भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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पृष्ठ 75
६४* श्रीविष्णुपुराण *[ अ० १३

यत्र यत्र समं त्वस्या भूमेरासीद्द्विजोत्तम।
तत्र तत्र प्रजाः सर्वा निवासं समरोचयन्॥ ८५
आहारः फलमूलानि प्रजानामभवत्तदा।
कृच्छ्रेण महता सोऽपि प्रणष्टास्वोषधीषु वै॥ ८६
स कल्पयित्वा वत्सं तु मनुं स्वायम्भुवं प्रभुम्।
स्वपाणौ पृथिवीनाथो दुदोह पृथिवीं पृथुः।
सस्यजातानि सर्वाणि प्रजानां हितकाम्यया॥ ८७
तेनान्नेन प्रजास्तात वर्तन्तेद्यापि नित्यशः॥ ८८
प्राणप्रदाता स पृथुर्यस्माद्भूमेरभूत्पिता।
ततस्तु पृथिवीसंज्ञामवापाखिलधारिणी॥ ८९
ततश्च देवैर्मुनिभिर्दैत्यै रक्षोभिरद्रिभिः।
गन्धर्वैरुरगैर्यक्षैः पितृभिस्तरुभिस्तथा॥ ९०
तत्तत्पात्रमुपादाय तत्तद्दुग्धं मुने पयः।
वत्सोग्धृविशेषाश्च तेषां तद्योनयोऽभवन्॥ ९१
सैषा धात्री विधात्री च धारिणी पोषणी तथा।
सर्वस्य तु ततः पृथ्वी विष्णुपादतलोद्भवा॥ ९२
एवं प्रभावस्स पृथुः पुत्रो वेनस्य वीर्यवान्।
जज्ञे महीपतिः पूर्वो राजाभूज्जनरञ्जनात्॥ ९३
य इदं जन्म वैन्यस्य पृथोः संकीर्त्तयेन्नरः।
न तस्य दुष्कृतं किञ्चित्फलदायि प्रजायते॥ ९४
दुस्स्वप्नोपशमं नृणां शृण्वतामेतदुत्तमम्।
पृथोर्जन्म प्रभावश्च करोति सततं नृणाम्॥ ९५

हे द्विजोत्तम! जहाँ-जहाँ भूमि समतल थी वहीं-वहींपर प्रजाने निवास करना पसन्द किया॥ ८५॥ उस समयतक प्रजाका आहार केवल फल मूलादि ही था; वह भी ओषधियोंके नष्ट हो जानेसे बड़ा दुर्लभ हो गया था॥ ८६॥
तब पृथिवीपति पृथुने स्वायम्भुवमनुको बछड़ा बनाकर अपने हाथमें ही पृथिवीसे प्रजाके हितके लिये समस्त धान्योंको दुहा। हे तात! उसी अन्नके आधारसे अब भी सदा प्रजा जीवित रहती है॥ ८७-८८॥ महाराज पृथु प्राणदान करनेके कारण भूमिके पिता हुए,* इसलिये उस सर्वभूतधारिणीको ‘पृथिवी’ नाम मिला॥ ८९॥
हे मुने! फिर देवता, मुनि, दैत्य, राक्षस, पर्वत, गन्धर्व, सर्प, यक्ष और पितृगण आदिने अपने-अपने पात्रोंमें अपना अभिमत दूध दुहा तथा दुहनेवालोंके अनुसार उनके सजातीय ही दोग्धा और वत्स आदि हुए॥ ९०-९१॥ इसीलिये विष्णुभगवान्‌के चरणोंसे प्रकट हुई यह पृथिवी ही सबको जन्म देनेवाली, बनानेवाली तथा धारण और पोषण करनेवाली है॥ ९२॥ इस प्रकार पूर्वकालमें वेनके पुत्र महाराज पृथु ऐसे प्रभावशाली और वीर्यवान् हुए। प्रजाका रंजन करनेके कारण वे ‘राजा’ कहलाये॥ ९३॥
जो मनुष्य महाराज पृथुके इस चरित्रका कीर्तन करता है उसका कोई भी दुष्कर्म फलदायी नहीं होता॥ ९४॥ पृथुका यह अत्युत्तम जन्म-वृत्तान्त और उनका प्रभाव अपने सुननेवाले पुरुषोंके दुःस्वप्नोंको सर्वदा शान्त कर देता है॥ ९५॥

इति श्रीविष्णुपुराणे प्रथमेऽंशे त्रयोदशोऽध्यायः॥ १३॥


* जन्म देनेवाला, यज्ञोपवीत करानेवाला, अन्नदाता, भयसे रक्षा करनेवाला तथा जो विद्यादान करे—ये पाँचों पिता माने गये हैं; जैसे कहा है—
जनकश्चोपनेता च यश्च विद्याः प्रयच्छति। अन्नदाता भयत्राता पञ्चैते पितरः स्मृताः॥


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