विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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| श्लोकाः | अंशाः | अध्या० | श्लो० | श्लोकाः | अंशाः | अध्या० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त्वष्टाथ जमदग्निश्च | २ | १० | १६ | दत्तो हि वार्षिकस्सर्वः | ५ | ५ | ३ |
| त्वष्टा त्वष्टुश्च विरजः | २ | १ | ४० | दत्त्वा काम्योदकम् | ३ | ११ | ३९ |
| त्वष्टैव तेजसा तेन | ३ | २ | ११ | दत्त्वा च भिक्षात्रितयम् | ३ | ११ | ६६ |
| त्वामणाराध्य जगताम् | ५ | २३ | ४३ | दत्त्वा चैकां निशां तेन | ४ | ६ | ७४ |
| त्वामाराध्य परं ब्रह्म | १ | ४ | १८ | दत्त्वा च दक्षिणां तेभ्यः | ३ | १५ | ४५ |
| त्वामार्त्ताः शरणं विष्णो | १ | ९ | ७२ | ददर्श च सुगन्धाढ्यम् | ५ | ३० | ३१ |
| त्वामृते यादवाश्चैते | ५ | १५ | २० | ददर्श रामकृष्णौ च | ५ | १९ | ४ |
| त्वं कर्ता च विकर्ता च | ५ | २९ | २६ | ददर्श तत्र चैवोभौ | ५ | १८ | ४५ |
| त्वं कर्ता सर्वभूतानाम् | ५ | २० | १०० | ददर्श चाश्वसमवेतम् | ४ | १३ | ३७ |
| त्वं कर्ता सर्वभूतानाम् | १ | ४ | १५ | ददाह सवनान्देशान् | ५ | ३६ | ६ |
| त्वं किमेतच्छिरः किं नु | २ | १३ | १०२ | ददौ यथाभिलषिताम् | १ | ११ | ५७ |
| त्वं च शुम्भनिशुम्भादीन् | ५ | १ | ८२ | ददौ स दश धर्माय | १ | १५ | १०३ |
| त्वं चाप्ययोनिजा साध्वी | १ | १५ | ७१ | ददौ च शिशुपालाय | ५ | २६ | ३ |
| त्वं परस्त्वं परस्याद्यः | ५ | ७ | ६२ | ददृशे वारुणं छत्रम् | ५ | २९ | ३४ |
| त्वं पयोनिधयश्शैल० | ५ | २३ | ३२ | ददृशे च प्रबुद्धा सा | ५ | ३ | २२ |
| त्वं प्रसादं प्रसन्नात्मन् | १ | ९ | ७४ | ददृशुस्ते मुनिं तत्र | ६ | २ | ४ |
| त्वं ब्रह्मा पशुपतिरर्यमा विधाता | ५ | १८ | ५६ | ददृशुश्चापि ते तत्र | ५ | ७ | २३ |
| त्वं भूतिः सन्नतिः क्षान्तिः | ५ | १ | ८३ | दधानमसिते वस्त्रे | ५ | १८ | ३८ |
| त्वं माता सर्वलोकानाम् | १ | ९ | १२६ | दधिमण्डोदकश्चापि | २ | ४ | ५८ |
| त्वं यज्ञस्त्वं वषट्कारः | १ | ९ | ७१ | दध्ना यवैः सबदरैः | ३ | १० | ६ |
| त्वं राजा शिबिका चेयम् | २ | १३ | ९२ | दध्यक्षतैस्सबदरैः | ३ | १३ | ३ |
| त्वं राजा सर्वलोकस्य | २ | १३ | १०१ | दन्ता गजानां कुलिशाग्रनिष्ठुराः | १ | १७ | ४४ |
| त्वं राजेव द्विजश्रेष्ठ | २ | १६ | १४ | दमस्य पुत्रो राजवर्द्धनः | ४ | १ | ३६ |
| त्वं विश्वनाभिर्भुवनस्य गोप्ता | ५ | १ | ४३ | दमिते कालिये नागे | ५ | १५ | २ |
| त्वं वेदास्त्वं त्वदंगानि | १ | ४ | २३ | दम्भप्रायमसम्बोधि | ३ | १७ | १८ |
| त्वं सिद्धिस्त्वं स्वधा स्वाहा | १ | ९ | ११९ | दया समस्तभूतेषु | ३ | ८ | ३६ |
| त्वं स्वाहा त्वं स्वधा विद्या | ५ | २ | २० | दर्शनान्मात्रेणाहल्याम् | ४ | ४ | ९१ |
| त्वां पातु दिक्षु वैकुण्ठः | ५ | ५ | २१ | दर्शितो मानुषो भावः | ५ | ७ | ४२ |
| त्वां योगिनश्चिन्तयन्ति | १ | १९ | ७३ | दश चाष्टौ च सङ्ग्रामम् | ५ | २२ | ११ |
| त्वां हत्वा वसुधे बाणैः | १ | १३ | ७६ | दशलक्षसंख्याश्च | ४ | १२ | ५ |
| द० | दशयज्ञसहस्राणि | ४ | ११ | १४ | |||
| दक्षकोपाच्च तत्याज | १ | ८ | १३ | दशमो ब्रह्मसावर्णिः | ३ | २ | २५ |
| दक्षिणाग्रेषु दर्भेषु | ३ | १५ | ४१ | दशपञ्चमुहूर्त्तं वै | २ | ८ | ६५ |
| दक्षिणस्यां दिशि तथा | १ | २२ | १२ | दशसाहस्रमेकैकम् | २ | ५ | २ |
| दक्षिणे त्वयने चैव | २ | ८ | ४७ | दशवर्षसहस्राणि | २ | ४ | ७९ |
| दक्षिणोत्तरभूम्यर्द्धं | २ | ८ | २४ | दशवर्षसहस्राणि | १ | १४ | १९ |
| दक्षिणं दन्तमुत्पाट्य | ५ | २० | ३९ | दशभ्यस्तु प्रचेतोभ्यः | १ | १५ | ७४ |
| दक्षिणं चोत्तरं चैव | २ | ८ | ७४ | दशाननाविक्षतराघवाणाम् | ४ | २४ | १४७ |
| दक्षो मरीचिरत्रिश्च | १ | ७ | ३७ | दशोत्तराणि पञ्चैव | २ | ४ | ९१ |
| दत्तं प्रमतिना चैतत् | ६ | ८ | ४९ | दशोत्तरेण पयसा | २ | ७ | २३ |
| दत्ताः पितृभ्यो यत्रापः | २ | ८ | ११७ | दह्यमानं तु तैर्दीप्तैः | ६ | ३ | २२ |