्कृष्ट है, सम्पूर्ण ग्रह और तारामण्डलका आश्रय बनेगा॥ ९०॥ |
| सूर्यात्सोमात्तथा भौमात्सोमपुत्राद्बृहस्पतेः।<br>सितार्कतनयादीनां सर्वर्क्षाणां तथा ध्रुव॥ ९१<br>सप्तर्षीणामशेषाणां ये च वैमानिकाः सुराः।<br>सर्वेषामुपरि स्थानं तव दत्तं मया ध्रुव॥ ९२ | हे ध्रुव! मैं तुझे वह ध्रुव (निश्चल) स्थान देता हूँ जो सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र और शनि आदि ग्रहों, सभी नक्षत्रों, सप्तर्षियों और सम्पूर्ण विमानचारी देवगणोंसे ऊपर है॥ ९१-९२॥ |
| केचिच्चतुर्युगं यावत्केचिन्मन्वन्तरं सुराः।<br>तिष्ठन्ति भवतो दत्ता मया वै कल्पसंस्थितिः॥ ९३ | देवताओंमेंसे कोई तो केवल चार युगतक और कोई एक मन्वन्तरतक ही रहते हैं; किन्तु तुझे मैं एक कल्पतककी स्थिति देता हूँ॥ ९३॥ |
| सुनीतिरपि ते माता त्वदासन्नातिनिर्मला।<br>विमाने तारका भूत्वा तावत्कालं निवत्स्यति॥ ९४ | तेरी माता सुनीति भी अति स्वच्छ तारारूपसे उतने ही समयतक तेरे पास एक विमानपर निवास करेगी॥ ९४॥ |
| ये च त्वां मानवाः प्रातः सायं च सुसमाहिताः।<br>कीर्त्तयिष्यन्ति तेषां च महत्पुण्यं भविष्यति॥ ९५ | और जो लोग समाहित-चित्तसे सायंकाल और प्रातःकालके समय तेरा गुण-कीर्तन करेंगे उनको महान् पुण्य होगा॥ ९५॥ |
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले— |
| एवं पूर्वं जगन्नाथाद्देवदेवाज्जनार्दनात्।<br>वरं प्राप्य ध्रुवः स्थानमध्यास्ते स महामते॥ ९६ | हे महामते! इस प्रकार पूर्वकालमें जगत्पति देवाधिदेव भगवान् जनार्दनसे वर पाकर ध्रुव उस अत्युत्तम स्थानमें स्थित हुए॥ ९६॥ |
| स्वयं शुश्रूषणाद्धर्म्यान्मातापित्रोश्च वै तथा।<br>द्वादशाक्षरमाहात्म्यात्तपसश्च प्रभावतः॥ ९७<br>तस्याभिमानमृद्धिं च महिमानं निरीक्ष्य हि।<br>देवासुराणामाचार्यः श्लोकमत्रोशना जगौ॥ ९८ | हे मुने! अपने माता-पिताकी धर्मपूर्वक सेवा करनेसे तथा द्वादशाक्षर-मन्त्रके माहात्म्य और तपके प्रभावसे उनके मान, वैभव एवं प्रभावकी वृद्धि देखकर देव और असुरोंके आचार्य शुक्रदेवने ये श्लोक कहे हैं—॥ ९७-९८॥ |
| अहोऽस्य तपसो वीर्यमहोऽस्य तपसः फलम्।<br>यदेनं पुरतः कृत्वा ध्रुवं सप्तर्षयः स्थिताः॥ ९९ | 'अहो! इस ध्रुवके तपका कैसा प्रभाव है? अहो ! इसकी तपस्याका कैसा अद्भुत फल है जो इस ध्रुवको ही आगे रखकर सप्तर्षिगण स्थित हो रहे हैं॥ ९९॥ |
| ध्रुवस्य जननी चेयं सुनीतिर्नाम सूनृता।<br>अस्याश्च महिमानं कः शक्तो वर्णयितुं भुवि॥ १०० | इसकी यह सुनीति नामवाली माता भी अवश्य ही सत्य और हितकर वचन बोलनेवाली है*। संसारमें ऐसा कौन है |
* सुनीतिने ध्रुवको पुण्योपार्जन करनेका उपदेश दिया था, जिसके आचरणसे उन्हें उत्तम लोक प्राप्त हुआ। अतएव 'सुनीति' सूनृता कही गयी है।
५८ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १३
| त्रैलोक्याश्रयतां प्राप्तं परं स्थानं स्थिरायति।<br>स्थानं प्राप्ता परं धृत्वा या कुक्षिविवरे ध्रुवम्॥ १०१<br>यश्चैतत्कीर्त्तयेन्नित्यं ध्रुवस्यारोहणं दिवि।<br>सर्वपापविनिर्मुक्तः स्वर्गलोके महीयते॥ १०२<br>स्थानभ्रंशं न चाप्नोति दिवि वा यदि वा भुवि।<br>सर्वकल्याणसंयुक्तो दीर्घकालं स जीवति॥ १०३ | जो इसकी महिमाका वर्णन कर सके? जिसने अपनी कोखमें उस ध्रुवको धारण करके त्रिलोकीका आश्रयभूत अति उत्तम स्थान प्राप्त कर लिया, जो भविष्यमें भी स्थिर रहनेवाला है'॥ १००-१०१ ॥<br>जो व्यक्ति ध्रुवके इस दिव्यलोक-प्राप्तिके प्रसंगका कीर्तन करता है वह सब पापोंसे मुक्त होकर स्वर्गलोकमें पूजित होता है॥ १०२॥ वह स्वर्गमें रहे अथवा पृथिवीमें, कभी अपने स्थानसे च्युत नहीं होता तथा समस्त मंगलोंसे भरपूर रहकर बहुत कालतक जीवित रहता है॥ १०३॥ |
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इति श्रीविष्णुपुराणे प्रथमऽंशे द्वादशोऽध्यायः॥ १२॥
तेरहवाँ अध्याय
राजा वेन और पृथुका चरित्र
श्रीपराशर उवाच
| ध्रुवाच्छिष्टं च भव्यं च भव्याच्छम्भुर्व्यजायत।<br>शिष्टेराधत्त सुच्छाया पञ्चपुत्रानकल्मषान्॥ १<br>रिपुं रिपुञ्जयं विप्रं वृकलं वृकतेजसम्।<br>रिपोराधत्त बृहती चाक्षुषं सर्वतेजसम्॥ २<br>अजीजनत्पुष्करिण्यां वारुण्यां चाक्षुषो मनुम्।<br>प्रजापतेरात्मजायां वीरणस्य महात्मनः॥ ३<br>मनोरजायन्त दश नड्वलायां महौजसः।<br>कन्यायां तपतां श्रेष्ठ वैराजस्य प्रजापतेः॥ ४<br>कुरुः पुरुः शतद्युम्नस्तपस्वी सत्यवाञ्छुचिः।<br>अग्निष्टोमोऽतिरात्रश्च सुद्युम्नश्चेति ते नव।<br>अभिमन्युश्च दशमो नड्वलायां महौजसः॥ ५<br>कुरोरजनयत्पुत्रान् षडाग्नेयी महाप्रभान्।<br>अङ्गं सुमनसं ख्यातिं क्रतुमङ्गिरसं शिबिम्॥ ६<br>अङ्गात्सुनीथापत्यं वै वेनमेकमजायत।<br>प्रजार्थमृषयस्तस्य ममन्थुर्दक्षिणं करम्॥ ७<br>वेनस्य पाणौ मथिते सम्बभूव महामुने।<br>वैन्यो नाम महीपालो यः पृथुः परिकीर्त्तितः॥ ८<br>येन दुग्धा मही पूर्वं प्रजानां हितकारणात्॥ ९ | श्रीपराशरजी बोले—हे मैत्रेय! ध्रुवसे [उसकी पत्नीने] शिष्टि और भव्यको उत्पन्न किया और भव्यसे शम्भुका जन्म हुआ तथा शिष्टिके द्वारा उसकी पत्नी सुच्छायाने रिपु, रिपुंजय, विप्र, वृकल और वृकतेजा नामक पाँच निष्पाप पुत्र उत्पन्न किये। उनमेंसे रिपुके द्वारा बृहतीके गर्भसे महातेजस्वी चाक्षुषका जन्म हुआ॥ १-२॥ चाक्षुषने अपनी भार्या पुष्करणीसे, जो वरुण-कुलमें उत्पन्न और महात्मा वीरण प्रजापतिकी पुत्री थी, मनुको उत्पन्न किया [जो छठे मन्वन्तरके अधिपति हुए]॥ ३॥ तपस्वियोंमें श्रेष्ठ मनुसे वैराज प्रजापतिकी पुत्री नड्वलाके गर्भमें दस महातेजस्वी पुत्र उत्पन्न हुए॥ ४॥ नड्वलासे कुरु, पुरु, शतद्युम्न, तपस्वी, सत्यवान्, शुचि, अग्निष्टोम, अतिरात्र तथा नवाँ सुद्युम्न और दसवाँ अभिमन्यु इन महातेजस्वी पुत्रोंका जन्म हुआ॥ ५॥ कुरुके द्वारा उसकी पत्नी आग्नेयीने अंग, सुमना, ख्याति, क्रतु, अंगिरा और शिबि इन छः परम तेजस्वी पुत्रोंको उत्पन्न किया॥ ६॥ अंगसे सुनीथाके वेन नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। ऋषियोंने उस (वेन)-के दाहिने हाथका सन्तानके लिये मन्थन किया था॥ ७॥ हे महामुने! वेनके हाथका मन्थन करनेपर उससे वैन्य नामक महीपाल उत्पन्न हुए जो पृथु नामसे विख्यात हैं और जिन्होंने प्रजाके हितके लिये पूर्वकालमें पृथिवीको दुहा था॥ ८-९॥ |
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अ० १३ ] * प्रथम अंश * ५९
श्रीमैत्रेय उवाच किमर्थं मथितः पाणिर्वेनस्य परमर्षिभिः। यत्र जज्ञे महावीर्यः स पृथुर्मुविसत्तम ॥ १० श्रीपराशर उवाच सुनीथा नाम या कन्या मृत्योः प्रथमतॊऽभवत्। अङ्गस्य भार्या सा दत्ता तस्यां वेनो व्यजायत ॥ ११ स मातामहदोषेण तेन मृत्योः सुतात्मजः। निसर्गादेव मैत्रेय दुष्ट एव व्यजायत ॥ १२ अभिषिक्तो यदा राज्ये स वेनः परमर्षिभिः। घोषयामास स तदा पृथिव्यां पृथिवीपतिः ॥ १३ न यष्टव्यं न दातव्यं न होतव्यं कथञ्चन। भोक्ता यज्ञस्य कस्त्वन्यो ह्यहं यज्ञपतिः प्रभुः ॥ १४ ततस्तमृषयः पूर्वं सम्पूज्य पृथिवीपतिम्। ऊचुः सामकलं वाक्यं मैत्रेय समुपस्थिताः ॥ १५ ऋषय ऊचुः भो भो राजन् शृणुष्व त्वं यद्वदाम महीपते। राज्यदेहोपकाराय प्रजानां च हितं परम् ॥ १६ दीर्घसत्रेण देवेशं सर्वयज्ञेश्वरं हरिम्। पूजयिष्याम भद्रं ते तस्यांशस्ते भविष्यति ॥ १७ यज्ञेन यज्ञपुरुषो विष्णुः सम्प्रीणितो नृप। अस्माभिर्भवतः कामान्सर्वानेव प्रदास्यति ॥ १८ यज्ञैर्यज्ञेश्वरो येषां राष्ट्रे सम्पूज्यते हरिः। तेषां सर्वेप्सितावाप्तिं ददाति नृप भूभृताम् ॥ १९ वेन उवाच मत्तः कोऽभ्यधिकोऽन्योऽस्ति कश्चाराध्यो ममापरः। कोऽयं हरिरिति ख्यातो यो वो यज्ञेश्वरो मतः ॥ २० ब्रह्मा जनार्दनः शम्भुरिन्द्रो वायुर्यमो रविः। हुतभुग्वरुणो धाता पूषा भूमिर्निशाकरः ॥ २१ एते चान्ये च ये देवाः शापानुग्रहकारिणः। नृपस्यैते शरीरस्थाः सर्वदेवमयो नृपः ॥ २२ एवं ज्ञात्वा मयाज्ञप्तं यद्यथा क्रियतां तथा। न दातव्यं न यष्टव्यं न होतव्यं च भो द्विजाः ॥ २३ भर्तृशुश्रूषणं धर्मो यथा स्त्रीणां परो मतः। ममाज्ञापालनं धर्मो भवतां च तथा द्विजाः ॥ २४
श्रीमैत्रेयजी बोले—हे मुनिश्रेष्ठ! परमर्षियोंने वेनके हाथको क्यों मथा जिससे महापराक्रमी पृथुका जन्म हुआ ? ॥ १०॥ श्रीपराशरजी बोले—हे मुने! मृत्युकी सुनीथा नामवाली जो प्रथम पुत्री थी वह अंगको पत्नीरूपसे दी (व्याही) गयी थी। उसीसे वेनका जन्म हुआ ॥ ११ ॥ हे मैत्रेय! वह मृत्युकी कन्याका पुत्र अपने मातामह (नाना)-के दोषसे स्वभावसे ही दुष्ट प्रकृति हुआ ॥ १२ ॥ उस वेनका जिस समय महर्षियोंद्वारा राजपद्पर अभिषेक हुआ उसी समय उस पृथिवीपतिने संसारभरमें यह घोषणा कर दी कि 'भगवान्, यज्ञपुरुष मैं ही हूँ, मुझसे अतिरिक्त यज्ञका भोक्ता और स्वामी हो ही कौन सकता है? इसलिये कभी कोई यज्ञ, दान और हवन आदि न करे' ॥ १३-१४ ॥ हे मैत्रेय! तब ऋषियोंने उस पृथिवीपतिके पास उपस्थित हो पहले उसकी खूब प्रशंसा कर सान्त्वनायुक्त मधुर वाणीसे कहा ॥ १५ ॥ ऋषिगण बोले—हे राजन्! हे पृथिवीपते! तुम्हारे राज्य और देहके उपकार तथा प्रजाके हितके लिये हम जो बात कहते हैं, सुनो ॥ १६॥ तुम्हारा कल्याण हो; देखो, हम बड़े-बड़े यज्ञोंद्वारा जो सर्व-यज्ञेश्वर देवाधिपति भगवान् हरिका पूजन करेंगे उसके फलमेंसे तुमको भी [छठा] भाग मिलेगा ॥ १७ ॥ हे नृप! इस प्रकार यज्ञोंके द्वारा यज्ञपुरुष भगवान् विष्णु प्रसन्न होकर हमलोगोंके साथ तुम्हारी भी सकल कामनाएँ पूर्ण करेंगे ॥ १८ ॥ हे राजन् जिन राजाओंके राज्यमें यज्ञेश्वर भगवान् हरिका यज्ञोंद्वारा पूजन किया जाता है, वे उनकी सभी कामनाओंको पूर्ण कर देते हैं ॥ १९॥ वेन बोला—मुझसे भी बढ़कर ऐसा और कौन है जो मेरा भी पूजनीय है? जिसे तुम यज्ञेश्वर मानते हो वह 'हरि' कहलानेवाला कौन है? ॥ २०॥ ब्रह्मा, विष्णु, महादेव, इन्द्र, वायु, यम, सूर्य, अग्नि, वरुण, धाता, पूषा, पृथिवी और चन्द्रमा तथा इनके अतिरिक्त और भी जितने देवता शाप और कृपा करनेमें समर्थ हैं वे सभी राजाके शरीरमें निवास करते हैं, इस प्रकार राजा सर्वदेवमय है ॥ २१-२२ ॥ हे ब्राह्मणो ! ऐसा जानकर मैंने जैसी जो कुछ आज्ञा की है वैसा ही करो। देखो, कोई भी दान, यज्ञ और हवन आदि न करे ॥ २३ ॥ हे द्विजगण! स्त्रीका परमधर्म जैसे अपने पतिकी सेवा करना ही माना गया है वैसे ही आपलोगोंका धर्म भी मेरी आज्ञाका पालन करना ही है ॥ २४ ॥
