विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
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५० * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ११
| पुलह उवाच<br>ऐन्द्रमिन्द्रः परं स्थानं यमाराध्य जगत्पतिम्।<br>प्राप यज्ञपतिं विष्णुं तमाराधय सुव्रत॥ ४७ | **पुलह बोले—**हे सुव्रत! जिन जगत्पतिकी आराधनासे इन्द्रने अत्युत्तम इन्द्रपद प्राप्त किया है, तू उन यज्ञपति भगवान् विष्णुकी आराधना कर॥ ४७॥ |
| क्रतुरुवाच<br>यो यज्ञपुरुषो यज्ञो योगेशः परमः पुमान्।<br>तस्मिंस्तुष्टे यदप्राप्यं किं तदस्ति जनार्दने ॥ ४८ | **क्रतु बोले—**जो परमपुरुष यज्ञपुरुष, यज्ञ और योगेश्वर हैं, उन जनार्दनके सन्तुष्ट होनेपर कौन-सी वस्तु दुर्लभ रह सकती है?॥४८॥ |
| वसिष्ठ उवाच<br>प्राप्नोष्याराधिते विष्णौ मनसा यद्यदिच्छसि।<br>त्रैलोक्यान्तर्गतं स्थानं किमु वत्सोत्तमोत्तमम्॥ ४९ | **वसिष्ठ बोले—**हे वत्स! विष्णुभगवान्की आराधना करनेपर तू अपने मनसे जो कुछ चाहेगा वही प्राप्त कर लेगा, फिर त्रिलोकीके उत्तमोत्तम स्थानकी तो बात ही क्या है?॥ ४९॥ |
| ध्रुव उवाच<br>आराध्यः कथितो देवो भवद्भिः प्रणतस्य मे।<br>मया तत्परितोषाय यज्जप्तव्यं तदुच्यताम्॥ ५०<br>यथा चाराधनं तस्य मया कार्यं महात्मनः।<br>प्रसादसुमुखास्तन्मे कथयन्तु महर्षयः॥ ५१ | **ध्रुवने कहा—**हे महर्षिगण! मुझ विनीतको आपने आराध्यदेव तो बता दिया। अब उसको प्रसन्न करनेके लिये मुझे क्या जपना चाहिये—यह बताइये। उस महापुरुषकी मुझे जिस प्रकार आराधना करनी चाहिये, वह आपलोग मुझसे प्रसन्नतापूर्वक कहिये॥ ५०-५१॥ |
| ऋषय ऊचुः<br>राजपुत्र यथा विष्णोराराधनपरैर्नरैः।<br>कार्यमाराधनं तन्नो यथावच्छ्रोतुमर्हसि॥ ५२<br>बाह्यार्थादखिलाच्चित्तं त्याजयेत्प्रथमं नरः।<br>तस्मिन्नेव जगद्धाम्नि ततः कुर्वीत निश्चलम्॥ ५३<br>एवमेकाग्रचित्तेन तन्मयेन धृतात्मना।<br>जप्तव्यं यन्निबोधैतत्तन्नः पार्थिवनन्दनः॥ ५४<br>हिरण्यगर्भपुरुषप्रधानाव्यक्तरूपिणे।<br>ॐ नमो वासुदेवाय शुद्धज्ञानस्वरूपिणे॥ ५५<br>एतज्जजाप भगवान् जप्यं स्वायम्भुवो मनुः।<br>पितामहस्तव पुरा तस्य तुष्टो जनार्दनः॥ ५६<br>ददौ यथाभिलषितां सिद्धिं त्रैलोक्यदुर्लभाम्।<br>तथा त्वमपि गोविन्दं तोषयैतत्स्सदा जपन्॥ ५७ | **ऋषिगण बोले—**हे राजकुमार! विष्णुभगवान्की आराधनामें तत्पर पुरुषोंको जिस प्रकार उनकी उपासना करनी चाहिये वह तू हमसे यथावत् श्रवण कर ॥५२॥ मनुष्यको चाहिये कि पहले सम्पूर्ण बाह्य विषयोंसे चित्तको हटावे और उसे एकमात्र उन जगदाधारमें ही स्थिर कर दे॥ ५३॥ हे राजकुमार! इस प्रकार एकाग्रचित्त होकर तन्मयभावसे जो कुछ जपना चाहिये, वह सुन—॥५४॥ 'ॐ हिरण्यगर्भ, पुरुष, प्रधान और अव्यक्तरूप शुद्ध ज्ञानस्वरूप वासुदेवको नमस्कार है'॥ ५५॥ इस (ॐ नमो भगवते वासुदेवाय) मन्त्रको पूर्वकालमें तेरे पितामह भगवान् स्वायम्भुव मनुने जपा था। तब उनसे सन्तुष्ट होकर श्रीजनार्दनने उन्हें त्रिलोकीमें दुर्लभ मनोवांछित सिद्धि दी थी। उसी प्रकार तू भी इसका निरन्तर जप करता हुआ श्रीगोविन्दको प्रसन्न कर॥ ५६-५७॥ |
इति श्रीविष्णुपुराणे प्रथमंशे एकादशोऽध्यायः ॥ ११॥