विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
| ४४ | * श्रीविष्णुपुराण * | [ अ० ९ |
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श्रीरुवाच परितुष्टास्मि देवेश स्तोत्रेणानेन ते हरे । वरं वृणीष्व यस्त्विष्टो वरदाहं तवागता ॥ १३५
इन्द्र उवाच वरदा यदि मे देवि वराहो यदि वाप्यहम् । त्रैलोक्यं न त्वया त्याज्यमेष मेऽस्तु वरः परः ॥ १३६
स्तोत्रेण यस्तथैतेन त्वां स्तोष्यत्यब्धिसम्भवे । स त्वया न परित्याज्यो द्वितीयोऽस्तु वरो मम ॥ १३७
श्रीरुवाच त्रैलोक्यं त्रिदशश्रेष्ठ न सन्त्यक्ष्यामि वासव । दत्तो वरो मया यस्ते स्तोत्राराधनतुष्टया ॥ १३८
यश्च सायं तथा प्रातः स्तोत्रेणानेन मानवः । मां स्तोष्यति न तस्याहं भविष्यामि पराङ्मुखी ॥ १३९
श्रीपराशर उवाच एवं ददौ वरं देवी देवराजाय वै पुरा । मैत्रेय श्रीमर्हाभागा स्तोत्राराधनतोषिता ॥ १४०
भृगोः ख्यातयां समुत्पन्ना श्रीः पूर्वमुदधेः पुनः । देवदानवयत्नेन प्रसूताऽमृतमन्थने ॥ १४१
एवं यदा जगत्स्वामी देवदेवो जनार्दनः । अवतारं करोत्येषा तदा श्रीस्तत्सहायिनी ॥ १४२
पुनश्च पद्मादुत्पन्ना आदित्योऽभूद्यदा हरिः । यदा तु भार्गवो रामस्तदाभूद्धरणी त्वियम् ॥ १४३
राघवत्वेऽभवत्सीता रुक्मिणी कृष्णजन्मनि । अन्येषु चावतारेषु विष्णोरेषानपायिनी ॥ १४४
देवत्वे देवदेहेयं मनुष्यत्वे च मानुषी । विष्णोर्देहानुरूपां वै करोत्येषात्मनस्तनुम् ॥ १४५
यश्चैतच्छृणुयाज्जन्म लक्ष्म्या यश्च पठेन्नरः । श्रियो न विच्युतिस्तस्य गृहे यावत्कुलत्रयम् ॥ १४६
पठ्यते येषु चैवेयं गृहेषु श्रीस्तुतिर्मुने । अलक्ष्मीः कलहाधारा न तेष्वास्ते कदाचन ॥ १४७
एतत्ते कथितं ब्रह्मन् यन्मां त्वं परिपृच्छसि । क्षीराब्धौ श्रीर्यथा जाता पूर्वं भृगुसुता सती ॥ १४८
श्रीलक्ष्मीजी बोलीं— हे देवेश्वर इन्द्र! मैं तेरे इस स्तोत्रसे अति प्रसन्न हूँ; तुझको जो अभीष्ट हो वही वर माँग ले। मैं तुझे वर देनेके लिये ही यहाँ आयी हूँ ॥ १३५ ॥
इन्द्र बोले— हे देवि! यदि आप वर देना चाहती हैं और मैं भी यदि वर पानेयोग्य हूँ तो मुझको पहला वर तो यही दीजिये कि आप इस त्रिलोकीका कभी त्याग न करें ॥ १३६ ॥ और हे समुद्रसम्भवे! दूसरा वर मुझे यह दीजिये कि जो कोई आपकी इस स्तोत्रसे स्तुति करे उसे आप कभी न त्यागें ॥ १३७ ॥
श्रीलक्ष्मीजी बोलीं— हे देवश्रेष्ठ इन्द्र! मैं अब इस त्रिलोकीको कभी न छोड़ूँगी। तेरे स्तोत्रसे प्रसन्न होकर मैं तुझे यह वर देती हूँ ॥ १३८ ॥ तथा जो कोई मनुष्य प्रातःकाल और सायंकालके समय इस स्तोत्रसे मेरी स्तुति करेगा उससे भी मैं कभी विमुख न होऊँगी ॥ १३९ ॥
श्रीपराशरजी बोले— हे मैत्रेय! इस प्रकार पूर्वकालमें महाभागा श्रीलक्ष्मीजीने देवराजकी स्तोत्ररूप आराधनासे सन्तुष्ट होकर उन्हें ये वर दिये ॥ १४० ॥ लक्ष्मीजी पहले भृगुजीके द्वारा ख्याति नामक स्त्रीसे उत्पन्न हुई थीं, फिर अमृत-मन्थनके समय देव और दानवोंके प्रयत्नसे वे समुद्रसे प्रकट हुईं ॥ १४१ ॥ इस प्रकार संसारके स्वामी देवाधिदेव श्रीविष्णुभगवान् जब-जब अवतार धारण करते हैं तभी लक्ष्मीजी उनके साथ रहती हैं ॥ १४२ ॥ जब श्रीहरि आदित्यरूप हुए तो वे पद्मासे फिर उत्पन्न हुईं [ और पद्मा कहलायीं ]। तथा जब वे परशुराम हुए तो ये पृथिवी हुईं ॥ १४३ ॥ श्रीहरिके राम होनेपर ये सीताजी हुईं और कृष्णावतारमें श्रीरुक्मिणीजी हुईं। इसी प्रकार अन्य अवतारोंमें भी ये भगवान्से कभी पृथक् नहीं होतीं ॥ १४४ ॥ भगवान्के देवरूप होनेपर ये दिव्य शरीर धारण करती हैं और मनुष्य होनेपर मानवीरूपसे प्रकट होती हैं। विष्णुभगवान्के शरीरके अनुरूप ही ये अपना शरीर भी बना लेती हैं ॥ १४५ ॥ जो मनुष्य लक्ष्मीजीके जन्मकी इस कथाको सुनेगा अथवा पढ़ेगा उसके घरमें (वर्तमान आगामी और भूत) तीनों कुलोंके रहते हुए कभी लक्ष्मीका नाश न होगा ॥ १४६ ॥ हे मुने! जिन घरोंमें लक्ष्मीजीके इस स्तोत्रका पाठ होता है उनमें कलहकी आधारभूता दरिद्रता कभी नहीं ठहर सकती ॥ १४७ ॥ हे ब्रह्मन्! तुमने जो मुझसे पूछा था कि पहले भृगुजीकी पुत्री होकर फिर लक्ष्मीजी क्षीर-समुद्रसे कैसे उत्पन्न हुईं सो मैंने तुमसे यह सब वृत्तान्त कह दिया ॥ १४८ ॥
अ० १० ] * प्रथम अंश * ४५
इति सकलविभूत्यवाप्तिहेतुः
स्तुतिरियमिन्द्रमुखोद्गता हि लक्ष्म्याः।
अनुदिनमिह पठ्यते नृभिर्यै-
र्वसति न तेषु कदाचिदप्यलक्ष्मीः ॥ १४९ ॥
इस प्रकार इन्द्रके मुखसे प्रकट हुई यह लक्ष्मीजीकी स्तुति सकल विभूतियोंकी प्राप्तिका कारण है। जो लोग इसका नित्यप्रति पाठ करेंगे उनके घरमें निर्धनता कभी नहीं रह सकेगी ॥ १४९ ॥
इति श्रीविष्णुपुराणे प्रथमेऽशे नवमोऽध्यायः॥ ९॥
दसवाँ अध्याय
भृगु, अग्नि और अग्निष्वात्तादि पितरोंकी सन्तानका वर्णन
श्रीमैत्रेय उवाच
कथितं मे त्वया सर्वं यत्पृष्टोऽसि मया मुने।
भृगुसर्गात्प्रभृत्येष सर्गो मे कथ्यतां पुनः॥ १
**श्रीमैत्रेयजी बोले—**हे मुने! मैंने आपसे जो कुछ पूछा था वह सब आपने वर्णन किया; अब भृगुजीकी सन्तानसे लेकर सम्पूर्ण सृष्टिका आप मुझसे फिर वर्णन कीजिये॥ १॥
श्रीपराशर उवाच
भृगोः ख्यात्यां समुत्पन्ना लक्ष्मीर्विष्णुपरिग्रहः।
तथा धातृविधातारौ ख्यात्यां जातौ सुतौ भृगोः॥ २
आयतिर्नियतिश्चैव मेरोः कन्ये महात्मनः।
भार्ये धातृविधात्रोस्ते तयोर्जातौ सुतावुभौ॥ ३
प्राणश्चैव मृकण्डुश्च मार्कण्डेयो मृकण्डुतः।
ततो वेदशिरा जज्ञे प्राणस्यापि सुतं शृणु॥ ४
प्राणस्य द्युतिमान्पुत्रो राजवांश्च ततोऽभवत्।
ततो वंशो महाभाग विस्तरं भार्गवो गतः॥ ५
**श्रीपराशरजी बोले—**भृगुजीके द्वारा ख्यातिसे विष्णुपत्नी लक्ष्मीजी और धाता, विधाता नामक दो पुत्र उत्पन्न हुए॥ २॥ महात्मा मेरुकी आयति और नियति-नाम्नी कन्याएँ धाता और विधाताकी स्त्रियाँ थीं; उनसे उनके प्राण और मृकण्डु नामक दो पुत्र हुए। मृकण्डुसे मार्कण्डेय और उनसे वेदशिराका जन्म हुआ। अब प्राणकी सन्तानका वर्णन सुनो॥ ३-४॥ प्राणका पुत्र द्युतिमान् और उसका पुत्र राजवान् हुआ। हे महाभाग! उस राजवान्से फिर भृगुवंशका बड़ा विस्तार हुआ॥ ५॥
पत्नी मरीचेः सम्भूतिः पौर्णमासमसूत।
विरजाः पर्वतश्चैव तस्य पुत्रौ महात्मनः॥ ६
वंशसंकीर्तने पुत्रान्वदिष्येऽहं ततो द्विज।
मरीचिकी पत्नी सम्भूतिने पौर्णमासको उत्पन्न किया। उस महात्माके विरजा और पर्वत दो पुत्र थे॥ ६॥ हे द्विज! उनके वंशका वर्णन करते समय मैं उन दोनोंकी सन्तानका वर्णन करूँगा।
स्मृतिश्चाङ्गिरसः पत्नी प्रसूता कन्यकास्तथा।
सिनीवाली कुहूश्चैव राका चानुमतिस्तथा॥ ७
अंगिराकी पत्नी स्मृति थी, उसके सिनीवाली, कुहू, राका और अनुमति नामकी कन्याएँ हुईं॥ ७॥
अनसूया तथैवात्रेर्जज्ञे निष्कल्मषान्सुतान्।
सोमं दुर्वाससं चैव दत्तात्रेयं च योगिनम्॥ ८
अत्रिकी भार्या अनसूयाने चन्द्रमा, दुर्वासा और योगी दत्तात्रेय—इन निष्पाप पुत्रोंको जन्म दिया॥ ८॥
प्रीत्यां पुलस्त्यभार्यायां दत्तोळिस्तत्सुतोऽभवत्।
पूर्वजन्मनि योऽगस्त्यः स्मृतः स्वायम्भुवेऽन्तरे॥ ९
पुलस्त्यकी स्त्री प्रीतिसे दत्तोळिका जन्म हुआ जो अपने पूर्व जन्ममें स्वायम्भुव मन्वन्तरमें अगस्त्य कहा जाता था॥ ९॥
कर्दमश्चोर्वरीयांश्च सहिष्णुश्च सुतास्त्रयः।
क्षमा तु सुषुवे भार्या पुलहस्य प्रजापतेः॥ १०
प्रजापति पुलहकी पत्नी क्षमासे कर्दम, उर्वरीयान् और सहिष्णु ये तीन पुत्र हुए॥ १०॥
४६ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ११
| क्रतोश्च सन्ततिर्भार्या वालखिल्यानसूत।<br>षष्टिपूत्रसहस्राणि मुनीनामूर्ध्वरेतसाम्।<br>अङ्गुष्ठपर्वमात्राणां ज्वलद्भास्करतेजसाम्॥ ११<br>ऊर्जायां तु वसिष्ठस्य सप्ताजायन्त वै सुताः॥ १२<br>रजो गोत्रोर्ध्वबाहुश्च सवनश्चानघस्तथा।<br>सुतपाः शुक्र इत्येते सर्वे सप्तर्षयोऽमलाः॥ १३<br>योऽसावग्न्यभिमानी स्याद् ब्रह्मणस्तनयोऽग्रजः।<br>तस्मात्स्वाहा सुताँल्लेभे त्रीनूदारौजसो द्विज॥ १४<br>पावकं पवमानं तु शुचिं चापि जलाशिनम्॥ १५<br>तेषां तु सन्ततावन्ये चत्वारिंशच्च पञ्च च।<br>कथ्यन्ते वह्नयश्चैते पितापुत्रत्रयं च यत्॥ १६<br>एवमेकोनपञ्चाशद्वह्नयः परिकीर्तिताः॥ १७<br>पितरो ब्रह्मणा सृष्टा व्याख्याता ये मया द्विज।<br>अग्निष्वात्ता बर्हिषदोऽनग्नयः साग्नयश्च ये॥ १८<br>तेभ्यः स्वधा सुते जज्ञे मेनां वै धारिणीं तथा।<br>ते उभे ब्रह्मवादिन्यौ योगिन्यावप्युभे द्विज॥ १९<br>उत्तमज्ञानसम्पन्ने सर्वैः समुदितैर्गुणैः॥ २०<br>इत्येषा दक्षकन्यानां कथितापत्यसन्ततिः।<br>श्रद्धावान्संस्मरन्नेतामनपत्यो न जायते॥ २१ | क्रतुकी सन्तति नामक भार्याने अँगूठेके पोरुओंके समान शरीरवाले तथा प्रखर सूर्यके समान तेजस्वी वालखिल्यादि साठ हजार ऊर्ध्वरेता मुनियोंको जन्म दिया॥ ११॥ वसिष्ठकी ऊर्जा नामक स्त्रीसे रज, गोत्र, ऊर्ध्वबाहु, सवन, अनघ, सुतपा और शुक्र ये सात पुत्र उत्पन्न हुए। ये निर्मल स्वभाववाले समस्त मुनिगण [तीसरे मन्वन्तरमें] सप्तर्षि हुए॥ १२-१३॥<br>हे द्विज! अग्निका अभिमानी देव, जो ब्रह्माजीका ज्येष्ठ पुत्र है, उसके द्वारा स्वाहा नामक पत्नीसे अति तेजस्वी पावक, पवमान और जलको भक्षण करनेवाला शुचि—ये तीन पुत्र हुए॥ १४-१५॥ इन तीनोंके [प्रत्येकके पन्द्रह-पन्द्रह पुत्रके क्रमसे] पैंतालीस सन्तानें हुईं। पिता अग्नि और उसके तीन पुत्रोंको मिलाकर ये सब अग्नि ही कहलाते हैं। इस प्रकार कुल उनचास (४९) अग्नि कहे गये हैं॥ १६-१७॥ हे द्विज! ब्रह्माजीद्वारा रचे गये जिन अनग्निक अग्निष्वात्ता और साग्निक बर्हिषद् आदि पितरोंके विषयमें तुमसे कहा था। उनके द्वारा स्वधाने मेना और धारिणी नामक दो कन्याएँ उत्पन्न कीं। वे दोनों ही उत्तम ज्ञानसे सम्पन्न और सभी गुणोंसे युक्त ब्रह्मवादिनी तथा योगिनी थीं॥ १८-२०॥<br>इस प्रकार यह दक्षकन्याओंकी वंशपरम्पराका वर्णन किया। जो कोई श्रद्धापूर्वक इसका स्मरण करता है वह निःसन्तान नहीं रहता॥ २१॥ |