| ६० | * श्रीविष्णुपुराण * | [ अ० १३ |
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| ऋषय ऊचुः | **ऋषिगण बोले—**महाराज! आप ऐसी आज्ञा दीजिये, जिससे धर्मका क्षय न हो। देखिये, यह सारा जगत् हवि (यज्ञमें हवन की हुई सामग्री)-का ही परिणाम है॥ २५॥ | | देह्यनुज्ञां महाराज मा धर्मो यातु सङ्क्षयम्।<br>हविषां परिणामोऽयं यदेतदखिलं जगत्॥ २५ | | | श्रीपराशर उवाच | **श्रीपराशरजी बोले—**महर्षियोंके इस प्रकार बारम्बार समझाने और कहने-सुननेपर भी जब वेनने ऐसी आज्ञा नहीं दी तो वे अत्यन्त क्रुद्ध और अमर्षयुक्त होकर आपसमें कहने लगे—'इस पापीको मारो, मारो!॥ २६-२७॥ जो अनादि और अनन्त यज्ञपुरुष प्रभु विष्णुकी निन्दा करता है वह अनाचारी किसी प्रकार पृथ्वीपति होनेके योग्य नहीं है'॥ २८॥ ऐसा कह मुनिगणोंने, भगवान्की निन्दा आदि करनेके कारण पहले ही मरे हुए उस राजाको मन्त्रसे पवित्र किये हुए कुशाओंसे मार डाला॥ २९॥ | | इति विज्ञाप्यमानोऽपि स वेनः परमर्षिभिः।<br>यदा ददाति नानुज्ञां प्रोक्तः प्रोक्तः पुनः पुनः॥ २६ | | | ततस्ते मुनयः सर्वे कोपामर्षसमन्विताः।<br>हन्यतां हन्यतां पाप इत्यूचुस्ते परस्परम्॥ २७ | | | यो यज्ञपुरुषं विष्णुमनादिनिधनं प्रभुम्।<br>विनिन्दत्यधमाचारो न स योग्यो भुवः पतिः॥ २८ | | | इत्युक्त्वा मन्त्रपूतैस्तैः कुशैर्मुनिगणा नृपम्।<br>निजघ्नुर्निहतं पूर्वं भगवन्निन्दनादिना॥ २९ | | | ततश्च मुनयो रेणुं ददृशुः सर्वतो द्विज।<br>किमेतदिति चासन्नान्प्रपच्छुस्ते जनांस्तदा॥ ३० | हे द्विज! तदनन्तर उन मुनीश्वरोंने सब ओर बड़ी धूलि उठती देखी, उसे देखकर उन्होंने अपने निकटवर्ती लोगोंसे पूछा—“यह क्या है?”॥ ३०॥ उन पुरुषोंने कहा—“राष्ट्रके राजाहीन हो जानेसे दीन-दुखिया लोगोंने चोर बनकर दूसरोंका धन लूटना आरम्भ कर दिया है॥ ३१॥ हे मुनिवरो! उन तीव्र वेगवाले परधनहारी चोरोंके उत्पातसे ही यह बड़ी भारी धूलि उड़ती दीख रही है”॥ ३२॥ | | आख्यातं च जनैस्तेषां चोरीभूतैरराजके।<br>राष्ट्रे तु लोकैरारब्धं परस्वादानमातुरैः॥ ३१ | | | तेषामुदीर्णवेगानां चोराणां मुनिसत्तमाः।<br>सुमहान् दृश्यते रेणुः परवित्तापहारिणाम्॥ ३२ | | | ततः सम्मन्त्र्य ते सर्वे मुनयस्तस्य भूभृतः।<br>ममन्थूरुं पुत्रार्थमनपत्यस्य यत्नतः॥ ३३ | तब उन सब मुनीश्वरोंने आपसमें सलाह कर उस पुत्रहीन राजाकी जंघाका पुत्रके लिये यत्नपूर्वक मन्थन किया॥ ३३॥ उसकी जंघाके मथनेपर उससे एक पुरुष उत्पन्न हुआ जो जले ठूँठके समान काला, अत्यन्त नाटा और छोटे मुखवाला था॥ ३४॥ उसने अति आतुर होकर उन सब ब्राह्मणोंसे कहा—'मैं क्या करूँ?' उन्होंने कहा—“निषीद (बैठ)” अतः वह 'निषाद' कहलाया॥ ३५॥ इसलिये हे मुनिशार्दूल! उससे उत्पन्न हुए लोग विन्ध्याचलनिवासी पाप-परायण निषादगण हुए॥ ३६॥ उस निषादरूप द्वारसे राजा वेनका सम्पूर्ण पाप निकल गया। अतः निषादगण वेनके पापोंका नाश करनेवाले हुए॥ ३७॥ | | मथ्यमानात्समुत्तस्थौ तस्योरोः पुरुषः किल।<br>दग्धस्थूणाप्रतीकाशः खर्वाटास्योऽतिह्रस्वकः॥ ३४ | | | किं करोमीति तान्सर्वान्स विप्रानाह चातुरः।<br>निषीदेति तमूचुस्ते निषादस्तेन सोऽभवत्॥ ३५ | | | ततस्तत्सम्भवा जाता विन्ध्यशैलनिवासिनः।<br>निषादा मुनिशार्दूल पापकर्मोपलक्षणाः॥ ३६ | | | तेन द्वारेण तत्पापं निष्क्रान्तं तस्य भूपतेः।<br>निषादास्ते ततो जाता वेनकल्मषनाशनाः॥ ३७ | | | तस्यैव दक्षिणं हस्तं ममन्थुस्ते ततो द्विजाः॥ ३८ | फिर उन ब्राह्मणोंने उसके दायें हाथका मन्थन किया। उसका मन्थन करनेसे परम प्रतापी वेनसुवन पृथु प्रकट हुए, जो अपने शरीरसे प्रज्वलित अग्निके समान देदीप्यमान थे॥ ३८-३९॥ इसी समय आजगव नामक आद्य (सर्वप्रथम) धनुष और दिव्य बाण तथा कवच आकाशसे गिरे॥ ४०॥ | | मथ्यमाने च तत्राभूत्पृथुर्वैन्यः प्रतापवान्।<br>दीप्यमानः स्ववपुषा साक्षादग्निरिव ज्वलन्॥ ३९ | | | आद्यमाजगवं नाम खात्यपात ततो धनुः।<br>शराश्च दिव्या नभसः कवचं च पपात ह॥ ४० | |
अ० १३ ] * प्रथम अंश * ६१
तस्मिन् जाते तु भूतानि सम्प्रहृष्टानि सर्वशः ॥ ४१
सत्पुत्रेणैव जातेन वेनोऽपि त्रिदिवं ययौ ।
पुन्नाम्नो नरकात् त्रातः सुतेन सुमहात्मना ॥ ४२
तं समुद्राश्च नद्यश्च रत्नान्यादाय सर्वशः ।
तोयानि चाभिषेकार्थं सर्वाण्येवोपत्तस्थिरे ॥ ४३
पितामहश्च भगवान्देवैराङ्गिरसैः सह ।
स्थावराणि च भूतानि जङ्गमानि च सर्वशः ।
समागम्य तदा वैन्यमभ्यषिञ्चन्नराधिपम् ॥ ४४
हस्ते तु दक्षिणे चक्रं दृष्ट्वा तस्य पितामहः ।
विष्णोरंशं पृथुं मत्वा परितोषं परं ययौ ॥ ४५
विष्णुचक्रं करे चिह्नं सर्वेषां चक्रवर्तिनाम् ।
भवत्यव्याहतो यस्य प्रभावस्त्रिदशैरपि ॥ ४६
महता राजराज्येन पृथुर्वैन्यः प्रतापवान् ।
सोऽभिषिक्तो महातेजा विधिवद्धर्म्मकोविदैः ॥ ४७
पित्राऽपरञ्जितास्तस्य प्रजास्तेनानुरञ्जिताः ।
अनुरागात्ततस्तस्य नाम राजेत्यजायत ॥ ४८
आपस्तस्तम्भिरे चास्य समुद्रमभियास्यतः ।
पर्वताश्च ददुर्मार्गं ध्वजभङ्गश्च नाभवत् ॥ ४९
अकृष्टपच्या पृथिवी सिद्ध्यन्त्यन्नानि चिन्तया ।
सर्वकामदुघा गावः पुटके पुटके मधु ॥ ५०
तस्य वै जातमात्रस्य यज्ञे पैतामहे शुभे ।
सूतः सूत्यां समुत्पन्नः सौत्येऽहनि महामतिः ॥ ५१
तस्मिन्नेव महायज्ञे जज्ञे प्राज्ञोऽथ मागधः ।
प्रोक्तौ तदा मुनिवरैस्तावभौ सूतमागधौ ॥ ५२
स्तूयतामेष नृपतिः पृथुर्वैन्यः प्रतापवान् ।
कर्म्मैतदनुरूपं वां पात्रं स्तोत्रस्य चापरम् ॥ ५३
ततस्तावूचतुर्विप्रान्सर्वानेव कृताञ्जली ।
अद्य जातस्य नो कर्म ज्ञायतेऽस्य महीपतेः ॥ ५४
गुणा न चास्य ज्ञायन्ते न चास्य प्रथितं यशः ।
स्तोत्रं किमाश्रयं त्वस्य कार्यमस्माभिरुच्यताम् ॥ ५५
ऋषय ऊचुः
करिष्यत्येष यत्कर्म चक्रवर्ती महाबलः ।
गुणा भविष्या ये चास्य तैरयं स्तूयतां नृपः ॥ ५६
उनके उत्पन्न होनेसे सभी जीवोंको अति आनन्द हुआ और केवल सत्पुत्रके ही जन्म लेनेसे वेन भी स्वर्गलोकको चला गया। इस प्रकार महात्मा पुत्रके कारण ही उसकी पुम् अर्थात् नरकसे रक्षा हुई ॥ ४१-४२ ॥
महाराज पृथुके अभिषेकके लिये सभी समुद्र और नदियाँ सब प्रकारके रत्न और जल लेकर उपस्थित हुए ॥ ४३ ॥ उस समय आंगिरस देवगणोंके सहित पितामह ब्रह्माजीने और समस्त स्थावर-जंगम प्राणियोंने वहाँ आकर महाराज वैन्य (वेनपुत्र)-का राज्याभिषेक किया ॥ ४४ ॥ उनके दाहिने हाथमें चक्रका चिह्न देखकर उन्हें विष्णुका अंश जान पितामह ब्रह्माजीको परम आनन्द हुआ ॥ ४५ ॥ यह श्रीविष्णुभगवान्के चक्रका चिह्न सभी चक्रवर्ती राजाओंके हाथमें हुआ करता है। उनका प्रभाव कभी देवताओंसे भी कुण्ठित नहीं होता ॥ ४६ ॥
इस प्रकार महातेजस्वी और परम प्रतापी वेनपुत्र धर्मकुशल महानुभावोंद्वारा विधिपूर्वक अति महान् राजराजेश्वरपदपर अभिषिक्त हुए ॥ ४७ ॥ जिस प्रजाको पिताने अपरुक्त (अप्रसन्न) किया था उसीको उन्होंने अनुरंजित (प्रसन्न) किया, इसलिये अनुरंजन करनेसे उनका नाम ‘राजा’ हुआ ॥ ४८ ॥ जब वे समुद्रमें चलते थे तो जल बहनेसे रुक जाता था, पर्वत उन्हें मार्ग देते थे और उनकी ध्वजा कभी भंग नहीं हुई ॥ ४९ ॥ पृथिवी बिना जोते-बोये धान्य पकानेवाली थी; केवल चिन्तनमात्रसे ही अन्न सिद्ध हो जाता था, गौएँ कामधेनुरूपा थीं और पत्ते-पत्तेमें मधु भरा रहता था ॥ ५० ॥
राजा पृथुने उत्पन्न होते ही पैतामह यज्ञ किया; उससे सोमाभिषवके दिन सूति (सोमाभिषवभूमि)-से महामति सूतकी उत्पत्ति हुई ॥ ५१ ॥ उसी महायज्ञमें बुद्धिमान् मागधका भी जन्म हुआ। तब मुनिवरोंने उन दोनों सूत और मागधोंसे कहा— ॥ ५२ ॥ ‘तुम इन प्रतापवान् वेनपुत्र महाराज पृथुकी स्तुति करो। तुम्हारे योग्य यही कार्य है और राजा भी स्तुतिके ही योग्य हैं’ ॥ ५३ ॥ तब उन्होंने हाथ जोड़कर सब ब्राह्मणोंसे कहा—‘‘ये महाराज तो आज ही उत्पन्न हुए हैं, हम इनके कोई कर्म तो जानते ही नहीं हैं ॥ ५४ ॥ अभी इनके न तो कोई गुण प्रकट हुए हैं और न यश ही विख्यात हुआ है; फिर कहिये, हम किस आधारपर इनकी स्तुति करें’’ ॥ ५५ ॥
**ऋषिगण बोले—**ये महाबली चक्रवर्ती महाराज भविष्यमें जो-जो कर्म करेंगे और इनके जो-जो भावी गुण होंगे उन्हींसे तुम इनका स्तवन करो ॥ ५६ ॥
| ६२ | * श्रीविष्णुपुराण * | [ अ० १३ |
