विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 86, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० १५] * प्रथम अंश * ७५
[संस्कृत श्लोक]
श्रीमैत्रेय उवाच
देवानां दानवानां च गन्धर्वोरगरक्षसाम्।
उत्पत्तिं विस्तरेणेह मम ब्रह्मन्प्रकीर्त्तय॥ ८५
श्रीपराशर उवाच
प्रजाः सृजेति व्यादिष्टः पूर्वं दक्षः स्वयम्भुवा।
यथा ससर्ज भूतानि तथा शृणु महामुने॥ ८६
मानसान्येव भूतानि पूर्वं दक्षोऽसृजत्तदा।
देवानृषीन्सगन्धर्वानसुरान्युन्नगांस्तथा ॥ ८७
यदास्य सृजमानस्य न व्यवर्धन्त ताः प्रजाः।
ततः सञ्चिन्त्य स पुनः सृष्टिहेतोः प्रजापतिः॥ ८८
मैथुनेनैव धर्मेण सिसृक्षुर्विविधाः प्रजाः।
असिक्नीमावहत्कन्यां वीरणस्य प्रजापतेः।
सुतां सुतपसा युक्तां महतीं लोकधारिणीम्॥ ८९
अथ पुत्रसहस्राणि वैरुण्यां पञ्च वीर्यवान्।
असिक्न्यां जनयामास सर्गहेतोः प्रजापतिः॥ ९०
तान्दृष्ट्वा नारदो विप्र संविवर्द्धयिषून्प्रजाः।
सङ्गम्य प्रियसम्वादो देवर्षिरिदमब्रवीत्॥ ९१
हे हर्यश्वा महावीर्याः प्रजा यूयं करिष्यथ।
ईदृशो दृश्यते यत्नो भवतां श्रूयतामिदम्॥ ९२
बालिशा बत यूयं वै नास्या जानीत वै भुवः।
अन्तरूर्ध्वमधश्चैव कथं सृक्ष्यथ वै प्रजाः॥ ९३
ऊर्ध्वं तिर्यगधश्चैव यदाऽप्रतिहता गतिः।
तदा कस्माद्भुवो नान्तं सर्वे द्रक्ष्यथ बालिशाः॥ ९४
ते तु तद्वचनं श्रुत्वा प्रयाताः सर्वतो दिशम्।
अद्यापि नो निवर्तन्ते समुद्रेभ्य इवापगाः॥ ९५
हर्यश्वेष्वथ नष्टेषु दक्षः प्राचेतसः पुनः।
वैरुण्यामथ पुत्राणां सहस्रमसृजत्प्रभुः॥ ९६
विवर्द्धयिषवस्ते तु शबलाश्वाः प्रजाः पुनः।
पूर्वोक्तं वचनं ब्रह्मन्नारदेनैव नोदिताः॥ ९७
[हिन्दी अनुवाद]
श्रीमैत्रेयजी बोले— हे ब्रह्मन्! आप मुझसे देव, दानव, गन्धर्व, सर्प और राक्षसोंकी उत्पत्ति विस्तारपूर्वक कहिये॥ ८५॥
श्रीपराशरजी बोले— हे महामुने! स्वयम्भू-भगवान् ब्रह्माजीकी ऐसी आज्ञा होनेपर कि 'तुम प्रजा उत्पन्न करो' दक्षने पूर्वकालमें जिस प्रकार प्राणियोंकी रचना की थी वह सुनो॥ ८६॥ उस समय पहले तो दक्षने ऋषि, गन्धर्व, असुर और सर्प आदि मानसिक प्राणियोंको ही उत्पन्न किया॥ ८७॥ इस प्रकार रचना करते हुए जब उनकी वह प्रजा और न बढ़ी तो उन प्रजापतिने सृष्टिकी वृद्धिके लिये मनमें विचारकर मैथुनधर्मसे नाना प्रकारकी प्रजा उत्पन्न करनेकी इच्छासे वीरण प्रजापतिकी अति तपस्विनी और लोकधारिणी पुत्री असिक्नीसे विवाह किया॥ ८८-८९॥
तदनन्तर वीर्यवान् प्रजापति दक्षने सर्गकी वृद्धिके लिये वीरणसुता असिक्नीसे पाँच सहस्र पुत्र उत्पन्न किये॥ ९०॥ उन्हें प्रजा-वृद्धिके इच्छुक देख प्रियवादी देवर्षि नारदने उनके निकट जाकर इस प्रकार कहा—॥ ९१॥ “हे महापराक्रमी हर्यश्वगण! आप लोगोंकी ऐसी चेष्टा प्रतीत होती है कि आप प्रजा उत्पन्न करेंगे, सो मेरा यह कथन सुनो॥ ९२॥ खेदकी बात है, तुमलोग अभी निरे अनभिज्ञ हो क्योंकि तुम इस पृथिवीका मध्य, ऊर्ध्व (ऊपरी भाग) और अधः (नीचेका भाग) कुछ भी नहीं जानते, फिर प्रजाकी रचना किस प्रकार करोगे? देखो, तुम्हारी गति इस ब्रह्माण्डमें ऊपर-नीचे और इधर-उधर सब ओर अप्रतिहत (बे-रोक-टोक) है; अतः हे अज्ञानियो! तुम सब मिलकर इस पृथिवीका अन्त क्यों नहीं देखते?”॥ ९३-९४॥ नारदजीके ये वचन सुनकर वे सब भिन्न-भिन्न दिशाओंको चले गये और समुद्रमें जाकर जिस प्रकार नदियाँ नहीं लौटतीं उसी प्रकार वे भी आजतक नहीं लौटे॥ ९५॥
हर्यश्वोंके इस प्रकार चले जानेपर प्रचेताओँके पुत्र दक्षने वैरुणीसे एक सहस्र पुत्र और उत्पन्न किये॥ ९६॥ वे शबलाश्वगण भी प्रजा बढ़ानेके इच्छुक हुए, किन्तु हे ब्रह्मन्! उनसे नारदजीने ही फिर पूर्वोक्त बातें कह दीं।