इति श्रीविष्णुपुराणे प्रथमेंऽशे दशमोऽध्यायः॥ १०॥
ग्यारहवाँ अध्याय
ध्रुवका वनगमन और मरीचि आदि ऋषियोंसे भेंट
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले— |
|---|---|
| प्रियव्रतोत्तानपादौ मनोः स्वायंभुवस्य तु।<br>द्वौ पुत्रौ तु महावीर्यौ धर्मज्ञौ कथितौ तव॥ १<br>तयोरुत्तानपादस्य सुरुच्यामुत्तमः सुतः।<br>अभीष्टायामभूद्ब्रह्मन्पितुरत्यन्तवल्लभः॥ २<br>सुनीतिर्नाम या राज्ञस्तस्यासीन्महिषी द्विज।<br>स नातिप्रीतिमांस्तस्यामभूद्यस्या ध्रुवः सुतः॥ ३ | हे मैत्रेय! मैंने तुम्हें स्वायम्भुवमनुके प्रियव्रत एवं उत्तानपाद नामक दो महाबलवान् और धर्मज्ञ पुत्र बतलाये थे॥ १॥ हे ब्रह्मन्! उनमेंसे उत्तानपादकी प्रेयसी पत्नी सुरुचिसे पिताका अत्यन्त लाडला उत्तम नामक पुत्र हुआ॥ २॥ हे द्विज! उस राजाकी जो सुनीति नामक राजमहिषी थी उसमें उसका विशेष प्रेम न था। उसका पुत्र ध्रुव हुआ॥ ३॥ |
अ० ११ ] * प्रथम अंश * ४७
| राजासनस्थितस्याङ्कं पितुर्भ्रातरमाश्रितम्।<br>दृष्ट्वोत्तमं ध्रुवश्चक्रे तमारोढुं मनोरथम्॥ ४<br>प्रत्यक्षं भूपतिस्तस्याः सुरुच्या नाभ्यनन्दत।<br>प्रणयेनागतं पुत्रमुत्सङ्गारोहणोत्सुकम्॥ ५<br>सपत्नीतनयं दृष्ट्वा तमङ्कारोहणोत्सुकम्।<br>स्वपुत्रं च तथारूढं सुरुचिर्वाक्यमब्रवीत्॥ ६<br>क्रियते किं वृथा वत्स महानेष मनोरथः।<br>अन्यस्त्रीगर्भजातेन ह्यसम्भ्रूय ममोदरे॥ ७<br>उत्तमोत्तममप्राप्यमविवेको हि वाञ्छसि।<br>सत्यं सुतस्त्वमप्यस्य किन्तु न स्वं मया धृतः॥ ८<br>एतद्राजासनं सर्वभूतृत्संश्रयकेतनम्।<br>योग्यं ममैव पुत्रस्य किमात्मा क्लिश्यते त्वया॥ ९<br>उच्चैर्मनोरथस्तेऽयं मत्पुत्रस्येव किं वृथा।<br>सुनीत्यामात्मनो जन्म किं त्वया नावगम्यते॥ १०<br>श्रीपराशर उवाच<br>उत्सृज्य पितरं बालस्तच्छ्रुत्वा मातृभाषितम्।<br>जगाम कुपितो मातुर्निजाया द्विज मन्दिरम्॥ ११<br>तं दृष्ट्वा कुपितं पुत्रमीषत्प्रस्फुरिताधरम्।<br>सुनीतिरङ्कमारोप्य मैत्रेयेदमभाषत॥ १२<br>वत्स कः कोपहेतुस्ते कश्च त्वां नाभिनन्दति।<br>कोऽवजानाति पितरं वत्स यस्तेऽपराध्यति॥ १३<br>श्रीपराशर उवाच<br>इत्युक्तः सकलं मात्रे कथयामास तद्यथा।<br>सुरुचिः प्राह भूपालप्रत्यक्षमतिगर्विता॥ १४<br>विनिःश्वस्येति कथिते तस्मिन्युत्रेण दुर्मनाः।<br>श्वासक्षामेक्षणा दीना सुनीतिर्वाक्यमब्रवीत्॥ १५<br>सुनीतिरुवाच<br>सुरुचिः सत्यमाहेदं मन्दभाग्योऽसि पुत्रक।<br>न हि पुण्यवतां वत्स सपत्नैरेवमुच्यते॥ १६<br>नोद्वेगस्तात कर्त्तव्यः कृतं यद्भवता पुरा।<br>तत्कोऽपहर्तुं शक्नोति दातुं कश्चाकृतं त्वया॥ १७<br>तत्त्वया नात्र कर्त्तव्यं दुःखं तद्वाक्यसम्भवम्॥ १८ | एक दिन राजसिंहासनपर बैठे हुए पिताकी गोदमें अपने भाई उत्तमको बैठा देख ध्रुवकी इच्छा भी गोदमें बैठनेकी हुई॥ ४॥ किन्तु राजाने अपनी प्रेयसी सुरुचिके सामने, गोदमें चढ़नेके लिये उत्कण्ठित होकर प्रेमवश आये हुए उस पुत्रका आदर नहीं किया॥ ५॥ अपनी सौतके पुत्रको गोदमें चढ़नेके लिये उत्सुक और अपने पुत्रको गोदमें बैठा देख सुरुचि इस प्रकार कहने लगी॥ ६॥ "अरे लल्ला! बिना मेरे पेटसे उत्पन्न हुए किसी अन्य स्त्रीका पुत्र होकर भी तू व्यर्थ क्यों ऐसा बड़ा मनोरथ करता है?॥ ७॥ तू अविवेकी है, इसीलिये ऐसी अलभ्य उत्तमोत्तम वस्तुकी इच्छा करता है। यह ठीक है कि तू भी इन्हीं राजाका पुत्र है, तथापि मैंने तो तुझे अपने गर्भमें धारण नहीं किया!॥ ८॥ समस्त चक्रवर्ती राजाओंका आश्रयरूप यह राजसिंहासन तो मेरे ही पुत्रके योग्य है; तू व्यर्थ क्यों अपने चित्तको सन्ताप देता है?॥ ९॥ मेरे पुत्रके समान तुझे वृथा ही यह ऊँचा मनोरथ क्यों होता है? क्या तू नहीं जानता कि तेरा जन्म सुनीतिसे हुआ है?"॥ १०॥<br>श्रीपराशरजी बोले—हे द्विज! विमाताका ऐसा कथन सुन वह बालक कुपित हो पिताको छोड़कर अपनी माताके महलको चल दिया॥ ११॥ हे मैत्रेय! जिसके ओष्ठ कुछ-कुछ काँप रहे थे—ऐसे अपने पुत्रको क्रोधयुक्त देख सुनीतिने उसे गोदमें बिठाकर पूछा—॥ १२॥ "बेटा! तेरे क्रोधका क्या कारण है? तेरा किसने आदर नहीं किया? तेरा अपराध करके कौन तेरे पिताजीका अपमान करने चला है?"॥ १३॥<br>श्रीपराशरजी बोले—ऐसा पूछनेपर ध्रुवने अपनी मातासे वे सब बातें कह दीं जो अति गर्वीली सुरुचिने उससे पिताके सामने कही थीं॥ १४॥ अपने पुत्रके सिसक-सिसककर ऐसा कहनेपर दुःखिनी सुनीतिने खिन्नचित्त और दीर्घ निःश्वासके कारण मलिननयना होकर कहा॥ १५॥<br>सुनीति बोली—बेटा! सुरुचिने ठीक ही कहा है, अवश्य ही तू मन्दभाग्य है। हे वत्स! पुण्यवानोंसे उनके विपक्षी ऐसा नहीं कह सकते॥ १६॥ बच्चा! तू व्याकुल मत हो, क्योंकि तूने पूर्व-जन्मोंमें जो कुछ किया है उसे दूर कौन कर सकता है? और जो नहीं किया वह तुझे दे भी कौन सकता है? इसलिये तुझे उसके वाक्योंसे खेद नहीं करना चाहिये॥ १७-१८॥ |
४८ * श्रीविष्णुपुराण * [अ० ११]
राजासनं राजच्छत्रं वराश्ववरवारणाः ।
यस्य पुण्यानि तस्यैते मत्वैतच्छाम्य पुत्रक ॥ १९
अन्यजन्मकृतैः पुण्यैः सुरुच्यां सुरुचिर्नृपः ।
भार्येति प्रोच्यते चान्या मद्विधा पुण्यवर्जिता ॥ २०
पुण्योपचयसम्पन्नस्तस्याः पुत्रस्तथोत्तमः ।
मम पुत्रस्तथा जातः स्वल्पपुण्यो ध्रुवो भवान् ॥ २१
तथापि दुःखं न भवान् कर्तुमर्हति पुत्रक ।
यस्य यावत्स तेनैव स्वेन तुष्यति मानवः ॥ २२
यदि ते दुःखमत्यर्थं सुरुच्या वचसाभवत् ।
तत्पुण्योपचये यत्नं कुरु सर्वफलप्रदे ॥ २३
सुशीलो भव धर्मात्मा मैत्रः प्राणिहिते रतः ।
निम्नं यथापः प्रवणाः पात्रमायान्ति सम्पदः ॥ २४
ध्रुव उवाच
अम्ब यत्त्वमिदं प्रात्थ प्रशमाय वचो मम ।
नैतद्दुर्वचसा भिन्ने हृदये मम तिष्ठति ॥ २५
सोऽहं तथा यतिष्यामि यथा सर्वोत्तमोत्तमम् ।
स्थानं प्राप्स्याम्यशेषाणां जगतामभिपूजितम् ॥ २६
सुरुचिर्दयिता राज्ञस्तस्या जातोऽस्मि नोदरात् ।
प्रभावं पश्य मेऽम्ब त्वं वृद्धस्यापि तवोदरे ॥ २७
उत्तमः स मम भ्राता यो गर्भेण धृतस्तया ।
स राजासनमाप्नोतु पित्रा दत्तं तथास्तु तत् ॥ २८
नान्यदत्तमभीप्सामि स्थानमम्ब स्वकर्मणा ।
इच्छामि तदहं स्थानं यन्न प्राप पिता मम ॥ २९
श्रीपराशर उवाच
निर्जगाम गृहान्मातुरित्युक्त्वा मातरं ध्रुवः ।
पुराच्च निर्गम्य ततस्तद्वाह्योपवनं ययौ ॥ ३०
स ददर्श मुनींस्तत्र सप्त पूर्वागतान्ध्रुवः ।
कृष्णाजिनोत्तरीयेषु विष्टरेषु समास्थितान् ॥ ३१
स राजपुत्रस्तान्सर्वान्प्रणिपत्याभ्यभाषत ।
प्रश्रयावनतः सम्यगभिवादनपूर्वकम् ॥ ३२
ध्रुव उवाच
उत्तानपादतनयं मां निबोधत सत्तमाः ।
जातं सुनीत्यां निर्वेदाद्युष्माकं प्राप्तमन्तिकम् ॥ ३३
हे वत्स ! जिसका पुण्य होता है उसीको राजासन, राजच्छत्र तथा उत्तम-उत्तम घोड़े और हाथी आदि मिलते हैं—ऐसा जानकर तू शान्त हो जा ॥ १९ ॥ अन्य जन्मोंमें किये हुए पुण्य-कर्मोंके कारण ही सुरुचिमें राजाकी सुरुचि (प्रीति) है और पुण्यहीना होनेसे ही मुझ-जैसी स्त्री केवल भार्या (भरण करनेयोग्य) ही कही जाती है ॥ २० ॥ उसी प्रकार उसका पुत्र उत्तम भी बड़ा पुण्यपुंज-सम्पन्न है और मेरा पुत्र तू ध्रुव मेरे समान ही अल्प पुण्यवान् है ॥ २१ ॥ तथापि बेटा ! तुझे दुःखी नहीं होना चाहिये, क्योंकि जिस मनुष्यको जितना मिलता है वह अपनी ही पूँजीमें मग्न रहता है ॥ २२ ॥ और यदि सुरुचिके वाक्योंसे तुझे अत्यन्त दुःख ही हुआ है तो सर्व फलदायक पुण्यके संग्रह करनेका प्रयत्न कर ॥ २३ ॥ तू सुशील, पुण्यात्मा, प्रेमी और समस्त प्राणियोंका हितैषी बन, क्योंकि जैसे नीची भूमिकी ओर ढलकतो हुआ जल अपने-आप ही पात्रमें आ जाता है वैसे ही सत्पात्र मनुष्यके पास स्वतः ही समस्त सम्पत्तियाँ आ जाती हैं ॥ २४ ॥
ध्रुव बोला—माताजी ! तुमने मेरे चित्तको शान्त करनेके लिये जो वचन कहे हैं वे दुर्वाक्योंसे बिंधे हुए मेरे हृदयमें तनिक भी नहीं ठहरते ॥ २५ ॥ इसलिये मैं तो अब वही प्रयत्न करूँगा जिससे सम्पूर्ण लोकोंसे आदरणीय सर्वश्रेष्ठ पदको प्राप्त कर सकूँ ॥ २६ ॥ राजाकी प्रेयसी तो अवश्य सुरुचि ही है और मैंने उसके उदरसे जन्म भी नहीं लिया है, तथापि हे माता ! अपने गर्भमें बढ़े हुए मेरा प्रभाव भी तुम देखना ॥ २७ ॥ उत्तम, जिसको उसने अपने गर्भमें धारण किया है, मेरा भाई ही है । पिताका दिया हुआ राजासन वही प्राप्त करे । [ भगवान् करें ] ऐसा ही हो ॥ २८ ॥ माताजी ! मैं किसी दूसरेके दिये हुए पदका इच्छुक नहीं हूँ; मैं तो अपने पुरुषार्थसे ही उस पदकी इच्छा करता हूँ जिसको पिताजीने भी नहीं प्राप्त किया है ॥ २९ ॥
श्रीपराशरजी बोले—मातासे इस प्रकार कह ध्रुव उसके महलसे निकल पड़ा और फिर नगरसे बाहर आकर बाहरी उपवनमें पहुँचा ॥ ३० ॥
वहाँ ध्रुवने पहलेसे ही आये हुए सात मुनीश्वरोंको कृष्ण मृग-चर्मके बिछौनोंसे युक्त आसनोंपर बैठे देखा ॥ ३१ ॥ उस राजकुमारने उन सबको प्रणाम कर अति नम्रता और समुचित अभिवादनादिपूर्वक उनसे कहा ॥ ३२ ॥
ध्रुवने कहा—हे महात्माओ ! मुझे आप सुनीतिसे
अ० ११ ] * प्रथम अंश * ४९
ऋषय ऊचुः चतुःपञ्चाब्दसम्भूतो बालस्त्वं नृपनन्दन। निर्वेदकारणं किञ्चित्तव नाद्यापि वर्तते॥ ३४ न चिन्त्यं भवतः किञ्चिद्दृश्यते भूपतिः पिता। न चैवेष्टवियोगादि तव पश्याम बालक॥ ३५ शरीरे न च ते व्याधिरस्माभिरुपलक्ष्यते। निर्वेदः किंनिमित्तस्ते कथ्यतां यदि विद्यते॥ ३६
