विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
पृष्ठ 514, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 514
५०३
| श्लोकाः | अंशाः | अध्या० | श्लो० | श्लोकाः | अंशाः | अध्या० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| तं प्रजाः पृथिवीनाथम् | १ | १३ | ६६ | त्रैलोक्यं च श्रियाजुष्टम् | १ | ९ | ११५ |
| तं बालं यातनासंस्थम् | ५ | २१ | ३१ | त्रैलोक्ययज्ञभागाश्च | ३ | १७ | ३७ |
| तं ब्रह्मभूतमात्मानम् | १ | १२ | ५४ | त्रैलोक्यं त्रिदशश्रेष्ठ | १ | ९ | १३८ |
| तं भुक्तवन्तमिच्छातः | २ | १५ | १६ | त्रैलोक्यादधिके स्थाने | १ | १२ | ९० |
| तं समुद्राश्च नद्यश्च | १ | १३ | ४३ | त्रैलोक्याश्रयतां प्राप्तम् | १ | १२ | १०१ |
| तं वन्दमानं चरणौ | ५ | ३८ | ३६ | त्रैलोक्यमेतत्कथितम् | २ | ७ | ११ |
| तं विभुग्नशिरोग्रीवम् | ५ | ७ | ४७ | त्रैलोक्यमेतत्कृतकम् | २ | ७ | १९ |
| तं वृक्षा जगृहुर्गर्भम् | १ | १५ | ४९ | त्रैलोक्यमखिलं ग्रस्त्वा | ३ | २ | ५१ |
| तं शोणितपुरं नीतम् | ५ | ३३ | ११ | त्रैवर्गिकांस्त्यजेत्सर्वान् | ३ | ९ | २६ |
| तं सा प्राह महाभाग | १ | १५ | १४ | त्वक् चक्षुर्नासिका जिह्वा | १ | २ | ४८ |
| त्यक्ता सापि तनुस्तेन | १ | ५ | ३४ | त्वत्तोऽमरास्सपितरः | ५ | २३ | ३५ |
| त्रयस्त्रिंशत्सहस्राणि | २ | १२ | ७ | त्वत्तो हि वेदाध्ययनम् | १ | १ | २ |
| त्रयी वार्ता दण्डनीति० | २ | ४ | ८३ | त्वतः ऋचोऽथ सामानि | १ | १२ | ६० |
| त्रयी समस्तवर्णानाम् | ३ | १७ | ६ | त्वत्प्रसादादिदमशेषम् | ४ | २ | १०६ |
| त्रयीधर्मसमुत्सर्गम् | ३ | १८ | १४ | त्वत्प्रसादान्मुनिश्रेष्ठ | १ | १ | ३ |
| त्रयोदशार्द्धमह्ना तु | २ | ८ | ३८ | त्वत्प्रसादान्मया ज्ञातम् | ६ | ८ | ८ |
| त्रयोदशी रुचिनर्मा | ३ | २ | ३७ | त्वद्धृतं चास्य राष्ट्रस्य | ४ | १३ | १६० |
| त्रय्यारुणेस्सत्यव्रतः | ४ | ३ | २१ | [त्वद्भक्तिप्रवणं ह्येतत् | १ | १२] | |
| त्रय्यारुणः पञ्चदशे | ३ | ३ | १५ | त्वद्रूपधारिणश्चान्त० | १ | १२ | ५९ |
| त्रसदस्युतस्सम्भूतः | ४ | ३ | १७ | त्वन्नो वृत्तिप्रदो धात्रा | १ | १३ | ६८ |
| त्रातास्ताश्च त्वया गावः | ५ | १२ | ९ | त्वन्मयाहं त्वदाधारा | १ | ४ | २० |
| त्राहि त्राहि गोविन्दः | ५ | १६ | ४ | त्वन्मायामूढमनसः | ५ | २३ | ४४ |
| त्रिकूटः शिशिरश्चैव | २ | २ | २७ | त्वमर्जुनेन सहितः | ५ | ३७ | ६३ |
| त्रिगुणं तज्जगद्योनिः | १ | २ | २१ | त्वमप्येतच्छिनीकाय | ६ | ८ | ५१ |
| त्रिनाभिमति पञ्चारे | २ | ८ | ४ | त्वमव्यक्तमनिर्देश्यम् | ५ | १ | ४० |
| त्रिणाचिकेतस्त्रिमधुः | ३ | १५ | २ | त्वमन्तः सर्वभूतानाम् | ५ | २० | ९६ |
| त्रिभिः क्रमैरिमाँल्लोकान् | ३ | १ | ४३ | त्वमासीर्ब्राह्मणः पूर्वम् | १ | १२ | ८३ |
| त्रिरपः प्रीणनार्थाय | ३ | ११ | २८ | त्वमुर्वी सलिलं वह्निः | ३ | १७ | १४ |
| त्रिविधा भावना भूप | ६ | ७ | ४८ | त्वमेव जगतो नाभिः | ५ | ७ | ३६ |
| त्रिविधोऽयमहंकारः | १ | २ | ३६ | त्वया विलोकिता सद्यः | १ | ९ | १३० |
| त्रिशंकोर्हरिश्चन्द्रः | ४ | ३ | २५ | त्वयाहमुद्धृता पूर्वम् | १ | ४ | १३ |
| त्रिशृंगो जारुधिश्चैव | २ | २ | ४४ | त्वया देवि परित्यक्तम् | १ | ९ | १२३ |
| त्रीणि श्राद्धे पवित्राणि | ३ | १५ | ५२ | त्वया यदभयं दत्तम् | ५ | ३३ | ४७ |
| त्रीणि लक्षाणि वर्षाणाम् | ४ | २४ | ११४ | त्वया नाथेन देवानाम् | ५ | २९ | ३ |
| त्रिष्वेतेष्वथ भुक्तेषु | २ | ८ | २९ | त्वया धृतेयं धरणी बिभर्त्ति | ५ | ९ | २९ |
| त्रिंशत्कोट्यस्तु सम्पूर्णाः | १ | ३ | २० | त्वयि भक्तिमतो द्वेषात् | १ | २० | २४ |
| त्रिंशन्मुहूर्तं कथितम् | २ | ८ | ६९ | त्वयैकेन हता भीष्म० | ५ | ३८ | ६४ |
| त्रेतायुगसमः कालः | ४ | ४ | १४ | त्वयोढा शिबिका चेति | २ | १३ | ६५ |
| त्रैराज्यमुषिकजनपदान् | ४ | २४ | ६७ | त्वयोक्तोऽयं गृहस्सत्यम् | ५ | २८ | २० |
| त्रैलोक्येश न ते युक्तम् | ५ | ३० | ७१ | त्वय्यस्ति भगवान् विष्णुः | १ | १९ | ३८ |
| त्रैलोक्यनाथो योऽयम् | ४ | २ | २९ | त्वर्यतां त्वर्यतां हे हे | १ | १८ | ९ |