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| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले— यह सुनकर राजाको भी परम सन्तोष हुआ; उन्होंने सोचा 'मनुष्य सद्गुणोंके कारण ही प्रशंसाका पात्र होता है; अतः मुझको भी गुण उपार्जन करने चाहिये॥ ५७॥ इसलिये अब स्तुतिके द्वारा ये जिन गुणोंका वर्णन करेंगे मैं भी सावधानतापूर्वक वैसा ही करूँगा॥ ५८॥ यदि यहाँपर ये कुछ त्याज्य अवगुणोंको भी कहेंगे तो मैं उन्हें त्यागूँगा।' इस प्रकार राजाने अपने चित्तमें निश्चय किया॥ ५९॥ तदनन्तर उन (सूत और मागध) दोनोंने परम बुद्धिमान् वेननन्दन महाराज पृथुका, उनके भावी कर्मोंके आश्रयसे स्वरसहित भली प्रकार स्तवन किया॥ ६०॥ [उन्होंने कहा—] 'ये महाराज सत्यवादी, दानशील, सत्य मर्यादावाले, लज्जाशील, सुहृद्, क्षमाशील, पराक्रमी और दुष्टोंका दमन करनेवाले हैं॥ ६१॥ ये धर्मज्ञ, कृतज्ञ, दयावान्, प्रियभाषी, माननीयोंको मान देनेवाले, यज्ञपरायण, ब्रह्मण्य, साधुसमाजमें सम्मानित और शत्रु तथा मित्रके साथ समान व्यवहार करनेवाले हैं'॥ ६२-६३॥ इस प्रकार सूत और मागधके कहे हुए गुणोंको उन्होंने अपने चित्तमें धारण किया और उसी प्रकारके कार्य किये॥ ६४॥ तब उन पृथिवीपतिने पृथिवीका पालन करते हुए बड़ी-बड़ी दक्षिणाओंवाले अनेकों महान् यज्ञ किये॥ ६५॥ अराजकताके समय ओषधियोंके नष्ट हो जानेसे भूखसे व्याकुल हुई प्रजा पृथिवीनाथ पृथुके पास आयी और उनके पूछनेपर प्रणाम करके उनसे अपने आनेका कारण निवेदन किया॥ ६६॥ |
| ततः स नृपतिस्तोषं तच्छ्रुत्वा परमं ययौ।<br>सद्गुणैः श्लाघ्यतामेति तस्माल्लभ्या गुणा मम॥ ५७ | |
| तस्माद्यदद्य स्तोत्रेण गुणनिवर्णनं त्विमौ।<br>करिष्येते करिष्यामि तदेवाहं समाहितः॥ ५८ | |
| यदिमौ वर्जनीयं च किञ्चिदत्र वदिष्यतः।<br>तदहं वर्जयिष्यामीत्येवं चक्रे मतिं नृपः॥ ५९ | |
| अथ तौ चक्रतुः स्तोत्रं पृथोर्वैन्यस्य धीमतः।<br>भविष्यैः कर्मभिः सम्यक् सुस्वरौ सूतमागधौ॥ ६० | |
| सत्यवाग्दानशीलोऽयं सत्यसन्धो नरेश्वरः।<br>ह्रीमान्मैत्रः क्षमाशीलो विक्रान्तो दुष्टशासनः॥ ६१ | |
| धर्मज्ञश्च कृतज्ञश्च दयावान् प्रियभाषकः।<br>मान्यान्मानयिता यज्वा ब्रह्मण्यः साधुसम्मतः॥ ६२ | |
| समः शत्रौ च मित्रे च व्यवहारस्थितौ नृपः॥ ६३ | |
| सूतेनोक्तान् गुणानित्थं स तदा मागधेन च।<br>चकार हृदि तादृक् च कर्मणा कृतवानसौ॥ ६४ | |
| ततस्तु पृथिवीपालः पालयन्पृथिवीमिमाम्।<br>इयाज विविधैर्यज्ञैर्महद्भिर्भूरिदक्षिणैः॥ ६५ | |
| तं प्रजाः पृथिवीनाथमुपतस्थुः क्षुधार्दिताः।<br>ओषधीषु प्रणष्टासु तस्मिन्काले ह्यराजके।<br>तमूचुस्ते नताः पृष्टास्तत्रागमनकारणम्॥ ६६ | |
| प्रजा ऊचुः | प्रजाने कहा— हे प्रजापति नृपश्रेष्ठ! अराजकताके समय पृथिवीने समस्त ओषधियाँ अपनेमें लीन कर ली हैं, अतः आपकी सम्पूर्ण प्रजा क्षीण हो रही है॥ ६७॥ विधाताने आपको हमारा जीवनदायक प्रजापति बनाया है; अतः क्षुधारूप महारोगसे पीड़ित हम प्रजाजनोंको आप जीवनरूप ओषधि दीजिये॥ ६८॥ |
| अराजके नृपश्रेष्ठ धरित्र्या सकलौषधीः।<br>ग्रस्तास्ततः क्षयं यान्ति प्रजाः सर्वाः प्रजेश्वर॥ ६७ | |
| त्वन्नो वृत्तिप्रदो धात्रा प्रजापालो निरूपितः।<br>देहि नः क्षुत्परीतानां प्रजानां जीवनौषधीः॥ ६८ | |
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले— यह सुनकर महाराज पृथु अपना आजगव नामक दिव्य धनुष और दिव्य बाण लेकर अत्यन्त क्रोधपूर्वक पृथिवीके पीछे दौड़े॥ ६९॥ तब भयसे अत्यन्त व्याकुल हुई पृथिवी गौका रूप धारणकर भागी और ब्रह्मलोक आदि सभी लोकोंमें गयी॥ ७०॥ समस्त भूतोंको धारण करनेवाली पृथिवी जहाँ-जहाँ भी गयी वहीं-वहीं उसने वेनपुत्र पृथुको शस्त्र-सन्धान किये अपने पीछे आते देखा॥ ७१॥ |
| ततस्तु नृपतिर्दिव्यमादायाजगवं धनुः।<br>शरांश्च दिव्यान्कुपितः सोन्वधावद्वसुन्धराम्॥ ६९ | |
| ततो ननाश त्वरिता गौर्भूत्वा च वसुन्धरा।<br>सा लोकान्ब्रह्मलोकादीन्सन्त्रासादगमन्मही॥ ७० | |
| यत्र यत्र ययौ देवी सा तदा भूतधारिणी।<br>तत्र तत्र तु सा वैन्यं ददृशेऽभ्युद्यतायुधम्॥ ७१ |
अ० १३ ] * प्रथम अंश * ६३
ततस्तं प्राह वसुधा पृथुं पृथुपराक्रमम्।
प्रवेपमाना तद्बाणपरित्राणपरायणा ॥ ७२
पृथिव्युवाच
स्त्रीवधे त्वं महापापं किं नरेन्द्र न पश्यसि।
येन मां हन्तुमत्यर्थं प्रकरोषि नृपोद्यमम् ॥ ७३
पृथुरुवाच
एकस्मिन् यत्र निधनं प्रापिते दुष्टकारिणि।
बहूनां भवति क्षेमं तस्य पुण्यप्रदो वधः ॥ ७४
पृथिव्युवाच
प्रजानामुपकाराय यदि मां त्वं हनिष्यसि।
आधारः कः प्रजानां ते नृपश्रेष्ठ भविष्यति ॥ ७५
पृथुरुवाच
त्वां हत्वा वसुधे बाणैर्मच्छासनपराङ्मुखीम्।
आत्मयोगबलेनेमा धारयिष्याम्यहं प्रजाः ॥ ७६
श्रीपराशर उवाच
ततः प्रणम्य वसुधा तं भूयः प्राह पार्थिवम्।
प्रवेपिताङ्गी परमं साध्वसं समुपागता ॥ ७७
पृथिव्युवाच
उपायतः समारब्धाः सर्वे सिद्ध्यन्त्युपक्रमाः।
तस्माद्ददाम्युपायं ते तं कुरुष्व यदीच्छसि ॥ ७८
समस्ता या मया जीर्णा नरनाथ महौषधीः।
यदीच्छसि प्रदास्यामि ताः क्षीरपरिणामिनीः ॥ ७९
तस्मात्प्रजाहितार्थाय मम धर्मभृतां वर।
तं तु वत्सं कुरुष्व त्वं क्षरेयं येन वत्सला ॥ ८०
समां च कुरु सर्वत्र येन क्षीरं समन्ततः।
वरौषधीबीजभूतं बीजं सर्वत्र भावये ॥ ८१
श्रीपराशर उवाच
तत उत्सारयामास शैलान् शतसहस्रशः।
धनुष्कोट्या तदा वैन्यस्तेन शैला विवर्द्धिताः ॥ ८२
न हि पूर्वविसर्गे वै विषमे पृथिवीतले।
प्रविभागः पुराणां वा ग्रामाणां वा पुराऽभवत् ॥ ८३
न सस्यानि न गोरक्ष्यं न कृषिर्न वणिक्पथः।
वैण्यात्प्रभृति मैत्रेय सर्वस्यैतस्य सम्भवः ॥ ८४
हिन्दी अनुवाद
तब उन प्रबल पराक्रमी महाराज पृथुसे, उनके बाणप्रहारसे बचनेकी कामनासे काँपती हुई पृथिवी इस प्रकार बोली ॥ ७२ ॥
पृथिवीने कहा— हे राजेन्द्र! क्या आपको स्त्री-वधका महापाप नहीं दीख पड़ता, जो मुझे मारनेपर आप ऐसे उतारू हो रहे हैं? ॥ ७३ ॥
पृथु बोले— जहाँ एक अनर्थकारीको मार देनेसे बहुतोंको सुख प्राप्त हो उसे मार देना ही पुण्यप्रद है ॥ ७४ ॥
पृथिवी बोली— हे नृपश्रेष्ठ! यदि आप प्रजाके हितके लिये ही मुझे मारना चाहते हैं तो [ मेरे मर जानेपर ] आपकी प्रजाका आधार क्या होगा? ॥ ७५ ॥
पृथुने कहा— अरी वसुधे! अपनी आज्ञाका उल्लंघन करनेवाली तुझे मारकर मैं अपने योगबलसे ही इस प्रजाको धारण करूँगा ॥ ७६ ॥
श्रीपराशरजी बोले— तब अत्यन्त भयभीत एवं काँपती हुई पृथिवीने उन पृथिवीपतिको पुनः प्रणाम करके कहा ॥ ७७ ॥
पृथिवी बोली— हे राजन्! यत्नपूर्वक आरम्भ किये हुए सभी कार्य सिद्ध हो जाते हैं। अतः मैं भी आपको एक उपाय बताती हूँ; यदि आपकी इच्छा हो तो वैसा ही करें ॥ ७८ ॥ हे नरनाथ! मैंने जिन समस्त ओषधियोंको पचा लिया है उन्हें यदि आपकी इच्छा हो तो दुग्धरूपसे मैं दे सकती हूँ ॥ ७९ ॥ अतः हे धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ महाराज! आप प्रजाके हितके लिये कोई ऐसा वत्स (बछड़ा) बनाइये जिससे वात्सल्यवश मैं उन्हें दुग्धरूपसे निकाल सकूँ ॥ ८० ॥ और मुझको आप सर्वत्र समतल कर दीजिये जिससे मैं उत्तमोत्तम ओषधियोंके बीजरूप दुग्धको सर्वत्र उत्पन्न कर सकूँ ॥ ८१ ॥
श्रीपराशरजी बोले— तब महाराज पृथुने अपने धनुषकी कोटिसे सैकड़ों-हजारों पर्वतोंको उखाड़ा और उन्हें एक स्थानपर इकट्ठा कर दिया ॥ ८२ ॥ इससे पूर्व पृथिवीके समतल न होनेसे पुर और ग्राम आदिका कोई नियमित विभाग नहीं था ॥ ८३ ॥ हे मैत्रेय! उस समय अन्न, गोरक्षा, कृषि और व्यापारका भी कोई क्रम न था। यह सब तो वैन्यपुत्र पृथुके समयसे ही आरम्भ हुआ है ॥ ८४ ॥
| ६४ | * श्रीविष्णुपुराण * | [ अ० १३ |
|---|
यत्र यत्र समं त्वस्या भूमेरासीद्द्विजोत्तम।
तत्र तत्र प्रजाः सर्वा निवासं समरोचयन्॥ ८५
आहारः फलमूलानि प्रजानामभवत्तदा।
कृच्छ्रेण महता सोऽपि प्रणष्टास्वोषधीषु वै॥ ८६
स कल्पयित्वा वत्सं तु मनुं स्वायम्भुवं प्रभुम्।
स्वपाणौ पृथिवीनाथो दुदोह पृथिवीं पृथुः।
सस्यजातानि सर्वाणि प्रजानां हितकाम्यया॥ ८७
तेनान्नेन प्रजास्तात वर्तन्तेद्यापि नित्यशः॥ ८८
प्राणप्रदाता स पृथुर्यस्माद्भूमेरभूत्पिता।
ततस्तु पृथिवीसंज्ञामवापाखिलधारिणी॥ ८९
ततश्च देवैर्मुनिभिर्दैत्यै रक्षोभिरद्रिभिः।
गन्धर्वैरुरगैर्यक्षैः पितृभिस्तरुभिस्तथा॥ ९०
तत्तत्पात्रमुपादाय तत्तद्दुग्धं मुने पयः।
वत्सोग्धृविशेषाश्च तेषां तद्योनयोऽभवन्॥ ९१
सैषा धात्री विधात्री च धारिणी पोषणी तथा।
सर्वस्य तु ततः पृथ्वी विष्णुपादतलोद्भवा॥ ९२
एवं प्रभावस्स पृथुः पुत्रो वेनस्य वीर्यवान्।
जज्ञे महीपतिः पूर्वो राजाभूज्जनरञ्जनात्॥ ९३
य इदं जन्म वैन्यस्य पृथोः संकीर्त्तयेन्नरः।
न तस्य दुष्कृतं किञ्चित्फलदायि प्रजायते॥ ९४
दुस्स्वप्नोपशमं नृणां शृण्वतामेतदुत्तमम्।
पृथोर्जन्म प्रभावश्च करोति सततं नृणाम्॥ ९५
हे द्विजोत्तम! जहाँ-जहाँ भूमि समतल थी वहीं-वहींपर प्रजाने निवास करना पसन्द किया॥ ८५॥ उस समयतक प्रजाका आहार केवल फल मूलादि ही था; वह भी ओषधियोंके नष्ट हो जानेसे बड़ा दुर्लभ हो गया था॥ ८६॥
तब पृथिवीपति पृथुने स्वायम्भुवमनुको बछड़ा बनाकर अपने हाथमें ही पृथिवीसे प्रजाके हितके लिये समस्त धान्योंको दुहा। हे तात! उसी अन्नके आधारसे अब भी सदा प्रजा जीवित रहती है॥ ८७-८८॥ महाराज पृथु प्राणदान करनेके कारण भूमिके पिता हुए,* इसलिये उस सर्वभूतधारिणीको ‘पृथिवी’ नाम मिला॥ ८९॥
हे मुने! फिर देवता, मुनि, दैत्य, राक्षस, पर्वत, गन्धर्व, सर्प, यक्ष और पितृगण आदिने अपने-अपने पात्रोंमें अपना अभिमत दूध दुहा तथा दुहनेवालोंके अनुसार उनके सजातीय ही दोग्धा और वत्स आदि हुए॥ ९०-९१॥ इसीलिये विष्णुभगवान्के चरणोंसे प्रकट हुई यह पृथिवी ही सबको जन्म देनेवाली, बनानेवाली तथा धारण और पोषण करनेवाली है॥ ९२॥ इस प्रकार पूर्वकालमें वेनके पुत्र महाराज पृथु ऐसे प्रभावशाली और वीर्यवान् हुए। प्रजाका रंजन करनेके कारण वे ‘राजा’ कहलाये॥ ९३॥