श्रीपराशर उवाच ततः स कथयामास सुरुच्या यदुदाहृतम्। तन्निशम्य ततः प्रोचुर्मुनयस्ते परस्परम्॥ ३७ अहो क्षात्रं परं तेजो बालस्यापि यदक्षमा। सपत्न्या मातुरुक्तं यद् हृदयान्नापसर्पति॥ ३८ भो भो क्षत्रियदायाद निर्वेदाद्यात्त्वयाधुना। कर्तुं व्यवसितं तन्नः कथ्यतां यदि रोचते॥ ३९ यच्च कार्यं तवास्माभिः साहाय्यममितद्युते। तदुच्यतां विवक्षुस्त्वमस्माभिरुपलक्ष्यसे॥ ४०
ध्रुव उवाच नाहमर्थमभीप्सामि न राज्यं द्विजसत्तमाः। तत्स्थानमेकमिच्छामि भुक्तं नान्येन यत्पुरा॥ ४१ एतन्मे क्रियतां सम्यक् कथ्यतां प्राप्यते यथा। स्थानमग्र्यं समस्तेभ्यः स्थानेभ्यो मुनिसत्तमाः॥ ४२
मरीचिरुवाच अनाराधितगोविन्दैर्नैरैः स्थानं नृपात्मज। न हि सम्प्राप्यते श्रेष्ठं तस्मादाराधयाच्युतम्॥ ४३
अत्रिरुवाच परः पराणां पुरुषो यस्य तुष्टो जनार्दनः। स प्राप्नोत्यक्षयं स्थानमेतत्सत्यं मयोदितम्॥ ४४
अङ्गिरा उवाच यस्यान्तः सर्वमेवेदमच्युतस्याव्ययात्मनः। तमाराधय गोविन्दं स्थानमग्र्यं यदीच्छसि॥ ४५
पुलस्त्य उवाच परं ब्रह्म परं धाम योऽसौ ब्रह्म तथा परम्। तमाराध्य हरिं याति मुक्तिमप्यतिदुर्लभाम्॥ ४६
उत्पन्न हुआ राजा उत्तानपादका पुत्र जानें। मैं आत्म-ग्लानिके कारण आपके निकट आया हूँ॥ ३३॥
ऋषि बोले- राजकुमार! अभी तो तू चार-पाँच वर्षका ही बालक है। अभी तेरे निर्वेदका कोई कारण नहीं दिखायी पड़ता॥ ३४॥ तुझे कोई चिन्ताका विषय भी नहीं है, क्योंकि अभी तेरा पिता राजा जीवित है और हे बालक! तेरी कोई इष्ट वस्तु खो गयी हो ऐसा भी हमें दिखायी नहीं देता॥ ३५॥ तथा हमें तेरे शरीरमें भी कोई व्याधि नहीं दीख पड़ती फिर बता, तेरी ग्लानिका क्या कारण है?॥ ३६॥
श्रीपराशरजी बोले- तब सुरुचिने उससे जो कुछ कहा था वह सब उसने कह सुनाया। उसे सुनकर वे ऋषिगण आपसमें इस प्रकार कहने लगे॥ ३७॥ 'अहो! क्षात्रतेज कैसा प्रबल है, जिससे बालकमें भी इतनी अक्षमा है कि अपनी विमाताका कथन उसके हृदयसे नहीं टलता'॥ ३८॥ हे क्षत्रियकुमार! इस निर्वेदके कारण तूने जो कुछ करनेका निश्चय किया है, यदि तुझे रुचे तो, वह हमलोगोंसे कह दे॥ ३९॥ और हे अतुलित तेजस्वी! यह भी बता कि हम तेरी क्या सहायता करें, क्योंकि हमें ऐसा प्रतीत होता है कि तू कुछ कहना चाहता है॥ ४०॥
ध्रुवने कहा- हे द्विजश्रेष्ठ! मुझे न तो धनकी इच्छा है और न राज्यकी; मैं तो केवल एक उसी स्थानको चाहता हूँ जिसको पहले कभी किसीने न भोगा हो॥ ४१॥ हे मुनिश्रेष्ठ! आपकी यही सहायता होगी कि आप मुझे भली प्रकार यह बता दें कि क्या करनेसे वह सबसे अग्रगण्य स्थान प्राप्त हो सकता है॥ ४२॥
मरीचि बोले- हे राजपुत्र! बिना गोविन्दकी आराधना किये मनुष्यको वह श्रेष्ठ स्थान नहीं मिल सकता; अतः तू श्रीअच्युतकी आराधना कर॥ ४३॥
अत्रि बोले- जो परा प्रकृति आदिसे भी परे हैं वे परमपुरुष जनार्दन जिससे सन्तुष्ट होते हैं उसीको वह अक्षयपद मिलता है यह मैं सत्य-सत्य कहता हूँ॥ ४४॥
अंगिरा बोले- यदि तू अग्रस्थानका इच्छुक है तो जिन अव्ययात्मा अच्युतमें यह सम्पूर्ण जगत् ओतप्रोत है, उन गोविन्दकी ही आराधना कर॥ ४५॥
पुलस्त्य बोले- जो परब्रह्म, परमधाम और परस्वरूप हैं, उन हरिकी आराधना करनेसे मनुष्य अति दुर्लभ मोक्षपदको भी प्राप्त कर लेता है॥ ४६॥
५० * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ११
| पुलह उवाच<br>ऐन्द्रमिन्द्रः परं स्थानं यमाराध्य जगत्पतिम्।<br>प्राप यज्ञपतिं विष्णुं तमाराधय सुव्रत॥ ४७ | **पुलह बोले—**हे सुव्रत! जिन जगत्पतिकी आराधनासे इन्द्रने अत्युत्तम इन्द्रपद प्राप्त किया है, तू उन यज्ञपति भगवान् विष्णुकी आराधना कर॥ ४७॥ |
| क्रतुरुवाच<br>यो यज्ञपुरुषो यज्ञो योगेशः परमः पुमान्।<br>तस्मिंस्तुष्टे यदप्राप्यं किं तदस्ति जनार्दने ॥ ४८ | **क्रतु बोले—**जो परमपुरुष यज्ञपुरुष, यज्ञ और योगेश्वर हैं, उन जनार्दनके सन्तुष्ट होनेपर कौन-सी वस्तु दुर्लभ रह सकती है?॥४८॥ |
| वसिष्ठ उवाच<br>प्राप्नोष्याराधिते विष्णौ मनसा यद्यदिच्छसि।<br>त्रैलोक्यान्तर्गतं स्थानं किमु वत्सोत्तमोत्तमम्॥ ४९ | **वसिष्ठ बोले—**हे वत्स! विष्णुभगवान्की आराधना करनेपर तू अपने मनसे जो कुछ चाहेगा वही प्राप्त कर लेगा, फिर त्रिलोकीके उत्तमोत्तम स्थानकी तो बात ही क्या है?॥ ४९॥ |
| ध्रुव उवाच<br>आराध्यः कथितो देवो भवद्भिः प्रणतस्य मे।<br>मया तत्परितोषाय यज्जप्तव्यं तदुच्यताम्॥ ५०<br>यथा चाराधनं तस्य मया कार्यं महात्मनः।<br>प्रसादसुमुखास्तन्मे कथयन्तु महर्षयः॥ ५१ | **ध्रुवने कहा—**हे महर्षिगण! मुझ विनीतको आपने आराध्यदेव तो बता दिया। अब उसको प्रसन्न करनेके लिये मुझे क्या जपना चाहिये—यह बताइये। उस महापुरुषकी मुझे जिस प्रकार आराधना करनी चाहिये, वह आपलोग मुझसे प्रसन्नतापूर्वक कहिये॥ ५०-५१॥ |
| ऋषय ऊचुः<br>राजपुत्र यथा विष्णोराराधनपरैर्नरैः।<br>कार्यमाराधनं तन्नो यथावच्छ्रोतुमर्हसि॥ ५२<br>बाह्यार्थादखिलाच्चित्तं त्याजयेत्प्रथमं नरः।<br>तस्मिन्नेव जगद्धाम्नि ततः कुर्वीत निश्चलम्॥ ५३<br>एवमेकाग्रचित्तेन तन्मयेन धृतात्मना।<br>जप्तव्यं यन्निबोधैतत्तन्नः पार्थिवनन्दनः॥ ५४<br>हिरण्यगर्भपुरुषप्रधानाव्यक्तरूपिणे।<br>ॐ नमो वासुदेवाय शुद्धज्ञानस्वरूपिणे॥ ५५<br>एतज्जजाप भगवान् जप्यं स्वायम्भुवो मनुः।<br>पितामहस्तव पुरा तस्य तुष्टो जनार्दनः॥ ५६<br>ददौ यथाभिलषितां सिद्धिं त्रैलोक्यदुर्लभाम्।<br>तथा त्वमपि गोविन्दं तोषयैतत्स्सदा जपन्॥ ५७ | **ऋषिगण बोले—**हे राजकुमार! विष्णुभगवान्की आराधनामें तत्पर पुरुषोंको जिस प्रकार उनकी उपासना करनी चाहिये वह तू हमसे यथावत् श्रवण कर ॥५२॥ मनुष्यको चाहिये कि पहले सम्पूर्ण बाह्य विषयोंसे चित्तको हटावे और उसे एकमात्र उन जगदाधारमें ही स्थिर कर दे॥ ५३॥ हे राजकुमार! इस प्रकार एकाग्रचित्त होकर तन्मयभावसे जो कुछ जपना चाहिये, वह सुन—॥५४॥ 'ॐ हिरण्यगर्भ, पुरुष, प्रधान और अव्यक्तरूप शुद्ध ज्ञानस्वरूप वासुदेवको नमस्कार है'॥ ५५॥ इस (ॐ नमो भगवते वासुदेवाय) मन्त्रको पूर्वकालमें तेरे पितामह भगवान् स्वायम्भुव मनुने जपा था। तब उनसे सन्तुष्ट होकर श्रीजनार्दनने उन्हें त्रिलोकीमें दुर्लभ मनोवांछित सिद्धि दी थी। उसी प्रकार तू भी इसका निरन्तर जप करता हुआ श्रीगोविन्दको प्रसन्न कर॥ ५६-५७॥ |
इति श्रीविष्णुपुराणे प्रथमंशे एकादशोऽध्यायः ॥ ११॥
अ० १२] \hfill * प्रथम अंश * \hfill ५१
बारहवाँ अध्याय
ध्रुवकी तपस्यासे प्रसन्न हुए भगवान्का आविर्भाव और उसे ध्रुवपद-दान
श्रीपराशर उवाच
निशम्यैतदशेषेण मैत्रेय नृपतेः सुतः।
निर्जगाम वनात्तस्मात्प्रणिपत्य स तानृषीन्॥ १
कृतकृत्यमिवात्मानं मन्यमानस्ततो द्विज।
मधुसंज्ञं महापुण्यं जगाम यमुनाटटम्॥ २
पुनश्च मधुसंज्ञेन दैत्येनाधिष्ठितं यतः।
ततो मधुवनं नाम्ना ख्यातमत्र महीतले॥ ३
हत्वा च लवणं रक्षो मधुपुत्रं महाबलम्।
शत्रुघ्नो मधुरां नाम पुरीं यत्र चकार वै॥ ४
यत्र वै देवदेवस्य सान्निध्यं हरिमेधसः।
सर्वपापहरे तस्मिंस्तपस्तीर्थे चकार सः॥ ५
मरीचिमुख्यैर्मुनिभिर्यथोद्दिष्टमभूत्तथा ।
आत्मन्यशेषदेवेशं स्थितं विष्णुममन्यत॥ ६
अनन्यचेतसस्तस्य ध्यायतो भगवान्हरिः।
सर्वभूतगतो विप्र सर्वभावगतोऽभवत्॥ ७
श्रीपराशरजी बोले— हे मैत्रेय! यह सब सुनकर राजपुत्र ध्रुव उन ऋषियोंको प्रणामकर उस वनसे चल दिया॥ १॥ और हे द्विज! अपनेको कृतकृत्य-सा मानकर वह यमुनाटटवर्ती अति पवित्र मधु नामक वनमें आया। आगे चलकर उस वनमें मधु नामक दैत्य रहने लगा था, इसलिये वह इस पृथ्वीतलमें मधुवन नामसे विख्यात हुआ॥ २-३॥ वहीं मधुके पुत्र लवण नामक महाबली राक्षसको मारकर शत्रुघ्नने मधुरा (मथुर) नामकी पुरी बसायी॥ ४॥ जिस (मधुवन)-में निरन्तर देवदेव श्रीहरिकी सन्निधि रहती है उसी सर्वपापपहारी तीर्थमें ध्रुवने तपस्या की॥ ५॥ मरीचि आदि मुनीश्वरोंने उसे जिस प्रकार उपदेश किया था उसने उसी प्रकार अपने हृदयमें विराजमान निखिलदेवेश्वर श्रीविष्णुभगवान्का ध्यान करना आरम्भ किया॥ ६॥ इस प्रकार हे विप्र! अनन्य-चित्त होकर ध्यान करते रहनेसे उसके हृदयमें सर्वभूतान्तर्यामी भगवान् हरि सर्वतोभावसे प्रकट हुए॥ ७॥
मनस्यवस्थिते तस्मिन्विष्णौ मैत्रेय योगिनः।
न शशाक धरा भारमुद्वोढुं भूतधारिणी॥ ८
वामपादस्थिते तस्मिन्ननामाद्धं मेदिनी।
द्वितीयं च नामाद्धं क्षितेर्दक्षिणतः स्थिते॥ ९
पादाङ्गुष्ठेन सम्पीय यदा स वसुधां स्थितः।
तदा समस्ता वसुधा चचाल सह पर्वतः॥ १०
नद्यो नदाः समुद्राश्च सङ्क्षोभं परमं ययुः।
तत्क्षोभादमराः क्षोभं परं जग्मुर्महामुने॥ ११
यामा नाम तदा देवा मैत्रेय परमाकुलाः।
इन्द्रेण सह सम्मन्त्र्य ध्यानभङ्गं प्रचक्रमुः॥ १२
कूष्माण्डा विविधै रूपैर्महेन्द्रेण महामुने।
समाधिभङ्गमत्यन्तमारब्धाः कर्तुमातुराः॥ १३
हे मैत्रेय! योगी ध्रुवके चित्तमें भगवान् विष्णुके स्थित हो जानेपर सर्वभूतोंको धारण करनेवाली पृथिवी उसका भार न सँभाल सकी॥ ८॥ उसके बायें चरणपर खड़े होनेसे पृथिवीका बायाँ आधा भाग झुक गया और फिर दायें चरणपर खड़े होनेसे दायाँ भाग झुक गया॥ ९॥ और जिस समय वह पैरके अँगूठेसे पृथिवीको (बीचसे) दबाकर खड़ा हुआ तो पर्वतोंके सहित समस्त भूमण्डल विचलित हो गया॥ १०॥ हे महामुने! उस समय नदी, नद और समुद्र आदि सभी अत्यन्त क्षुब्ध हो गये और उनके क्षोभसे देवताओंमें भी बड़ी हलचल मची॥ ११॥ हे मैत्रेय! तब याम नामक देवताओंने अत्यन्त व्याकुल हो इन्द्रके साथ परामर्श कर उसके ध्यानको भंग करनेका आयोजन किया॥ १२॥ हे महामुने! इन्द्रके साथ अति आतुर कूष्माण्ड नामक उपदेवताओँने नानारूप धारणकर उसकी समाधि भंग करना आरम्भ किया॥ १३॥
सुनीतिर्नाम तन्माता सास्रा तत्पुरतः स्थिता।
पुत्रेति करुणां वाचमाह मायामयी तदा॥ १४
