विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
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अ० ११ ] * प्रथम अंश * ४७
| राजासनस्थितस्याङ्कं पितुर्भ्रातरमाश्रितम्।<br>दृष्ट्वोत्तमं ध्रुवश्चक्रे तमारोढुं मनोरथम्॥ ४<br>प्रत्यक्षं भूपतिस्तस्याः सुरुच्या नाभ्यनन्दत।<br>प्रणयेनागतं पुत्रमुत्सङ्गारोहणोत्सुकम्॥ ५<br>सपत्नीतनयं दृष्ट्वा तमङ्कारोहणोत्सुकम्।<br>स्वपुत्रं च तथारूढं सुरुचिर्वाक्यमब्रवीत्॥ ६<br>क्रियते किं वृथा वत्स महानेष मनोरथः।<br>अन्यस्त्रीगर्भजातेन ह्यसम्भ्रूय ममोदरे॥ ७<br>उत्तमोत्तममप्राप्यमविवेको हि वाञ्छसि।<br>सत्यं सुतस्त्वमप्यस्य किन्तु न स्वं मया धृतः॥ ८<br>एतद्राजासनं सर्वभूतृत्संश्रयकेतनम्।<br>योग्यं ममैव पुत्रस्य किमात्मा क्लिश्यते त्वया॥ ९<br>उच्चैर्मनोरथस्तेऽयं मत्पुत्रस्येव किं वृथा।<br>सुनीत्यामात्मनो जन्म किं त्वया नावगम्यते॥ १०<br>श्रीपराशर उवाच<br>उत्सृज्य पितरं बालस्तच्छ्रुत्वा मातृभाषितम्।<br>जगाम कुपितो मातुर्निजाया द्विज मन्दिरम्॥ ११<br>तं दृष्ट्वा कुपितं पुत्रमीषत्प्रस्फुरिताधरम्।<br>सुनीतिरङ्कमारोप्य मैत्रेयेदमभाषत॥ १२<br>वत्स कः कोपहेतुस्ते कश्च त्वां नाभिनन्दति।<br>कोऽवजानाति पितरं वत्स यस्तेऽपराध्यति॥ १३<br>श्रीपराशर उवाच<br>इत्युक्तः सकलं मात्रे कथयामास तद्यथा।<br>सुरुचिः प्राह भूपालप्रत्यक्षमतिगर्विता॥ १४<br>विनिःश्वस्येति कथिते तस्मिन्युत्रेण दुर्मनाः।<br>श्वासक्षामेक्षणा दीना सुनीतिर्वाक्यमब्रवीत्॥ १५<br>सुनीतिरुवाच<br>सुरुचिः सत्यमाहेदं मन्दभाग्योऽसि पुत्रक।<br>न हि पुण्यवतां वत्स सपत्नैरेवमुच्यते॥ १६<br>नोद्वेगस्तात कर्त्तव्यः कृतं यद्भवता पुरा।<br>तत्कोऽपहर्तुं शक्नोति दातुं कश्चाकृतं त्वया॥ १७<br>तत्त्वया नात्र कर्त्तव्यं दुःखं तद्वाक्यसम्भवम्॥ १८ | एक दिन राजसिंहासनपर बैठे हुए पिताकी गोदमें अपने भाई उत्तमको बैठा देख ध्रुवकी इच्छा भी गोदमें बैठनेकी हुई॥ ४॥ किन्तु राजाने अपनी प्रेयसी सुरुचिके सामने, गोदमें चढ़नेके लिये उत्कण्ठित होकर प्रेमवश आये हुए उस पुत्रका आदर नहीं किया॥ ५॥ अपनी सौतके पुत्रको गोदमें चढ़नेके लिये उत्सुक और अपने पुत्रको गोदमें बैठा देख सुरुचि इस प्रकार कहने लगी॥ ६॥ "अरे लल्ला! बिना मेरे पेटसे उत्पन्न हुए किसी अन्य स्त्रीका पुत्र होकर भी तू व्यर्थ क्यों ऐसा बड़ा मनोरथ करता है?॥ ७॥ तू अविवेकी है, इसीलिये ऐसी अलभ्य उत्तमोत्तम वस्तुकी इच्छा करता है। यह ठीक है कि तू भी इन्हीं राजाका पुत्र है, तथापि मैंने तो तुझे अपने गर्भमें धारण नहीं किया!॥ ८॥ समस्त चक्रवर्ती राजाओंका आश्रयरूप यह राजसिंहासन तो मेरे ही पुत्रके योग्य है; तू व्यर्थ क्यों अपने चित्तको सन्ताप देता है?॥ ९॥ मेरे पुत्रके समान तुझे वृथा ही यह ऊँचा मनोरथ क्यों होता है? क्या तू नहीं जानता कि तेरा जन्म सुनीतिसे हुआ है?"॥ १०॥<br>श्रीपराशरजी बोले—हे द्विज! विमाताका ऐसा कथन सुन वह बालक कुपित हो पिताको छोड़कर अपनी माताके महलको चल दिया॥ ११॥ हे मैत्रेय! जिसके ओष्ठ कुछ-कुछ काँप रहे थे—ऐसे अपने पुत्रको क्रोधयुक्त देख सुनीतिने उसे गोदमें बिठाकर पूछा—॥ १२॥ "बेटा! तेरे क्रोधका क्या कारण है? तेरा किसने आदर नहीं किया? तेरा अपराध करके कौन तेरे पिताजीका अपमान करने चला है?"॥ १३॥<br>श्रीपराशरजी बोले—ऐसा पूछनेपर ध्रुवने अपनी मातासे वे सब बातें कह दीं जो अति गर्वीली सुरुचिने उससे पिताके सामने कही थीं॥ १४॥ अपने पुत्रके सिसक-सिसककर ऐसा कहनेपर दुःखिनी सुनीतिने खिन्नचित्त और दीर्घ निःश्वासके कारण मलिननयना होकर कहा॥ १५॥<br>सुनीति बोली—बेटा! सुरुचिने ठीक ही कहा है, अवश्य ही तू मन्दभाग्य है। हे वत्स! पुण्यवानोंसे उनके विपक्षी ऐसा नहीं कह सकते॥ १६॥ बच्चा! तू व्याकुल मत हो, क्योंकि तूने पूर्व-जन्मोंमें जो कुछ किया है उसे दूर कौन कर सकता है? और जो नहीं किया वह तुझे दे भी कौन सकता है? इसलिये तुझे उसके वाक्योंसे खेद नहीं करना चाहिये॥ १७-१८॥ |