भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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४६ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ११

क्रतोश्च सन्ततिर्भार्या वालखिल्यानसूत।<br>षष्टिपूत्रसहस्राणि मुनीनामूर्ध्वरेतसाम्।<br>अङ्गुष्ठपर्वमात्राणां ज्वलद्भास्करतेजसाम्॥ ११<br>ऊर्जायां तु वसिष्ठस्य सप्ताजायन्त वै सुताः॥ १२<br>रजो गोत्रोर्ध्वबाहुश्च सवनश्चानघस्तथा।<br>सुतपाः शुक्र इत्येते सर्वे सप्तर्षयोऽमलाः॥ १३<br>योऽसावग्न्यभिमानी स्याद् ब्रह्मणस्तनयोऽग्रजः।<br>तस्मात्स्वाहा सुताँल्लेभे त्रीनूदारौजसो द्विज॥ १४<br>पावकं पवमानं तु शुचिं चापि जलाशिनम्॥ १५<br>तेषां तु सन्ततावन्ये चत्वारिंशच्च पञ्च च।<br>कथ्यन्ते वह्नयश्चैते पितापुत्रत्रयं च यत्॥ १६<br>एवमेकोनपञ्चाशद्वह्नयः परिकीर्तिताः॥ १७<br>पितरो ब्रह्मणा सृष्टा व्याख्याता ये मया द्विज।<br>अग्निष्वात्ता बर्हिषदोऽनग्नयः साग्नयश्च ये॥ १८<br>तेभ्यः स्वधा सुते जज्ञे मेनां वै धारिणीं तथा।<br>ते उभे ब्रह्मवादिन्यौ योगिन्यावप्युभे द्विज॥ १९<br>उत्तमज्ञानसम्पन्ने सर्वैः समुदितैर्गुणैः॥ २०<br>इत्येषा दक्षकन्यानां कथितापत्यसन्ततिः।<br>श्रद्धावान्संस्मरन्नेतामनपत्यो न जायते॥ २१क्रतुकी सन्तति नामक भार्याने अँगूठेके पोरुओंके समान शरीरवाले तथा प्रखर सूर्यके समान तेजस्वी वालखिल्यादि साठ हजार ऊर्ध्वरेता मुनियोंको जन्म दिया॥ ११॥ वसिष्ठकी ऊर्जा नामक स्त्रीसे रज, गोत्र, ऊर्ध्वबाहु, सवन, अनघ, सुतपा और शुक्र ये सात पुत्र उत्पन्न हुए। ये निर्मल स्वभाववाले समस्त मुनिगण [तीसरे मन्वन्तरमें] सप्तर्षि हुए॥ १२-१३॥<br>हे द्विज! अग्निका अभिमानी देव, जो ब्रह्माजीका ज्येष्ठ पुत्र है, उसके द्वारा स्वाहा नामक पत्नीसे अति तेजस्वी पावक, पवमान और जलको भक्षण करनेवाला शुचि—ये तीन पुत्र हुए॥ १४-१५॥ इन तीनोंके [प्रत्येकके पन्द्रह-पन्द्रह पुत्रके क्रमसे] पैंतालीस सन्तानें हुईं। पिता अग्नि और उसके तीन पुत्रोंको मिलाकर ये सब अग्नि ही कहलाते हैं। इस प्रकार कुल उनचास (४९) अग्नि कहे गये हैं॥ १६-१७॥ हे द्विज! ब्रह्माजीद्वारा रचे गये जिन अनग्निक अग्निष्वात्ता और साग्निक बर्हिषद् आदि पितरोंके विषयमें तुमसे कहा था। उनके द्वारा स्वधाने मेना और धारिणी नामक दो कन्याएँ उत्पन्न कीं। वे दोनों ही उत्तम ज्ञानसे सम्पन्न और सभी गुणोंसे युक्त ब्रह्मवादिनी तथा योगिनी थीं॥ १८-२०॥<br>इस प्रकार यह दक्षकन्याओंकी वंशपरम्पराका वर्णन किया। जो कोई श्रद्धापूर्वक इसका स्मरण करता है वह निःसन्तान नहीं रहता॥ २१॥

इति श्रीविष्णुपुराणे प्रथमेंऽशे दशमोऽध्यायः॥ १०॥


ग्यारहवाँ अध्याय

ध्रुवका वनगमन और मरीचि आदि ऋषियोंसे भेंट

श्रीपराशर उवाचश्रीपराशरजी बोले—
प्रियव्रतोत्तानपादौ मनोः स्वायंभुवस्य तु।<br>द्वौ पुत्रौ तु महावीर्यौ धर्मज्ञौ कथितौ तव॥ १<br>तयोरुत्तानपादस्य सुरुच्यामुत्तमः सुतः।<br>अभीष्टायामभूद्ब्रह्मन्पितुरत्यन्तवल्लभः॥ २<br>सुनीतिर्नाम या राज्ञस्तस्यासीन्महिषी द्विज।<br>स नातिप्रीतिमांस्तस्यामभूद्यस्या ध्रुवः सुतः॥ ३हे मैत्रेय! मैंने तुम्हें स्वायम्भुवमनुके प्रियव्रत एवं उत्तानपाद नामक दो महाबलवान् और धर्मज्ञ पुत्र बतलाये थे॥ १॥ हे ब्रह्मन्! उनमेंसे उत्तानपादकी प्रेयसी पत्नी सुरुचिसे पिताका अत्यन्त लाडला उत्तम नामक पुत्र हुआ॥ २॥ हे द्विज! उस राजाकी जो सुनीति नामक राजमहिषी थी उसमें उसका विशेष प्रेम न था। उसका पुत्र ध्रुव हुआ॥ ३॥