उस समय मायाहीसे रची हुई उसकी माता सुनीति नेत्रोंमें आँसू भरे उसके सामने प्रकट हुई और 'हे पुत्र! हे पुत्र!' ऐसा कहकर करुणायुक्त वचन बोलने लगी
| ५२ | * श्रीविष्णुपुराण * | [अ० १२ |
|---|
[मूल संस्कृत श्लोक]
पुत्रकास्मान्निवर्त्तस्व शरीरात्ययदारुणात्।
निर्बन्धतो मया लब्धो बहुभिस्त्वं मनोरथैः॥ १५
दीनामेकां परित्यक्तुमनाथां न त्वमर्हसि।
सपत्नीवचनाद्वत्स अगतेस्त्वं गतिर्मम॥ १६
क्व च त्वं पञ्चवर्षीयः क्व चैतद्दारुणं तपः।
निवर्त्ततां मनः कष्टान्निर्बन्धात्फलवर्जितात्॥ १७
कालः क्रीडनकानान्ते तदन्तेऽध्ययनस्य ते।
ततः समस्तभोगानां तदन्ते चेष्यते तपः॥ १८
कालः क्रीडनकानां यस्तव बालस्य पुत्रक।
तस्मिंस्त्वमिच्छसि तपः किं नाशायात्मनो रतः॥ १९
मत्प्रीतिः परमो धर्मो वयोऽवस्थाक्रियाक्रमम्।
अनुवर्त्तस्व मा मोहान्निवर्त्तास्मादधर्मतः॥ २०
परित्यजति वत्साद्य यद्येतन्न भवांस्तपः।
त्यक्ष्याम्यहमिह प्राणांस्ततो वै पश्यतस्तव॥ २१
श्रीपराशर उवाच
तां प्रलापवतीमेवं बाष्पाकुलविलोचनाम्।
समाहितमना विष्णौ पश्यन्नपि न दृष्टवान्॥ २२
वत्स वत्स सुघोराणि रक्षांस्येतानि भीषणे।
वनेऽभ्युद्यतशस्त्राणि समायान्त्यपगम्यताम्॥ २३
इत्युक्त्वा प्रययौ साथ रक्षांस्याविर्बभूस्ततः।
अभ्युद्यतोग्रशस्त्राणि ज्वालामालाकुलैर्मुखैः॥ २४
ततो नादानतीवोग्रान्राजपुत्रस्य ते पुरः।
मुमुचुर्दीप्तशस्त्राणि भ्रामयन्तो निशाचराः॥ २५
शिवाश्च शतशो नेदुः सञ्ज्वालाकवलैर्मुखैः।
त्रासाय तस्य बालस्य योगयुक्तस्य सर्वदा॥ २६
हन्यतां हन्यतामेष छिद्यतां छिद्यतामयम्।
भक्ष्यतां भक्ष्यतां चायमित्यूचुस्ते निशाचराः॥ २७
ततो नानाविधान्नादान् सिंहोष्ट्रमकराननाः।
त्रासाय राजपुत्रस्य नेदुस्ते रजनीचराः॥ २८
रक्षांसि तानि ते नादाःशिवास्तान्यायुधानि च।
गोविन्दासक्तचित्तस्य ययुर्नेन्द्रियगोचरम्॥ २९
एकाग्रचेताः सततं विष्णुमेवात्मसंश्रयम्।
दृष्टवान्पृथिवीनाथपुत्रो नान्यं कथञ्चन॥ ३०
[हिन्दी अनुवाद]
[उसने कहा]—बेटा! तू शरीरको घुलानेवाले इस भयंकर तपका आग्रह छोड़ दे। मैंने बड़ी-बड़ी कामनाओंद्वारा तुझे प्राप्त किया है॥ १४-१५॥
अरे! मुझ अकेली, अनाथा, दुखियाको सौतके कटु वाक्योंसे छोड़ देना तुझे उचित नहीं है। बेटा! मुझ आश्रयहीनाका तो एकमात्र तू ही सहारा है॥ १६॥
कहाँ तो पाँच वर्षका तू और कहाँ तेरा यह अति उग्र तप? अरे! इस निष्फल क्लेशकारी आग्रहसे अपना मन मोड़ ले॥ १७॥
अभी तो तेरे खेलने-कूदनेका समय है, फिर अध्ययनका समय आयेगा, तदनन्तर समस्त भोगोंके भोगनेका और फिर अन्तमें तपस्या करना भी ठीक होगा॥ १८॥
बेटा! तुझ सुकुमार बालकका 'जो खेल-कूदका समय है उसीमें तू तपस्या करना चाहता है। तू इस प्रकार क्यों अपने सर्वनाशमें तत्पर हुआ है?॥ १९॥
तेरा परम धर्म तो मुझको प्रसन्न रखना ही है, अतः तू अपनी आयु और अवस्थाके अनुकूल कर्मोंमें ही लग, मोहका अनुवर्तन न कर और इस तपरूपी अधर्मसे निवृत्त हो॥ २०॥
बेटा! यदि आज तू इस तपस्याको न छोड़ेगा तो देख तेरे सामने ही मैं अपने प्राण छोड़ दूँगी॥ २१॥
श्रीपराशरजी बोले— हे मैत्रेय! भगवान् विष्णुमें चित्त स्थिर रहनेके कारण ध्रुवने उसे आँखोंमें आँसू भरकर इस प्रकार विलाप करती देखकर भी नहीं देखा॥ २२॥
तब, 'अरे बेटा! यहाँसे भाग-भाग! देख, इस महाभयंकर वनमें ये कैसे घोर राक्षस अस्त्र-शस्त्र उठाये आ रहे हैं'—ऐसा कहती हुई वह चली गयी और वहाँ जिनके मुखसे अग्निकी लपटें निकल रही थीं ऐसे अनेकों राक्षसगण अस्त्र-शस्त्र सँभाले प्रकट हो गये॥ २३-२४॥
उन राक्षसोंने अपने अति चमकीले शस्त्रोंको घुमाते हुए उस राजपुत्रके सामने बड़ा भयंकर कोलाहल किया॥ २५॥
उस नित्य-योगयुक्त बालकको भयभीत करनेके लिये अपने मुखसे अग्निकी लपटें निकालती हुई सैकड़ों स्यारियाँ घोर नाद करने लगीं॥ २६॥
वे राक्षसगण भी 'इसको मारो-मारो, काटो-काटो, खाओ-खाओ' इस प्रकार चिल्लाने लगे॥ २७॥
फिर सिंह, ऊँट और मकर आदिके-से मुखवाले वे राक्षस राजपुत्रको त्रास देनेके लिये नाना प्रकारसे गरजने लगे॥ २८॥
किन्तु उस भगवदासक्तचित्त बालकको वे राक्षस, उनके शब्द, स्यारियाँ और अस्त्र-शस्त्रादि कुछ भी दिखायी नहीं दिये॥ २९॥
वह राजपुत्र एकाग्रचित्तसे निरन्तर अपने आश्रयभूत विष्णुभगवान्को ही देखता रहा और उसने किसीकी ओर किसी भी प्रकार दृष्टिपात नहीं किया॥ ३०॥
अ० १२] * प्रथम अंश * ५३
ततः सर्वासु मायासु विलीनासु पुनः सुराः।
सङ्क्षोभं परमं जग्मुस्तत्पराभवशङ्किताः ॥ ३१
ते समेत्य जगद्योनिमनादिनिधनं हरिम्।
शरण्यं शरणं यातास्तपसा तस्य तापिताः ॥ ३२
देवा ऊचुः
देवदेव जगन्नाथ परेश पुरुषोत्तम।
ध्रुवस्य तपसा तप्तास्त्वां वयं शरणं गताः ॥ ३३
दिने दिने कलालेशैः शशाङ्कः पूर्यते यथा।
तथायं तपसा देव प्रयात्यृद्धिमहर्निशम् ॥ ३४
औत्तानपादितपसा वयमित्थं जनार्दन।
भीतास्त्वां शरणं यातास्तपसस्तं निवर्तय ॥ ३५
न विद्मः किं स शक्रत्वं सूर्यत्वं किमभीप्सति।
वित्तपाम्बुपसोमानां साभिलाषः पदेषु किम् ॥ ३६
तदस्माकं प्रसीदेश हृदयाच्छल्यमुद्धर।
उत्तानपादतनयं तपसः संनिवर्तय ॥ ३७
श्रीभगवानुवाच
नेन्द्रत्वं न च सूर्यत्वं नैवाम्बुपधनेशताम्।
प्रार्थयत्येष यं कामं तं करोम्यखिलं सुराः ॥ ३८
यात देवा यथाकामं स्वस्थानं विगतज्वराः।
निवर्त्तयाम्यहं बालं तपस्यासक्तमानसम् ॥ ३९
श्रीपराशर उवाच
इत्युक्ता देवदेवेन प्रणम्य त्रिदशास्ततः।
प्रययुः स्वानि धिष्ण्यानि शतक्रतुपुरोगमाः ॥ ४०
भगवानपि सर्वात्मा तन्मयत्वेन तोषितः।
गत्वा ध्रुवमुवाचेदं चतुर्भुजवपुर्हरिः ॥ ४१
श्रीभगवानुवाच
औत्तानपादे भद्रं ते तपसा परितोषितः।
वरदोऽहमनुप्राप्तो वरं वरय सुव्रत ॥ ४२
बाह्यार्थनिरपेक्षं ते मयि चित्तं यदाहितम्।
तुष्टोऽहं भवतस्तेन तद्वृणीष्व वरं परम् ॥ ४३
श्रीपराशर उवाच
श्रुत्वेत्थं गदितं तस्य देवदेवस्य बालकः।
उन्मीलिताक्षो ददृशे ध्यानदृष्टं हरिं पुरः ॥ ४४
तब सम्पूर्ण मायाके लीन हो जानेपर उससे हार जानेकी आशंकासे देवताओंको बड़ा भय हुआ ॥ ३१ ॥ अतः उसके तपसे सन्तप्त हो वे सब आपसमें मिलकर जगत्के आदि-कारण, शरणागतवत्सल, अनादि और अनन्त श्रीहरिकी शरणमें गये ॥ ३२ ॥
देवता बोले— हे देवाधिदेव, जगन्नाथ, परमेश्वर, पुरुषोत्तम! हम सब ध्रुवकी तपस्यासे सन्तप्त होकर आपकी शरणमें आये हैं ॥ ३३ ॥ हे देव! जिस प्रकार चन्द्रमा अपनी कलाओंसे प्रतिदिन बढ़ता है उसी प्रकार यह भी तपस्याके कारण रात-दिन उन्नत हो रहा है ॥ ३४ ॥ हे जनार्दन! इस उत्तानपादके पुत्रकी तपस्यासे भयभीत होकर हम आपकी शरणमें आये हैं, आप उसे तपसे निवृत्त कीजिये ॥ ३५ ॥ हम नहीं जानते, वह इन्द्रत्व चाहता है या सूर्यत्व अथवा उसे कुबेर, वरुण या चन्द्रमाके पदकी अभिलाषा है ॥ ३६ ॥ अतः हे ईश! आप हमपर प्रसन्न होइये और इस उत्तानपादके पुत्रको तपसे निवृत्त करके हमारे हृदयका काँटा निकालिये ॥ ३७ ॥
श्रीभगवान् बोले— हे सुरगण! उसे इन्द्र, सूर्य, वरुण अथवा कुबेर आदि किसीके पदकी अभिलाषा नहीं है, उसकी जो कुछ इच्छा है वह मैं सब पूर्ण करूँगा ॥ ३८ ॥ हे देवगण! तुम निश्चिन्त होकर इच्छानुसार अपने-अपने स्थानोंको जाओ। मैं तपस्यामें लगे हुए उस बालकको निवृत्त करता हूँ ॥ ३९ ॥
श्रीपराशरजी बोले— देवाधिदेव भगवान्के ऐसा कहनेपर इन्द्र आदि समस्त देवगण उन्हें प्रणामकर अपने-अपने स्थानोंको गये ॥ ४० ॥ सर्वात्मा भगवान् हरिने भी ध्रुवकी तन्मयतासे प्रसन्न हो उसके निकट चतुर्भुजरूपसे जाकर इस प्रकार कहा ॥ ४१ ॥
श्रीभगवान् बोले— हे उत्तानपादके पुत्र ध्रुव! तेरा कल्याण हो। मैं तेरी तपस्यासे प्रसन्न होकर तुझे वर देनेके लिये प्रकट हुआ हूँ, हे सुव्रत! तू वर माँग ॥ ४२ ॥ तूने सम्पूर्ण बाह्य विषयोंसे उपरत होकर अपने चित्तको मुझमें ही लगा दिया है। अतः मैं तुझसे अति सन्तुष्ट हूँ। अब तू अपनी इच्छानुसार श्रेष्ठ वर माँग ॥ ४३ ॥
श्रीपराशरजी बोले— देवाधिदेव भगवान्के ऐसे वचन सुनकर बालक ध्रुवने आँखें खोलीं और अपनी ध्यानावस्थामें देखे हुए भगवान् हरिको साक्षात् अपने सम्मुख खड़े देखा ॥ ४४ ॥
५४
- श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १२
| शङ्खचक्रगदाशार्ङ्गवरासिधरमच्युतम् ।<br>किरीटिनं समालोक्य जगाम शिरसा महीम् ॥ ४५ | श्रीअच्युतको किरीट तथा शंख, चक्र, गदा, शार्ङ्ग धनुष और खड्ग धारण किये देख उसने पृथिवीपर सिर रखकर प्रणाम किया ॥ ४५ ॥ और सहसा रोमांचित तथा परम भयभीत होकर उसने देवदेवकी स्तुति करनेकी इच्छा की ॥ ४६ ॥ किन्तु ‘इनकी स्तुतिके लिये मैं क्या कहूँ? क्या कहनेसे इनका स्तवन हो सकता है?’ यह न जाननेके कारण वह चित्तमें व्याकुल हो गया और अन्तमें उसने उन देवदेवकी ही शरण ली ॥ ४७ ॥ |
|---|---|
| रोमाञ्चिताङ्गः सहसा साध्वसं परमं गतः ।<br>स्तवाय देवदेवस्य स चक्रे मानसं ध्रुवः ॥ ४६ | |
| किं वदामि स्तुतावस्य केनोक्तेनास्य संस्तुतिः ।<br>इत्याकुलमतिर्देवं तमेव शरणं ययौ ॥ ४७ |
ध्रुव उवाच
| भगवन्यदि मे तोषं तपसा परमं गतः ।<br>स्तोतुं तदहमिच्छामि वरमेनं प्रयच्छ मे ॥ ४८<br>[ ब्रह्माद्यैरस्य वेदज्ञैर्ज्ञायते यस्य नो गतिः ।<br>तं त्वां कथमहं देव स्तोतुं शक्नोमि बालकः ॥<br>त्वद्भक्तिप्रवणं ह्येतत्परमेश्वर मे मनः ।<br>स्तोतुं प्रवृत्तं त्वत्पादौ तत्र प्रज्ञां प्रयच्छ मे ॥ ] | ध्रुवने कहा— भगवन्! आप यदि मेरी तपस्यासे सन्तुष्ट हैं तो मैं आपकी स्तुति करना चाहता हूँ, आप मुझे यही वर दीजिये [ जिससे मैं स्तुति कर सकूँ ] ॥ ४८ ॥ [ हे देव! जिनकी गति ब्रह्मा आदि वेदज्ञजन भी नहीं जानते; उन्हीं आपका मैं बालक कैसे स्तवन कर सकता हूँ। किन्तु हे परम प्रभो! आपकी भक्तिसे द्रवीभूत हुआ मेरा चित्त आपके चरणोंकी स्तुति करनेमें प्रवृत्त हो रहा है। अतः आप इसे उसके लिये बुद्धि प्रदान कीजिये]। |
