विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
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अ० १४ ] * प्रथम अंश * ६५
चौदहवाँ अध्याय
प्राचीनबर्हिका जन्म और प्रचेताओँका भगवदाराधन
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले— |
|---|---|
| पृथॊः पुत्रौ तु धर्मज्ञौ जज्ञातेऽन्तर्द्धिवादिनौ ।<br>शिखण्डिनी हविर्धानमन्तर्द्धानाद्व्यजायत ॥ १ | हे मैत्रेय ! पृथुका अन्तर्द्धान और वादी नामक दो धर्मज्ञ पुत्र हुए; उनमेंसे अन्तर्द्धानसे उसकी पत्नी शिखण्डिनीने हविर्धानको उत्पन्न किया॥ १॥ |
| हविर्द्धानात् षडाग्नेयी धिषणाऽजनयत्सुतान् ।<br>प्राचीनबर्हिषं शुक्लं गयं कृष्णं वृजाजिनौ ॥ २ | हविर्धानसे अग्निकुलीना धिषणाने प्राचीनबर्हि, शुक्र, गय, कृष्ण, वृज और अजिन—ये छः पुत्र उत्पन्न किये॥ २॥ |
| प्राचीनबर्हिर्भगवान्महानासीत्प्रजापतिः ।<br>हविर्द्धानान्महाभाग येन संवर्द्धिताः प्रजाः ॥ ३ | हे महाभाग! हविर्धानसे उत्पन्न हुए भगवान् प्राचीनबर्हि एक महान् प्रजापति थे, जिन्होंने यज्ञके द्वारा अपनी प्रजाकी बहुत वृद्धि की॥ ३॥ |
| प्राचीनाग्राः कुशास्तस्य पृथिव्यां विश्रुता मुने ।<br>प्राचीनबर्हिर्भवत्ख्यातो भुवि महाबलः ॥ ४ | हे मुने! उनके समयमें [यज्ञानुष्ठानकी अधिकताके कारण] प्राचीनाग्र कुश समस्त पृथिवीमें फैले हुए थे, इसलिये वे महाबली 'प्राचीनबर्हि' नामसे विख्यात हुए॥ ४॥ |
| समुद्रतनयायां तु कृतदारो महीपतिः ।<br>महत्तस्तपसः पारे सवर्णायां महामते ॥ ५ | हे महामते! उन महीपतिने महान् तपस्याके अनन्तर समुद्रकी पुत्री सवर्णासे विवाह किया॥ ५॥ |
| सवर्णार्धत्त सामुद्री दश प्राचीनबर्हिषः ।<br>सर्वे प्रचेतसो नाम धनुर्वेदस्य पारगाः ॥ ६ | उस समुद्र-कन्या सवर्णाके प्राचीनबर्हिसे दस पुत्र हुए। वे प्रचेता-नामक सभी पुत्र धनुर्विद्याके पारगामी थे॥ ६॥ |
| अपृथग्धर्मचरणास्तेऽतप्यन्त महत्तपः ।<br>दशवर्षसहस्राणि समुद्रसलिलेशयाः ॥ ७ | उन्होंने समुद्रके जलमें रहकर दस हजार वर्षतक समान धर्मका आचरण करते हुए घोर तपस्या की॥ ७॥ |
| श्रीमैत्रेय उवाच | श्रीमैत्रेयजी बोले— |
| यदर्थं ते महात्मानस्तपस्तेपुर्महामुने ।<br>प्रचेतसः समुद्राम्भस्येतदाख्यातुमर्हसि ॥ ८ | हे महामुने! उन महात्मा प्रचेताओँने जिस लिये समुद्रके जलमें तपस्या की थी सो आप कहिये॥ ८॥ |
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी कहने लगे— |
| पित्रा प्रचेतसः प्रोक्ताः प्रजार्थममितात्मना ।<br>प्रजापतिनियुक्तेन बहुमानपुरस्सरम् ॥ ९ | हे मैत्रेय! एक बार प्रजापतिकी प्रेरणासे प्रचेताओँके महात्मा पिता प्राचीनबर्हिने उनसे अति सम्मानपूर्वक सन्तानोत्पत्तिके लिये इस प्रकार कहा॥ ९॥ |
| प्राचीनबर्हिरुवाच | प्राचीनबर्हि बोले— |
| ब्रह्मणा देवदेवेन समादिष्टोऽस्म्यहं सुताः ।<br>प्रजाः संवर्द्धनीयास्ते मया चोक्तं तथेति तत् ॥ १० | हे पुत्रो! देवाधिदेव ब्रह्माजीने मुझे आज्ञा दी है कि 'तुम प्रजाकी वृद्धि करो' और मैंने भी उनसे 'बहुत अच्छा' कह दिया है॥ १०॥ |
| तन्मम प्रीतये पुत्राः प्रजावृद्धिमत्तन्द्रिताः ।<br>कुरुध्वं माननीया वः सम्यगाज्ञा प्रजापतेः ॥ ११ | अतः हे पुत्रगण! तुम भी मेरी प्रसन्नताके लिये सावधानतापूर्वक प्रजाकी वृद्धि करो, क्योंकि प्रजापतिकी आज्ञा तुमको भी सर्वथा माननीय है॥ ११॥ |
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले— |
| ततस्ते तत्पितुः श्रुत्वा वचनं नृपनन्दनाः ।<br>तथेत्युक्त्वा च तं भूयः पप्रच्छुः पितरं मुने ॥ १२ | हे मुने! उन राजकुमारों ने पिताके ये वचन सुनकर उनसे 'जो आज्ञा' ऐसा कहकर फिर पूछा॥ १२॥ |
| प्रचेतस ऊचुः | प्रचेता बोले— |
| येन तात प्रजावृद्धौ समर्थाः कर्मणा वयम् ।<br>भवेम तत् समस्तं नः कर्म व्याख्यातुमर्हसि ॥ १३ | हे तात! जिस कर्मसे हम प्रजा-वृद्धिमें समर्थ हो सकें उसकी आप हमसे भली प्रकार व्याख्या कीजिये॥ १३॥ |