जो मनुष्य महाराज पृथुके इस चरित्रका कीर्तन करता है उसका कोई भी दुष्कर्म फलदायी नहीं होता॥ ९४॥ पृथुका यह अत्युत्तम जन्म-वृत्तान्त और उनका प्रभाव अपने सुननेवाले पुरुषोंके दुःस्वप्नोंको सर्वदा शान्त कर देता है॥ ९५॥
इति श्रीविष्णुपुराणे प्रथमेऽंशे त्रयोदशोऽध्यायः॥ १३॥
* जन्म देनेवाला, यज्ञोपवीत करानेवाला, अन्नदाता, भयसे रक्षा करनेवाला तथा जो विद्यादान करे—ये पाँचों पिता माने गये हैं; जैसे कहा है—
जनकश्चोपनेता च यश्च विद्याः प्रयच्छति। अन्नदाता भयत्राता पञ्चैते पितरः स्मृताः॥
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अ० १४ ] * प्रथम अंश * ६५
चौदहवाँ अध्याय
प्राचीनबर्हिका जन्म और प्रचेताओँका भगवदाराधन
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले— |
|---|---|
| पृथॊः पुत्रौ तु धर्मज्ञौ जज्ञातेऽन्तर्द्धिवादिनौ ।<br>शिखण्डिनी हविर्धानमन्तर्द्धानाद्व्यजायत ॥ १ | हे मैत्रेय ! पृथुका अन्तर्द्धान और वादी नामक दो धर्मज्ञ पुत्र हुए; उनमेंसे अन्तर्द्धानसे उसकी पत्नी शिखण्डिनीने हविर्धानको उत्पन्न किया॥ १॥ |
| हविर्द्धानात् षडाग्नेयी धिषणाऽजनयत्सुतान् ।<br>प्राचीनबर्हिषं शुक्लं गयं कृष्णं वृजाजिनौ ॥ २ | हविर्धानसे अग्निकुलीना धिषणाने प्राचीनबर्हि, शुक्र, गय, कृष्ण, वृज और अजिन—ये छः पुत्र उत्पन्न किये॥ २॥ |
| प्राचीनबर्हिर्भगवान्महानासीत्प्रजापतिः ।<br>हविर्द्धानान्महाभाग येन संवर्द्धिताः प्रजाः ॥ ३ | हे महाभाग! हविर्धानसे उत्पन्न हुए भगवान् प्राचीनबर्हि एक महान् प्रजापति थे, जिन्होंने यज्ञके द्वारा अपनी प्रजाकी बहुत वृद्धि की॥ ३॥ |
| प्राचीनाग्राः कुशास्तस्य पृथिव्यां विश्रुता मुने ।<br>प्राचीनबर्हिर्भवत्ख्यातो भुवि महाबलः ॥ ४ | हे मुने! उनके समयमें [यज्ञानुष्ठानकी अधिकताके कारण] प्राचीनाग्र कुश समस्त पृथिवीमें फैले हुए थे, इसलिये वे महाबली 'प्राचीनबर्हि' नामसे विख्यात हुए॥ ४॥ |
| समुद्रतनयायां तु कृतदारो महीपतिः ।<br>महत्तस्तपसः पारे सवर्णायां महामते ॥ ५ | हे महामते! उन महीपतिने महान् तपस्याके अनन्तर समुद्रकी पुत्री सवर्णासे विवाह किया॥ ५॥ |
| सवर्णार्धत्त सामुद्री दश प्राचीनबर्हिषः ।<br>सर्वे प्रचेतसो नाम धनुर्वेदस्य पारगाः ॥ ६ | उस समुद्र-कन्या सवर्णाके प्राचीनबर्हिसे दस पुत्र हुए। वे प्रचेता-नामक सभी पुत्र धनुर्विद्याके पारगामी थे॥ ६॥ |
| अपृथग्धर्मचरणास्तेऽतप्यन्त महत्तपः ।<br>दशवर्षसहस्राणि समुद्रसलिलेशयाः ॥ ७ | उन्होंने समुद्रके जलमें रहकर दस हजार वर्षतक समान धर्मका आचरण करते हुए घोर तपस्या की॥ ७॥ |
| श्रीमैत्रेय उवाच | श्रीमैत्रेयजी बोले— |
| यदर्थं ते महात्मानस्तपस्तेपुर्महामुने ।<br>प्रचेतसः समुद्राम्भस्येतदाख्यातुमर्हसि ॥ ८ | हे महामुने! उन महात्मा प्रचेताओँने जिस लिये समुद्रके जलमें तपस्या की थी सो आप कहिये॥ ८॥ |
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी कहने लगे— |
| पित्रा प्रचेतसः प्रोक्ताः प्रजार्थममितात्मना ।<br>प्रजापतिनियुक्तेन बहुमानपुरस्सरम् ॥ ९ | हे मैत्रेय! एक बार प्रजापतिकी प्रेरणासे प्रचेताओँके महात्मा पिता प्राचीनबर्हिने उनसे अति सम्मानपूर्वक सन्तानोत्पत्तिके लिये इस प्रकार कहा॥ ९॥ |
| प्राचीनबर्हिरुवाच | प्राचीनबर्हि बोले— |
| ब्रह्मणा देवदेवेन समादिष्टोऽस्म्यहं सुताः ।<br>प्रजाः संवर्द्धनीयास्ते मया चोक्तं तथेति तत् ॥ १० | हे पुत्रो! देवाधिदेव ब्रह्माजीने मुझे आज्ञा दी है कि 'तुम प्रजाकी वृद्धि करो' और मैंने भी उनसे 'बहुत अच्छा' कह दिया है॥ १०॥ |
| तन्मम प्रीतये पुत्राः प्रजावृद्धिमत्तन्द्रिताः ।<br>कुरुध्वं माननीया वः सम्यगाज्ञा प्रजापतेः ॥ ११ | अतः हे पुत्रगण! तुम भी मेरी प्रसन्नताके लिये सावधानतापूर्वक प्रजाकी वृद्धि करो, क्योंकि प्रजापतिकी आज्ञा तुमको भी सर्वथा माननीय है॥ ११॥ |
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले— |
| ततस्ते तत्पितुः श्रुत्वा वचनं नृपनन्दनाः ।<br>तथेत्युक्त्वा च तं भूयः पप्रच्छुः पितरं मुने ॥ १२ | हे मुने! उन राजकुमारों ने पिताके ये वचन सुनकर उनसे 'जो आज्ञा' ऐसा कहकर फिर पूछा॥ १२॥ |
| प्रचेतस ऊचुः | प्रचेता बोले— |
| येन तात प्रजावृद्धौ समर्थाः कर्मणा वयम् ।<br>भवेम तत् समस्तं नः कर्म व्याख्यातुमर्हसि ॥ १३ | हे तात! जिस कर्मसे हम प्रजा-वृद्धिमें समर्थ हो सकें उसकी आप हमसे भली प्रकार व्याख्या कीजिये॥ १३॥ |
६६ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १४
| पितोवाच | **पिताने कहा—**वरदायक भगवान् विष्णुकी आराधना |
| आराध्य वरदं विष्णुमिष्टप्राप्तिमसंशयम्। | करनेसे ही मनुष्यको निःसन्देह इष्ट वस्तुकी प्राप्ति |
| समेति नान्यथा मर्त्यः किमन्यत्कथयामि वः॥ १४ | होती है और किसी उपायसे नहीं। इसके सिवा और मैं |
| तस्मात्प्रजाविवृद्ध्यर्थं सर्वभूतप्रभुं हरिम्। | तुमसे क्या कहूँ॥ १४॥ इसलिये यदि तुम सफलता |
| आराधयत गोविन्दं यदि सिद्धिमभीप्सथ॥ १५ | चाहते हो तो प्रजा-वृद्धिके लिये सर्वभूतोंके स्वामी श्रीहरि |
| धर्ममर्थं च कामं च मोक्षं चान्विच्छतां सदा। | गोविन्दकी उपासना करो॥ १५॥ धर्म, अर्थ, काम या |
| आराधनीयो भगवाननादिपुरुषोत्तम ॥ १६ | मोक्षकी इच्छावालोंको सदा अनादि पुरुषोत्तम भगवान् |
| यस्मिन्नाराधिते सर्गं चकारादौ प्रजापतिः। | विष्णुकी ही आराधना करनी चाहिये॥ १६॥ कल्पके |
| तमाराध्याच्युतं वृद्धिः प्रजानां वो भविष्यति॥ १७ | आरम्भमें जिनकी उपासना करके प्रजापतिने संसारकी |
| रचना की है, तुम उन अच्युतकी ही आराधना करो। | |
| इससे तुम्हारी सन्तानकी वृद्धि होगी॥ १७॥ | |
| श्रीपराशर उवाच | **श्रीपराशरजी बोले—**पिताकी ऐसी आज्ञा होनेपर |
| इत्येवमुक्तास्ते पित्रा पुत्राः प्रचेतसो दश। | प्रचेता नामक दसों पुत्रोंने समुद्रके जलमें डूबे रहकर |
| मग्नाः पयोधिसलिले तपस्तेपुः समाहिताः॥ १८ | सावधानतापूर्वक तप करना आरम्भ कर दिया॥ १८॥ |
| दशवर्षसहस्त्राणि न्यस्तचित्ता जगत्पतौ। | हे मुनिश्रेष्ठ! सर्वलोकाश्रय जगत्पति श्रीनारायणमें चित्त |
| नारायणे मुनिश्रेष्ठ सर्वलोकपरायणे॥ १९ | लगाये हुए उन्होंने दस हजार वर्षतक वहीं (जलमें |
| तत्रैवावस्थिता देवमेकाग्रमनसो हरिम्। | ही) स्थित रहकर देवाधिदेव श्रीहरिकी एकाग्र-चित्तसे स्तुति |
| तुष्टुवुर्यस्स्तुतः कामान् स्तोतुरिष्टान्प्रयच्छति॥ २० | की, जो अपनी स्तुति की जानेपर स्तुति करनेवालोंकी |
| सभी कामनाएँ सफल कर देते हैं॥ १९-२०॥ | |
| श्रीमैत्रेय उवाच | **श्रीमैत्रेयजी बोले—**हे मुनिश्रेष्ठ! समुद्रके जलमें |
| स्तवं प्रचेतसो विष्णोः समुद्राम्भसि संस्थिताः। | स्थित रहकर प्रचेताओंने भगवान् विष्णुकी जो अति |
| चक्रुस्तन्मे मुनिश्रेष्ठ सुपुण्यं वक्तुमर्हसि॥ २१ | पवित्र स्तुति की थी वह कृपया मुझसे कहिये॥ २१॥ |
| श्रीपराशर उवाच | **श्रीपराशरजी बोले—**हे मैत्रेय! पूर्वकालमें समुद्रमें |
| शृणु मैत्रेय गोविन्दं यथापूर्वं प्रचेतसः। | स्थित रहकर प्रचेताओंने तन्मयभावसे श्रीगोविन्दकी |
| तुष्टुवुस्तन्मयीभूताः समुद्रसलिलेशयाः॥ २२ | जो स्तुति की, वह सुनो॥ २२॥ |
| प्रचेतस ऊचुः | **प्रचेताओंने कहा—**जिनमें सम्पूर्ण वाक्योंकी नित्य- |
| नताः स्म सर्ववचसां प्रतिष्ठा यत्र शाश्वती। | प्रतिष्ठा है [अर्थात् जो सम्पूर्ण वाक्योंके एकमात्र प्रतिपाद्य |
| तमाद्यन्तमशेषस्य जगतः परमं प्रभुम्॥ २३ | हैं] तथा जो जगत्की उत्पत्ति और प्रलयके कारण हैं उन |
| ज्योतिराद्यमनौपम्यमण्वनन्तमपारवत्। | निखिल-जगन्नायक परमप्रभुको हम नमस्कार करते |
| योनिभूतमशेषस्य स्थावरस्य चरस्य च॥ २४ | हैं॥ २३॥ जो आद्य ज्योतिःस्वरूप, अनुपम, अणु, अनन्त, |
| यस्याहः प्रथमं रूपमरूपस्य तथा निशा। | अपार और समस्त चराचरके कारण हैं, तथा जिन रूपहीन |
| सन्ध्या च परमेशस्य तस्मै कालात्मने नमः॥ २५ | परमेश्वरके दिन, रात्रि और सन्ध्या ही प्रथम रूप हैं, उन |
| भुज्यतेऽनुदिनं देवैः पितृभिश्च सुधात्मकः। | कालस्वरूप भगवान्को नमस्कार है॥ २४-२५॥ समस्त |
| जीवभूतः समस्तस्य तस्मै सोमात्मने नमः॥ २६ | प्राणियोंके जीवनरूप जिनके अमृतमय स्वरूपको देव |
| यस्तमांस्यत्ति तीव्रात्मा प्रभाभिर्भासयन्नभः। | और पितृगण नित्यप्रति भोगते हैं—उन सोमस्वरूप प्रभुको |
| धर्मशीताम्भसां योनिस्तस्मै सूर्यात्मने नमः॥ २७ | नमस्कार है॥ २६॥ जो तीक्ष्णस्वरूप अपने तेजसे |
| आकाशमण्डलको प्रकाशित करते हुए अन्धकारको भक्षण | |
| कर जाते हैं तथा जो घाम, शीत और जलके उद्गमस्थान | |
| हैं उन सूर्यस्वरूप [नारायण]-को नमस्कार है॥ २७॥ |
48 Visnupuran_Section_4_1_Back In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
अ० १४ ] * प्रथम अंश * ६७
| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| काठिन्यवान् यो बिभर्त्ति जगदेतदशेषतः।<br>शब्दादिसंश्रयो व्यापी तस्मै भूम्यात्मने नमः ॥ २८ | जो कठिनतायुक्त होकर इस सम्पूर्ण संसारको धारण करते हैं और शब्द आदि पाँचों विषयोंके आधार तथा व्यापक हैं, उन भूमिरूप भगवान्को नमस्कार है ॥ २८ ॥ |
| यद्योनिभूतं जगतो बीजं यत्सर्वदेहिनाम्।<br>तत्तोयरूपमीशस्य नमामो हरिमेधसः ॥ २९ | जो संसारका योनिरूप है और समस्त देहधारियोंका बीज है, भगवान् हरिके उस जलस्वरूपको हम नमस्कार करते हैं ॥ २९ ॥ |