|---|
श्रीपराशर उवाच
| शङ्खप्रान्तेन गोविन्दस्तं पस्पर्श कृताञ्जलिम् ।<br>उत्तानपादतनयं द्विजवर्य जगत्पतिः ॥ ४९ | श्रीपराशरजी बोले— हे द्विजवर्य ! तब जगत्पति श्रीगोविन्दने अपने सामने हाथ जोड़े खड़े हुए उस उत्तानपादके पुत्रको अपने (वेदमय) शंखके अन्त (वेदान्तमय) भागसे छू दिया ॥ ४९ ॥ तब तो एक क्षणमें ही वह राजकुमार प्रसन्न-मुखसे अति विनीत हो सर्वभूताधिष्ठान श्रीअच्युतकी स्तुति करने लगा ॥ ५० ॥ |
|---|---|
| अथ प्रसन्नवदनः स क्षणान्नृपनन्दनः ।<br>तुष्टाव प्रणतो भूत्वा भूतधातारमच्युतम् ॥ ५० |
ध्रुव उवाच
| भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च ।<br>भूतादिरादिप्रकृतिर्यस्य रूपं नतोऽस्मि तम् ॥ ५१ | ध्रुव बोले— पृथिवी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि, अहंकार और मूल-प्रकृति—ये सब जिनके रूप हैं उन भगवान्को मैं नमस्कार करता हूँ॥ ५१ ॥ जो अति शुद्ध, सूक्ष्म, सर्वव्यापक और प्रधानसे भी परे हैं, वह पुरुष जिनका रूप है उन गुण-भोक्ता परमपुरुषको मैं नमस्कार करता हूँ॥ ५२ ॥ हे परमेश्वर! पृथिवी आदि समस्त भूत, गन्धादि उनके गुण, बुद्धि आदि अन्तःकरण-चतुष्टय तथा प्रधान और पुरुष(जीव)-से भी परे जो सनातन पुरुष हैं, उन आप निखिलब्रह्माण्डनायकके ब्रह्मभूत शुद्धस्वरूप आत्माकी मैं शरण हूँ॥ ५३-५४॥ हे सर्वात्मन्! हे योगियोंके चिन्तनीय! व्यापक और वर्धनशील होनेके कारण आपका जो ब्रह्म नामक स्वरूप है, उस विकाररहित रूपको मैं नमस्कार करता हूँ॥ ५५ ॥ हे प्रभो! आप हजारों मस्तकोंवाले, हजारों नेत्रोंवाले और हजारों चरणोंवाले परमपुरुष हैं, आप सर्वत्र व्याप्त हैं और [ पृथिवी आदि आवरणोंके सहित ] सम्पूर्ण ब्रह्माण्डको व्याप्त कर दस गुण महाप्रमाणसे स्थित हैं ॥ ५६ ॥ |
|---|---|
| शुद्धः सूक्ष्मोऽखिलव्यापी प्रधानात्परतः पुमान् ।<br>यस्य रूपं नमस्तस्मै पुरुषाय गुणाशिने ॥ ५२ | |
| भूरादीनां समस्तानां गन्धादीनां च शाश्वतः ।<br>बुद्ध्यादीनां प्रधानस्य पुरुषस्य च यः परः ॥ ५३ | |
| तं ब्रह्मभूतमात्मानमशेषजगतः पतिम् ।<br>प्रपद्ये शरणं शुद्धं त्वद्रूपं परमेश्वर ॥ ५४ | |
| बृहत्त्वाद्वृंहणत्वाच्च यद्रूपं ब्रह्मसंज्ञितम् ।<br>तस्मै नमस्ते सर्वात्मन्योगिचिन्त्याविकारिणे ॥ ५५ | |
| सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात् ।<br>सर्वव्यापी भुवः स्पर्शादत्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम् ॥ ५६ |
अ० १२] * प्रथम अंश * ५५
यद्भूतं यच्च वै भव्यं पुरुषोत्तम तद्भवान्। त्वत्तो विराद् स्वराद् सम्राट् त्वत्तश्चाप्यधिपूरुषः ॥ ५७ अत्यरिच्यत सोऽधश्च तिर्यगूर्ध्वं च वै भुवः । त्वत्तो विश्वमिदं जातं त्वत्तो भूतभविष्यती ॥ ५८ त्वद्रूपधारिणश्चान्तर्भूतं सर्वमिदं जगत्। त्वत्तो यज्ञः सर्वहुतः पृषदाज्यं पशुर्द्विधा ॥ ५९ त्वत्तः ऋचोऽथ सामानि त्वत्तश्छन्दांसि जज्ञिरे। त्वत्तो यजूंष्यजायन्त त्वत्तोऽश्वाश्चैकतो दतः ॥ ६० गावस्त्वत्तः समुद्भूतास्त्वत्तोऽजा अवयो मृगाः । त्वन्मुखाद्ब्राह्मणास्त्वत्तो बाहोः क्षत्रमजायत ॥ ६१ वैश्यास्तवोरुजाः शूद्रास्तव पद्भ्यां समुद्गताः। अक्ष्णोः सूर्योऽनिलः प्राणाच्चन्द्रमा मनसस्तव ॥ ६२ प्राणोऽन्तःसुषिराज्जातो मुखादग्निरजायत । नाभितो गगनं द्यौश्च शिरसः समवर्तत ॥ ६३ दिशः श्रोत्रात्क्षितिः पद्भ्यां त्वत्तः सर्वमभूदिदम् ॥ ६४ न्यग्रोधः सुमहानल्पे यथा बीजे व्यवस्थितः । संयमे विश्वमखिलं बीजभूते तथा त्वयि ॥ ६५ बीजादङ्कुरसम्भूतौ न्यग्रोधस्तु समुत्थितः । विस्तारं च यथा याति त्वत्तः सृष्टौ तथा जगत् ॥ ६६ यथा हि कदली नान्या त्वक्पत्रादपि दृश्यते। एवं विश्वस्य नान्यस्त्वं त्वत्स्थायीश्वर दृश्यते ॥ ६७ ह्लादिनी सन्धिनी संवित्त्वय्येका सर्वसंस्थितौ । ह्लादतापकरी मिश्रा त्वयि नो गुणवर्जिते ॥ ६८ पृथग्भूतैकभूताय भूतभूताय ते नमः । प्रभूतभूतभूताय तुभ्यं भूतात्मने नमः ॥ ६९ व्यक्तं प्रधानपुरुषौ विराद् सम्राट् स्वराद् तथा । विभाव्यतेऽन्तःकरणे पुरुषेष्वक्षयो भवान् ॥ ७० सर्वस्मिन्सर्वभूतस्त्वं सर्वः सर्वस्वरूपधृक् । सर्वं त्वत्तस्ततश्च त्वं नमः सर्वात्मनेऽस्तु ते ॥ ७१
हे पुरुषोत्तम ! भूत और भविष्यत् जो कुछ पदार्थ हैं वे सब आप ही हैं तथा विराट्, स्वराट्, सम्राट् और अधिपूरुष (ब्रह्मा) आदि भी सब आपहीसे उत्पन्न हुए हैं ॥ ५७ ॥ वे ही आप इस पृथिवीके नीचे-ऊपर और इधर-उधर सब ओर बढ़े हुए हैं। यह सम्पूर्ण जगत् आपहीसे उत्पन्न हुआ है तथा आपहीसे भूत और भविष्यत् हुए हैं ॥ ५८ ॥ यह सम्पूर्ण जगत् आपके स्वरूपभूत ब्रह्माण्डके अन्तर्गत है [फिर आपके अन्तर्गत होनेकी तो बात ही क्या है] जिसमें सभी पुरोडाशोंका हवन होता है वह यज्ञ, पृषदाज्य (दधि और घृत) तथा [ग्राम्य और वन्य] दो प्रकारके पशु आपहीसे उत्पन्न हुए हैं ॥ ५९ ॥ आपहीसे ऋक्, साम और गायत्री आदि छन्द प्रकट हुए हैं, आपहीसे यजुर्वेदका प्रादुर्भाव हुआ है और आपहीसे अश्व तथा एक ओर दाँतवाले महिष आदि जीव उत्पन्न हुए हैं ॥ ६० ॥ आपहीसे गौओं, बकरियों, भेड़ों और मृगोंकी उत्पत्ति हुई है; आपहीके मुखसे ब्राह्मण, बाहुओंसे क्षत्रिय, जंघाओंसे वैश्य और चरणोंसे शूद्र प्रकट हुए हैं तथा आपहीके नेत्रोंसे सूर्य, प्राणसे वायु, मनसे चन्द्रमा, भीतरी छिद्र (नासारन्ध्र)-से प्राण, मुखसे अग्नि, नाभिसे आकाश, सिरसे स्वर्ग, श्रोत्रसे दिशाएँ और चरणोंसे पृथिवी आदि उत्पन्न हुए हैं; इस प्रकार हे प्रभो ! यह सम्पूर्ण जगत् आपहीसे प्रकट हुआ है ॥ ६१–६४ ॥ जिस प्रकार नन्हेंसे बीजमें बड़ा भारी वट-वृक्ष रहता है उसी प्रकार प्रलय-कालमें यह सम्पूर्ण जगत् बीज-स्वरूप आपहीमें लीन रहता है ॥ ६५ ॥ जिस प्रकार बीजसे अंकुररूपमें प्रकट हुआ वट-वृक्ष बढ़कर अत्यन्त विस्तारवाला हो जाता है उसी प्रकार सृष्टिकालमें यह जगत् आपहीसे प्रकट होकर फैल जाता है ॥ ६६ ॥ हे ईश्वर ! जिस प्रकार केलेका पौधा छिलके और पत्तोंसे अलग दिखायी नहीं देता उसी प्रकार जगत्से आप पृथक् नहीं हैं, वह आपहीमें स्थित देखा जाता है ॥ ६७ ॥ सबके आधारभूत आपमें ह्लादिनी (निरन्तर आह्लादित करनेवाली) और सन्धिनी (विच्छेदरहित) संवित् (विद्याशक्ति) अभिन्नरूपसे रहती हैं। आपमें (विषयजन्य) आह्लाद या ताप देनेवाली (सात्त्विकी या तामसी) अथवा उभयमिश्रा (राजसी) कोई भी संवित् नहीं है, क्योंकि आप निर्गुण हैं ॥ ६८ ॥ आप [कार्यदृष्टिसे] पृथक्-रूप और [कारणदृष्टिसे] एकरूप हैं। आप ही भूतसूक्ष्म हैं और आप ही नाना जीवरूप हैं। हे भूतान्तरात्मन् ! ऐसे आपको मैं नमस्कार करता हूँ ॥ ६९ ॥ [योगियोंके द्वारा] अन्तःकरणमें आप ही महत्तत्त्व, प्रधान, पुरुष, विराट्, सम्राट् और स्वराट् आदि रूपोंसे भावना किये जाते हैं और [क्षयशील] पुरुषोंमें आप नित्य अक्षय हैं ॥ ७० ॥ आकाशादि सर्वभूतोंमें सार अर्थात् उनके गुणरूप आप ही हैं; समस्त रूपोंको धारण
५६ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १२
सर्वात्मकोऽसि सर्वेश सर्वभूतस्थितो यतः।
कथयामि ततः किं ते सर्वं वेत्सि हृदि स्थितम् ॥ ७२
सर्वात्मन्सर्वभूतेश सर्वसत्त्वसमुद्भव।
सर्वभूतो भवान्वेत्ति सर्वसत्त्वमनोरथम् ॥ ७३
यो मे मनोरथो नाथ सफलः स त्वया कृतः।
तपश्च तप्तं सफलं यद्दृष्टोऽसि जगत्पते ॥ ७४
श्रीभगवानुवाच
तपसस्तत्फलं प्राप्तं यद्दृष्टोऽहं त्वया ध्रुव।
मद्दर्शनं हि विफलं राजपुत्र न जायते ॥ ७५
वरं वरय तस्मात्त्वं यथाभिमतमात्मनः।
सर्वं सम्पद्यते पुंसां मयि दृष्टिपथं गते ॥ ७६
ध्रुव उवाच
भगवन्भूतभव्येश सर्वस्यास्ते भवान् हृदि।
किमज्ञातं तव ब्रह्मन्मनसा यन्मयेक्षितम् ॥ ७७
तथापि तुभ्यं देवेश कथयिष्यामि यन्मया।
प्रार्थ्यते दुर्विनीतेन हृदयेनातिदुर्लभम् ॥ ७८
किं वा सर्वजगत्स्रष्टः प्रसन्ने त्वयि दुर्लभम्।
त्वत्प्रसादफलं भुङ्क्ते त्रैलोक्यं मघवानपि ॥ ७९
नैतद्राजासनं योग्यमजातस्य ममोदरात्।
इतिगर्वादवोचन्मां सपत्नी मातुरुच्चकैः ॥ ८०
आधारभूतं जगतः सर्वेषामुत्तमोत्तमम्।
प्रार्थयामि प्रभो स्थानं त्वत्प्रसादादतोऽव्ययम् ॥ ८१
श्रीभगवानुवाच
यत्त्वया प्रार्थ्यते स्थानमेतत्प्राप्स्यसि वै भवान्।
त्वयाऽहं तोषितः पूर्वमन्यजन्मनि बालक ॥ ८२
त्वमासीर्ब्राह्मणः पूर्वं मय्येकाग्रमतिः सदा।
मातापित्रोश्च शुश्रूषुर्निजधर्मानुपालकः ॥ ८३
कालेन गच्छता मित्रं राजपुत्रस्तवाभवत्।
यौवनेऽखिलभोगाढ्यो दर्शनीयोज्ज्वलाकृतिः ॥ ८४
तत्सङ्गात्तस्य तामृद्धिमवलोक्यातिदुर्लभाम्।
भवेयं राजपुत्रोऽहमिति वाञ्छा त्वया कृता ॥ ८५
करनेवाले होनेसे सब कुछ आप ही हैं; सब कुछ आपहीसे हुआ है; अतएव सबके द्वारा आप ही हो रहे हैं इसलिये आप सर्वात्माको नमस्कार है ॥ ७१ ॥ हे सर्वेश्वर ! आप सर्वात्मक हैं; क्योंकि सम्पूर्ण भूतोंमें व्याप्त हैं; अतः मैं आपसे क्या कहूँ? आप स्वयं ही सब हृदयस्थित बातोंको जानते हैं॥ ७२॥ हे सर्वात्मन्! हे सर्वभूतेश्वर ! हे सब भूतोंके आदि-स्थान ! आप सर्वभूतरूपसे सभी प्राणियोंके मनोरथोंको जानते हैं ॥ ७३ ॥ हे नाथ ! मेरा जो कुछ मनोरथ था वह तो आपने सफल कर दिया और हे जगत्पते ! मेरी तपस्या भी सफल हो गयी, क्योंकि मुझे आपका साक्षात् दर्शन प्राप्त हुआ ॥ ७४॥
श्रीभगवान् बोले— हे ध्रुव ! तुमको मेरा साक्षात् दर्शन प्राप्त हुआ, इससे अवश्य ही तेरी तपस्या तो सफल हो गयी; परन्तु हे राजकुमार ! मेरा दर्शन भी तो कभी निष्फल नहीं होता ॥ ७५ ॥ इसलिये तुझको जिस वरकी इच्छा हो वह माँग ले। मेरा दर्शन हो जानेपर पुरुषको सभी कुछ प्राप्त हो सकता है ॥ ७६ ॥
