विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
पृष्ठ 513, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 513
५०२
| श्लोकाः | अंशाः | अध्या० | श्लो० | श्लोकाः | अंशाः | अध्या० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| तेनैव सह गन्तव्यम् | ५ | ३७ | ६१ | ते सम्प्रयोगाल्लोभस्य | २ | ८ | ९६ |
| तेऽप्यन्येषां तथैवोचुः | ३ | १८ | २२ | ते सुखप्रीतिबहुलाः | १ | ५ | १३ |
| तेऽप्युचुर्न वयं विद्मः | ६ | ६ | १५ | ते हि दुष्टविषज्वालाः | ४ | ७ | १३ |
| ते ब्राह्मणा वेदवेदानु० | ४ | २० | २५ | तैजसानीन्द्रियाण्याहुर्देवाः | १ | २ | ४७ |
| तेभ्योऽपि नागगन्धर्व० | ६ | ७ | ६६ | तैरप्येकैकेन प्रत्याख्यातः | ४ | १० | १४ |
| तेभ्यः स्वधा सुते | १ | १० | १९ | तैरप्यन्ये परे तैश्च | ३ | १८ | १५ |
| तेभ्यः पूर्वतराश्च | ४ | २४ | १२५ | तैरन्तःस्थैरनन्तोऽसौ | ५ | २ | १८ |
| ते वाह्यन्तस्त्वन्योन्य० | ५ | ९ | १५ | तैरस्याप्यतितेजोमतेः | ४ | २० | २२ |
| तेषामपीह सततम् | १ | १५ | १३८ | तैरियं पृथिवी सर्वा | १ | २२ | १५ |
| तेषामिन्द्रश्च भविता | ३ | २ | २६ | तैलपीडा यथा चक्रम् | २ | १२ | २७ |
| तेषामिन्द्रो महावीर्यः | ३ | २ | २२ | तैलस्त्रीमांससम्भोगी | ३ | ११ | ११९ |
| तेषामुत्सादनार्थाय | ४ | १५ | ४८ | तैश्च गन्धर्ववीर्यावधूतैः | ४ | ३ | ५ |
| तेषामभावे सर्वेषाम् | ३ | १३ | ३२ | तैश्च विमिश्रा जनपदाः | ४ | २४ | ७२ |
| तेषामभावे मौर्याः | ४ | २४ | २७ | तैश्चापि सामवेदोऽसौ | ३ | ६ | ८ |
| तेषामन्ते पृथिवीम् | ४ | २४ | ३३ | तैश्चोकं पुरुकुत्साय | १ | २ | ९ |
| तेषामपत्यं विन्ध्यशक्तिः | ४ | २४ | ५६ | तैस्तु द्वादशसाहस्रैः | ६ | ३ | ११ |
| तेषामुदीर्णवेगानाम् | १ | १३ | ३२ | तैः षड्भिरयनं वर्षम् | १ | ३ | १० |
| तेषां तु सन्ततावन्ये | १ | १० | १६ | तोयान्तःस्थां महीं ज्ञात्वा | १ | ४ | ७ |
| तेषां मध्ये महाभाग | १ | १५ | १४३ | तौ च मृगयामुपयातौ | ४ | १९ | ६७ |
| तेषां नद्यस्तु सप्तैव | २ | ४ | १० | तौ च दृष्ट्वा विकसद्वक्त्र० | ५ | १७ | २५ |
| तेषां वंशप्रसूतैश्च | २ | १ | ४२ | तौ बाहू स च मे मुष्टिः | ५ | ३८ | ३२ |
| तेषां गणश्च देवानाम् | ३ | २ | १६ | तौ समुत्पन्नविज्ञानः | ५ | २१ | १ |
| तेषां स्वागतदानादि | ३ | ९ | १४ | तौ हत्वा वसुदेवं च | ५ | १५ | १८ |
| तेषां कुशाम्बः शत्रुतुल्यः | ४ | ७ | ९ | तं कालयवनं नाम | ५ | २३ | ५ |
| तेषां च बहूनि कौशिकगोत्राणि | ४ | ७ | ३९ | तं च पिता शशाप | ४ | १० | १२ |
| तेषां च पृथुश्रवाः | ४ | १२ | ६ | तं च स्यमन्तकाभिलषित० | ४ | १३ | ४४ |
| तेषां वृकदेवोपदेवा | ४ | १४ | १८ | तं च भगवान् | ४ | ६ | ७ |
| तेषां च प्रद्युम्नचारुदेष्णः | ४ | १५ | ३७ | तं चोग्रतपसमवलोक्य | ४ | ७ | १० |
| तेषां प्रधानः काम्पिल्याधिपतिः | ४ | १९ | ४० | तं तत्र पतितं दृष्ट्वा | ५ | ७ | १८ |
| तेषां यवीयान् पृषतः | ४ | १९ | ७३ | तं तादृशमसंस्कारम् | २ | १३ | ४८ |
| तेषां च द्रौपदीं पञ्चैव | ४ | २० | ४१ | तं तादृशं महात्मानम् | २ | १३ | ५२ |
| तेषां च बीजभूतानाम् | ४ | २४ | १०० | तं तुष्टुवुस्तोषपरीतचेतसः | १ | ४ | ३० |
| तेषां मुनीनां भूयश्च | ६ | २ | ७ | तं तु ब्रूहि महाभाग | ६ | ७ | २६ |
| तेषां प्रधानभूतास्तु | १ | २१ | २१ | तं ददर्श हरिर्दूरात् | ५ | ३४ | १६ |
| तेषु पुण्या जनपदाः | २ | ४ | ९ | तं दृष्ट्वा साधकं सर्गम् | १ | ५ | ८ |
| तेषु दानवदैतेयाः | २ | ५ | ४ | तं दृष्ट्वा ते तदा देवाः | १ | ९ | ६७ |
| तेषूत्सन्नेषु कैकिलाः | ४ | २४ | ५५ | तं दृष्ट्वा कुपितं पुत्रम् | १ | ११ | १२ |
| तेष्वहं मित्रभावेन | १ | १८ | ४३ | तं दृष्ट्वा गृहमानानाम् | ५ | ३८ | ८० |
| ते समेत्य जगद्योनिम् | १ | १२ | ३२ | तं दृष्ट्वैव महाभागम् | ३ | १८ | ६६ |
| ते सर्वे सर्वदा भद्रे | ५ | १ | ८७ | तं पाञ्चजन्यमापूर्य | ५ | २१ | ३० |
| ते सर्वे समवर्तन्त | १ | ७ | २ | तं पिता मूर्न्युपाघ्राय | १ | २० | ३० |