| यो मुखं सर्वदेवानां हव्यभुक् कव्यभुक् तथा।<br>पितॄणां च नमस्तस्मै विष्णवे पावकात्मने ॥ ३० | जो समस्त देवताओंका हव्यभुक् और पितृगणका कव्यभुक् मुख है, उस अग्निस্বরূপ विष्णुभगवान्को नमस्कार है ॥ ३० ॥ |
| पञ्चधावस्थितो देहे यश्चेष्टां कुरुतेऽनिशम्।<br>आकाशयोनिर्भगवान्स्तस्मै वाय्वात्मने नमः ॥ ३१ | जो प्राण, अपान आदि पाँच प्रकारसे देहमें स्थित होकर दिन-रात चेष्टा करता रहता है तथा जिसकी योनि आकाश है, उस वायुरूप भगवान्को नमस्कार है ॥ ३१ ॥ |
| अवकाशमशेषाणां भूतानां यः प्रयच्छति।<br>अनन्तमूर्तिमाञ्छुद्धस्तस्मै व्योमात्मने नमः ॥ ३२ | जो समस्त भूतोंको अवकाश देता है उस अनन्तमूर्ति और परम शुद्ध आकाशस्वरूप प्रभुको नमस्कार है ॥ ३२ ॥ |
| समस्तेन्द्रियसर्गस्य यः सदा स्थानमुत्तमम्।<br>तस्मै शब्दादिरूपाय नमः कृष्णाय वेधसे ॥ ३३ | समस्त इन्द्रिय-सृष्टिके जो उत्तम स्थान हैं उन शब्द-स्पर्शादिरूप विधाता श्रीकृष्णचन्द्रको नमस्कार है ॥ ३३ ॥ |
| गृह्णाति विषयान्नित्यमिन्द्रियात्मा क्षराक्षरः।<br>यस्तस्मै ज्ञानमूलाय नताः स्म हरिमेधसे ॥ ३४ | जो क्षर और अक्षर इन्द्रियरूपसे नित्य विषयोंको ग्रहण करते हैं उन ज्ञानमूल हरिको नमस्कार है ॥ ३४ ॥ |
| गृहीतानिनिन्द्रियैरर्थानात्मने यः प्रयच्छति।<br>अन्तःकरणरूपाय तस्मै विश्वात्मने नमः ॥ ३५ | इन्द्रियोंके द्वारा ग्रहण किये विषयोंको जो आत्माके सम्मुख उपस्थित करता है उस अन्तःकरणरूप विश्वात्माको नमस्कार है ॥ ३५ ॥ |
| यस्मिन्ननन्ते सकलं विश्वं यस्मात्तथोद्गतम्।<br>लयस्थानं च यस्तस्मै नमः प्रकृतिधर्मिणे ॥ ३६ | जिस अनन्तमें सकल विश्व स्थित है, जिससे वह उत्पन्न हुआ है और जो उसके लयका भी स्थान है उस प्रकृतिस्वरूप परमात्माको नमस्कार है ॥ ३६ ॥ |
| शुद्धः सँल्लक्ष्यते भ्रान्त्या गुणवानिव योऽगुणः।<br>तमात्मरूपिणं देवं नताः स्म पुरुषोत्तमम् ॥ ३७ | जो शुद्ध और निर्गुण होकर भी भ्रमवश गुणयुक्त-से दिखायी देते हैं उन आत्मस्वरूप पुरुषोत्तमदेवको हम नमस्कार करते हैं ॥ ३७ ॥ |
| अविकारमजं शुद्धं निर्गुणं यन्निरञ्जनम्।<br>नताः स्म तत्परं ब्रह्म विष्णोर्यत्परमं पदम् ॥ ३८ | जो अविकारी, अजन्मा, शुद्ध, निर्गुण, निर्मल और श्रीविष्णुका परमपद है उस ब्रह्मस्वरूपको हम नमस्कार करते हैं ॥ ३८ ॥ |
| अदीर्घह्रस्वमस्थूलमनण्वश्यामलोहितम्।<br>अस्नेहच्छायमतनुमसक्तमशरीरिणम् ॥ ३९ | जो न लम्बा है, न पतला है, न मोटा है, न छोटा है और न काला है, न लाल है; जो स्नेह (द्रव), कान्ति तथा शरीरसे रहित एवं अनासक्त और अशरीरी (जीवसे भिन्न) है ॥ ३९ ॥ |
| अनाकाशमसंस्पर्शमगन्धमरसं च यत्।<br>अचक्षुश्रोत्रमचलमवाक्पाणिममानसम् ॥ ४० | जो अवकाश स्पर्श, गन्ध और रससे रहित तथा आँख-कान-विहीन, अचल एवं जिह्वा, हाथ और मनसे रहित है ॥ ४० ॥ |
| अनामगोत्रमसुखमतेजस्कमहेतुकम् ।<br>अभयं भ्रान्तिरहितमनिद्रमजरामरम् ॥ ४१ | जो नाम, गोत्र, सुख और तेजसे शून्य तथा कारणहीन है; जिसमें भय, भ्रान्ति, निद्रा, जरा और मरण-इन (अवस्थाओं)-का अभाव है ॥ ४१ ॥ |
| अरजोऽशब्दममृतमप्लुतं यदसंवृतम्।<br>पूर्वापरे न वै यस्मिंस्तद्विष्णोः परमं पदम् ॥ ४२ | जो अरज (रजोगुणरहित), अशब्द, अमृत, अप्लुत (गतिशून्य) और असंवृत (अनाच्छादित) है एवं जिसमें पूर्वापर व्यवहारकी गति नहीं है वही भगवान् विष्णुका परमपद है ॥ ४२ ॥ |
| परमेशत्वगुणवत्सर्वभूतमसंश्रयम् ।<br>नताः स्म तत्पदं विष्णोर्जिह्वादृग्गोचरं न यत् ॥ ४३ | जिसका ईशन (शासन) ही परमगुण है, जो सर्वरूप और अनाधार है तथा जिह्वा और दृष्टिका अविषय है, भगवान् विष्णुके उस परमपदको हम नमस्कार करते हैं ॥ ४३ ॥ |
| ६८ | * श्रीविष्णुपुराण * | [ अ० १५ |
|---|
| श्रीपराशर उवाच | |
|---|---|
| एवं प्रचेतसो विष्णुं स्तुवन्तस्तत्समाधयः।<br>दशवर्षसहस्राणि तपश्चेरुर्महार्णवे ॥ ४४ | **श्रीपराशरजी बोले—**इस प्रकार श्रीविष्णुभगवान्में समाधिस्थ होकर प्रचेताओेंने महासागरमें रहकर उनकी स्तुति करते हुए दस हजार वर्षतक तपस्या की ॥ ४४ ॥ |
| ततः प्रसन्नो भगवांस्तेषामन्तर्जले हरिः।<br>ददौ दर्शनमुन्निद्रनीलोत्पलदलच्छविः ॥ ४५ | तब भगवान् श्रीहरिने प्रसन्न होकर उन्हें खिले हुए नील कमलकी-सी आभायुक्त दिव्य छविसे जलके भीतर ही दर्शन दिया ॥ ४५ ॥ |
| पतत्त्रिराजमारूढमवलोक्य प्रचेतसः।<br>प्रणिपेतुः शिरोभिस्तं भक्तिभारावनामितैः ॥ ४६ | प्रचेताओेंने पक्षिराज गरुड़पर चढ़े हुए श्रीहरिको देखकर उन्हें भक्तिभावके भारसे झुके हुए मस्तकोंद्वारा प्रणाम किया ॥ ४६ ॥ |
| ततस्तानाह भगवान्व्रियतामीप्सितो वरः।<br>प्रसादसुमुखोऽहं वो वरदः समुपस्थितः ॥ ४७ | तब भगवान्ने उनसे कहा—"मैं तुमसे प्रसन्न होकर तुम्हें वर देनेके लिये आया हूँ, तुम अपना अभीष्ट वर माँगो" ॥ ४७ ॥ |
| ततस्तमूचुर्वरदं प्रणिपत्य प्रचेतसः।<br>यथा पित्रा समादिष्टं प्रजानां वृद्धिकारणम् ॥ ४८ | तब प्रचेताओेंने वरदायक श्रीहरिको प्रणाम कर, जिस प्रकार उनके पिताने उन्हें प्रजा-वृद्धिके लिये आज्ञा दी थी वह सब उनसे निवेदन की ॥ ४८ ॥ |
| स चापि देवस्तं दत्त्वा यथाभिलषितं वरम्।<br>अन्तर्धानं जगामाशु ते च निश्चक्रमुर्जलात् ॥ ४९ | तदनन्तर, भगवान् उन्हें अभीष्ट वर देकर अन्तर्धान हो गये और वे जलसे बाहर निकल आये ॥ ४९ ॥ |
इति श्रीविष्णुपुराणे प्रथमऽंशे चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥
पन्द्रहवाँ अध्याय
प्रचेताओेंका मारिषा नामक कन्याके साथ विवाह, दक्ष प्रजापतिकी उत्पत्ति एवं दक्षकी साठ कन्याओंके वंशका वर्णन
| श्रीपराशर उवाच | |
|---|---|
| तपश्चरत्सु पृथिवीं प्रचेतःसु महीरुहाः।<br>अरक्ष्यमाणामावव्रुर्वभूवाथ प्रजाक्षयः ॥ १ | **श्रीपराशरजी बोले—**प्रचेताओेंके तपस्यामें लगे रहनेसे [कृषि आदिद्वारा] किसी प्रकारकी रक्षा न होनेके कारण पृथिवीको वृक्षोंने ढँक लिया और प्रजा बहुत कुछ नष्ट हो गयी ॥ १ ॥ |
| नाशकन्मरुतो वातुं वृतं खमभवद्द्रुमैः।<br>दशवर्षसहस्राणि न शेकुश्चेष्टितुं प्रजाः ॥ २ | आकाश वृक्षोंसे भर गया था। इसलिये दस हजार वर्षतक न तो वायु ही चला और न प्रजा ही किसी प्रकारकी चेष्टा कर सकी ॥ २ ॥ |
| तान्दृष्ट्वा जलनिष्क्रान्ताः सर्वे क्रुद्धाः प्रचेतसः।<br>मुखेभ्यो वायुमग्निं च तेऽसृजन् जातमन्यवः ॥ ३ | जलसे निकलनेपर उन वृक्षोंको देखकर प्रचेतागण अति क्रोधित हुए और उन्होंने रोषपूर्वक अपने मुखसे वायु और अग्निको छोड़ा ॥ ३ ॥ |
| उन्मूलानथ तान्वृक्षान्कृत्वा वायुरशोषयत्।<br>तानग्निरदहद्धोरस्तत्राभूद्द्रुमसंक्षयः ॥ ४ | वायुने वृक्षोंको उखाड़-उखाड़कर सुखा दिया और प्रचण्ड अग्निने उन्हें जला डाला। इस प्रकार उस समय वहाँ वृक्षोंका नाश होने लगा ॥ ४ ॥ |
| द्रुमक्षयमथो दृष्ट्वा किञ्चिच्छिष्टेषु शाखिषु।<br>उपगम्याब्रवीदेतान् राजा सोमः प्रजापतीन् ॥ ५ | तब वह भयंकर वृक्ष-प्रलय देखकर थोड़े-से वृक्षोंके रह जानेपर उनके राजा सोमने प्रजापति प्रचेताओेंके पास जाकर कहा— ॥ ५ ॥ |
अ० १५ ] * प्रथम अंश * ६९
| कोपं यच्छत राजानः शृणुध्वं च वचो मम।<br>सन्धानं वः करिष्यामि सह क्षितिरुहैरहम्॥ ६<br>रत्नभूता च कन्येयं वार्क्षेयी वरवर्णिनी।<br>भविष्यज्जानता पूर्वं मया गोभिर्विवर्द्धिता॥ ७<br>मारिषा नाम नाम्नैषा वृक्षाणामिति निर्मिता।<br>भार्या वोऽस्तु महाभागा ध्रुवं वंशविवर्द्धिनी॥ ८<br>युष्माकं तेजसोऽर्द्धेन मम चार्द्धेन तेजसः।<br>अस्यामुत्पत्स्यते विद्वान्दक्षो नाम प्रजापतिः॥ ९<br>मम चांशेन संयुक्तो युष्मत्तेजोमयेन वै।<br>तेजसाग्निसमो भूयः प्रजाः संवर्द्धयिष्यति॥ १०<br>कण्डुर्नाम मुनिः पूर्वमासीद्वेदविदां वरः।<br>सुरम्ये गोमतीतीरे स तेपे परमं तपः॥ ११<br>तत्क्षोभाय सुरेन्द्रेण प्रम्लोचाख्या वराप्सराः।<br>प्रयुक्ता क्षोभयामास तमृषिं सा शुचिस्मिता॥ १२<br>क्षोभितः स तया सार्द्धं वर्षाणामधिकं शतम्।<br>अतिष्ठन्मन्दरद्रोण्यां विषयासक्तमानसः॥ १३<br>तं सा प्राह महाभाग गन्तुमिच्छाम्यहं दिवम्।<br>प्रसादसुमुखो ब्रह्मन्ननुज्ञां दातुमर्हसि॥ १४<br>तथैवमुक्तः स मुनिस्तस्यामासक्तमानसः।<br>दिनानि कतिचिद्भद्रे स्थीयतामित्यभाषत॥ १५<br>एवमुक्ता ततस्तेन साग्रं वर्षशतं पुनः।<br>बुभुजे विषयांस्तन्वी तेन साकं महात्मना॥ १६<br>अनुज्ञां देहि भगवन् व्रजामि त्रिदशालयम्।<br>उक्तस्तथेति स पुनः स्थीयतामित्यभाषत॥ १७<br>पुनर्गते वर्षशते साधिके सा शुभानना।<br>यामीत्याह दिवं ब्रह्मन्प्रणयस्मितशोभनम्॥ १८<br>उक्तस्तथैवं स मुनिरुपगुह्यायतेक्षणाम्।<br>इहास्यतां क्षणं सुभ्रु चिरकालं गमिष्यसि॥ १९<br>सा क्रीडमाना सुश्रोणी सह तेनर्षिणा पुनः।<br>शतद्वयं किञ्चिदूनं वर्षाणामन्वतिष्ठत॥ २०<br>गमनाय महाभाग देवराजनिवेशनम्।<br>प्रोक्तः प्रोक्तस्तया तन्व्या स्थीयतामित्यभाषत॥ २१ | "हे नृपतिगण! आप क्रोध शान्त कीजिये और मैं जो कुछ कहता हूँ, सुनिये। मैं वृक्षोंके साथ आपलोगोंकी सन्धि करा दूँगा॥ ६॥ वृक्षोंसे उत्पन्न हुई इस सुन्दर वर्णवाली रत्नस्वरूपा कन्याको मैंने पहलेसे ही भविष्यको जानकर अपनी [अमृतमयी] किरणोंसे पालन-पोषण किया है॥ ७॥ वृक्षोंकी यह कन्या मारिषा नामसे प्रसिद्ध है, यह महाभागा इसलिये ही उत्पन्न की गयी है कि निश्चय ही तुम्हारे वंशको बढ़ानेवाली तुम्हारी भार्या हो॥ ८॥ मेरे और तुम लोगोंके आधे-आधे तेजसे इसके परम विद्वान् दक्ष नामक प्रजापति उत्पन्न होगा॥ ९॥ वह तुम लोगोंके तेजके सहित मेरे अंशसे युक्त होकर अपने तेजके कारण अग्निके समान होगा और प्रजाकी खूब वृद्धि करेगा॥ १०॥<br>पूर्वकालमें वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ एक कण्डु नामक मुनीश्वर थे। उन्होंने गोमती नदीके परम रमणीक तटपर घोर तप किया॥ ११॥ तब इन्द्रने उन्हें तपोभ्रष्ट करनेके लिये प्रम्लोचा नामकी उत्तम अप्सराको नियुक्त किया। उस मंजुहासिनीने उन ऋषिश्रेष्ठको विचलित कर दिया॥ १२॥ उसके द्वारा क्षुब्ध होकर वे सौसे भी अधिक वर्षतक विषयासक्त-चित्तसे मन्दराचलकी कन्दरामें रहे॥ १३॥<br>तब, हे महाभाग! एक दिन उस अप्सराने कण्डु ऋषिसे कहा—'हे ब्रह्मन्! अब मैं स्वर्गलोकको जाना चाहती हूँ, आप प्रसन्नतापूर्वक मुझे आज्ञा दीजिये'॥ १४॥ उसके ऐसा कहनेपर उसमें आसक्तचित्त हुए मुनिने कहा—'भद्रे! अभी कुछ दिन और रहो'॥ १५॥ उनके ऐसा कहनेपर उस सुन्दरीने महात्मा कण्डुके साथ अगले सौ वर्षतक और रहकर नाना प्रकारके भोग भोगे॥ १६॥ तब भी, उसके यह पूछनेपर कि 'भगवन्! मुझे स्वर्गलोकको जानेकी आज्ञा दीजिये' ऋषिने यही कहा कि 'अभी और ठहरो'॥ १७॥ तदनन्तर सौ वर्षसे कुछ अधिक बीत जानेपर उस सुमुखने प्रणययुक्त मुसकानसे सुशोभित वचनोंमें फिर कहा—'ब्रह्मन्! अब मैं स्वर्गको जाती हूँ'॥ १८॥ यह सुनकर मुनिने उस विशालाक्षीको आलिंगनकर कहा—'अयि सुभ्रु! अब तो तू बहुत दिनोंके लिये चली जायगी इसलिये क्षणभर तो और ठहर'॥ १९॥ तब वह सुश्रोणी (सुन्दर कमरवाली) उस ऋषिके साथ क्रीड़ा करती हुई दो सौ वर्षसे कुछ कम और रही॥ २०॥<br>हे महाभाग! इस प्रकार जब-जब वह सुन्दरी देवलोकको जानेके लिये कहती तभी-तभी कण्डु ऋषि उससे यही कहते कि 'अभी ठहर जा'॥ २१॥ |
७० * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १५
| तस्य शापभयाद्भीता दाक्षिण्येन च दक्षिणा।<br>प्रोक्ता प्रणयभङ्गार्त्तिवेदिनी न जहौ मुनिम्॥ २२ | मुनिके इस प्रकार कहनेपर, प्रणयभंगकी पीड़ाको जाननेवाली उस दक्षिणाने* अपने दाक्षिण्यवश तथा मुनिके शापसे भयभीत होकर उन्हें न छोड़ा॥ २२॥ तथा उन महर्षि महोदयका भी कामासक्तचित्तसे उसके साथ अहर्निश रमण करते-करते, उसमें नित्य नूतन प्रेम बढ़ता गया॥ २३॥ |
| तया च रमतस्तस्य परमर्षेरहर्निशम्।<br>नवं नवमभूत्प्रेम मन्मथाविष्टचेतसः॥ २३ | |
| एकदा तु त्वरायुक्तो निश्चक्रामोटजान्मुनिः।<br>निष्क्रामन्तं च कुत्रेति गम्यते प्राह सा शुभा॥ २४ | एक दिन वे मुनिवर बड़ी शीघ्रतासे अपनी कुटीसे निकले। उनके निकलते समय वह सुन्दरी बोली—"आप कहाँ जाते हैं"॥ २४॥ उसके इस प्रकार पूछनेपर मुनिने कहा—"हे शुभे! दिन अस्त हो चुका है, इसलिये मैं सन्ध्योपासना करूँगा; नहीं तो नित्य-क्रिया नष्ट हो जायगी"॥ २५॥ तब उस सुन्दर दाँतोंवालीने उन मुनीश्वरसे हँसकर कहा—"हे सर्वधर्मज्ञ! क्या आज ही आपका दिन अस्त हुआ है?॥ २६॥ हे विप्र! अनेकों वर्षोंके पश्चात् आज आपका दिन अस्त हुआ है; इससे कहिये, किसको आश्चर्य न होगा?"॥ २७॥ |
| इत्युक्तः स तया प्राह परिवृत्तमहः शुभे।<br>सन्ध्योपास्तिं करिष्यामि क्रियालोपोऽन्यथा भवेत्॥ २५ | |
| ततः प्रहस्य सुदती तं सा प्राह महामुनिम्।<br>किमद्य सर्वधर्मज्ञ परिवृत्तमहस्तव॥ २६ | |
| बहूनां विप्र वर्षाणां परिवृत्तमहस्तव।<br>गतमेतन्न कुरुते विस्मयं कस्य कथ्यताम्॥ २७ | |
| मुनिरुवाच | **मुनि बोले—**भद्रे! नदीके इस सुन्दर तटपर तुम आज सबेरे ही तो आयी हो। [ मुझे भली प्रकार स्मरण है ] मैंने आज ही तुमको अपने आश्रममें प्रवेश करते देखा था॥ २८॥ अब दिनके समाप्त होनेपर यह सन्ध्याकाल हुआ है। फिर, सच तो कहो, ऐसा उपहास क्यों करती हो?॥ २९॥ |
| प्रातस्त्वमागता भद्रे नदीतीरमिदं शुभम्।<br>मया दृष्टासि तन्वङ्गि प्रविष्टासि ममाश्रमम्॥ २८ | |
| इयं च वर्तते सन्ध्या परिणाममहर्गतम्।<br>उपहासः किमर्थोऽयं सद्भावः कथ्यतां मम॥ २९ | |
| प्रम्लोचोवाच | **प्रम्लोचा बोली—**ब्रह्मन्! आपका यह कथन कि 'तुम सबेरे ही आयी हो' ठीक ही है, इसमें झूठ नहीं; परन्तु उस समयको तो आज सैकड़ों वर्ष बीत चुके॥ ३०॥ |
| प्रत्यूषस्यागता ब्रह्मन् सत्यमेतन्न तन्मृषा।<br>नन्वस्य तस्य कालस्य गतान्यब्दशतानि ते॥ ३० | |
| सोम उवाच | **सोमने कहा—**तब उन विप्रवरने उस विशालाक्षीसे कुछ घबड़ाकर पूछा—"अरी भीरु! ठीक-ठीक बता, तेरे साथ रमण करते मुझे कितना समय बीत गया?"॥ ३१॥ |
| ततस्ससाध्वसो विप्रस्तां पप्रच्छायतेक्षणाम्।<br>कथ्यतां भीरु कः कालस्त्वया मे रमतः सह॥ ३१ | |
| प्रम्लोचोवाच | **प्रम्लोचाने कहा—**अबतक नौ सौ सात वर्ष, छः महीने तथा तीन दिन और भी बीत चुके हैं॥ ३२॥ |
| सप्तोत्तराण्यतीतानि नववर्षशतानि ते।<br>मासाश्च षट् तथैवान्यत्समतीतं दिनत्रयम्॥ ३२ | |
| ऋषिरुवाच | **ऋषि बोले—**अयि भीरु! यह तू ठीक कहती है, या हे शुभे! मेरी हँसी करती है? मुझे तो ऐसा ही प्रतीत होता है कि मैं इस स्थानपर तेरे साथ केवल एक ही दिन रहा हूँ॥ ३३॥ |
| सत्यं भीरु वदस्येतत्परिहासोऽथ वा शुभे।<br>दिनमेकमहं मन्ये त्वया सार्द्धमिहासितम्॥ ३३ |
* दक्षिणा नायिकाका लक्षण इस प्रकार कहा है—
या गौरवं भयं प्रेम सद्भावं पूर्वनायके।
न मुञ्चत्यन्यसक्तापि सा ज्ञेया दक्षिणा बुधैः॥
अन्य नायकमें आसक्त रहते हुए भी जो अपने पूर्व-नायकको गौरव, भय, प्रेम और सद्भावके कारण न छोड़ती हो उसे 'दक्षिणा' जानना चाहिये। दक्षिणाके गुणको 'दाक्षिण्य' कहते हैं।
अ० १५ ] * प्रथम अंश * ७१
| प्रम्लोचोवाच | प्रम्लोचा बोली—हे ब्रह्मन्! आपके निकट मैं झूठ कैसे बोल सकती हूँ? और फिर विशेषतया उस समय जब कि आज आप अपने धर्म-मार्गका अनुसरण करनेमें तत्पर होकर मुझसे पूछ रहे हैं॥ ३४॥ |
|---|---|
| वदिष्याम्यनृतं ब्रह्मन्कथमत्र तवान्तिके।<br>विशेषेणाद्य भवता पृष्टा मार्गानुवर्तिना ॥ ३४ | |
| सोम उवाच | **सोमने कहा—**हे राजकुमारो! उसके ये सत्य वचन सुनकर मुनिने 'मुझे धिक्कार है! मुझे धिक्कार है!' ऐसा कहकर स्वयं ही अपनेको बहुत कुछ भला-बुरा कहा ॥ ३५ ॥ |
| निशम्य तद्वचः सत्यं स मुनिर्नृपनन्दनाः।<br>धिग्धिङ् मामित्यतीवेत्थं निन्दिन्दात्मानमात्मना ॥ ३५ | |
| मुनिरुवाच | **मुनि बोले—**ओह! मेरा तप नष्ट हो गया, जो ब्रह्मवेत्ताओंका धन था वह लुट गया और विवेकबुद्धि मारी गयी। अहो! स्त्रीको तो किसीने मोह उपजानेके लिये ही रचा है॥ ३६॥ 'मुझे अपने मनको जीतकर छहों ऊर्मियों* से अतीत परब्रह्मको जानना चाहिये'—जिसने मेरी इस प्रकारकी बुद्धिको नष्ट कर दिया, उस कामरूपी महाग्रहको धिक्कार है॥ ३७॥ नरकग्रामके मार्गरूप इस स्त्रीके संगसे वेदवेद्य भगवान्की प्राप्तिके कारणरूप मेरे समस्त व्रत नष्ट हो गये ॥ ३८॥ |
| तपांसि मम नष्टानि हतं ब्रह्मविदां धनम्।<br>हतो विवेकः केनापि योषिन्मोहाय निर्मिता ॥ ३६ | |
| ऊर्मिषट्कातिगं ब्रह्म ज्ञेयमात्मजयेन मे।<br>मतिरेषा हृता येन धिक् तं कामं महाग्रहम् ॥ ३७ | |
| व्रतानि वेदवेद्याप्तिकारणान्यखिलानि च।<br>नरकग्राममार्गेण सङ्गेनापहृतानि मे ॥ ३८ | |
| विनिन्द्योत्थं स धर्मज्ञः स्वयमात्मानमात्मना।<br>तामप्सरसमासीनामिदं वचनमब्रवीत् ॥ ३९ | इस प्रकार उन धर्मज्ञ मुनिवरने अपने-आप ही अपनी निन्दा करते हुए वहाँ बैठी हुई उस अप्सरासे कहा—॥ ३९॥ “अरी पापिनि! अब तेरी जहाँ इच्छा हो चली जा, तूने अपनी भावभंगीसे मुझे मोहित करके इन्द्रका जो कार्य था वह पूरा कर लिया॥ ४०॥ मैं अपने क्रोधसे प्रज्वलित हुए अग्निद्वारा तुझे भस्म नहीं करता हूँ, क्योंकि सज्जनोंकी मित्रता सात पग साथ रहनेसे हो जाती है और मैं तो [इतने दिन] तेरे साथ निवास कर चुका हूँ॥ ४१॥ अथवा इसमें तेरा दोष भी क्या है, जो मैं तुझपर क्रोध करूँ? दोष तो सारा मेरा ही है, क्योंकि मैं बड़ा ही अजितेन्द्रिय हूँ॥ ४२॥ तू महामोहकी पिटारी और अत्यन्त निन्दनीया है। हाय! तूने इन्द्रके स्वार्थके लिये मेरी तपस्या नष्ट कर दी!! तुझे धिक्कार है!!! ॥ ४३ ॥ |
| गच्छ पापे यथाकामं यत्कार्यं तत्कृतं त्वया।<br>देवराजस्य मत्क्षोभं कुर्वन्त्या भावचेष्टितैः ॥ ४० | |
| न त्वां करोम्यहं भस्म क्रोधतीव्रेण वह्निना।<br>सतां सप्तपदं मैत्रमुषितोऽहं त्वया सह ॥ ४१ | |
| अथवा तव को दोषः किं वा कुप्यामहं तव।<br>ममैव दोषो नितरां येनाहमजितेन्द्रियः ॥ ४२ | |
| यया शक्रप्रियार्थिन्या कृतो मे तपसो व्ययः।<br>त्वया धिक्तां महामोहमञ्जूषां सुजुगुप्सिताम् ॥ ४३ | |
| सोम उवाच | **सोमने कहा—**वे ब्रह्मर्षि उस सुन्दरीसे जबतक ऐसा कहते रहे तबतक वह [भयके कारण] पसीनेमें सराबोर होकर अत्यन्त काँपती रही ॥ ४४॥ इस प्रकार जिसका समस्त शरीर पसीनेमें डूबा हुआ था और जो भयसे थर-थर काँप रही थी उस प्रम्लोचासे मुनिश्रेष्ठ कण्डुने क्रोधपूर्वक कहा—'अरी! तू चली जा! चली जा!! ॥ ४५ ॥ |
| यावदित्थं स विप्रर्षिस्तां ब्रवीति सुमध्यमाम्।<br>तावद्गलत्स्वेदजला सा बभूवातिवेपथुः ॥ ४४ | |
| प्रवेपमानां सततं स्विन्नगात्रलतां सतीम्।<br>गच्छ गच्छेति सक्रोधमुवाच मुनिसत्तमः ॥ ४५ | |
| सा तु निर्भर्त्सिता तेन विनिष्क्रम्य तदाश्रमात्।<br>आकाशगामिनी स्वेदं ममार्ज तरुपल्लवैः ॥ ४६ | तब बारम्बार फटकारे जानेपर वह उस आश्रमसे निकली और आकाश-मार्गसे जाते हुए उसने अपना पसीना वृक्षके पत्तोंसे पोंछा ॥ ४६ ॥ |
* क्षुधा, पिपासा, लोभ, मोह, जरा और मृत्यु—ये छः ऊर्मियाँ हैं।
७२ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १५