ध्रुव बोले— हे भूतभव्येश्वर भगवन् ! आप सभीके अन्तःकरणोंमें विराजमान हैं। हे ब्रह्मन्! मेरे मनकी जो कुछ अभिलाषा है वह क्या आपसे छिपी हुई है ? ॥ ७७ ॥ तो भी, हे देवेश्वर ! मैं दुर्विनीत जिस अति दुर्लभ वस्तुकी हृदयसे इच्छा करता हूँ उसे आपकी आज्ञानुसार आपके प्रति निवेदन करूँगा ॥ ७८ ॥ हे समस्त संसारको रचनेवाले परमेश्वर ! आपके प्रसन्न होनेपर (संसारमें) क्या दुर्लभ है? इन्द्र भी आपके कृपाकटाक्षके फलरूपसे ही त्रिलोकीको भोगता है ॥ ७९ ॥
प्रभो ! मेरी सौतेली माताने गर्वसे अति बढ़-बढ़कर मुझसे यह कहा था कि 'जो मेरे उदरसे उत्पन्न नहीं है उसके योग्य यह राजासन नहीं है' ॥ ८० ॥ अतः हे प्रभो ! आपके प्रसादसे मैं उस सर्वोत्तम एवं अव्यय स्थानको प्राप्त करना चाहता हूँ जो सम्पूर्ण विश्वका आधारभूत हो ॥ ८१ ॥
श्रीभगवान् बोले— अरे बालक ! तूने अपने पूर्वजन्ममें भी मुझे सन्तुष्ट किया था, इसलिये तू जिस स्थानकी इच्छा करता है उसे अवश्य प्राप्त करेगा ॥ ८२ ॥ पूर्व जन्ममें तू एक ब्राह्मण था और मुझमें निरन्तर एकाग्रचित्त रहनेवाला, माता-पिताका सेवक तथा स्वधर्मका पालन करनेवाला था ॥ ८३ ॥ कालान्तरमें एक राजपुत्र तेरा मित्र हो गया। वह अपनी युवावस्थामें सम्पूर्ण भोगोंसे सम्पन्न और अति दर्शनीय रूपलावण्ययुक्त था ॥ ८४ ॥ उसके संगसे उसके दुर्लभ वैभवको देखकर तेरी ऐसी इच्छा हुई कि 'मैं भी राजपुत्र होऊँ' ॥ ८५ ॥
अ० १२ ] * प्रथम अंश * ५७
| ततो यथाभिलषिता प्राप्ता ते राजपुत्रता।<br>उत्तानपादस्य गृहे जातोऽसि ध्रुव दुर्लभे॥ ८६<br>अन्येषां दुर्लभं स्थानं कुले स्वायम्भुवस्य यत्॥ ८७ | अतः हे ध्रुव! तुझको अपनी मनोवांछित राजपुत्रता प्राप्त हुई और जिन स्वायम्भुवमनुके कुलमें और किसीको स्थान मिलना अति दुर्लभ है, उन्हींके घरमें तूने उत्तानपादके यहाँ जन्म लिया॥ ८६-८७॥ |
| तस्यैतदपरं बाल येनाहं परितोषितः।<br>मामाराध्य नरो मुक्तिमवाप्नोत्यविलम्बिताम्॥ ८८<br>मय्यर्पितमना बाल किमु स्वर्गादिकं पदम्॥ ८९ | अरे बालक! [औरोंके लिये यह स्थान कितना ही दुर्लभ हो परन्तु] जिसने मुझे सन्तुष्ट किया है उसके लिये तो यह अत्यन्त तुच्छ है। मेरी आराधना करनेसे तो मोक्षपद भी तत्काल प्राप्त हो सकता है, फिर जिसका चित्त निरन्तर मुझमें ही लगा हुआ है उसके लिये स्वर्गादि लोकोंका तो कहना ही क्या है?॥ ८८-८९॥ |
| त्रैलोक्यादधिके स्थाने सर्वताराग्रहाश्रयः।<br>भविष्यति न सन्देहो मत्प्रसादाद्भवाञ्ध्रुव॥ ९० | हे ध्रुव! मेरी कृपासे तू निस्सन्देह उस स्थानमें, जो त्रिलोकीमें सबसे उत्कृष्ट है, सम्पूर्ण ग्रह और तारामण्डलका आश्रय बनेगा॥ ९०॥ |
| सूर्यात्सोमात्तथा भौमात्सोमपुत्राद्बृहस्पतेः।<br>सितार्कतनयादीनां सर्वर्क्षाणां तथा ध्रुव॥ ९१<br>सप्तर्षीणामशेषाणां ये च वैमानिकाः सुराः।<br>सर्वेषामुपरि स्थानं तव दत्तं मया ध्रुव॥ ९२ | हे ध्रुव! मैं तुझे वह ध्रुव (निश्चल) स्थान देता हूँ जो सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र और शनि आदि ग्रहों, सभी नक्षत्रों, सप्तर्षियों और सम्पूर्ण विमानचारी देवगणोंसे ऊपर है॥ ९१-९२॥ |
| केचिच्चतुर्युगं यावत्केचिन्मन्वन्तरं सुराः।<br>तिष्ठन्ति भवतो दत्ता मया वै कल्पसंस्थितिः॥ ९३ | देवताओंमेंसे कोई तो केवल चार युगतक और कोई एक मन्वन्तरतक ही रहते हैं; किन्तु तुझे मैं एक कल्पतककी स्थिति देता हूँ॥ ९३॥ |
| सुनीतिरपि ते माता त्वदासन्नातिनिर्मला।<br>विमाने तारका भूत्वा तावत्कालं निवत्स्यति॥ ९४ | तेरी माता सुनीति भी अति स्वच्छ तारारूपसे उतने ही समयतक तेरे पास एक विमानपर निवास करेगी॥ ९४॥ |
| ये च त्वां मानवाः प्रातः सायं च सुसमाहिताः।<br>कीर्त्तयिष्यन्ति तेषां च महत्पुण्यं भविष्यति॥ ९५ | और जो लोग समाहित-चित्तसे सायंकाल और प्रातःकालके समय तेरा गुण-कीर्तन करेंगे उनको महान् पुण्य होगा॥ ९५॥ |
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले— |
| एवं पूर्वं जगन्नाथाद्देवदेवाज्जनार्दनात्।<br>वरं प्राप्य ध्रुवः स्थानमध्यास्ते स महामते॥ ९६ | हे महामते! इस प्रकार पूर्वकालमें जगत्पति देवाधिदेव भगवान् जनार्दनसे वर पाकर ध्रुव उस अत्युत्तम स्थानमें स्थित हुए॥ ९६॥ |
| स्वयं शुश्रूषणाद्धर्म्यान्मातापित्रोश्च वै तथा।<br>द्वादशाक्षरमाहात्म्यात्तपसश्च प्रभावतः॥ ९७<br>तस्याभिमानमृद्धिं च महिमानं निरीक्ष्य हि।<br>देवासुराणामाचार्यः श्लोकमत्रोशना जगौ॥ ९८ | हे मुने! अपने माता-पिताकी धर्मपूर्वक सेवा करनेसे तथा द्वादशाक्षर-मन्त्रके माहात्म्य और तपके प्रभावसे उनके मान, वैभव एवं प्रभावकी वृद्धि देखकर देव और असुरोंके आचार्य शुक्रदेवने ये श्लोक कहे हैं—॥ ९७-९८॥ |
| अहोऽस्य तपसो वीर्यमहोऽस्य तपसः फलम्।<br>यदेनं पुरतः कृत्वा ध्रुवं सप्तर्षयः स्थिताः॥ ९९ | 'अहो! इस ध्रुवके तपका कैसा प्रभाव है? अहो ! इसकी तपस्याका कैसा अद्भुत फल है जो इस ध्रुवको ही आगे रखकर सप्तर्षिगण स्थित हो रहे हैं॥ ९९॥ |
| ध्रुवस्य जननी चेयं सुनीतिर्नाम सूनृता।<br>अस्याश्च महिमानं कः शक्तो वर्णयितुं भुवि॥ १०० | इसकी यह सुनीति नामवाली माता भी अवश्य ही सत्य और हितकर वचन बोलनेवाली है*। संसारमें ऐसा कौन है |
* सुनीतिने ध्रुवको पुण्योपार्जन करनेका उपदेश दिया था, जिसके आचरणसे उन्हें उत्तम लोक प्राप्त हुआ। अतएव 'सुनीति' सूनृता कही गयी है।
५८ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १३
| त्रैलोक्याश्रयतां प्राप्तं परं स्थानं स्थिरायति।<br>स्थानं प्राप्ता परं धृत्वा या कुक्षिविवरे ध्रुवम्॥ १०१<br>यश्चैतत्कीर्त्तयेन्नित्यं ध्रुवस्यारोहणं दिवि।<br>सर्वपापविनिर्मुक्तः स्वर्गलोके महीयते॥ १०२<br>स्थानभ्रंशं न चाप्नोति दिवि वा यदि वा भुवि।<br>सर्वकल्याणसंयुक्तो दीर्घकालं स जीवति॥ १०३ | जो इसकी महिमाका वर्णन कर सके? जिसने अपनी कोखमें उस ध्रुवको धारण करके त्रिलोकीका आश्रयभूत अति उत्तम स्थान प्राप्त कर लिया, जो भविष्यमें भी स्थिर रहनेवाला है'॥ १००-१०१ ॥<br>जो व्यक्ति ध्रुवके इस दिव्यलोक-प्राप्तिके प्रसंगका कीर्तन करता है वह सब पापोंसे मुक्त होकर स्वर्गलोकमें पूजित होता है॥ १०२॥ वह स्वर्गमें रहे अथवा पृथिवीमें, कभी अपने स्थानसे च्युत नहीं होता तथा समस्त मंगलोंसे भरपूर रहकर बहुत कालतक जीवित रहता है॥ १०३॥ |
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इति श्रीविष्णुपुराणे प्रथमऽंशे द्वादशोऽध्यायः॥ १२॥
तेरहवाँ अध्याय
राजा वेन और पृथुका चरित्र
श्रीपराशर उवाच
| ध्रुवाच्छिष्टं च भव्यं च भव्याच्छम्भुर्व्यजायत।<br>शिष्टेराधत्त सुच्छाया पञ्चपुत्रानकल्मषान्॥ १<br>रिपुं रिपुञ्जयं विप्रं वृकलं वृकतेजसम्।<br>रिपोराधत्त बृहती चाक्षुषं सर्वतेजसम्॥ २<br>अजीजनत्पुष्करिण्यां वारुण्यां चाक्षुषो मनुम्।<br>प्रजापतेरात्मजायां वीरणस्य महात्मनः॥ ३<br>मनोरजायन्त दश नड्वलायां महौजसः।<br>कन्यायां तपतां श्रेष्ठ वैराजस्य प्रजापतेः॥ ४<br>कुरुः पुरुः शतद्युम्नस्तपस्वी सत्यवाञ्छुचिः।<br>अग्निष्टोमोऽतिरात्रश्च सुद्युम्नश्चेति ते नव।<br>अभिमन्युश्च दशमो नड्वलायां महौजसः॥ ५<br>कुरोरजनयत्पुत्रान् षडाग्नेयी महाप्रभान्।<br>अङ्गं सुमनसं ख्यातिं क्रतुमङ्गिरसं शिबिम्॥ ६<br>अङ्गात्सुनीथापत्यं वै वेनमेकमजायत।<br>प्रजार्थमृषयस्तस्य ममन्थुर्दक्षिणं करम्॥ ७<br>वेनस्य पाणौ मथिते सम्बभूव महामुने।<br>वैन्यो नाम महीपालो यः पृथुः परिकीर्त्तितः॥ ८<br>येन दुग्धा मही पूर्वं प्रजानां हितकारणात्॥ ९ | श्रीपराशरजी बोले—हे मैत्रेय! ध्रुवसे [उसकी पत्नीने] शिष्टि और भव्यको उत्पन्न किया और भव्यसे शम्भुका जन्म हुआ तथा शिष्टिके द्वारा उसकी पत्नी सुच्छायाने रिपु, रिपुंजय, विप्र, वृकल और वृकतेजा नामक पाँच निष्पाप पुत्र उत्पन्न किये। उनमेंसे रिपुके द्वारा बृहतीके गर्भसे महातेजस्वी चाक्षुषका जन्म हुआ॥ १-२॥ चाक्षुषने अपनी भार्या पुष्करणीसे, जो वरुण-कुलमें उत्पन्न और महात्मा वीरण प्रजापतिकी पुत्री थी, मनुको उत्पन्न किया [जो छठे मन्वन्तरके अधिपति हुए]॥ ३॥ तपस्वियोंमें श्रेष्ठ मनुसे वैराज प्रजापतिकी पुत्री नड्वलाके गर्भमें दस महातेजस्वी पुत्र उत्पन्न हुए॥ ४॥ नड्वलासे कुरु, पुरु, शतद्युम्न, तपस्वी, सत्यवान्, शुचि, अग्निष्टोम, अतिरात्र तथा नवाँ सुद्युम्न और दसवाँ अभिमन्यु इन महातेजस्वी पुत्रोंका जन्म हुआ॥ ५॥ कुरुके द्वारा उसकी पत्नी आग्नेयीने अंग, सुमना, ख्याति, क्रतु, अंगिरा और शिबि इन छः परम तेजस्वी पुत्रोंको उत्पन्न किया॥ ६॥ अंगसे सुनीथाके वेन नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। ऋषियोंने उस (वेन)-के दाहिने हाथका सन्तानके लिये मन्थन किया था॥ ७॥ हे महामुने! वेनके हाथका मन्थन करनेपर उससे वैन्य नामक महीपाल उत्पन्न हुए जो पृथु नामसे विख्यात हैं और जिन्होंने प्रजाके हितके लिये पूर्वकालमें पृथिवीको दुहा था॥ ८-९॥ |
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अ० १३ ] * प्रथम अंश * ५९
