विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 60, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० ११ ] * प्रथम अंश * ४९
ऋषय ऊचुः चतुःपञ्चाब्दसम्भूतो बालस्त्वं नृपनन्दन। निर्वेदकारणं किञ्चित्तव नाद्यापि वर्तते॥ ३४ न चिन्त्यं भवतः किञ्चिद्दृश्यते भूपतिः पिता। न चैवेष्टवियोगादि तव पश्याम बालक॥ ३५ शरीरे न च ते व्याधिरस्माभिरुपलक्ष्यते। निर्वेदः किंनिमित्तस्ते कथ्यतां यदि विद्यते॥ ३६
श्रीपराशर उवाच ततः स कथयामास सुरुच्या यदुदाहृतम्। तन्निशम्य ततः प्रोचुर्मुनयस्ते परस्परम्॥ ३७ अहो क्षात्रं परं तेजो बालस्यापि यदक्षमा। सपत्न्या मातुरुक्तं यद् हृदयान्नापसर्पति॥ ३८ भो भो क्षत्रियदायाद निर्वेदाद्यात्त्वयाधुना। कर्तुं व्यवसितं तन्नः कथ्यतां यदि रोचते॥ ३९ यच्च कार्यं तवास्माभिः साहाय्यममितद्युते। तदुच्यतां विवक्षुस्त्वमस्माभिरुपलक्ष्यसे॥ ४०
ध्रुव उवाच नाहमर्थमभीप्सामि न राज्यं द्विजसत्तमाः। तत्स्थानमेकमिच्छामि भुक्तं नान्येन यत्पुरा॥ ४१ एतन्मे क्रियतां सम्यक् कथ्यतां प्राप्यते यथा। स्थानमग्र्यं समस्तेभ्यः स्थानेभ्यो मुनिसत्तमाः॥ ४२
मरीचिरुवाच अनाराधितगोविन्दैर्नैरैः स्थानं नृपात्मज। न हि सम्प्राप्यते श्रेष्ठं तस्मादाराधयाच्युतम्॥ ४३
अत्रिरुवाच परः पराणां पुरुषो यस्य तुष्टो जनार्दनः। स प्राप्नोत्यक्षयं स्थानमेतत्सत्यं मयोदितम्॥ ४४
अङ्गिरा उवाच यस्यान्तः सर्वमेवेदमच्युतस्याव्ययात्मनः। तमाराधय गोविन्दं स्थानमग्र्यं यदीच्छसि॥ ४५
पुलस्त्य उवाच परं ब्रह्म परं धाम योऽसौ ब्रह्म तथा परम्। तमाराध्य हरिं याति मुक्तिमप्यतिदुर्लभाम्॥ ४६
उत्पन्न हुआ राजा उत्तानपादका पुत्र जानें। मैं आत्म-ग्लानिके कारण आपके निकट आया हूँ॥ ३३॥
ऋषि बोले- राजकुमार! अभी तो तू चार-पाँच वर्षका ही बालक है। अभी तेरे निर्वेदका कोई कारण नहीं दिखायी पड़ता॥ ३४॥ तुझे कोई चिन्ताका विषय भी नहीं है, क्योंकि अभी तेरा पिता राजा जीवित है और हे बालक! तेरी कोई इष्ट वस्तु खो गयी हो ऐसा भी हमें दिखायी नहीं देता॥ ३५॥ तथा हमें तेरे शरीरमें भी कोई व्याधि नहीं दीख पड़ती फिर बता, तेरी ग्लानिका क्या कारण है?॥ ३६॥
श्रीपराशरजी बोले- तब सुरुचिने उससे जो कुछ कहा था वह सब उसने कह सुनाया। उसे सुनकर वे ऋषिगण आपसमें इस प्रकार कहने लगे॥ ३७॥ 'अहो! क्षात्रतेज कैसा प्रबल है, जिससे बालकमें भी इतनी अक्षमा है कि अपनी विमाताका कथन उसके हृदयसे नहीं टलता'॥ ३८॥ हे क्षत्रियकुमार! इस निर्वेदके कारण तूने जो कुछ करनेका निश्चय किया है, यदि तुझे रुचे तो, वह हमलोगोंसे कह दे॥ ३९॥ और हे अतुलित तेजस्वी! यह भी बता कि हम तेरी क्या सहायता करें, क्योंकि हमें ऐसा प्रतीत होता है कि तू कुछ कहना चाहता है॥ ४०॥
ध्रुवने कहा- हे द्विजश्रेष्ठ! मुझे न तो धनकी इच्छा है और न राज्यकी; मैं तो केवल एक उसी स्थानको चाहता हूँ जिसको पहले कभी किसीने न भोगा हो॥ ४१॥ हे मुनिश्रेष्ठ! आपकी यही सहायता होगी कि आप मुझे भली प्रकार यह बता दें कि क्या करनेसे वह सबसे अग्रगण्य स्थान प्राप्त हो सकता है॥ ४२॥
मरीचि बोले- हे राजपुत्र! बिना गोविन्दकी आराधना किये मनुष्यको वह श्रेष्ठ स्थान नहीं मिल सकता; अतः तू श्रीअच्युतकी आराधना कर॥ ४३॥
अत्रि बोले- जो परा प्रकृति आदिसे भी परे हैं वे परमपुरुष जनार्दन जिससे सन्तुष्ट होते हैं उसीको वह अक्षयपद मिलता है यह मैं सत्य-सत्य कहता हूँ॥ ४४॥
अंगिरा बोले- यदि तू अग्रस्थानका इच्छुक है तो जिन अव्ययात्मा अच्युतमें यह सम्पूर्ण जगत् ओतप्रोत है, उन गोविन्दकी ही आराधना कर॥ ४५॥
पुलस्त्य बोले- जो परब्रह्म, परमधाम और परस्वरूप हैं, उन हरिकी आराधना करनेसे मनुष्य अति दुर्लभ मोक्षपदको भी प्राप्त कर लेता है॥ ४६॥