| निर्मार्जमाना गात्राणि गलत्स्वेदजलानि वै।<br>वृक्षाद्वृक्षं ययौ बाला तदग्रारुणपल्लवैः ॥ ४७<br>ऋषिणा यस्तदा गर्भस्तस्या देहे समाहितः।<br>निर्जगाम स रोमाञ्चस्वेदरूपी तदङ्गतः ॥ ४८<br>तं वृक्षा जगृहुर्गर्भमेकं चक्रे तु मारुतः।<br>मया चाप्यायितो गोभिः स तदा ववृधे शनैः ॥ ४९<br>वृक्षाग्रगर्भसम्भूता मारिषाख्या वरानना।<br>तां प्रदास्यन्ति वो वृक्षाः कोप एष प्रशाम्यताम् ॥ ५०<br>कण्डोरपत्यमेवं सा वृक्षेभ्यश्च समुद्गता।<br>ममापत्यं तथा वायोः प्रम्लोचातनया च सा ॥ ५१ | वह बाला वृक्षोंके नवीन लाल-लाल पत्तोंसे अपने पसीनेसे तर शरीरको पोंछती हुई एक वृक्षसे दूसरे वृक्षपर चलती गयी॥ ४७॥ उस समय ऋषिने उसके शरीरमें जो गर्भ स्थापित किया था; वह भी रोमांचसे निकले हुए पसीनेके रूपमें उसके शरीरसे बाहर निकल आया॥ ४८॥ उस गर्भको वृक्षोंने ग्रहण कर लिया, उसे वायुने एकत्रित कर दिया और मैं अपनी किरणोंसे उसे पोषित करने लगा। इससे वह धीरे-धीरे बढ़ गया॥ ४९॥ वृक्षाग्रसे उत्पन्न हुई वह मारिषा नामकी सुमुखी कन्या तुम्हें वृक्षगण समर्पण करेंगे। अतः अब यह क्रोध शान्त करो॥ ५०॥ इस प्रकार वृक्षोंसे उत्पन्न हुई वह कन्या प्रम्लोचाकी पुत्री है तथा कण्डु मुनिकी, मेरी और वायुकी भी सन्तान है॥ ५१॥ |
| श्रीपराशर उवाच<br>स चापि भगवान् कण्डुः क्षीणे तपसि सत्तमः।<br>पुरुषोत्तमाख्यं मैत्रेय विष्णोरायतनं ययौ ॥ ५२<br>तत्रैकाग्रमतिर्भूत्वा चकाराराधनं हरेः।<br>ब्रह्मपारमयं कुर्वञ्जपमेकाग्रमानसः।<br>ऊर्ध्वबाहुर्महायोगी स्थित्वासौ भूपनन्दनाः ॥ ५३ | **श्रीपराशरजी बोले—**हे मैत्रेय! [तब यह सोचकर कि प्रचेतागण योगभ्रष्टकी कन्या होनेसे मारिषाको अग्राह्य न समझें सोमदेवने कहा—] साधुश्रेष्ठ भगवान् कण्डु भी तपके क्षीण हो जानेसे पुरुषोत्तमक्षेत्र नामक भगवान् विष्णुकी निवास-भूमिको गये और हे राजपुत्रो! वहाँ वे महायोगी एकनिष्ठ होकर एकाग्रचित्तसे ब्रह्मपार-मन्त्रका जप करते हुए ऊर्ध्वबाहु रहकर श्रीविष्णुभगवान्की आराधना करने लगे॥ ५२-५३॥ |
| प्रचेतस ऊचुः<br>ब्रह्मपारं मुनेः श्रोतुमिच्छामः परमं स्तवम्।<br>जपता कण्डुना देवो येनाराध्यत केशवः ॥ ५४ | **प्रचेतागण बोले—**हम कण्डु मुनिका ब्रह्मपार नामक परमस्तोत्र सुनना चाहते हैं, जिसका जप करते हुए उन्होंने श्रीकेशवकी आराधना की थी॥ ५४॥ |
| सोम उवाच<br>पारं परं विष्णुरपारपारः<br>परः परेभ्यः परमार्थरूपी।<br>स ब्रह्मपारः परपारभूतः<br>परः पराणामपि पारपारः ॥ ५५<br>स कारणं कारणतस्ततोऽपि<br>तस्यापि हेतुः परहेतुहेतुः।<br>कार्येषु चैवं सह कर्मकर्तृ-<br>रूपैरशेषैरवतीह सर्वम् ॥ ५६<br>ब्रह्म प्रभुर्ब्रह्म स सर्वभूतो<br>ब्रह्म प्रजानां पतिरच्युतोऽसौ।<br>ब्रह्माव्ययं नित्यमजं स विष्णु-<br>रपक्षयाद्यैरखिलैरसङ्गि ॥ ५७ | सोमने कहा—[हे राजकुमारो! वह मन्त्र इस प्रकार है—] 'श्रीविष्णुभगवान् संसार-मार्गकी अन्तिम अवधि हैं, उनका पार पाना कठिन है, वे पर (आकाशादि)-से भी पर अर्थात् अनन्त हैं, अतः सत्यस्वरूप हैं। तपोनिष्ठ महात्माओंको ही वे प्राप्त हो सकते हैं, क्योंकि वे पर (अनात्म-प्रपंच)-से परे हैं तथा पर (इन्द्रियों)-के अगोचर परमात्मा हैं और [भक्तोंके] पालक एवं [उनके अभीष्टको] पूर्ण करनेवाले हैं॥ ५५॥ वे कारण (पंचभूत)-के कारण (पंचतन्मात्रा)-के हेतु (तामस-अहंकार) और उसके भी हेतु (महत्तत्त्व)-के हेतु (प्रधान)-के भी परम हेतु हैं और इस प्रकार समस्त कर्म और कर्ता आदिके सहित कार्यरूपसे स्थित सकल प्रपंचका पालन करते हैं॥ ५६॥ ब्रह्म ही प्रभु है, ब्रह्म ही सर्व जीवरूप है और ब्रह्म ही सकल प्रजाका पति (रक्षक) तथा अविनाशी है। वह ब्रह्म अव्यय, नित्य और अजन्मा है तथा वही क्षय आदि समस्त विकारोंसे शून्य विष्णु है॥ ५७॥ |
अ० १५ ] * प्रथम अंश * ७३
ब्रह्माक्षरमजं नित्यं यथाऽसौ पुरुषोत्तमः। तथा रागादयो दोषाः प्रयान्तु प्रशमं मम॥ ५८
एतद्ब्रह्मपराख्यं वै संस्तवं परमं जपन्। अवाप परमां सिद्धिं स तमाराध्य केशवम्॥ ५९
[ इमं स्तवं यः पठति शृणुयाद्वापि नित्यशः। स कामदोषैरखिलैर्मुक्तः प्राप्नोति वाञ्छितम्॥ ]
इयं च मारिषा पूर्वमासीद्या तां ब्रवीमि वः। कार्यगौरवमेतस्याः कथने फलदायि वः॥ ६०
अपुत्रा प्रागियं विष्णुं मृते भर्त्तरि सत्तमा। भूपपत्नी महाभागा तोषयामास भक्तितः॥ ६१
आराधितस्तया विष्णुः प्राह प्रत्यक्षतां गतः। वरं वृणीष्वेति शुभे सा च प्राहत्मवाञ्छितम्॥ ६२
भगवन्बालवैधव्याद् वृथाजन्माहमीदृशी। मन्दभाग्या समुद्भूता विफला च जगत्पते॥ ६३
भवन्तु पतयः श्लाघ्या मम जन्मनि जन्मनि। त्वत्प्रसादात्तथा पुत्रः प्रजापतिसमोऽस्तु मे॥ ६४
कुलं शीलं वयः सत्यं दाक्षिण्यं क्षिप्रकारिता। अविसंवादिता सत्त्वं वृद्धसेवा कृतज्ञता॥ ६५
रूपसम्पत्समायुक्ता सर्वस्य प्रियदर्शना। अयोनिजा च जायेयं त्वत्प्रसादादधोक्षज॥ ६६
सोम उवाच
तयैवमुक्तो देवेशो हृषीकेश उवाच ताम्। प्रणामनम्रामुत्थाप्य वरदः परमेश्वरः॥ ६७
देव उवाच
भविष्यन्ति महावीर्या एकस्मिन्नेव जन्मनि। प्रख्यातोदारकर्माणो भवत्याः पतयो दश॥ ६८
पुत्रं च सुमहावीर्यं महाबलपराक्रमम्। प्रजापतिगुणैर्युक्तं त्वमवाप्स्यसि शोभने॥ ६९
वंशानां तस्य कर्तृत्वं जगत्यस्मिन्भविष्यति। त्रैलोक्यमखिला सूतिस्तस्य चापूरयिष्यति॥ ७०
क्योंकि वह अक्षर, अज और नित्य ब्रह्म ही पुरुषोत्तम भगवान् विष्णु हैं, इसलिये [ उनका नित्य अनुरक्त भक्त होनेके कारण ] मेरे राग आदि दोष शान्त हों'॥ ५८॥
इस ब्रह्मपार नामक परम स्तोत्रका जप करते हुए श्रीकेशवकी आराधना करनेसे उन मुनीश्वरने परमसिद्धि प्राप्त की॥ ५९॥ [जो पुरुष इस स्तवको नित्यप्रति पढ़ता या सुनता है वह काम आदि सकल दोषोंसे मुक्त होकर अपना मनोवांछित फल प्राप्त करता है।] अब मैं तुम्हें यह बताता हूँ कि यह मारिषा पूर्वजन्ममें कौन थी। यह बता देनेसे तुम्हारे कार्यका गौरव सफल होगा। [अर्थात् तुम प्रजा-वृद्धिरूप फल प्राप्त कर सकोगे]॥ ६०॥
यह साध्वी अपने पूर्व जन्ममें एक महारानी थी। पुत्रहीन अवस्थामें ही पतिके मर जानेपर इस महाभागाने अपने भक्तिभावसे विष्णुभगवान्को सन्तुष्ट किया॥ ६१॥ इसकी आराधनासे प्रसन्न हो विष्णुभगवान्ने प्रकट होकर कहा—"हे शुभे! वर माँग।" तब इसने अपनी मनोभिलाषा इस प्रकार कह सुनायी—॥६२॥ "भगवन्! बाल-विधवा होनेके कारण मेरा जन्म व्यर्थ ही हुआ। हे जगत्पते! मैं ऐसी अभागिनी हूँ कि फलहीन (पुत्रहीन) ही उत्पन्न हुई॥ ६३॥ अतः आपकी कृपासे जन्म-जन्ममें मेरे बड़े प्रशंसनीय पति हों और प्रजापति (ब्रह्माजी)-के समान पुत्र हो॥ ६४॥ और हे अधोक्षज! आपके प्रसादसे मैं भी कुल, शील, अवस्था, सत्य, दाक्षिण्य (कार्य-कुशलता), शीघ्रकारिता, अविसंवादिता (उलटा न कहना), सत्त्व, वृद्धसेवा और कृतज्ञता आदि गुणोंसे तथा सुन्दर रूपसम्पत्तिसे सम्पन्न और सबको प्रिय लगनेवाली अयोनिजा (माताके गर्भसे जन्म लिये बिना) ही उत्पन्न होऊँ'॥ ६५-६६॥
सोम बोले—उसके ऐसा कहनेपर वरदायक परमेश्वर देवाधिदेव श्रीहृषीकेशने प्रणामके लिये झुकी हुई उस बालाको उठाकर कहा॥ ६७॥
भगवान् बोले—तेरे एक ही जन्ममें बड़े पराक्रमी और विख्यात कर्मवीर दस पति होंगे और हे शोभने! उसी समय तुझे प्रजापतिके समान एक महावीर्यवान् एवं अत्यन्त बल-विक्रमयुक्त पुत्र भी प्राप्त होगा॥ ६८-६९॥ वह इस संसारमें कितने ही वंशोंको चलानेवाला होगा और उसकी सन्तान सम्पूर्ण त्रिलोकीमें फैल जायगी॥ ७०॥
| ७४ | * श्रीविष्णुपुराण * | [ अ० १५ |
|---|
| त्वं चाप्ययोनिजा साध्वी रूपौदार्यगुणान्विता।<br>मनःप्रीतिकरी नॄणां मत्प्रसादाद्भविष्यसि॥ ७१<br>इत्युक्त्वान्तर्दधे देवस्तां विशालविलोचनाम्।<br>सा चेयं मारिषा जाता युष्मत्पत्नी नृपात्मजाः॥ ७२ | तथा तू भी मेरी कृपासे उदाररूप-गुणसम्पन्ना, सुशीला और मनुष्योंके चित्तको प्रसन्न करनेवाली अयोनिजा ही उत्पन्न होगी॥ ७१॥ हे राजपुत्रो! उस विशालाक्षीसे ऐसा कह भगवान् अन्तर्धान हो गये और वही यह मारिषाके रूपसे उत्पन्न हुई तुम्हारी पत्नी है॥ ७२॥ |
| श्रीपराशर उवाच<br>ततः सोमस्य वचनाज्जगृहुस्ते प्रचेतसः।<br>संहृत्य कोपं वृक्षेभ्यः पत्नीधर्मेण मारिषाम्॥ ७३<br>दशभ्यस्तु प्रचेतोभ्यो मारिषायां प्रजापतिः।<br>जज्ञे दक्षो महाभागो यः पूर्वं ब्रह्मणोऽभवत्॥ ७४ | श्रीपराशरजी बोले — तब सोमदेवके कहनेसे प्रचेताओंतने अपना क्रोध शान्त किया और उस मारिषाको वृक्षोंसे पत्नीरूपमें ग्रहण किया॥ ७३॥ उन दसों प्रचेताओंतसे मारिषाके महाभाग दक्ष प्रजापतिका जन्म हुआ, जो पहले ब्रह्माजीसे उत्पन्न हुए थे॥ ७४॥ |
| स तु दक्षो महाभागस्सृष्ट्यर्थं सुमहामते।<br>पुत्रानुत्पादयामास प्रजासृष्ट्यर्थमात्मनः॥ ७५<br>अवरांश्च वरांश्चैव द्विपदोऽथ चतुष्पदान्।<br>आदेशं ब्रह्मणः कुर्वन् सृष्ट्यर्थं समुपस्थितः॥ ७६ | हे महामते! उन महाभाग दक्षने, ब्रह्माजीकी आज्ञा पालते हुए सर्ग-रचनाके लिये उद्यत होकर उनकी अपनी सृष्टि बढ़ाने और सन्तान उत्पन्न करनेके लिये नीच-ऊँच तथा द्विपद-चतुष्पद आदि नाना प्रकारके जीवोंको पुत्ररूपसे उत्पन्न किया॥ ७५-७६॥ |
| स सृष्ट्वा मनसा दक्षः पश्चादसृजत स्त्रियः।<br>ददौ स दश धर्माय कश्यपाय त्रयोदश।<br>कालस्य नयने युक्ताः सप्तविंशतिमिन्दवे॥ ७७ | प्रजापति दक्षने पहले मनसे ही सृष्टि करके फिर स्त्रियोंकी उत्पत्ति की। उनमेंसे दस धर्मको और तेरह कश्यपको दीं तथा काल-परिवर्तनमें नियुक्त [अश्विनी आदि] सत्ताईस चन्द्रमाको विवाह दीं॥ ७७॥ |
| तासु देवास्तथा दैत्या नागा गावस्तथा खगाः।<br>गन्धर्वाप्सरसश्चैव दानवाद्याश्च जज्ञिरे॥ ७८ | उन्हींसे देवता, दैत्य, नाग, गौ, पक्षी, गन्धर्व, अप्सरा और दानव आदि उत्पन्न हुए॥ ७८॥ |