श्रीमैत्रेय उवाच किमर्थं मथितः पाणिर्वेनस्य परमर्षिभिः। यत्र जज्ञे महावीर्यः स पृथुर्मुविसत्तम ॥ १० श्रीपराशर उवाच सुनीथा नाम या कन्या मृत्योः प्रथमतॊऽभवत्। अङ्गस्य भार्या सा दत्ता तस्यां वेनो व्यजायत ॥ ११ स मातामहदोषेण तेन मृत्योः सुतात्मजः। निसर्गादेव मैत्रेय दुष्ट एव व्यजायत ॥ १२ अभिषिक्तो यदा राज्ये स वेनः परमर्षिभिः। घोषयामास स तदा पृथिव्यां पृथिवीपतिः ॥ १३ न यष्टव्यं न दातव्यं न होतव्यं कथञ्चन। भोक्ता यज्ञस्य कस्त्वन्यो ह्यहं यज्ञपतिः प्रभुः ॥ १४ ततस्तमृषयः पूर्वं सम्पूज्य पृथिवीपतिम्। ऊचुः सामकलं वाक्यं मैत्रेय समुपस्थिताः ॥ १५ ऋषय ऊचुः भो भो राजन् शृणुष्व त्वं यद्वदाम महीपते। राज्यदेहोपकाराय प्रजानां च हितं परम् ॥ १६ दीर्घसत्रेण देवेशं सर्वयज्ञेश्वरं हरिम्। पूजयिष्याम भद्रं ते तस्यांशस्ते भविष्यति ॥ १७ यज्ञेन यज्ञपुरुषो विष्णुः सम्प्रीणितो नृप। अस्माभिर्भवतः कामान्सर्वानेव प्रदास्यति ॥ १८ यज्ञैर्यज्ञेश्वरो येषां राष्ट्रे सम्पूज्यते हरिः। तेषां सर्वेप्सितावाप्तिं ददाति नृप भूभृताम् ॥ १९ वेन उवाच मत्तः कोऽभ्यधिकोऽन्योऽस्ति कश्चाराध्यो ममापरः। कोऽयं हरिरिति ख्यातो यो वो यज्ञेश्वरो मतः ॥ २० ब्रह्मा जनार्दनः शम्भुरिन्द्रो वायुर्यमो रविः। हुतभुग्वरुणो धाता पूषा भूमिर्निशाकरः ॥ २१ एते चान्ये च ये देवाः शापानुग्रहकारिणः। नृपस्यैते शरीरस्थाः सर्वदेवमयो नृपः ॥ २२ एवं ज्ञात्वा मयाज्ञप्तं यद्यथा क्रियतां तथा। न दातव्यं न यष्टव्यं न होतव्यं च भो द्विजाः ॥ २३ भर्तृशुश्रूषणं धर्मो यथा स्त्रीणां परो मतः। ममाज्ञापालनं धर्मो भवतां च तथा द्विजाः ॥ २४
श्रीमैत्रेयजी बोले—हे मुनिश्रेष्ठ! परमर्षियोंने वेनके हाथको क्यों मथा जिससे महापराक्रमी पृथुका जन्म हुआ ? ॥ १०॥ श्रीपराशरजी बोले—हे मुने! मृत्युकी सुनीथा नामवाली जो प्रथम पुत्री थी वह अंगको पत्नीरूपसे दी (व्याही) गयी थी। उसीसे वेनका जन्म हुआ ॥ ११ ॥ हे मैत्रेय! वह मृत्युकी कन्याका पुत्र अपने मातामह (नाना)-के दोषसे स्वभावसे ही दुष्ट प्रकृति हुआ ॥ १२ ॥ उस वेनका जिस समय महर्षियोंद्वारा राजपद्पर अभिषेक हुआ उसी समय उस पृथिवीपतिने संसारभरमें यह घोषणा कर दी कि 'भगवान्, यज्ञपुरुष मैं ही हूँ, मुझसे अतिरिक्त यज्ञका भोक्ता और स्वामी हो ही कौन सकता है? इसलिये कभी कोई यज्ञ, दान और हवन आदि न करे' ॥ १३-१४ ॥ हे मैत्रेय! तब ऋषियोंने उस पृथिवीपतिके पास उपस्थित हो पहले उसकी खूब प्रशंसा कर सान्त्वनायुक्त मधुर वाणीसे कहा ॥ १५ ॥ ऋषिगण बोले—हे राजन्! हे पृथिवीपते! तुम्हारे राज्य और देहके उपकार तथा प्रजाके हितके लिये हम जो बात कहते हैं, सुनो ॥ १६॥ तुम्हारा कल्याण हो; देखो, हम बड़े-बड़े यज्ञोंद्वारा जो सर्व-यज्ञेश्वर देवाधिपति भगवान् हरिका पूजन करेंगे उसके फलमेंसे तुमको भी [छठा] भाग मिलेगा ॥ १७ ॥ हे नृप! इस प्रकार यज्ञोंके द्वारा यज्ञपुरुष भगवान् विष्णु प्रसन्न होकर हमलोगोंके साथ तुम्हारी भी सकल कामनाएँ पूर्ण करेंगे ॥ १८ ॥ हे राजन् जिन राजाओंके राज्यमें यज्ञेश्वर भगवान् हरिका यज्ञोंद्वारा पूजन किया जाता है, वे उनकी सभी कामनाओंको पूर्ण कर देते हैं ॥ १९॥ वेन बोला—मुझसे भी बढ़कर ऐसा और कौन है जो मेरा भी पूजनीय है? जिसे तुम यज्ञेश्वर मानते हो वह 'हरि' कहलानेवाला कौन है? ॥ २०॥ ब्रह्मा, विष्णु, महादेव, इन्द्र, वायु, यम, सूर्य, अग्नि, वरुण, धाता, पूषा, पृथिवी और चन्द्रमा तथा इनके अतिरिक्त और भी जितने देवता शाप और कृपा करनेमें समर्थ हैं वे सभी राजाके शरीरमें निवास करते हैं, इस प्रकार राजा सर्वदेवमय है ॥ २१-२२ ॥ हे ब्राह्मणो ! ऐसा जानकर मैंने जैसी जो कुछ आज्ञा की है वैसा ही करो। देखो, कोई भी दान, यज्ञ और हवन आदि न करे ॥ २३ ॥ हे द्विजगण! स्त्रीका परमधर्म जैसे अपने पतिकी सेवा करना ही माना गया है वैसे ही आपलोगोंका धर्म भी मेरी आज्ञाका पालन करना ही है ॥ २४ ॥
| ६० | * श्रीविष्णुपुराण * | [ अ० १३ |
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| ऋषय ऊचुः | **ऋषिगण बोले—**महाराज! आप ऐसी आज्ञा दीजिये, जिससे धर्मका क्षय न हो। देखिये, यह सारा जगत् हवि (यज्ञमें हवन की हुई सामग्री)-का ही परिणाम है॥ २५॥ | | देह्यनुज्ञां महाराज मा धर्मो यातु सङ्क्षयम्।<br>हविषां परिणामोऽयं यदेतदखिलं जगत्॥ २५ | | | श्रीपराशर उवाच | **श्रीपराशरजी बोले—**महर्षियोंके इस प्रकार बारम्बार समझाने और कहने-सुननेपर भी जब वेनने ऐसी आज्ञा नहीं दी तो वे अत्यन्त क्रुद्ध और अमर्षयुक्त होकर आपसमें कहने लगे—'इस पापीको मारो, मारो!॥ २६-२७॥ जो अनादि और अनन्त यज्ञपुरुष प्रभु विष्णुकी निन्दा करता है वह अनाचारी किसी प्रकार पृथ्वीपति होनेके योग्य नहीं है'॥ २८॥ ऐसा कह मुनिगणोंने, भगवान्की निन्दा आदि करनेके कारण पहले ही मरे हुए उस राजाको मन्त्रसे पवित्र किये हुए कुशाओंसे मार डाला॥ २९॥ | | इति विज्ञाप्यमानोऽपि स वेनः परमर्षिभिः।<br>यदा ददाति नानुज्ञां प्रोक्तः प्रोक्तः पुनः पुनः॥ २६ | | | ततस्ते मुनयः सर्वे कोपामर्षसमन्विताः।<br>हन्यतां हन्यतां पाप इत्यूचुस्ते परस्परम्॥ २७ | | | यो यज्ञपुरुषं विष्णुमनादिनिधनं प्रभुम्।<br>विनिन्दत्यधमाचारो न स योग्यो भुवः पतिः॥ २८ | | | इत्युक्त्वा मन्त्रपूतैस्तैः कुशैर्मुनिगणा नृपम्।<br>निजघ्नुर्निहतं पूर्वं भगवन्निन्दनादिना॥ २९ | | | ततश्च मुनयो रेणुं ददृशुः सर्वतो द्विज।<br>किमेतदिति चासन्नान्प्रपच्छुस्ते जनांस्तदा॥ ३० | हे द्विज! तदनन्तर उन मुनीश्वरोंने सब ओर बड़ी धूलि उठती देखी, उसे देखकर उन्होंने अपने निकटवर्ती लोगोंसे पूछा—“यह क्या है?”॥ ३०॥ उन पुरुषोंने कहा—“राष्ट्रके राजाहीन हो जानेसे दीन-दुखिया लोगोंने चोर बनकर दूसरोंका धन लूटना आरम्भ कर दिया है॥ ३१॥ हे मुनिवरो! उन तीव्र वेगवाले परधनहारी चोरोंके उत्पातसे ही यह बड़ी भारी धूलि उड़ती दीख रही है”॥ ३२॥ | | आख्यातं च जनैस्तेषां चोरीभूतैरराजके।<br>राष्ट्रे तु लोकैरारब्धं परस्वादानमातुरैः॥ ३१ | | | तेषामुदीर्णवेगानां चोराणां मुनिसत्तमाः।<br>सुमहान् दृश्यते रेणुः परवित्तापहारिणाम्॥ ३२ | | | ततः सम्मन्त्र्य ते सर्वे मुनयस्तस्य भूभृतः।<br>ममन्थूरुं पुत्रार्थमनपत्यस्य यत्नतः॥ ३३ | तब उन सब मुनीश्वरोंने आपसमें सलाह कर उस पुत्रहीन राजाकी जंघाका पुत्रके लिये यत्नपूर्वक मन्थन किया॥ ३३॥ उसकी जंघाके मथनेपर उससे एक पुरुष उत्पन्न हुआ जो जले ठूँठके समान काला, अत्यन्त नाटा और छोटे मुखवाला था॥ ३४॥ उसने अति आतुर होकर उन सब ब्राह्मणोंसे कहा—'मैं क्या करूँ?' उन्होंने कहा—“निषीद (बैठ)” अतः वह 'निषाद' कहलाया॥ ३५॥ इसलिये हे मुनिशार्दूल! उससे उत्पन्न हुए लोग विन्ध्याचलनिवासी पाप-परायण निषादगण हुए॥ ३६॥ उस निषादरूप द्वारसे राजा वेनका सम्पूर्ण पाप निकल गया। अतः निषादगण वेनके पापोंका नाश करनेवाले हुए॥ ३७॥ | | मथ्यमानात्समुत्तस्थौ तस्योरोः पुरुषः किल।<br>दग्धस्थूणाप्रतीकाशः खर्वाटास्योऽतिह्रस्वकः॥ ३४ | | | किं करोमीति तान्सर्वान्स विप्रानाह चातुरः।<br>निषीदेति तमूचुस्ते निषादस्तेन सोऽभवत्॥ ३५ | | | ततस्तत्सम्भवा जाता विन्ध्यशैलनिवासिनः।<br>निषादा मुनिशार्दूल पापकर्मोपलक्षणाः॥ ३६ | | | तेन द्वारेण तत्पापं निष्क्रान्तं तस्य भूपतेः।<br>निषादास्ते ततो जाता वेनकल्मषनाशनाः॥ ३७ | | | तस्यैव दक्षिणं हस्तं ममन्थुस्ते ततो द्विजाः॥ ३८ | फिर उन ब्राह्मणोंने उसके दायें हाथका मन्थन किया। उसका मन्थन करनेसे परम प्रतापी वेनसुवन पृथु प्रकट हुए, जो अपने शरीरसे प्रज्वलित अग्निके समान देदीप्यमान थे॥ ३८-३९॥ इसी समय आजगव नामक आद्य (सर्वप्रथम) धनुष और दिव्य बाण तथा कवच आकाशसे गिरे॥ ४०॥ | | मथ्यमाने च तत्राभूत्पृथुर्वैन्यः प्रतापवान्।<br>दीप्यमानः स्ववपुषा साक्षादग्निरिव ज्वलन्॥ ३९ | | | आद्यमाजगवं नाम खात्यपात ततो धनुः।<br>शराश्च दिव्या नभसः कवचं च पपात ह॥ ४० | |
अ० १३ ] * प्रथम अंश * ६१
तस्मिन् जाते तु भूतानि सम्प्रहृष्टानि सर्वशः ॥ ४१
सत्पुत्रेणैव जातेन वेनोऽपि त्रिदिवं ययौ ।
पुन्नाम्नो नरकात् त्रातः सुतेन सुमहात्मना ॥ ४२
तं समुद्राश्च नद्यश्च रत्नान्यादाय सर्वशः ।
तोयानि चाभिषेकार्थं सर्वाण्येवोपत्तस्थिरे ॥ ४३
पितामहश्च भगवान्देवैराङ्गिरसैः सह ।
स्थावराणि च भूतानि जङ्गमानि च सर्वशः ।
समागम्य तदा वैन्यमभ्यषिञ्चन्नराधिपम् ॥ ४४
हस्ते तु दक्षिणे चक्रं दृष्ट्वा तस्य पितामहः ।
विष्णोरंशं पृथुं मत्वा परितोषं परं ययौ ॥ ४५
विष्णुचक्रं करे चिह्नं सर्वेषां चक्रवर्तिनाम् ।
भवत्यव्याहतो यस्य प्रभावस्त्रिदशैरपि ॥ ४६
महता राजराज्येन पृथुर्वैन्यः प्रतापवान् ।
सोऽभिषिक्तो महातेजा विधिवद्धर्म्मकोविदैः ॥ ४७
पित्राऽपरञ्जितास्तस्य प्रजास्तेनानुरञ्जिताः ।
अनुरागात्ततस्तस्य नाम राजेत्यजायत ॥ ४८
आपस्तस्तम्भिरे चास्य समुद्रमभियास्यतः ।
पर्वताश्च ददुर्मार्गं ध्वजभङ्गश्च नाभवत् ॥ ४९
अकृष्टपच्या पृथिवी सिद्ध्यन्त्यन्नानि चिन्तया ।
सर्वकामदुघा गावः पुटके पुटके मधु ॥ ५०
तस्य वै जातमात्रस्य यज्ञे पैतामहे शुभे ।
सूतः सूत्यां समुत्पन्नः सौत्येऽहनि महामतिः ॥ ५१
तस्मिन्नेव महायज्ञे जज्ञे प्राज्ञोऽथ मागधः ।
प्रोक्तौ तदा मुनिवरैस्तावभौ सूतमागधौ ॥ ५२
स्तूयतामेष नृपतिः पृथुर्वैन्यः प्रतापवान् ।
कर्म्मैतदनुरूपं वां पात्रं स्तोत्रस्य चापरम् ॥ ५३
ततस्तावूचतुर्विप्रान्सर्वानेव कृताञ्जली ।
अद्य जातस्य नो कर्म ज्ञायतेऽस्य महीपतेः ॥ ५४
गुणा न चास्य ज्ञायन्ते न चास्य प्रथितं यशः ।
स्तोत्रं किमाश्रयं त्वस्य कार्यमस्माभिरुच्यताम् ॥ ५५
ऋषय ऊचुः
करिष्यत्येष यत्कर्म चक्रवर्ती महाबलः ।
गुणा भविष्या ये चास्य तैरयं स्तूयतां नृपः ॥ ५६
उनके उत्पन्न होनेसे सभी जीवोंको अति आनन्द हुआ और केवल सत्पुत्रके ही जन्म लेनेसे वेन भी स्वर्गलोकको चला गया। इस प्रकार महात्मा पुत्रके कारण ही उसकी पुम् अर्थात् नरकसे रक्षा हुई ॥ ४१-४२ ॥
