विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
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अ० १५ ] * प्रथम अंश * ७१
| प्रम्लोचोवाच | प्रम्लोचा बोली—हे ब्रह्मन्! आपके निकट मैं झूठ कैसे बोल सकती हूँ? और फिर विशेषतया उस समय जब कि आज आप अपने धर्म-मार्गका अनुसरण करनेमें तत्पर होकर मुझसे पूछ रहे हैं॥ ३४॥ |
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| वदिष्याम्यनृतं ब्रह्मन्कथमत्र तवान्तिके।<br>विशेषेणाद्य भवता पृष्टा मार्गानुवर्तिना ॥ ३४ | |
| सोम उवाच | **सोमने कहा—**हे राजकुमारो! उसके ये सत्य वचन सुनकर मुनिने 'मुझे धिक्कार है! मुझे धिक्कार है!' ऐसा कहकर स्वयं ही अपनेको बहुत कुछ भला-बुरा कहा ॥ ३५ ॥ |
| निशम्य तद्वचः सत्यं स मुनिर्नृपनन्दनाः।<br>धिग्धिङ् मामित्यतीवेत्थं निन्दिन्दात्मानमात्मना ॥ ३५ | |
| मुनिरुवाच | **मुनि बोले—**ओह! मेरा तप नष्ट हो गया, जो ब्रह्मवेत्ताओंका धन था वह लुट गया और विवेकबुद्धि मारी गयी। अहो! स्त्रीको तो किसीने मोह उपजानेके लिये ही रचा है॥ ३६॥ 'मुझे अपने मनको जीतकर छहों ऊर्मियों* से अतीत परब्रह्मको जानना चाहिये'—जिसने मेरी इस प्रकारकी बुद्धिको नष्ट कर दिया, उस कामरूपी महाग्रहको धिक्कार है॥ ३७॥ नरकग्रामके मार्गरूप इस स्त्रीके संगसे वेदवेद्य भगवान्की प्राप्तिके कारणरूप मेरे समस्त व्रत नष्ट हो गये ॥ ३८॥ |
| तपांसि मम नष्टानि हतं ब्रह्मविदां धनम्।<br>हतो विवेकः केनापि योषिन्मोहाय निर्मिता ॥ ३६ | |
| ऊर्मिषट्कातिगं ब्रह्म ज्ञेयमात्मजयेन मे।<br>मतिरेषा हृता येन धिक् तं कामं महाग्रहम् ॥ ३७ | |
| व्रतानि वेदवेद्याप्तिकारणान्यखिलानि च।<br>नरकग्राममार्गेण सङ्गेनापहृतानि मे ॥ ३८ | |
| विनिन्द्योत्थं स धर्मज्ञः स्वयमात्मानमात्मना।<br>तामप्सरसमासीनामिदं वचनमब्रवीत् ॥ ३९ | इस प्रकार उन धर्मज्ञ मुनिवरने अपने-आप ही अपनी निन्दा करते हुए वहाँ बैठी हुई उस अप्सरासे कहा—॥ ३९॥ “अरी पापिनि! अब तेरी जहाँ इच्छा हो चली जा, तूने अपनी भावभंगीसे मुझे मोहित करके इन्द्रका जो कार्य था वह पूरा कर लिया॥ ४०॥ मैं अपने क्रोधसे प्रज्वलित हुए अग्निद्वारा तुझे भस्म नहीं करता हूँ, क्योंकि सज्जनोंकी मित्रता सात पग साथ रहनेसे हो जाती है और मैं तो [इतने दिन] तेरे साथ निवास कर चुका हूँ॥ ४१॥ अथवा इसमें तेरा दोष भी क्या है, जो मैं तुझपर क्रोध करूँ? दोष तो सारा मेरा ही है, क्योंकि मैं बड़ा ही अजितेन्द्रिय हूँ॥ ४२॥ तू महामोहकी पिटारी और अत्यन्त निन्दनीया है। हाय! तूने इन्द्रके स्वार्थके लिये मेरी तपस्या नष्ट कर दी!! तुझे धिक्कार है!!! ॥ ४३ ॥ |
| गच्छ पापे यथाकामं यत्कार्यं तत्कृतं त्वया।<br>देवराजस्य मत्क्षोभं कुर्वन्त्या भावचेष्टितैः ॥ ४० | |
| न त्वां करोम्यहं भस्म क्रोधतीव्रेण वह्निना।<br>सतां सप्तपदं मैत्रमुषितोऽहं त्वया सह ॥ ४१ | |
| अथवा तव को दोषः किं वा कुप्यामहं तव।<br>ममैव दोषो नितरां येनाहमजितेन्द्रियः ॥ ४२ | |
| यया शक्रप्रियार्थिन्या कृतो मे तपसो व्ययः।<br>त्वया धिक्तां महामोहमञ्जूषां सुजुगुप्सिताम् ॥ ४३ | |
| सोम उवाच | **सोमने कहा—**वे ब्रह्मर्षि उस सुन्दरीसे जबतक ऐसा कहते रहे तबतक वह [भयके कारण] पसीनेमें सराबोर होकर अत्यन्त काँपती रही ॥ ४४॥ इस प्रकार जिसका समस्त शरीर पसीनेमें डूबा हुआ था और जो भयसे थर-थर काँप रही थी उस प्रम्लोचासे मुनिश्रेष्ठ कण्डुने क्रोधपूर्वक कहा—'अरी! तू चली जा! चली जा!! ॥ ४५ ॥ |
| यावदित्थं स विप्रर्षिस्तां ब्रवीति सुमध्यमाम्।<br>तावद्गलत्स्वेदजला सा बभूवातिवेपथुः ॥ ४४ | |
| प्रवेपमानां सततं स्विन्नगात्रलतां सतीम्।<br>गच्छ गच्छेति सक्रोधमुवाच मुनिसत्तमः ॥ ४५ | |
| सा तु निर्भर्त्सिता तेन विनिष्क्रम्य तदाश्रमात्।<br>आकाशगामिनी स्वेदं ममार्ज तरुपल्लवैः ॥ ४६ | तब बारम्बार फटकारे जानेपर वह उस आश्रमसे निकली और आकाश-मार्गसे जाते हुए उसने अपना पसीना वृक्षके पत्तोंसे पोंछा ॥ ४६ ॥ |
* क्षुधा, पिपासा, लोभ, मोह, जरा और मृत्यु—ये छः ऊर्मियाँ हैं।