विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
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| श्लोकाः | अंशाः | अध्या० | श्लो० | श्लोकाः | अंशाः | अध्या० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| तासां चाप्सरसामुर्वशी | ४ | ६ | ६८ | तृतीयेऽप्यन्तरे ब्रह्मन् | ३ | १ | १३ |
| तासां च रुक्मिणीसत्यभामा० | ४ | १५ | ३५ | तृप्तये जायते पुंसः | ३ | १८ | २९ |
| तासु चाष्टावयुतानि | ४ | १५ | ३६ | तृप्तेष्वेतेषु विकिरेत् | ३ | १५ | ३८ |
| तासु क्षीणास्वशेषाषु | १ | ६ | १७ | तृष्णा लक्ष्मीर्जगन्नाथः | १ | ८ | ३३ |
| तासु देवास्तथादैत्याः | १ | १५ | ७८ | ते च यदुसैनिकास्तत्र | ४ | १३ | ४७ |
| तास्विमे कुरुपाञ्चालाः | २ | ३ | १५ | ते च गोपा महद्दृष्ट्वा | ५ | ५ | २३ |
| तां च भार्गवः | ४ | ७ | १३ | ते चापि तेन | ४ | ९ | २० |
| तां च गान्दिनीं कन्याम् | ४ | १३ | १२५ | तेजसा नागराजानम् | १ | ९ | ९१ |
| तां च पाण्डुरुवाह | ४ | १४ | ३४ | तेजसी भास्कराग्नये | २ | ८ | २३ |
| तां चाक्रूरकृतवर्म० | ४ | १३ | ६५ | तेजसो भवतां देवाः | १ | ९ | ७६ |
| तां चान्तःप्रसवाम् | ४ | ६ | २० | तेजोबलैश्वर्यमहावबोध० | ६ | ५ | ८५ |
| तां चामृतस्राविणीम् | ४ | २ | ६२ | ते तस्य मुखनिःश्वास० | १ | ९ | ८६ |
| तां चापश्यन् | ४ | ६ | ६२ | ते तथैव ततश्चक्रुः | १ | १८ | ४ |
| तां तुष्टुवुर्मुदा युक्ताः | १ | ९ | १०१ | ते तु तद्वचनं श्रुत्वा | १ | १५ | ९५ |
| तां पिता दातुकामोऽभूत् | ३ | १८ | ६४ | तेन द्वारेण तत्पापम् | १ | १३ | ३७ |
| तां प्रलापवतीमेवम् | १ | १२ | २२ | तेन सप्तर्षयो युक्ताः | ४ | २४ | १०६ |
| तां रेवतीं रैवतभूपकन्याम् | ४ | १ | ९६ | तेन सह कन्यान्तः० | ४ | २ | ८७ |
| तांश्चापि नष्टान् विज्ञाय | १ | १५ | १०१ | तेन च प्रीतिमतातम्पुत्रः | ४ | ८ | १३ |
| तांश्च सर्वानैव कंसः | ४ | १५ | २७ | तेन व्यस्ता यथा वेदाः | ३ | ४ | ६ |
| तांश्चिच्छेद हरिः पाशान् | ५ | २९ | १७ | तेन प्रीणात्यशेषाणि | २ | ११ | २५ |
| ताः कन्यास्तांस्तथा नागान् | ५ | २९ | ३३ | तेन यज्ञान्यथाप्रोक्तान् | २ | ९ | २० |
| ताः पिबन्ति मुदा युक्ताः | २ | ४ | ६७ | तेन वृद्धिं परां नीतः | २ | ९ | १९ |
| तितिक्षोरपि रुशद्रथः | ४ | १८ | ११ | तेन संप्रेरितं ज्योतिः | २ | ८ | ५६ |
| तिर्यक्स्रोतास्तु यः प्रोक्तः | १ | ५ | २२ | तेन मायासहस्रं तत् | १ | १९ | २० |
| तिर्यङ्मनुष्यदेवादि० | ३ | १७ | ३० | तेन च क्रोधाश्रितेनाम्बुना | ४ | ४ | ५७ |
| तिलगन्धोदकैर्युक्तम् | ३ | १३ | २८ | तेन विक्षिभितश्चाब्धिः | ५ | ३६ | ८ |
| तिलैस्सप्ताष्टभिर्वापि | ३ | १४ | २७ | तेन विप्र कृतं सर्वम् | ५ | ३६ | १० |
| तिष्ठन्न मूत्रयेत्तद्वत् | ३ | १२ | २८ | तेनास्या गर्भस्सप्तवर्षाणि | ४ | ३ | २८ |
| तिस्रः कोट्यस्सहस्राणाम् | ४ | १५ | ४५ | तेनाविष्टमथात्मानम् | १ | १९ | २३ |
| तीरम्मृत्तद्रसं प्राप्य | २ | २ | २३ | तेनाख्यातंमिदं सर्वम् | ३ | ७ | १० |
| तुतोष परमप्रीतया | ५ | ३० | ३३ | तेनानुयातः कृष्णोऽपि | ५ | २३ | १८ |
| तुभ्यं यथावन्मैत्रेय | ६ | ८ | ४ | तेनान्नेन प्रजारतात | १ | १३ | ८८ |
| तुरंगस्यास्य शक्रोऽपि | ५ | १६ | २२ | तेनातिपतता तत्र | ५ | ७ | १२ |
| तुल्यवेषास्तु मनुजाः | २ | ४ | ८२ | तेनाप्युषिणा वरुणः | ४ | ७ | १५ |
| तुषाः कणाश्च सन्तो वै | २ | ७ | ३८ | तेनेयमशेषद्वीपवती | ४ | ११ | १३ |
| तुष्टात्मनस्तृतीयस्तु | १ | ५ | १४ | तेनेयं दूषिता सर्वा | ५ | ७ | ७ |
| तुष्टाव च पुनर्धीमान् | १ | २० | ८ | तेनेयं नागवर्येण | २ | ५ | २७ |
| तुष्टुवुर्निहते तस्मिन् | ५ | १४ | १४ | तेनैवोक्तं पठेद्देवम् | ३ | ९ | ५ |
| तृणबिन्दोः प्रसादेन | ४ | १ | ६१ | तेनैव च भगवता | ४ | ३ | ३४ |
| तृणैरास्तीर्य वसुधाम् | ३ | ११ | १५ | तेनैव चाग्निविधिना | ४ | ६ | ९३ |
| तृतीये चोशना व्यासः | ३ | ३ | १२ | तेनैव मुखनिःश्वास० | १ | ९ | ८७ |