भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 78, कुल 558 में से

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पृष्ठ 78

अ० १४ ] * प्रथम अंश * ६७


संस्कृतहिन्दी अनुवाद
काठिन्यवान् यो बिभर्त्ति जगदेतदशेषतः।<br>शब्दादिसंश्रयो व्यापी तस्मै भूम्यात्मने नमः ॥ २८जो कठिनतायुक्त होकर इस सम्पूर्ण संसारको धारण करते हैं और शब्द आदि पाँचों विषयोंके आधार तथा व्यापक हैं, उन भूमिरूप भगवान्‌को नमस्कार है ॥ २८ ॥
यद्योनिभूतं जगतो बीजं यत्सर्वदेहिनाम्।<br>तत्तोयरूपमीशस्य नमामो हरिमेधसः ॥ २९जो संसारका योनिरूप है और समस्त देहधारियोंका बीज है, भगवान् हरिके उस जलस्वरूपको हम नमस्कार करते हैं ॥ २९ ॥
यो मुखं सर्वदेवानां हव्यभुक् कव्यभुक् तथा।<br>पितॄणां च नमस्तस्मै विष्णवे पावकात्मने ॥ ३०जो समस्त देवताओंका हव्यभुक् और पितृगणका कव्यभुक् मुख है, उस अग्निस্বরূপ विष्णुभगवान्‌को नमस्कार है ॥ ३० ॥
पञ्चधावस्थितो देहे यश्चेष्टां कुरुतेऽनिशम्।<br>आकाशयोनिर्भगवान्स्तस्मै वाय्वात्मने नमः ॥ ३१जो प्राण, अपान आदि पाँच प्रकारसे देहमें स्थित होकर दिन-रात चेष्टा करता रहता है तथा जिसकी योनि आकाश है, उस वायुरूप भगवान्‌को नमस्कार है ॥ ३१ ॥
अवकाशमशेषाणां भूतानां यः प्रयच्छति।<br>अनन्तमूर्तिमाञ्छुद्धस्तस्मै व्योमात्मने नमः ॥ ३२जो समस्त भूतोंको अवकाश देता है उस अनन्तमूर्ति और परम शुद्ध आकाशस्वरूप प्रभुको नमस्कार है ॥ ३२ ॥
समस्तेन्द्रियसर्गस्य यः सदा स्थानमुत्तमम्।<br>तस्मै शब्दादिरूपाय नमः कृष्णाय वेधसे ॥ ३३समस्त इन्द्रिय-सृष्टिके जो उत्तम स्थान हैं उन शब्द-स्पर्शादिरूप विधाता श्रीकृष्णचन्द्रको नमस्कार है ॥ ३३ ॥
गृह्णाति विषयान्नित्यमिन्द्रियात्मा क्षराक्षरः।<br>यस्तस्मै ज्ञानमूलाय नताः स्म हरिमेधसे ॥ ३४जो क्षर और अक्षर इन्द्रियरूपसे नित्य विषयोंको ग्रहण करते हैं उन ज्ञानमूल हरिको नमस्कार है ॥ ३४ ॥
गृहीतानिनिन्द्रियैरर्थानात्मने यः प्रयच्छति।<br>अन्तःकरणरूपाय तस्मै विश्वात्मने नमः ॥ ३५इन्द्रियोंके द्वारा ग्रहण किये विषयोंको जो आत्माके सम्मुख उपस्थित करता है उस अन्तःकरणरूप विश्वात्माको नमस्कार है ॥ ३५ ॥
यस्मिन्ननन्ते सकलं विश्वं यस्मात्तथोद्गतम्।<br>लयस्थानं च यस्तस्मै नमः प्रकृतिधर्मिणे ॥ ३६जिस अनन्तमें सकल विश्व स्थित है, जिससे वह उत्पन्न हुआ है और जो उसके लयका भी स्थान है उस प्रकृतिस्वरूप परमात्माको नमस्कार है ॥ ३६ ॥
शुद्धः सँल्लक्ष्यते भ्रान्त्या गुणवानिव योऽगुणः।<br>तमात्मरूपिणं देवं नताः स्म पुरुषोत्तमम् ॥ ३७जो शुद्ध और निर्गुण होकर भी भ्रमवश गुणयुक्त-से दिखायी देते हैं उन आत्मस्वरूप पुरुषोत्तमदेवको हम नमस्कार करते हैं ॥ ३७ ॥
अविकारमजं शुद्धं निर्गुणं यन्निरञ्जनम्।<br>नताः स्म तत्परं ब्रह्म विष्णोर्यत्परमं पदम् ॥ ३८जो अविकारी, अजन्मा, शुद्ध, निर्गुण, निर्मल और श्रीविष्णुका परमपद है उस ब्रह्मस्वरूपको हम नमस्कार करते हैं ॥ ३८ ॥
अदीर्घह्रस्वमस्थूलमनण्वश्यामलोहितम्।<br>अस्नेहच्छायमतनुमसक्तमशरीरिणम् ॥ ३९जो न लम्बा है, न पतला है, न मोटा है, न छोटा है और न काला है, न लाल है; जो स्नेह (द्रव), कान्ति तथा शरीरसे रहित एवं अनासक्त और अशरीरी (जीवसे भिन्न) है ॥ ३९ ॥
अनाकाशमसंस्पर्शमगन्धमरसं च यत्।<br>अचक्षुश्रोत्रमचलमवाक्पाणिममानसम् ॥ ४०जो अवकाश स्पर्श, गन्ध और रससे रहित तथा आँख-कान-विहीन, अचल एवं जिह्वा, हाथ और मनसे रहित है ॥ ४० ॥
अनामगोत्रमसुखमतेजस्कमहेतुकम् ।<br>अभयं भ्रान्तिरहितमनिद्रमजरामरम् ॥ ४१जो नाम, गोत्र, सुख और तेजसे शून्य तथा कारणहीन है; जिसमें भय, भ्रान्ति, निद्रा, जरा और मरण-इन (अवस्थाओं)-का अभाव है ॥ ४१ ॥
अरजोऽशब्दममृतमप्लुतं यदसंवृतम्।<br>पूर्वापरे न वै यस्मिंस्तद्विष्णोः परमं पदम् ॥ ४२जो अरज (रजोगुणरहित), अशब्द, अमृत, अप्लुत (गतिशून्य) और असंवृत (अनाच्छादित) है एवं जिसमें पूर्वापर व्यवहारकी गति नहीं है वही भगवान् विष्णुका परमपद है ॥ ४२ ॥
परमेशत्वगुणवत्सर्वभूतमसंश्रयम् ।<br>नताः स्म तत्पदं विष्णोर्जिह्वादृग्गोचरं न यत् ॥ ४३जिसका ईशन (शासन) ही परमगुण है, जो सर्वरूप और अनाधार है तथा जिह्वा और दृष्टिका अविषय है, भगवान् विष्णुके उस परमपदको हम नमस्कार करते हैं ॥ ४३ ॥