भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 74, कुल 558 में से

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पृष्ठ 74

अ० १३ ] * प्रथम अंश * ६३


ततस्तं प्राह वसुधा पृथुं पृथुपराक्रमम्।
प्रवेपमाना तद्बाणपरित्राणपरायणा ॥ ७२

पृथिव्युवाच
स्त्रीवधे त्वं महापापं किं नरेन्द्र न पश्यसि।
येन मां हन्तुमत्यर्थं प्रकरोषि नृपोद्यमम् ॥ ७३

पृथुरुवाच
एकस्मिन् यत्र निधनं प्रापिते दुष्टकारिणि।
बहूनां भवति क्षेमं तस्य पुण्यप्रदो वधः ॥ ७४

पृथिव्युवाच
प्रजानामुपकाराय यदि मां त्वं हनिष्यसि।
आधारः कः प्रजानां ते नृपश्रेष्ठ भविष्यति ॥ ७५

पृथुरुवाच
त्वां हत्वा वसुधे बाणैर्मच्छासनपराङ्मुखीम्।
आत्मयोगबलेनेमा धारयिष्याम्यहं प्रजाः ॥ ७६

श्रीपराशर उवाच
ततः प्रणम्य वसुधा तं भूयः प्राह पार्थिवम्।
प्रवेपिताङ्गी परमं साध्वसं समुपागता ॥ ७७

पृथिव्युवाच
उपायतः समारब्धाः सर्वे सिद्ध्यन्त्युपक्रमाः।
तस्माद्ददाम्युपायं ते तं कुरुष्व यदीच्छसि ॥ ७८
समस्ता या मया जीर्णा नरनाथ महौषधीः।
यदीच्छसि प्रदास्यामि ताः क्षीरपरिणामिनीः ॥ ७९
तस्मात्प्रजाहितार्थाय मम धर्मभृतां वर।
तं तु वत्सं कुरुष्व त्वं क्षरेयं येन वत्सला ॥ ८०
समां च कुरु सर्वत्र येन क्षीरं समन्ततः।
वरौषधीबीजभूतं बीजं सर्वत्र भावये ॥ ८१

श्रीपराशर उवाच
तत उत्सारयामास शैलान् शतसहस्रशः।
धनुष्कोट्या तदा वैन्यस्तेन शैला विवर्द्धिताः ॥ ८२
न हि पूर्वविसर्गे वै विषमे पृथिवीतले।
प्रविभागः पुराणां वा ग्रामाणां वा पुराऽभवत् ॥ ८३
न सस्यानि न गोरक्ष्यं न कृषिर्न वणिक्पथः।
वैण्यात्प्रभृति मैत्रेय सर्वस्यैतस्य सम्भवः ॥ ८४


हिन्दी अनुवाद

तब उन प्रबल पराक्रमी महाराज पृथुसे, उनके बाणप्रहारसे बचनेकी कामनासे काँपती हुई पृथिवी इस प्रकार बोली ॥ ७२ ॥

पृथिवीने कहा— हे राजेन्द्र! क्या आपको स्त्री-वधका महापाप नहीं दीख पड़ता, जो मुझे मारनेपर आप ऐसे उतारू हो रहे हैं? ॥ ७३ ॥

पृथु बोले— जहाँ एक अनर्थकारीको मार देनेसे बहुतोंको सुख प्राप्त हो उसे मार देना ही पुण्यप्रद है ॥ ७४ ॥

पृथिवी बोली— हे नृपश्रेष्ठ! यदि आप प्रजाके हितके लिये ही मुझे मारना चाहते हैं तो [ मेरे मर जानेपर ] आपकी प्रजाका आधार क्या होगा? ॥ ७५ ॥

पृथुने कहा— अरी वसुधे! अपनी आज्ञाका उल्लंघन करनेवाली तुझे मारकर मैं अपने योगबलसे ही इस प्रजाको धारण करूँगा ॥ ७६ ॥

श्रीपराशरजी बोले— तब अत्यन्त भयभीत एवं काँपती हुई पृथिवीने उन पृथिवीपतिको पुनः प्रणाम करके कहा ॥ ७७ ॥

पृथिवी बोली— हे राजन्! यत्नपूर्वक आरम्भ किये हुए सभी कार्य सिद्ध हो जाते हैं। अतः मैं भी आपको एक उपाय बताती हूँ; यदि आपकी इच्छा हो तो वैसा ही करें ॥ ७८ ॥ हे नरनाथ! मैंने जिन समस्त ओषधियोंको पचा लिया है उन्हें यदि आपकी इच्छा हो तो दुग्धरूपसे मैं दे सकती हूँ ॥ ७९ ॥ अतः हे धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ महाराज! आप प्रजाके हितके लिये कोई ऐसा वत्स (बछड़ा) बनाइये जिससे वात्सल्यवश मैं उन्हें दुग्धरूपसे निकाल सकूँ ॥ ८० ॥ और मुझको आप सर्वत्र समतल कर दीजिये जिससे मैं उत्तमोत्तम ओषधियोंके बीजरूप दुग्धको सर्वत्र उत्पन्न कर सकूँ ॥ ८१ ॥

श्रीपराशरजी बोले— तब महाराज पृथुने अपने धनुषकी कोटिसे सैकड़ों-हजारों पर्वतोंको उखाड़ा और उन्हें एक स्थानपर इकट्ठा कर दिया ॥ ८२ ॥ इससे पूर्व पृथिवीके समतल न होनेसे पुर और ग्राम आदिका कोई नियमित विभाग नहीं था ॥ ८३ ॥ हे मैत्रेय! उस समय अन्न, गोरक्षा, कृषि और व्यापारका भी कोई क्रम न था। यह सब तो वैन्यपुत्र पृथुके समयसे ही आरम्भ हुआ है ॥ ८४ ॥