भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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अ० १५ ] * प्रथम अंश * ७३


ब्रह्माक्षरमजं नित्यं यथाऽसौ पुरुषोत्तमः। तथा रागादयो दोषाः प्रयान्तु प्रशमं मम॥ ५८

एतद्ब्रह्मपराख्यं वै संस्तवं परमं जपन्। अवाप परमां सिद्धिं स तमाराध्य केशवम्॥ ५९

[ इमं स्तवं यः पठति शृणुयाद्वापि नित्यशः। स कामदोषैरखिलैर्मुक्तः प्राप्नोति वाञ्छितम्॥ ]

इयं च मारिषा पूर्वमासीद्या तां ब्रवीमि वः। कार्यगौरवमेतस्याः कथने फलदायि वः॥ ६०

अपुत्रा प्रागियं विष्णुं मृते भर्त्तरि सत्तमा। भूपपत्नी महाभागा तोषयामास भक्तितः॥ ६१

आराधितस्तया विष्णुः प्राह प्रत्यक्षतां गतः। वरं वृणीष्वेति शुभे सा च प्राहत्मवाञ्छितम्॥ ६२

भगवन्बालवैधव्याद् वृथाजन्माहमीदृशी। मन्दभाग्या समुद्भूता विफला च जगत्पते॥ ६३

भवन्तु पतयः श्लाघ्या मम जन्मनि जन्मनि। त्वत्प्रसादात्तथा पुत्रः प्रजापतिसमोऽस्तु मे॥ ६४

कुलं शीलं वयः सत्यं दाक्षिण्यं क्षिप्रकारिता। अविसंवादिता सत्त्वं वृद्धसेवा कृतज्ञता॥ ६५

रूपसम्पत्समायुक्ता सर्वस्य प्रियदर्शना। अयोनिजा च जायेयं त्वत्प्रसादादधोक्षज॥ ६६

सोम उवाच

तयैवमुक्तो देवेशो हृषीकेश उवाच ताम्। प्रणामनम्रामुत्थाप्य वरदः परमेश्वरः॥ ६७

देव उवाच

भविष्यन्ति महावीर्या एकस्मिन्नेव जन्मनि। प्रख्यातोदारकर्माणो भवत्याः पतयो दश॥ ६८

पुत्रं च सुमहावीर्यं महाबलपराक्रमम्। प्रजापतिगुणैर्युक्तं त्वमवाप्स्यसि शोभने॥ ६९

वंशानां तस्य कर्तृत्वं जगत्यस्मिन्भविष्यति। त्रैलोक्यमखिला सूतिस्तस्य चापूरयिष्यति॥ ७०


क्योंकि वह अक्षर, अज और नित्य ब्रह्म ही पुरुषोत्तम भगवान् विष्णु हैं, इसलिये [ उनका नित्य अनुरक्त भक्त होनेके कारण ] मेरे राग आदि दोष शान्त हों'॥ ५८॥

इस ब्रह्मपार नामक परम स्तोत्रका जप करते हुए श्रीकेशवकी आराधना करनेसे उन मुनीश्वरने परमसिद्धि प्राप्त की॥ ५९॥ [जो पुरुष इस स्तवको नित्यप्रति पढ़ता या सुनता है वह काम आदि सकल दोषोंसे मुक्त होकर अपना मनोवांछित फल प्राप्त करता है।] अब मैं तुम्हें यह बताता हूँ कि यह मारिषा पूर्वजन्ममें कौन थी। यह बता देनेसे तुम्हारे कार्यका गौरव सफल होगा। [अर्थात् तुम प्रजा-वृद्धिरूप फल प्राप्त कर सकोगे]॥ ६०॥

यह साध्वी अपने पूर्व जन्ममें एक महारानी थी। पुत्रहीन अवस्थामें ही पतिके मर जानेपर इस महाभागाने अपने भक्तिभावसे विष्णुभगवान्‌को सन्तुष्ट किया॥ ६१॥ इसकी आराधनासे प्रसन्न हो विष्णुभगवान्‌ने प्रकट होकर कहा—"हे शुभे! वर माँग।" तब इसने अपनी मनोभिलाषा इस प्रकार कह सुनायी—॥६२॥ "भगवन्! बाल-विधवा होनेके कारण मेरा जन्म व्यर्थ ही हुआ। हे जगत्पते! मैं ऐसी अभागिनी हूँ कि फलहीन (पुत्रहीन) ही उत्पन्न हुई॥ ६३॥ अतः आपकी कृपासे जन्म-जन्ममें मेरे बड़े प्रशंसनीय पति हों और प्रजापति (ब्रह्माजी)-के समान पुत्र हो॥ ६४॥ और हे अधोक्षज! आपके प्रसादसे मैं भी कुल, शील, अवस्था, सत्य, दाक्षिण्य (कार्य-कुशलता), शीघ्रकारिता, अविसंवादिता (उलटा न कहना), सत्त्व, वृद्धसेवा और कृतज्ञता आदि गुणोंसे तथा सुन्दर रूपसम्पत्तिसे सम्पन्न और सबको प्रिय लगनेवाली अयोनिजा (माताके गर्भसे जन्म लिये बिना) ही उत्पन्न होऊँ'॥ ६५-६६॥

सोम बोले—उसके ऐसा कहनेपर वरदायक परमेश्वर देवाधिदेव श्रीहृषीकेशने प्रणामके लिये झुकी हुई उस बालाको उठाकर कहा॥ ६७॥

भगवान् बोले—तेरे एक ही जन्ममें बड़े पराक्रमी और विख्यात कर्मवीर दस पति होंगे और हे शोभने! उसी समय तुझे प्रजापतिके समान एक महावीर्यवान् एवं अत्यन्त बल-विक्रमयुक्त पुत्र भी प्राप्त होगा॥ ६८-६९॥ वह इस संसारमें कितने ही वंशोंको चलानेवाला होगा और उसकी सन्तान सम्पूर्ण त्रिलोकीमें फैल जायगी॥ ७०॥