भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 83, कुल 558 में से

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पृष्ठ 83

७२ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १५


निर्मार्जमाना गात्राणि गलत्स्वेदजलानि वै।<br>वृक्षाद्वृक्षं ययौ बाला तदग्रारुणपल्लवैः ॥ ४७<br>ऋषिणा यस्तदा गर्भस्तस्या देहे समाहितः।<br>निर्जगाम स रोमाञ्चस्वेदरूपी तदङ्गतः ॥ ४८<br>तं वृक्षा जगृहुर्गर्भमेकं चक्रे तु मारुतः।<br>मया चाप्यायितो गोभिः स तदा ववृधे शनैः ॥ ४९<br>वृक्षाग्रगर्भसम्भूता मारिषाख्या वरानना।<br>तां प्रदास्यन्ति वो वृक्षाः कोप एष प्रशाम्यताम् ॥ ५०<br>कण्डोरपत्यमेवं सा वृक्षेभ्यश्च समुद्गता।<br>ममापत्यं तथा वायोः प्रम्लोचातनया च सा ॥ ५१वह बाला वृक्षोंके नवीन लाल-लाल पत्तोंसे अपने पसीनेसे तर शरीरको पोंछती हुई एक वृक्षसे दूसरे वृक्षपर चलती गयी॥ ४७॥ उस समय ऋषिने उसके शरीरमें जो गर्भ स्थापित किया था; वह भी रोमांचसे निकले हुए पसीनेके रूपमें उसके शरीरसे बाहर निकल आया॥ ४८॥ उस गर्भको वृक्षोंने ग्रहण कर लिया, उसे वायुने एकत्रित कर दिया और मैं अपनी किरणोंसे उसे पोषित करने लगा। इससे वह धीरे-धीरे बढ़ गया॥ ४९॥ वृक्षाग्रसे उत्पन्न हुई वह मारिषा नामकी सुमुखी कन्या तुम्हें वृक्षगण समर्पण करेंगे। अतः अब यह क्रोध शान्त करो॥ ५०॥ इस प्रकार वृक्षोंसे उत्पन्न हुई वह कन्या प्रम्लोचाकी पुत्री है तथा कण्डु मुनिकी, मेरी और वायुकी भी सन्तान है॥ ५१॥
श्रीपराशर उवाच<br>स चापि भगवान् कण्डुः क्षीणे तपसि सत्तमः।<br>पुरुषोत्तमाख्यं मैत्रेय विष्णोरायतनं ययौ ॥ ५२<br>तत्रैकाग्रमतिर्भूत्वा चकाराराधनं हरेः।<br>ब्रह्मपारमयं कुर्वञ्जपमेकाग्रमानसः।<br>ऊर्ध्वबाहुर्महायोगी स्थित्वासौ भूपनन्दनाः ॥ ५३**श्रीपराशरजी बोले—**हे मैत्रेय! [तब यह सोचकर कि प्रचेतागण योगभ्रष्टकी कन्या होनेसे मारिषाको अग्राह्य न समझें सोमदेवने कहा—] साधुश्रेष्ठ भगवान् कण्डु भी तपके क्षीण हो जानेसे पुरुषोत्तमक्षेत्र नामक भगवान् विष्णुकी निवास-भूमिको गये और हे राजपुत्रो! वहाँ वे महायोगी एकनिष्ठ होकर एकाग्रचित्तसे ब्रह्मपार-मन्त्रका जप करते हुए ऊर्ध्वबाहु रहकर श्रीविष्णुभगवान्‌की आराधना करने लगे॥ ५२-५३॥
प्रचेतस ऊचुः<br>ब्रह्मपारं मुनेः श्रोतुमिच्छामः परमं स्तवम्।<br>जपता कण्डुना देवो येनाराध्यत केशवः ॥ ५४**प्रचेतागण बोले—**हम कण्डु मुनिका ब्रह्मपार नामक परमस्तोत्र सुनना चाहते हैं, जिसका जप करते हुए उन्होंने श्रीकेशवकी आराधना की थी॥ ५४॥
सोम उवाच<br>पारं परं विष्णुरपारपारः<br>परः परेभ्यः परमार्थरूपी।<br>स ब्रह्मपारः परपारभूतः<br>परः पराणामपि पारपारः ॥ ५५<br>स कारणं कारणतस्ततोऽपि<br>तस्यापि हेतुः परहेतुहेतुः।<br>कार्येषु चैवं सह कर्मकर्तृ-<br>रूपैरशेषैरवतीह सर्वम् ॥ ५६<br>ब्रह्म प्रभुर्ब्रह्म स सर्वभूतो<br>ब्रह्म प्रजानां पतिरच्युतोऽसौ।<br>ब्रह्माव्ययं नित्यमजं स विष्णु-<br>रपक्षयाद्यैरखिलैरसङ्गि ॥ ५७सोमने कहा—[हे राजकुमारो! वह मन्त्र इस प्रकार है—] 'श्रीविष्णुभगवान् संसार-मार्गकी अन्तिम अवधि हैं, उनका पार पाना कठिन है, वे पर (आकाशादि)-से भी पर अर्थात् अनन्त हैं, अतः सत्यस्वरूप हैं। तपोनिष्ठ महात्माओंको ही वे प्राप्त हो सकते हैं, क्योंकि वे पर (अनात्म-प्रपंच)-से परे हैं तथा पर (इन्द्रियों)-के अगोचर परमात्मा हैं और [भक्तोंके] पालक एवं [उनके अभीष्टको] पूर्ण करनेवाले हैं॥ ५५॥ वे कारण (पंचभूत)-के कारण (पंचतन्मात्रा)-के हेतु (तामस-अहंकार) और उसके भी हेतु (महत्तत्त्व)-के हेतु (प्रधान)-के भी परम हेतु हैं और इस प्रकार समस्त कर्म और कर्ता आदिके सहित कार्यरूपसे स्थित सकल प्रपंचका पालन करते हैं॥ ५६॥ ब्रह्म ही प्रभु है, ब्रह्म ही सर्व जीवरूप है और ब्रह्म ही सकल प्रजाका पति (रक्षक) तथा अविनाशी है। वह ब्रह्म अव्यय, नित्य और अजन्मा है तथा वही क्षय आदि समस्त विकारोंसे शून्य विष्णु है॥ ५७॥
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