भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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७४* श्रीविष्णुपुराण *[ अ० १५
त्वं चाप्ययोनिजा साध्वी रूपौदार्यगुणान्विता।<br>मनःप्रीतिकरी नॄणां मत्प्रसादाद्भविष्यसि॥ ७१<br>इत्युक्त्वान्तर्दधे देवस्तां विशालविलोचनाम्।<br>सा चेयं मारिषा जाता युष्मत्पत्नी नृपात्मजाः॥ ७२तथा तू भी मेरी कृपासे उदाररूप-गुणसम्पन्ना, सुशीला और मनुष्योंके चित्तको प्रसन्न करनेवाली अयोनिजा ही उत्पन्न होगी॥ ७१॥ हे राजपुत्रो! उस विशालाक्षीसे ऐसा कह भगवान् अन्तर्धान हो गये और वही यह मारिषाके रूपसे उत्पन्न हुई तुम्हारी पत्नी है॥ ७२॥
श्रीपराशर उवाच<br>ततः सोमस्य वचनाज्जगृहुस्ते प्रचेतसः।<br>संहृत्य कोपं वृक्षेभ्यः पत्नीधर्मेण मारिषाम्॥ ७३<br>दशभ्यस्तु प्रचेतोभ्यो मारिषायां प्रजापतिः।<br>जज्ञे दक्षो महाभागो यः पूर्वं ब्रह्मणोऽभवत्॥ ७४श्रीपराशरजी बोले — तब सोमदेवके कहनेसे प्रचेताओंतने अपना क्रोध शान्त किया और उस मारिषाको वृक्षोंसे पत्नीरूपमें ग्रहण किया॥ ७३॥ उन दसों प्रचेताओंतसे मारिषाके महाभाग दक्ष प्रजापतिका जन्म हुआ, जो पहले ब्रह्माजीसे उत्पन्न हुए थे॥ ७४॥
स तु दक्षो महाभागस्सृष्ट्यर्थं सुमहामते।<br>पुत्रानुत्पादयामास प्रजासृष्ट्यर्थमात्मनः॥ ७५<br>अवरांश्च वरांश्चैव द्विपदोऽथ चतुष्पदान्।<br>आदेशं ब्रह्मणः कुर्वन् सृष्ट्यर्थं समुपस्थितः॥ ७६हे महामते! उन महाभाग दक्षने, ब्रह्माजीकी आज्ञा पालते हुए सर्ग-रचनाके लिये उद्यत होकर उनकी अपनी सृष्टि बढ़ाने और सन्तान उत्पन्न करनेके लिये नीच-ऊँच तथा द्विपद-चतुष्पद आदि नाना प्रकारके जीवोंको पुत्ररूपसे उत्पन्न किया॥ ७५-७६॥
स सृष्ट्वा मनसा दक्षः पश्चादसृजत स्त्रियः।<br>ददौ स दश धर्माय कश्यपाय त्रयोदश।<br>कालस्य नयने युक्ताः सप्तविंशतिमिन्दवे॥ ७७प्रजापति दक्षने पहले मनसे ही सृष्टि करके फिर स्त्रियोंकी उत्पत्ति की। उनमेंसे दस धर्मको और तेरह कश्यपको दीं तथा काल-परिवर्तनमें नियुक्त [अश्विनी आदि] सत्ताईस चन्द्रमाको विवाह दीं॥ ७७॥
तासु देवास्तथा दैत्या नागा गावस्तथा खगाः।<br>गन्धर्वाप्सरसश्चैव दानवाद्याश्च जज्ञिरे॥ ७८उन्हींसे देवता, दैत्य, नाग, गौ, पक्षी, गन्धर्व, अप्सरा और दानव आदि उत्पन्न हुए॥ ७८॥
ततः प्रभृति मैत्रेय प्रजा मैथुनसम्भवाः।<br>सङ्कल्पाद्दर्शनात्स्पर्शात्पूर्वेषामभवन् प्रजाः।<br>तपोविशेषैः सिद्धानां तदात्यन्ततपस्विनाम्॥ ७९हे मैत्रेय! दक्षके समयसे ही प्रजाका मैथुन (स्त्री-पुरुष-सम्बन्ध) द्वारा उत्पन्न होना आरम्भ हुआ है। उससे पहले तो अत्यन्त तपस्वी प्राचीन सिद्ध पुरुषोंके तपोबलसे उनके संकल्प, दर्शन अथवा स्पर्शमात्रसे ही प्रजा उत्पन्न होती थी॥ ७९॥
श्रीमैत्रेय उवाच<br>अङ्गुष्ठाद्दक्षिणाद्दक्षः पूर्वं जातो मया श्रुतः।<br>कथं प्राचेतसो भूयः समुत्पन्नो महामुने॥ ८०<br>एष मे संशयो ब्रह्मन्सुमहान्हृदि वर्त्तते।<br>यदौहित्रश्च सोमस्य पुनः श्वशुरतां गतः॥ ८१श्रीमैत्रेयजी बोले— हे महामुने! मैंने तो सुना था कि दक्षका जन्म ब्रह्माजीके दायें अँगूठेसे हुआ था, फिर वे प्रचेताओंतके पुत्र किस प्रकार हुए?॥ ८०॥ हे ब्रह्मन्! मेरे हृदयमें यह बड़ा सन्देह है कि सोमदेवके दौहित्र (धेवते) होकर भी फिर वे उनके श्वशुर हुए!॥ ८१॥
श्रीपराशर उवाच<br>उत्पत्तिश्च निरोधश्च नित्यो भूतेषु सर्वदा।<br>ऋषयोऽत्र न मुह्यन्ति ये चान्ये दिव्यचक्षुषः॥ ८२<br>युगे युगे भवन्त्येते दक्षाद्या मुनिसत्तम।<br>पुनश्चैवं निरुध्यन्ते विद्वांस्तत्र न मुह्यति॥ ८३<br>कनिष्ठ्यं ज्यैष्ठ्यमप्येषां पूर्वं नाभूद्द्विजोत्तम।<br>तप एव गरीयोऽभूत्प्रभावश्चैव कारणम्॥ ८४श्रीपराशरजी बोले— हे मैत्रेय! प्राणियोंके उत्पत्ति और नाश [प्रवाहरूपसे] निरन्तर हुआ करते हैं। इस विषयमें ऋषियों तथा अन्य दिव्यदृष्टि-पुरुषोंको कोई मोह नहीं होता॥ ८२॥ हे मुनिश्रेष्ठ! ये दक्षादि युग-युगमें होते हैं और फिर लीन हो जाते हैं; इसमें विद्वान्को किसी प्रकारका सन्देह नहीं होता॥ ८३॥ हे द्विजोत्तम! इनमें पहले किसी प्रकारकी ज्येष्ठता अथवा कनिष्ठता भी नहीं थी। उस समय तप और प्रभाव ही उनकी ज्येष्ठताका कारण होता था॥ ८४॥