विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 55, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४४ | * श्रीविष्णुपुराण * | [ अ० ९ |
|---|
श्रीरुवाच परितुष्टास्मि देवेश स्तोत्रेणानेन ते हरे । वरं वृणीष्व यस्त्विष्टो वरदाहं तवागता ॥ १३५
इन्द्र उवाच वरदा यदि मे देवि वराहो यदि वाप्यहम् । त्रैलोक्यं न त्वया त्याज्यमेष मेऽस्तु वरः परः ॥ १३६
स्तोत्रेण यस्तथैतेन त्वां स्तोष्यत्यब्धिसम्भवे । स त्वया न परित्याज्यो द्वितीयोऽस्तु वरो मम ॥ १३७
श्रीरुवाच त्रैलोक्यं त्रिदशश्रेष्ठ न सन्त्यक्ष्यामि वासव । दत्तो वरो मया यस्ते स्तोत्राराधनतुष्टया ॥ १३८
यश्च सायं तथा प्रातः स्तोत्रेणानेन मानवः । मां स्तोष्यति न तस्याहं भविष्यामि पराङ्मुखी ॥ १३९
श्रीपराशर उवाच एवं ददौ वरं देवी देवराजाय वै पुरा । मैत्रेय श्रीमर्हाभागा स्तोत्राराधनतोषिता ॥ १४०
भृगोः ख्यातयां समुत्पन्ना श्रीः पूर्वमुदधेः पुनः । देवदानवयत्नेन प्रसूताऽमृतमन्थने ॥ १४१
एवं यदा जगत्स्वामी देवदेवो जनार्दनः । अवतारं करोत्येषा तदा श्रीस्तत्सहायिनी ॥ १४२
पुनश्च पद्मादुत्पन्ना आदित्योऽभूद्यदा हरिः । यदा तु भार्गवो रामस्तदाभूद्धरणी त्वियम् ॥ १४३
राघवत्वेऽभवत्सीता रुक्मिणी कृष्णजन्मनि । अन्येषु चावतारेषु विष्णोरेषानपायिनी ॥ १४४
देवत्वे देवदेहेयं मनुष्यत्वे च मानुषी । विष्णोर्देहानुरूपां वै करोत्येषात्मनस्तनुम् ॥ १४५
यश्चैतच्छृणुयाज्जन्म लक्ष्म्या यश्च पठेन्नरः । श्रियो न विच्युतिस्तस्य गृहे यावत्कुलत्रयम् ॥ १४६
पठ्यते येषु चैवेयं गृहेषु श्रीस्तुतिर्मुने । अलक्ष्मीः कलहाधारा न तेष्वास्ते कदाचन ॥ १४७
एतत्ते कथितं ब्रह्मन् यन्मां त्वं परिपृच्छसि । क्षीराब्धौ श्रीर्यथा जाता पूर्वं भृगुसुता सती ॥ १४८
श्रीलक्ष्मीजी बोलीं— हे देवेश्वर इन्द्र! मैं तेरे इस स्तोत्रसे अति प्रसन्न हूँ; तुझको जो अभीष्ट हो वही वर माँग ले। मैं तुझे वर देनेके लिये ही यहाँ आयी हूँ ॥ १३५ ॥
इन्द्र बोले— हे देवि! यदि आप वर देना चाहती हैं और मैं भी यदि वर पानेयोग्य हूँ तो मुझको पहला वर तो यही दीजिये कि आप इस त्रिलोकीका कभी त्याग न करें ॥ १३६ ॥ और हे समुद्रसम्भवे! दूसरा वर मुझे यह दीजिये कि जो कोई आपकी इस स्तोत्रसे स्तुति करे उसे आप कभी न त्यागें ॥ १३७ ॥
श्रीलक्ष्मीजी बोलीं— हे देवश्रेष्ठ इन्द्र! मैं अब इस त्रिलोकीको कभी न छोड़ूँगी। तेरे स्तोत्रसे प्रसन्न होकर मैं तुझे यह वर देती हूँ ॥ १३८ ॥ तथा जो कोई मनुष्य प्रातःकाल और सायंकालके समय इस स्तोत्रसे मेरी स्तुति करेगा उससे भी मैं कभी विमुख न होऊँगी ॥ १३९ ॥
श्रीपराशरजी बोले— हे मैत्रेय! इस प्रकार पूर्वकालमें महाभागा श्रीलक्ष्मीजीने देवराजकी स्तोत्ररूप आराधनासे सन्तुष्ट होकर उन्हें ये वर दिये ॥ १४० ॥ लक्ष्मीजी पहले भृगुजीके द्वारा ख्याति नामक स्त्रीसे उत्पन्न हुई थीं, फिर अमृत-मन्थनके समय देव और दानवोंके प्रयत्नसे वे समुद्रसे प्रकट हुईं ॥ १४१ ॥ इस प्रकार संसारके स्वामी देवाधिदेव श्रीविष्णुभगवान् जब-जब अवतार धारण करते हैं तभी लक्ष्मीजी उनके साथ रहती हैं ॥ १४२ ॥ जब श्रीहरि आदित्यरूप हुए तो वे पद्मासे फिर उत्पन्न हुईं [ और पद्मा कहलायीं ]। तथा जब वे परशुराम हुए तो ये पृथिवी हुईं ॥ १४३ ॥ श्रीहरिके राम होनेपर ये सीताजी हुईं और कृष्णावतारमें श्रीरुक्मिणीजी हुईं। इसी प्रकार अन्य अवतारोंमें भी ये भगवान्से कभी पृथक् नहीं होतीं ॥ १४४ ॥ भगवान्के देवरूप होनेपर ये दिव्य शरीर धारण करती हैं और मनुष्य होनेपर मानवीरूपसे प्रकट होती हैं। विष्णुभगवान्के शरीरके अनुरूप ही ये अपना शरीर भी बना लेती हैं ॥ १४५ ॥ जो मनुष्य लक्ष्मीजीके जन्मकी इस कथाको सुनेगा अथवा पढ़ेगा उसके घरमें (वर्तमान आगामी और भूत) तीनों कुलोंके रहते हुए कभी लक्ष्मीका नाश न होगा ॥ १४६ ॥ हे मुने! जिन घरोंमें लक्ष्मीजीके इस स्तोत्रका पाठ होता है उनमें कलहकी आधारभूता दरिद्रता कभी नहीं ठहर सकती ॥ १४७ ॥ हे ब्रह्मन्! तुमने जो मुझसे पूछा था कि पहले भृगुजीकी पुत्री होकर फिर लक्ष्मीजी क्षीर-समुद्रसे कैसे उत्पन्न हुईं सो मैंने तुमसे यह सब वृत्तान्त कह दिया ॥ १४८ ॥