विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
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| श्लोकाः | अंशाः | अध्या० | श्लो० | श्लोकाः | अंशाः | अध्या० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| तस्याप्यष्टौ सुताः | ४ | २४ | २३ | तस्योपरि जलौघस्य | १ | ४ | ४६ |
| तस्यापि पुत्रो बिन्दुसारः | ४ | २४ | २९ | तस्योदावसुः | ४ | ५ | २४ |
| तस्याप्यशोकवर्द्धनः | ४ | २४ | ३० | तस्योर्वो जातकर्मादि० | ४ | ३ | ३६ |
| तस्यापि बृहद्रथनामा | ४ | २४ | ३१ | तात यद्येकैकां गाम् | ४ | १३ | १२२ |
| तस्यापि पुत्रः शान्तकर्णिः | ४ | २४ | ४५ | तातातिरमणीयः | ४ | २ | १०४ |
| तस्यापि शान्तकर्णिस्ततः | ४ | २४ | ४८ | तातैष वह्निः पवनेरितोऽपि | १ | १७ | ४७ |
| तस्याप्यध्ययनं यज्ञः | ३ | ८ | ३१ | तानि च तदपत्यानि | ४ | २४ | १०१ |
| तस्याप्येका कन्या | ४ | १ | ४७ | तानेवाहं न पश्यामि | १ | १९ | ३६ |
| तस्यामप्यस्य विशालः | ४ | १ | ४९ | तान्दृष्ट्वा यादवानाह | ५ | ३७ | ३० |
| तस्यापि सज्जयोऽभूत् | ४ | १ | ५३ | तान्दृष्ट्वा जलनिष्क्रान्ताः | १ | १५ | ३ |
| तस्याप्यम्बरीषः | ४ | २ | ६ | तान्दृष्ट्वा नारदो विप्र | १ | १५ | ९२ |
| तस्यापि चान्द्रो युवनाश्वः | ४ | २ | ३६ | तान्निवार्यबलः प्राह | ५ | ३५ | ७ |
| तस्यापि कुवलयाश्वः | ४ | २ | ३९ | तान्यपि षष्टिः पुत्र० | ४ | ४ | ११ |
| तस्यापि विदूरथः | ४ | २० | ३ | तापत्रयेणाभिहतम् | १ | १७ | ८० |
| तस्यापि क्षेम्यस्ततश्च | ४ | २३ | ६ | ताभिः प्रसन्नचित्ताभिः | ५ | १३ | ४८ |
| तस्यापि रिपुञ्जयः | ४ | २३ | १२ | ताभ्यां चापत्यार्थमोर्वः | ४ | ४ | २ |
| तस्याञ्चातिमहाभीम् | ५ | ७ | ३ | ताभ्यां तद्नमपमृगं कृतम् | ४ | ४ | ४२ |
| तस्यामस्याभवत्पुत्रः | ५ | २८ | ७ | ताभ्यां च नागराजाय | ६ | ८ | ४६ |
| तस्यापि रुक्मिणः पौत्रीम् | ५ | २८ | ८ | तामग्रतो हरिदृष्ट्वा | ५ | ३३ | ३७ |
| तस्यां च शिशुपालः | ४ | १४ | ४५ | तामवेक्ष्य जनस्त्रासात् | ५ | ३४ | ३४ |
| तस्यां च मध्यरात्रौ | ४ | २ | ५० | तामप्याशु स तत्याज | १ | ५ | ३८ |
| तस्यांशुमतो दिलीपं | ४ | ४ | ३४ | तामसस्यान्तरे देवाः | ३ | १ | १६ |
| तस्यां चाशेषक्षत्रहन्तारम् | ४ | ७ | ३६ | तामसस्यान्तरे चैव | ३ | १ | ३९ |
| तस्यां च पञ्चपुत्रान् | ४ | ८ | २ | तामाह ललितं कृष्णः | ५ | २० | २ |
| तस्यां चासौ क्रथकैशिकसंज्ञौ | ४ | १२ | ३७ | तामादायात्मनो मूर्ध्नि | १ | ९ | ६ |
| तस्यां चासौ दशपुत्रान् | ४ | १४ | २७ | तामात्मनः स शिरसः | १ | ९ | ८ |
| तस्यां च धर्मानिलेन्द्रैः | ४ | १४ | ३५ | तामिस्रमन्धतामिस्रम् | १ | ६ | ४१ |
| तस्यां च नासत्यम् | ४ | १४ | ३८ | तारकाविमले व्योम्नि | ५ | १० | ७ |
| तस्यां च दन्तवक्रो नाम | ४ | १४ | ४० | तारामयं भगवतः | २ | ९ | १ |
| तस्यां च सन्तर्दनादयः | ४ | १४ | ४२ | तालजङ्घस्य तालजङ्घाख्यम् | ४ | ११ | २३ |
| तस्यां जज्ञे च प्रद्युम्नः | ५ | २६ | १२ | तावच्च भगवच्चक्रेणाशु | ४ | १५ | १५ |
| तस्यां तथावुषा स्वप्ने | ५ | ३२ | १५ | तावच्च गन्धवैरप्यतीवोज्ज्वला | ४ | ६ | ५८ |
| तस्येदं चान्यत् | ४ | २ | २१ | तावच्च ब्रह्मणोऽन्तिके | ४ | १ | ६८ |
| तस्यैव दक्षिणं हस्तम् | १ | १३ | ३८ | तावत्संखैरहोरात्रम् | १ | ३ | ९ |
| तस्यैतदपरं बाल | १ | १२ | ८८ | तावदार्त्तिस्तथा वाञ्छा | १ | ९ | ७३ |
| तस्यैव योऽनु गुणभुक् | ६ | ८ | ६१ | तावत्प्रमाणा च निशा | ३ | २ | ५१ |
| तस्यैव कल्पनाहीनम् | ६ | ७ | ९२ | तावदत्र स्यन्दने भवता | ४ | १३ | ९६ |
| तस्यैकशतं पुत्राणाम् | ४ | १९ | ३९ | ता वार्यमाणाः पतिभिः | ५ | १३ | ५९ |
| तस्यैतां दानवाश्चेष्टाम् | १ | १८ | १ | तानुभावपि चैवास्ताम् | ६ | ६ | १० |
| तस्यैवंयुग्ममिथुनात् | ४ | १३ | १२७ | ताश्च सर्वा वसुदेव० | ४ | १४ | ९९ |
| तस्योत्संगे घनश्याम० | ५ | १८ | ३९ | तासामपत्यान्यभवन् | १ | १५ | १३४ |