विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
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| ६८ | * श्रीविष्णुपुराण * | [ अ० १५ |
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| श्रीपराशर उवाच | |
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| एवं प्रचेतसो विष्णुं स्तुवन्तस्तत्समाधयः।<br>दशवर्षसहस्राणि तपश्चेरुर्महार्णवे ॥ ४४ | **श्रीपराशरजी बोले—**इस प्रकार श्रीविष्णुभगवान्में समाधिस्थ होकर प्रचेताओेंने महासागरमें रहकर उनकी स्तुति करते हुए दस हजार वर्षतक तपस्या की ॥ ४४ ॥ |
| ततः प्रसन्नो भगवांस्तेषामन्तर्जले हरिः।<br>ददौ दर्शनमुन्निद्रनीलोत्पलदलच्छविः ॥ ४५ | तब भगवान् श्रीहरिने प्रसन्न होकर उन्हें खिले हुए नील कमलकी-सी आभायुक्त दिव्य छविसे जलके भीतर ही दर्शन दिया ॥ ४५ ॥ |
| पतत्त्रिराजमारूढमवलोक्य प्रचेतसः।<br>प्रणिपेतुः शिरोभिस्तं भक्तिभारावनामितैः ॥ ४६ | प्रचेताओेंने पक्षिराज गरुड़पर चढ़े हुए श्रीहरिको देखकर उन्हें भक्तिभावके भारसे झुके हुए मस्तकोंद्वारा प्रणाम किया ॥ ४६ ॥ |
| ततस्तानाह भगवान्व्रियतामीप्सितो वरः।<br>प्रसादसुमुखोऽहं वो वरदः समुपस्थितः ॥ ४७ | तब भगवान्ने उनसे कहा—"मैं तुमसे प्रसन्न होकर तुम्हें वर देनेके लिये आया हूँ, तुम अपना अभीष्ट वर माँगो" ॥ ४७ ॥ |
| ततस्तमूचुर्वरदं प्रणिपत्य प्रचेतसः।<br>यथा पित्रा समादिष्टं प्रजानां वृद्धिकारणम् ॥ ४८ | तब प्रचेताओेंने वरदायक श्रीहरिको प्रणाम कर, जिस प्रकार उनके पिताने उन्हें प्रजा-वृद्धिके लिये आज्ञा दी थी वह सब उनसे निवेदन की ॥ ४८ ॥ |
| स चापि देवस्तं दत्त्वा यथाभिलषितं वरम्।<br>अन्तर्धानं जगामाशु ते च निश्चक्रमुर्जलात् ॥ ४९ | तदनन्तर, भगवान् उन्हें अभीष्ट वर देकर अन्तर्धान हो गये और वे जलसे बाहर निकल आये ॥ ४९ ॥ |
इति श्रीविष्णुपुराणे प्रथमऽंशे चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥
पन्द्रहवाँ अध्याय
प्रचेताओेंका मारिषा नामक कन्याके साथ विवाह, दक्ष प्रजापतिकी उत्पत्ति एवं दक्षकी साठ कन्याओंके वंशका वर्णन
| श्रीपराशर उवाच | |
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| तपश्चरत्सु पृथिवीं प्रचेतःसु महीरुहाः।<br>अरक्ष्यमाणामावव्रुर्वभूवाथ प्रजाक्षयः ॥ १ | **श्रीपराशरजी बोले—**प्रचेताओेंके तपस्यामें लगे रहनेसे [कृषि आदिद्वारा] किसी प्रकारकी रक्षा न होनेके कारण पृथिवीको वृक्षोंने ढँक लिया और प्रजा बहुत कुछ नष्ट हो गयी ॥ १ ॥ |
| नाशकन्मरुतो वातुं वृतं खमभवद्द्रुमैः।<br>दशवर्षसहस्राणि न शेकुश्चेष्टितुं प्रजाः ॥ २ | आकाश वृक्षोंसे भर गया था। इसलिये दस हजार वर्षतक न तो वायु ही चला और न प्रजा ही किसी प्रकारकी चेष्टा कर सकी ॥ २ ॥ |
| तान्दृष्ट्वा जलनिष्क्रान्ताः सर्वे क्रुद्धाः प्रचेतसः।<br>मुखेभ्यो वायुमग्निं च तेऽसृजन् जातमन्यवः ॥ ३ | जलसे निकलनेपर उन वृक्षोंको देखकर प्रचेतागण अति क्रोधित हुए और उन्होंने रोषपूर्वक अपने मुखसे वायु और अग्निको छोड़ा ॥ ३ ॥ |
| उन्मूलानथ तान्वृक्षान्कृत्वा वायुरशोषयत्।<br>तानग्निरदहद्धोरस्तत्राभूद्द्रुमसंक्षयः ॥ ४ | वायुने वृक्षोंको उखाड़-उखाड़कर सुखा दिया और प्रचण्ड अग्निने उन्हें जला डाला। इस प्रकार उस समय वहाँ वृक्षोंका नाश होने लगा ॥ ४ ॥ |
| द्रुमक्षयमथो दृष्ट्वा किञ्चिच्छिष्टेषु शाखिषु।<br>उपगम्याब्रवीदेतान् राजा सोमः प्रजापतीन् ॥ ५ | तब वह भयंकर वृक्ष-प्रलय देखकर थोड़े-से वृक्षोंके रह जानेपर उनके राजा सोमने प्रजापति प्रचेताओेंके पास जाकर कहा— ॥ ५ ॥ |