| ततः प्रभृति मैत्रेय प्रजा मैथुनसम्भवाः।<br>सङ्कल्पाद्दर्शनात्स्पर्शात्पूर्वेषामभवन् प्रजाः।<br>तपोविशेषैः सिद्धानां तदात्यन्ततपस्विनाम्॥ ७९ | हे मैत्रेय! दक्षके समयसे ही प्रजाका मैथुन (स्त्री-पुरुष-सम्बन्ध) द्वारा उत्पन्न होना आरम्भ हुआ है। उससे पहले तो अत्यन्त तपस्वी प्राचीन सिद्ध पुरुषोंके तपोबलसे उनके संकल्प, दर्शन अथवा स्पर्शमात्रसे ही प्रजा उत्पन्न होती थी॥ ७९॥ |
| श्रीमैत्रेय उवाच<br>अङ्गुष्ठाद्दक्षिणाद्दक्षः पूर्वं जातो मया श्रुतः।<br>कथं प्राचेतसो भूयः समुत्पन्नो महामुने॥ ८०<br>एष मे संशयो ब्रह्मन्सुमहान्हृदि वर्त्तते।<br>यदौहित्रश्च सोमस्य पुनः श्वशुरतां गतः॥ ८१ | श्रीमैत्रेयजी बोले— हे महामुने! मैंने तो सुना था कि दक्षका जन्म ब्रह्माजीके दायें अँगूठेसे हुआ था, फिर वे प्रचेताओंतके पुत्र किस प्रकार हुए?॥ ८०॥ हे ब्रह्मन्! मेरे हृदयमें यह बड़ा सन्देह है कि सोमदेवके दौहित्र (धेवते) होकर भी फिर वे उनके श्वशुर हुए!॥ ८१॥ |
| श्रीपराशर उवाच<br>उत्पत्तिश्च निरोधश्च नित्यो भूतेषु सर्वदा।<br>ऋषयोऽत्र न मुह्यन्ति ये चान्ये दिव्यचक्षुषः॥ ८२<br>युगे युगे भवन्त्येते दक्षाद्या मुनिसत्तम।<br>पुनश्चैवं निरुध्यन्ते विद्वांस्तत्र न मुह्यति॥ ८३<br>कनिष्ठ्यं ज्यैष्ठ्यमप्येषां पूर्वं नाभूद्द्विजोत्तम।<br>तप एव गरीयोऽभूत्प्रभावश्चैव कारणम्॥ ८४ | श्रीपराशरजी बोले— हे मैत्रेय! प्राणियोंके उत्पत्ति और नाश [प्रवाहरूपसे] निरन्तर हुआ करते हैं। इस विषयमें ऋषियों तथा अन्य दिव्यदृष्टि-पुरुषोंको कोई मोह नहीं होता॥ ८२॥ हे मुनिश्रेष्ठ! ये दक्षादि युग-युगमें होते हैं और फिर लीन हो जाते हैं; इसमें विद्वान्को किसी प्रकारका सन्देह नहीं होता॥ ८३॥ हे द्विजोत्तम! इनमें पहले किसी प्रकारकी ज्येष्ठता अथवा कनिष्ठता भी नहीं थी। उस समय तप और प्रभाव ही उनकी ज्येष्ठताका कारण होता था॥ ८४॥ |
अ० १५] * प्रथम अंश * ७५
[संस्कृत श्लोक]
श्रीमैत्रेय उवाच
देवानां दानवानां च गन्धर्वोरगरक्षसाम्।
उत्पत्तिं विस्तरेणेह मम ब्रह्मन्प्रकीर्त्तय॥ ८५
श्रीपराशर उवाच
प्रजाः सृजेति व्यादिष्टः पूर्वं दक्षः स्वयम्भुवा।
यथा ससर्ज भूतानि तथा शृणु महामुने॥ ८६
मानसान्येव भूतानि पूर्वं दक्षोऽसृजत्तदा।
देवानृषीन्सगन्धर्वानसुरान्युन्नगांस्तथा ॥ ८७
यदास्य सृजमानस्य न व्यवर्धन्त ताः प्रजाः।
ततः सञ्चिन्त्य स पुनः सृष्टिहेतोः प्रजापतिः॥ ८८
मैथुनेनैव धर्मेण सिसृक्षुर्विविधाः प्रजाः।
असिक्नीमावहत्कन्यां वीरणस्य प्रजापतेः।
सुतां सुतपसा युक्तां महतीं लोकधारिणीम्॥ ८९
अथ पुत्रसहस्राणि वैरुण्यां पञ्च वीर्यवान्।
असिक्न्यां जनयामास सर्गहेतोः प्रजापतिः॥ ९०
तान्दृष्ट्वा नारदो विप्र संविवर्द्धयिषून्प्रजाः।
सङ्गम्य प्रियसम्वादो देवर्षिरिदमब्रवीत्॥ ९१
हे हर्यश्वा महावीर्याः प्रजा यूयं करिष्यथ।
ईदृशो दृश्यते यत्नो भवतां श्रूयतामिदम्॥ ९२
बालिशा बत यूयं वै नास्या जानीत वै भुवः।
अन्तरूर्ध्वमधश्चैव कथं सृक्ष्यथ वै प्रजाः॥ ९३
ऊर्ध्वं तिर्यगधश्चैव यदाऽप्रतिहता गतिः।
तदा कस्माद्भुवो नान्तं सर्वे द्रक्ष्यथ बालिशाः॥ ९४
ते तु तद्वचनं श्रुत्वा प्रयाताः सर्वतो दिशम्।
अद्यापि नो निवर्तन्ते समुद्रेभ्य इवापगाः॥ ९५
हर्यश्वेष्वथ नष्टेषु दक्षः प्राचेतसः पुनः।
वैरुण्यामथ पुत्राणां सहस्रमसृजत्प्रभुः॥ ९६
विवर्द्धयिषवस्ते तु शबलाश्वाः प्रजाः पुनः।
पूर्वोक्तं वचनं ब्रह्मन्नारदेनैव नोदिताः॥ ९७
[हिन्दी अनुवाद]
श्रीमैत्रेयजी बोले— हे ब्रह्मन्! आप मुझसे देव, दानव, गन्धर्व, सर्प और राक्षसोंकी उत्पत्ति विस्तारपूर्वक कहिये॥ ८५॥
श्रीपराशरजी बोले— हे महामुने! स्वयम्भू-भगवान् ब्रह्माजीकी ऐसी आज्ञा होनेपर कि 'तुम प्रजा उत्पन्न करो' दक्षने पूर्वकालमें जिस प्रकार प्राणियोंकी रचना की थी वह सुनो॥ ८६॥ उस समय पहले तो दक्षने ऋषि, गन्धर्व, असुर और सर्प आदि मानसिक प्राणियोंको ही उत्पन्न किया॥ ८७॥ इस प्रकार रचना करते हुए जब उनकी वह प्रजा और न बढ़ी तो उन प्रजापतिने सृष्टिकी वृद्धिके लिये मनमें विचारकर मैथुनधर्मसे नाना प्रकारकी प्रजा उत्पन्न करनेकी इच्छासे वीरण प्रजापतिकी अति तपस्विनी और लोकधारिणी पुत्री असिक्नीसे विवाह किया॥ ८८-८९॥
तदनन्तर वीर्यवान् प्रजापति दक्षने सर्गकी वृद्धिके लिये वीरणसुता असिक्नीसे पाँच सहस्र पुत्र उत्पन्न किये॥ ९०॥ उन्हें प्रजा-वृद्धिके इच्छुक देख प्रियवादी देवर्षि नारदने उनके निकट जाकर इस प्रकार कहा—॥ ९१॥ “हे महापराक्रमी हर्यश्वगण! आप लोगोंकी ऐसी चेष्टा प्रतीत होती है कि आप प्रजा उत्पन्न करेंगे, सो मेरा यह कथन सुनो॥ ९२॥ खेदकी बात है, तुमलोग अभी निरे अनभिज्ञ हो क्योंकि तुम इस पृथिवीका मध्य, ऊर्ध्व (ऊपरी भाग) और अधः (नीचेका भाग) कुछ भी नहीं जानते, फिर प्रजाकी रचना किस प्रकार करोगे? देखो, तुम्हारी गति इस ब्रह्माण्डमें ऊपर-नीचे और इधर-उधर सब ओर अप्रतिहत (बे-रोक-टोक) है; अतः हे अज्ञानियो! तुम सब मिलकर इस पृथिवीका अन्त क्यों नहीं देखते?”॥ ९३-९४॥ नारदजीके ये वचन सुनकर वे सब भिन्न-भिन्न दिशाओंको चले गये और समुद्रमें जाकर जिस प्रकार नदियाँ नहीं लौटतीं उसी प्रकार वे भी आजतक नहीं लौटे॥ ९५॥
हर्यश्वोंके इस प्रकार चले जानेपर प्रचेताओँके पुत्र दक्षने वैरुणीसे एक सहस्र पुत्र और उत्पन्न किये॥ ९६॥ वे शबलाश्वगण भी प्रजा बढ़ानेके इच्छुक हुए, किन्तु हे ब्रह्मन्! उनसे नारदजीने ही फिर पूर्वोक्त बातें कह दीं।
७६ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १५
अन्योन्यमूचुस्ते सर्वे सम्यगाह महामुनिः।
भ्रातॄणां पदवी चैव गन्तव्या नात्र संशयः॥ ९८
ज्ञात्वा प्रमाणं पृथ्व्याश्च प्रजास्त्रक्ष्यामहे ततः।
तेऽपि तेनैव मार्गेण प्रयाताः सर्वतोमुखम्।
अद्यापि न निवर्त्तन्ते समुद्रेभ्य इवापगाः॥ ९९
ततः प्रभृति वै भ्राता भ्रातुरन्वेषणे द्विज।
प्रयातो नश्यति तथा तन्न कार्यं विजानता॥ १००
तांश्चापि नष्टान् विज्ञाय पुत्रान् दक्षः प्रजापतिः।
क्रोधं चक्रे महाभागो नारदं स शशाप च॥ १०१
सर्गकामस्ततो विद्वान्स मैत्रेय प्रजापतिः।
षष्टिं दक्षोऽसृजत्कन्या वैरुण्यामिति नः श्रुतम्॥ १०२
ददौ स दश धर्माय कश्यपाय त्रयोदश।
सप्तविंशति सोमाय चतस्रोऽरिष्टनेमिने॥ १०३
द्वे चैव बहुपुत्राय द्वे चैवाङ्गिरसे तथा।
द्वे कृशाश्वाय विदुषे तासां नामानि मे शृणु॥ १०४
अरुन्धती वसुर्यामिर्लम्बा भानुर्मरुत्वती।
सङ्कल्पा च मुहूर्त्ता च साध्या विश्वा च तादृशी।
धर्मपत्न्यो दश त्वेतास्तास्वपत्यानि मे शृणु॥ १०५
विश्वेदेवास्तु विश्वायाः साध्या साध्यानजायत।
मरुत्वत्यां मरुत्वन्तो वसोश्च वसवः स्मृताः।
भानोस्तु भानवः पुत्रा मुहूर्तायां मुहूर्त्तजाः॥ १०६
लम्बायाश्चैव घोषोऽथ नागवीथी तु यामिजा॥ १०७
पृथिवीविषयं सर्वमरुन्धत्यामजायत।
सङ्कल्पायास्तु सर्वात्मा जज्ञे सङ्कल्प एव हि॥ १०८
ये त्वनेकवसुप्राणदेवा ज्योतिःपुरोगमाः।
वसवोऽष्टौ समाख्यातास्तेषां वक्ष्यामि विस्तरम्॥ १०९
आपो ध्रुवश्च सोमश्च धर्मश्चैवानिलोऽनलः।
प्रत्यूषश्च प्रभासश्च वसवो नामभिः स्मृताः॥ ११०
आपस्य पुत्रो वैतण्डः श्रमः शान्तो ध्वनिस्तथा।
ध्रुवस्य पुत्रो भगवान्कालो लोकप्रकालनः॥ १११
सोमस्य भगवान्वर्चा वर्चस्वी येन जायते॥ ११२
धर्मस्य पुत्रो द्रविणो हुतहव्यवहस्तथा।
मनोहरायां शिशिरः प्राणोऽथ वरुणस्तथा॥ ११३
तब वे सब आपसमें एक-दूसरेसे कहने लगे—'महामुनि नारदजी ठीक कहते हैं; हमको भी, इसमें सन्देह नहीं, अपने भाइयोंके मार्गका ही अवलम्बन करना चाहिये। हम भी पृथिवीका परिमाण जानकर ही सृष्टि करेंगे।' इस प्रकार वे भी उसी मार्गसे समस्त दिशाओंको चले गये और समुद्रगत नदियोंके समान आजतक नहीं लौटे॥ ९७—९९॥ हे द्विज! तबसे ही यदि भाईको खोजनेके लिये भाई ही जाय तो वह नष्ट हो जाता है, अतः विज्ञ पुरुषको ऐसा न करना चाहिये॥ १००॥
महाभाग दक्ष प्रजापतिने उन पुत्रोंको भी गये जान नारदजीपर बड़ा क्रोध किया और उन्हें शाप दे दिया॥ १०१॥ हे मैत्रेय! हमने सुना है कि फिर उस विद्वान् प्रजापतिने सर्गवृद्धिकी इच्छासे वैरुणीसे साठ कन्याएँ उत्पन्न कीं॥ १०२॥ उनमेंसे उन्होंने दस धर्मको, तेरह कश्यपको, सत्ताईस सोम (चन्द्रमा)-को और चार अरिष्टनेमिको दीं॥ १०३॥ तथा दो बहुपुत्र, दो अंगिरा और दो कृशाश्वको विवाहीँ। अब उनके नाम सुनो॥ १०४॥ अरुन्धती, वसु, यामी, लम्बा, भानु, मरुत्वती, संकल्पा, मुहूर्त्ता, साध्या और विश्वा—ये दस धर्मकी पत्नियाँ थीं; अब तुम इनके पुत्रोंका विवरण सुनो॥ १०५॥ विश्वाके पुत्र विश्वेदेवा थे, साध्यासे साध्यगण हुए, मरुत्वतीसे मरुत्वान् और वसुसे वसुगण हुए तथा भानुसे भानु और मुहूर्तासे मुहूर्त्ताभिमानी देवगण हुए॥ १०६॥ लम्बासे घोष, यामीसे नागवीथी और अरून्धतीसे समस्त पृथिवी-विषयक प्राणी हुए तथा संकल्पासे सर्वात्मक संकल्पकी उत्पत्ति हुई॥ १०७-१०८॥
नाना प्रकारका वसु (तेज अथवा धन) ही जिनका प्राण है ऐसे ज्योति आदि जो आठ वसुगण विख्यात हैं, अब मैं उनके वंशका विस्तार बताता हूँ॥ १०९॥ उनके नाम आप, ध्रुव, सोम, धर्म, अनिल (वायु), अनल (अग्नि), प्रत्यूष और प्रभास कहे जाते हैं॥ ११०॥ आपके पुत्र वैतण्ड, श्रम, शान्त और ध्वनि हुए तथा ध्रुवके पुत्र लोक-संहारक भगवान् काल हुए॥ १११॥ भगवान् वर्चा सोमके पुत्र थे जिनसे पुरुष वर्चस्वी (तेजस्वी) हो जाता है और धर्मके उनकी भार्या मनोहरासे द्रविण, हुत एवं हव्यवह तथा शिशिर, प्राण और वरुण नामक पुत्र हुए॥ ११२-११३॥