भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 73, कुल 558 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 73
६२* श्रीविष्णुपुराण *[ अ० १३
श्रीपराशर उवाचश्रीपराशरजी बोले— यह सुनकर राजाको भी परम सन्तोष हुआ; उन्होंने सोचा 'मनुष्य सद्गुणोंके कारण ही प्रशंसाका पात्र होता है; अतः मुझको भी गुण उपार्जन करने चाहिये॥ ५७॥ इसलिये अब स्तुतिके द्वारा ये जिन गुणोंका वर्णन करेंगे मैं भी सावधानतापूर्वक वैसा ही करूँगा॥ ५८॥ यदि यहाँपर ये कुछ त्याज्य अवगुणोंको भी कहेंगे तो मैं उन्हें त्यागूँगा।' इस प्रकार राजाने अपने चित्तमें निश्चय किया॥ ५९॥ तदनन्तर उन (सूत और मागध) दोनोंने परम बुद्धिमान् वेननन्दन महाराज पृथुका, उनके भावी कर्मोंके आश्रयसे स्वरसहित भली प्रकार स्तवन किया॥ ६०॥ [उन्होंने कहा—] 'ये महाराज सत्यवादी, दानशील, सत्य मर्यादावाले, लज्जाशील, सुहृद्, क्षमाशील, पराक्रमी और दुष्टोंका दमन करनेवाले हैं॥ ६१॥ ये धर्मज्ञ, कृतज्ञ, दयावान्, प्रियभाषी, माननीयोंको मान देनेवाले, यज्ञपरायण, ब्रह्मण्य, साधुसमाजमें सम्मानित और शत्रु तथा मित्रके साथ समान व्यवहार करनेवाले हैं'॥ ६२-६३॥ इस प्रकार सूत और मागधके कहे हुए गुणोंको उन्होंने अपने चित्तमें धारण किया और उसी प्रकारके कार्य किये॥ ६४॥ तब उन पृथिवीपतिने पृथिवीका पालन करते हुए बड़ी-बड़ी दक्षिणाओंवाले अनेकों महान् यज्ञ किये॥ ६५॥ अराजकताके समय ओषधियोंके नष्ट हो जानेसे भूखसे व्याकुल हुई प्रजा पृथिवीनाथ पृथुके पास आयी और उनके पूछनेपर प्रणाम करके उनसे अपने आनेका कारण निवेदन किया॥ ६६॥
ततः स नृपतिस्तोषं तच्छ्रुत्वा परमं ययौ।<br>सद्गुणैः श्लाघ्यतामेति तस्माल्लभ्या गुणा मम॥ ५७
तस्माद्यदद्य स्तोत्रेण गुणनिवर्णनं त्विमौ।<br>करिष्येते करिष्यामि तदेवाहं समाहितः॥ ५८
यदिमौ वर्जनीयं च किञ्चिदत्र वदिष्यतः।<br>तदहं वर्जयिष्यामीत्येवं चक्रे मतिं नृपः॥ ५९
अथ तौ चक्रतुः स्तोत्रं पृथोर्वैन्यस्य धीमतः।<br>भविष्यैः कर्मभिः सम्यक् सुस्वरौ सूतमागधौ॥ ६०
सत्यवाग्दानशीलोऽयं सत्यसन्धो नरेश्वरः।<br>ह्रीमान्मैत्रः क्षमाशीलो विक्रान्तो दुष्टशासनः॥ ६१
धर्मज्ञश्च कृतज्ञश्च दयावान् प्रियभाषकः।<br>मान्यान्मानयिता यज्वा ब्रह्मण्यः साधुसम्मतः॥ ६२
समः शत्रौ च मित्रे च व्यवहारस्थितौ नृपः॥ ६३
सूतेनोक्तान् गुणानित्थं स तदा मागधेन च।<br>चकार हृदि तादृक् च कर्मणा कृतवानसौ॥ ६४
ततस्तु पृथिवीपालः पालयन्पृथिवीमिमाम्।<br>इयाज विविधैर्यज्ञैर्महद्भिर्भूरिदक्षिणैः॥ ६५
तं प्रजाः पृथिवीनाथमुपतस्थुः क्षुधार्दिताः।<br>ओषधीषु प्रणष्टासु तस्मिन्काले ह्यराजके।<br>तमूचुस्ते नताः पृष्टास्तत्रागमनकारणम्॥ ६६
प्रजा ऊचुःप्रजाने कहा— हे प्रजापति नृपश्रेष्ठ! अराजकताके समय पृथिवीने समस्त ओषधियाँ अपनेमें लीन कर ली हैं, अतः आपकी सम्पूर्ण प्रजा क्षीण हो रही है॥ ६७॥ विधाताने आपको हमारा जीवनदायक प्रजापति बनाया है; अतः क्षुधारूप महारोगसे पीड़ित हम प्रजाजनोंको आप जीवनरूप ओषधि दीजिये॥ ६८॥
अराजके नृपश्रेष्ठ धरित्र्या सकलौषधीः।<br>ग्रस्तास्ततः क्षयं यान्ति प्रजाः सर्वाः प्रजेश्वर॥ ६७
त्वन्नो वृत्तिप्रदो धात्रा प्रजापालो निरूपितः।<br>देहि नः क्षुत्परीतानां प्रजानां जीवनौषधीः॥ ६८
श्रीपराशर उवाचश्रीपराशरजी बोले— यह सुनकर महाराज पृथु अपना आजगव नामक दिव्य धनुष और दिव्य बाण लेकर अत्यन्त क्रोधपूर्वक पृथिवीके पीछे दौड़े॥ ६९॥ तब भयसे अत्यन्त व्याकुल हुई पृथिवी गौका रूप धारणकर भागी और ब्रह्मलोक आदि सभी लोकोंमें गयी॥ ७०॥ समस्त भूतोंको धारण करनेवाली पृथिवी जहाँ-जहाँ भी गयी वहीं-वहीं उसने वेनपुत्र पृथुको शस्त्र-सन्धान किये अपने पीछे आते देखा॥ ७१॥
ततस्तु नृपतिर्दिव्यमादायाजगवं धनुः।<br>शरांश्च दिव्यान्कुपितः सोन्वधावद्वसुन्धराम्॥ ६९
ततो ननाश त्वरिता गौर्भूत्वा च वसुन्धरा।<br>सा लोकान्ब्रह्मलोकादीन्सन्त्रासादगमन्मही॥ ७०
यत्र यत्र ययौ देवी सा तदा भूतधारिणी।<br>तत्र तत्र तु सा वैन्यं ददृशेऽभ्युद्यतायुधम्॥ ७१