महाराज पृथुके अभिषेकके लिये सभी समुद्र और नदियाँ सब प्रकारके रत्न और जल लेकर उपस्थित हुए ॥ ४३ ॥ उस समय आंगिरस देवगणोंके सहित पितामह ब्रह्माजीने और समस्त स्थावर-जंगम प्राणियोंने वहाँ आकर महाराज वैन्य (वेनपुत्र)-का राज्याभिषेक किया ॥ ४४ ॥ उनके दाहिने हाथमें चक्रका चिह्न देखकर उन्हें विष्णुका अंश जान पितामह ब्रह्माजीको परम आनन्द हुआ ॥ ४५ ॥ यह श्रीविष्णुभगवान्के चक्रका चिह्न सभी चक्रवर्ती राजाओंके हाथमें हुआ करता है। उनका प्रभाव कभी देवताओंसे भी कुण्ठित नहीं होता ॥ ४६ ॥
इस प्रकार महातेजस्वी और परम प्रतापी वेनपुत्र धर्मकुशल महानुभावोंद्वारा विधिपूर्वक अति महान् राजराजेश्वरपदपर अभिषिक्त हुए ॥ ४७ ॥ जिस प्रजाको पिताने अपरुक्त (अप्रसन्न) किया था उसीको उन्होंने अनुरंजित (प्रसन्न) किया, इसलिये अनुरंजन करनेसे उनका नाम ‘राजा’ हुआ ॥ ४८ ॥ जब वे समुद्रमें चलते थे तो जल बहनेसे रुक जाता था, पर्वत उन्हें मार्ग देते थे और उनकी ध्वजा कभी भंग नहीं हुई ॥ ४९ ॥ पृथिवी बिना जोते-बोये धान्य पकानेवाली थी; केवल चिन्तनमात्रसे ही अन्न सिद्ध हो जाता था, गौएँ कामधेनुरूपा थीं और पत्ते-पत्तेमें मधु भरा रहता था ॥ ५० ॥
राजा पृथुने उत्पन्न होते ही पैतामह यज्ञ किया; उससे सोमाभिषवके दिन सूति (सोमाभिषवभूमि)-से महामति सूतकी उत्पत्ति हुई ॥ ५१ ॥ उसी महायज्ञमें बुद्धिमान् मागधका भी जन्म हुआ। तब मुनिवरोंने उन दोनों सूत और मागधोंसे कहा— ॥ ५२ ॥ ‘तुम इन प्रतापवान् वेनपुत्र महाराज पृथुकी स्तुति करो। तुम्हारे योग्य यही कार्य है और राजा भी स्तुतिके ही योग्य हैं’ ॥ ५३ ॥ तब उन्होंने हाथ जोड़कर सब ब्राह्मणोंसे कहा—‘‘ये महाराज तो आज ही उत्पन्न हुए हैं, हम इनके कोई कर्म तो जानते ही नहीं हैं ॥ ५४ ॥ अभी इनके न तो कोई गुण प्रकट हुए हैं और न यश ही विख्यात हुआ है; फिर कहिये, हम किस आधारपर इनकी स्तुति करें’’ ॥ ५५ ॥
**ऋषिगण बोले—**ये महाबली चक्रवर्ती महाराज भविष्यमें जो-जो कर्म करेंगे और इनके जो-जो भावी गुण होंगे उन्हींसे तुम इनका स्तवन करो ॥ ५६ ॥
| ६२ | * श्रीविष्णुपुराण * | [ अ० १३ |
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| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले— यह सुनकर राजाको भी परम सन्तोष हुआ; उन्होंने सोचा 'मनुष्य सद्गुणोंके कारण ही प्रशंसाका पात्र होता है; अतः मुझको भी गुण उपार्जन करने चाहिये॥ ५७॥ इसलिये अब स्तुतिके द्वारा ये जिन गुणोंका वर्णन करेंगे मैं भी सावधानतापूर्वक वैसा ही करूँगा॥ ५८॥ यदि यहाँपर ये कुछ त्याज्य अवगुणोंको भी कहेंगे तो मैं उन्हें त्यागूँगा।' इस प्रकार राजाने अपने चित्तमें निश्चय किया॥ ५९॥ तदनन्तर उन (सूत और मागध) दोनोंने परम बुद्धिमान् वेननन्दन महाराज पृथुका, उनके भावी कर्मोंके आश्रयसे स्वरसहित भली प्रकार स्तवन किया॥ ६०॥ [उन्होंने कहा—] 'ये महाराज सत्यवादी, दानशील, सत्य मर्यादावाले, लज्जाशील, सुहृद्, क्षमाशील, पराक्रमी और दुष्टोंका दमन करनेवाले हैं॥ ६१॥ ये धर्मज्ञ, कृतज्ञ, दयावान्, प्रियभाषी, माननीयोंको मान देनेवाले, यज्ञपरायण, ब्रह्मण्य, साधुसमाजमें सम्मानित और शत्रु तथा मित्रके साथ समान व्यवहार करनेवाले हैं'॥ ६२-६३॥ इस प्रकार सूत और मागधके कहे हुए गुणोंको उन्होंने अपने चित्तमें धारण किया और उसी प्रकारके कार्य किये॥ ६४॥ तब उन पृथिवीपतिने पृथिवीका पालन करते हुए बड़ी-बड़ी दक्षिणाओंवाले अनेकों महान् यज्ञ किये॥ ६५॥ अराजकताके समय ओषधियोंके नष्ट हो जानेसे भूखसे व्याकुल हुई प्रजा पृथिवीनाथ पृथुके पास आयी और उनके पूछनेपर प्रणाम करके उनसे अपने आनेका कारण निवेदन किया॥ ६६॥ |
| ततः स नृपतिस्तोषं तच्छ्रुत्वा परमं ययौ।<br>सद्गुणैः श्लाघ्यतामेति तस्माल्लभ्या गुणा मम॥ ५७ | |
| तस्माद्यदद्य स्तोत्रेण गुणनिवर्णनं त्विमौ।<br>करिष्येते करिष्यामि तदेवाहं समाहितः॥ ५८ | |
| यदिमौ वर्जनीयं च किञ्चिदत्र वदिष्यतः।<br>तदहं वर्जयिष्यामीत्येवं चक्रे मतिं नृपः॥ ५९ | |
| अथ तौ चक्रतुः स्तोत्रं पृथोर्वैन्यस्य धीमतः।<br>भविष्यैः कर्मभिः सम्यक् सुस्वरौ सूतमागधौ॥ ६० | |
| सत्यवाग्दानशीलोऽयं सत्यसन्धो नरेश्वरः।<br>ह्रीमान्मैत्रः क्षमाशीलो विक्रान्तो दुष्टशासनः॥ ६१ | |
| धर्मज्ञश्च कृतज्ञश्च दयावान् प्रियभाषकः।<br>मान्यान्मानयिता यज्वा ब्रह्मण्यः साधुसम्मतः॥ ६२ | |
| समः शत्रौ च मित्रे च व्यवहारस्थितौ नृपः॥ ६३ | |
| सूतेनोक्तान् गुणानित्थं स तदा मागधेन च।<br>चकार हृदि तादृक् च कर्मणा कृतवानसौ॥ ६४ | |
| ततस्तु पृथिवीपालः पालयन्पृथिवीमिमाम्।<br>इयाज विविधैर्यज्ञैर्महद्भिर्भूरिदक्षिणैः॥ ६५ | |
| तं प्रजाः पृथिवीनाथमुपतस्थुः क्षुधार्दिताः।<br>ओषधीषु प्रणष्टासु तस्मिन्काले ह्यराजके।<br>तमूचुस्ते नताः पृष्टास्तत्रागमनकारणम्॥ ६६ | |
| प्रजा ऊचुः | प्रजाने कहा— हे प्रजापति नृपश्रेष्ठ! अराजकताके समय पृथिवीने समस्त ओषधियाँ अपनेमें लीन कर ली हैं, अतः आपकी सम्पूर्ण प्रजा क्षीण हो रही है॥ ६७॥ विधाताने आपको हमारा जीवनदायक प्रजापति बनाया है; अतः क्षुधारूप महारोगसे पीड़ित हम प्रजाजनोंको आप जीवनरूप ओषधि दीजिये॥ ६८॥ |
| अराजके नृपश्रेष्ठ धरित्र्या सकलौषधीः।<br>ग्रस्तास्ततः क्षयं यान्ति प्रजाः सर्वाः प्रजेश्वर॥ ६७ | |
| त्वन्नो वृत्तिप्रदो धात्रा प्रजापालो निरूपितः।<br>देहि नः क्षुत्परीतानां प्रजानां जीवनौषधीः॥ ६८ | |
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले— यह सुनकर महाराज पृथु अपना आजगव नामक दिव्य धनुष और दिव्य बाण लेकर अत्यन्त क्रोधपूर्वक पृथिवीके पीछे दौड़े॥ ६९॥ तब भयसे अत्यन्त व्याकुल हुई पृथिवी गौका रूप धारणकर भागी और ब्रह्मलोक आदि सभी लोकोंमें गयी॥ ७०॥ समस्त भूतोंको धारण करनेवाली पृथिवी जहाँ-जहाँ भी गयी वहीं-वहीं उसने वेनपुत्र पृथुको शस्त्र-सन्धान किये अपने पीछे आते देखा॥ ७१॥ |
| ततस्तु नृपतिर्दिव्यमादायाजगवं धनुः।<br>शरांश्च दिव्यान्कुपितः सोन्वधावद्वसुन्धराम्॥ ६९ | |
| ततो ननाश त्वरिता गौर्भूत्वा च वसुन्धरा।<br>सा लोकान्ब्रह्मलोकादीन्सन्त्रासादगमन्मही॥ ७० | |
| यत्र यत्र ययौ देवी सा तदा भूतधारिणी।<br>तत्र तत्र तु सा वैन्यं ददृशेऽभ्युद्यतायुधम्॥ ७१ |
अ० १३ ] * प्रथम अंश * ६३
ततस्तं प्राह वसुधा पृथुं पृथुपराक्रमम्।
प्रवेपमाना तद्बाणपरित्राणपरायणा ॥ ७२
पृथिव्युवाच
स्त्रीवधे त्वं महापापं किं नरेन्द्र न पश्यसि।
येन मां हन्तुमत्यर्थं प्रकरोषि नृपोद्यमम् ॥ ७३
पृथुरुवाच
एकस्मिन् यत्र निधनं प्रापिते दुष्टकारिणि।
बहूनां भवति क्षेमं तस्य पुण्यप्रदो वधः ॥ ७४
पृथिव्युवाच
प्रजानामुपकाराय यदि मां त्वं हनिष्यसि।
आधारः कः प्रजानां ते नृपश्रेष्ठ भविष्यति ॥ ७५
पृथुरुवाच
त्वां हत्वा वसुधे बाणैर्मच्छासनपराङ्मुखीम्।
आत्मयोगबलेनेमा धारयिष्याम्यहं प्रजाः ॥ ७६
श्रीपराशर उवाच
ततः प्रणम्य वसुधा तं भूयः प्राह पार्थिवम्।
प्रवेपिताङ्गी परमं साध्वसं समुपागता ॥ ७७
पृथिव्युवाच
उपायतः समारब्धाः सर्वे सिद्ध्यन्त्युपक्रमाः।
तस्माद्ददाम्युपायं ते तं कुरुष्व यदीच्छसि ॥ ७८
समस्ता या मया जीर्णा नरनाथ महौषधीः।
यदीच्छसि प्रदास्यामि ताः क्षीरपरिणामिनीः ॥ ७९
तस्मात्प्रजाहितार्थाय मम धर्मभृतां वर।
तं तु वत्सं कुरुष्व त्वं क्षरेयं येन वत्सला ॥ ८०
समां च कुरु सर्वत्र येन क्षीरं समन्ततः।
वरौषधीबीजभूतं बीजं सर्वत्र भावये ॥ ८१
श्रीपराशर उवाच
तत उत्सारयामास शैलान् शतसहस्रशः।
धनुष्कोट्या तदा वैन्यस्तेन शैला विवर्द्धिताः ॥ ८२
न हि पूर्वविसर्गे वै विषमे पृथिवीतले।
प्रविभागः पुराणां वा ग्रामाणां वा पुराऽभवत् ॥ ८३
न सस्यानि न गोरक्ष्यं न कृषिर्न वणिक्पथः।
वैण्यात्प्रभृति मैत्रेय सर्वस्यैतस्य सम्भवः ॥ ८४
हिन्दी अनुवाद
तब उन प्रबल पराक्रमी महाराज पृथुसे, उनके बाणप्रहारसे बचनेकी कामनासे काँपती हुई पृथिवी इस प्रकार बोली ॥ ७२ ॥
पृथिवीने कहा— हे राजेन्द्र! क्या आपको स्त्री-वधका महापाप नहीं दीख पड़ता, जो मुझे मारनेपर आप ऐसे उतारू हो रहे हैं? ॥ ७३ ॥
पृथु बोले— जहाँ एक अनर्थकारीको मार देनेसे बहुतोंको सुख प्राप्त हो उसे मार देना ही पुण्यप्रद है ॥ ७४ ॥
पृथिवी बोली— हे नृपश्रेष्ठ! यदि आप प्रजाके हितके लिये ही मुझे मारना चाहते हैं तो [ मेरे मर जानेपर ] आपकी प्रजाका आधार क्या होगा? ॥ ७५ ॥
पृथुने कहा— अरी वसुधे! अपनी आज्ञाका उल्लंघन करनेवाली तुझे मारकर मैं अपने योगबलसे ही इस प्रजाको धारण करूँगा ॥ ७६ ॥
श्रीपराशरजी बोले— तब अत्यन्त भयभीत एवं काँपती हुई पृथिवीने उन पृथिवीपतिको पुनः प्रणाम करके कहा ॥ ७७ ॥
पृथिवी बोली— हे राजन्! यत्नपूर्वक आरम्भ किये हुए सभी कार्य सिद्ध हो जाते हैं। अतः मैं भी आपको एक उपाय बताती हूँ; यदि आपकी इच्छा हो तो वैसा ही करें ॥ ७८ ॥ हे नरनाथ! मैंने जिन समस्त ओषधियोंको पचा लिया है उन्हें यदि आपकी इच्छा हो तो दुग्धरूपसे मैं दे सकती हूँ ॥ ७९ ॥ अतः हे धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ महाराज! आप प्रजाके हितके लिये कोई ऐसा वत्स (बछड़ा) बनाइये जिससे वात्सल्यवश मैं उन्हें दुग्धरूपसे निकाल सकूँ ॥ ८० ॥ और मुझको आप सर्वत्र समतल कर दीजिये जिससे मैं उत्तमोत्तम ओषधियोंके बीजरूप दुग्धको सर्वत्र उत्पन्न कर सकूँ ॥ ८१ ॥
श्रीपराशरजी बोले— तब महाराज पृथुने अपने धनुषकी कोटिसे सैकड़ों-हजारों पर्वतोंको उखाड़ा और उन्हें एक स्थानपर इकट्ठा कर दिया ॥ ८२ ॥ इससे पूर्व पृथिवीके समतल न होनेसे पुर और ग्राम आदिका कोई नियमित विभाग नहीं था ॥ ८३ ॥ हे मैत्रेय! उस समय अन्न, गोरक्षा, कृषि और व्यापारका भी कोई क्रम न था। यह सब तो वैन्यपुत्र पृथुके समयसे ही आरम्भ हुआ है ॥ ८४ ॥