भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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६६ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १४


पितोवाच**पिताने कहा—**वरदायक भगवान् विष्णुकी आराधना
आराध्य वरदं विष्णुमिष्टप्राप्तिमसंशयम्।करनेसे ही मनुष्यको निःसन्देह इष्ट वस्तुकी प्राप्ति
समेति नान्यथा मर्त्यः किमन्यत्कथयामि वः॥ १४होती है और किसी उपायसे नहीं। इसके सिवा और मैं
तस्मात्प्रजाविवृद्ध्यर्थं सर्वभूतप्रभुं हरिम्।तुमसे क्या कहूँ॥ १४॥ इसलिये यदि तुम सफलता
आराधयत गोविन्दं यदि सिद्धिमभीप्सथ॥ १५चाहते हो तो प्रजा-वृद्धिके लिये सर्वभूतोंके स्वामी श्रीहरि
धर्ममर्थं च कामं च मोक्षं चान्विच्छतां सदा।गोविन्दकी उपासना करो॥ १५॥ धर्म, अर्थ, काम या
आराधनीयो भगवाननादिपुरुषोत्तम ॥ १६मोक्षकी इच्छावालोंको सदा अनादि पुरुषोत्तम भगवान्
यस्मिन्नाराधिते सर्गं चकारादौ प्रजापतिः।विष्णुकी ही आराधना करनी चाहिये॥ १६॥ कल्पके
तमाराध्याच्युतं वृद्धिः प्रजानां वो भविष्यति॥ १७आरम्भमें जिनकी उपासना करके प्रजापतिने संसारकी
रचना की है, तुम उन अच्युतकी ही आराधना करो।
इससे तुम्हारी सन्तानकी वृद्धि होगी॥ १७॥
श्रीपराशर उवाच**श्रीपराशरजी बोले—**पिताकी ऐसी आज्ञा होनेपर
इत्येवमुक्तास्ते पित्रा पुत्राः प्रचेतसो दश।प्रचेता नामक दसों पुत्रोंने समुद्रके जलमें डूबे रहकर
मग्नाः पयोधिसलिले तपस्तेपुः समाहिताः॥ १८सावधानतापूर्वक तप करना आरम्भ कर दिया॥ १८॥
दशवर्षसहस्त्राणि न्यस्तचित्ता जगत्पतौ।हे मुनिश्रेष्ठ! सर्वलोकाश्रय जगत्पति श्रीनारायणमें चित्त
नारायणे मुनिश्रेष्ठ सर्वलोकपरायणे॥ १९लगाये हुए उन्होंने दस हजार वर्षतक वहीं (जलमें
तत्रैवावस्थिता देवमेकाग्रमनसो हरिम्।ही) स्थित रहकर देवाधिदेव श्रीहरिकी एकाग्र-चित्तसे स्तुति
तुष्टुवुर्यस्स्तुतः कामान् स्तोतुरिष्टान्प्रयच्छति॥ २०की, जो अपनी स्तुति की जानेपर स्तुति करनेवालोंकी
सभी कामनाएँ सफल कर देते हैं॥ १९-२०॥
श्रीमैत्रेय उवाच**श्रीमैत्रेयजी बोले—**हे मुनिश्रेष्ठ! समुद्रके जलमें
स्तवं प्रचेतसो विष्णोः समुद्राम्भसि संस्थिताः।स्थित रहकर प्रचेताओंने भगवान् विष्णुकी जो अति
चक्रुस्तन्मे मुनिश्रेष्ठ सुपुण्यं वक्तुमर्हसि॥ २१पवित्र स्तुति की थी वह कृपया मुझसे कहिये॥ २१॥
श्रीपराशर उवाच**श्रीपराशरजी बोले—**हे मैत्रेय! पूर्वकालमें समुद्रमें
शृणु मैत्रेय गोविन्दं यथापूर्वं प्रचेतसः।स्थित रहकर प्रचेताओंने तन्मयभावसे श्रीगोविन्दकी
तुष्टुवुस्तन्मयीभूताः समुद्रसलिलेशयाः॥ २२जो स्तुति की, वह सुनो॥ २२॥
प्रचेतस ऊचुः**प्रचेताओंने कहा—**जिनमें सम्पूर्ण वाक्योंकी नित्य-
नताः स्म सर्ववचसां प्रतिष्ठा यत्र शाश्वती।प्रतिष्ठा है [अर्थात् जो सम्पूर्ण वाक्योंके एकमात्र प्रतिपाद्य
तमाद्यन्तमशेषस्य जगतः परमं प्रभुम्॥ २३हैं] तथा जो जगत्की उत्पत्ति और प्रलयके कारण हैं उन
ज्योतिराद्यमनौपम्यमण्वनन्तमपारवत्।निखिल-जगन्नायक परमप्रभुको हम नमस्कार करते
योनिभूतमशेषस्य स्थावरस्य चरस्य च॥ २४हैं॥ २३॥ जो आद्य ज्योतिःस्वरूप, अनुपम, अणु, अनन्त,
यस्याहः प्रथमं रूपमरूपस्य तथा निशा।अपार और समस्त चराचरके कारण हैं, तथा जिन रूपहीन
सन्ध्या च परमेशस्य तस्मै कालात्मने नमः॥ २५परमेश्वरके दिन, रात्रि और सन्ध्या ही प्रथम रूप हैं, उन
भुज्यतेऽनुदिनं देवैः पितृभिश्च सुधात्मकः।कालस्वरूप भगवान्को नमस्कार है॥ २४-२५॥ समस्त
जीवभूतः समस्तस्य तस्मै सोमात्मने नमः॥ २६प्राणियोंके जीवनरूप जिनके अमृतमय स्वरूपको देव
यस्तमांस्यत्ति तीव्रात्मा प्रभाभिर्भासयन्नभः।और पितृगण नित्यप्रति भोगते हैं—उन सोमस्वरूप प्रभुको
धर्मशीताम्भसां योनिस्तस्मै सूर्यात्मने नमः॥ २७नमस्कार है॥ २६॥ जो तीक्ष्णस्वरूप अपने तेजसे
आकाशमण्डलको प्रकाशित करते हुए अन्धकारको भक्षण
कर जाते हैं तथा जो घाम, शीत और जलके उद्गमस्थान
हैं उन सूर्यस्वरूप [नारायण]-को नमस्कार है॥ २७॥

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