विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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| श्लोकाः | अंशाः | अध्या० | श्लो० | श्लोकाः | अंशाः | अध्या० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| दह्यमानस्त्वमस्माभिः | १ | १८ | २९ | दीनामेकां परित्यक्तुम् | १ | १२ | १६ |
| दातव्योऽनुदिनं पिण्डः | ३ | १३ | ११ | दीप्तिमान् गालवो रामः | ३ | २ | १७ |
| दानपते जानीम एव वयम् | ४ | १३ | १३९ | दीप्तिमत्ताप्रपक्षाद्याः | ५ | ३२ | २ |
| दानमेव धर्महेतुः | ४ | २४ | ८८ | दीर्घसत्रेण देवेशम् | १ | १३ | १७ |
| दानानि दद्यादिच्छातः | ३ | ८ | २६ | दीर्घायुरप्रतिहतः | १ | १८ | ४५ |
| दानं दद्याद्यजेद्देवान् | ३ | ८ | २२ | दुरात्मा वध्यतामेषः | १ | १७ | ३१ |
| दानं च दद्याच्छूद्रोऽपि | ३ | ८ | ३४ | दुरात्मा क्षिप्यतामस्मात् | १ | १९ | ११ |
| दामोदरोऽसौ गोविन्दः | ५ | २४ | १८ | दुर्नीतमेतद्गोविन्द | ५ | २९ | १२ |
| दाम्ना मध्ये ततो बद्ध्वा | ५ | ६ | १४ | दुर्बुद्धे विनिवर्तस्व | १ | १७ | ३५ |
| दाराः पुत्रस्तथागार० | १ | ९ | १२४ | दुर्भिक्षमेव सततम् | ६ | १ | २६ |
| दारिते मत्स्यजठरे | ५ | २७ | ८ | दुर्भिक्षकरपीडाभिः | ६ | १ | ३८ |
| दारुण्यग्निर्यथा तैलम् | २ | ७ | २८ | दुर्वसोर्वह्निनरात्मजः | ४ | १६ | ३ |
| दिगन्तिनां दन्तभूमिम् | १ | १६ | ८ | दुर्वासाः शंकरस्यांशः | १ | ९ | २ |
| दितिर्विनष्टपुत्रा वै | १ | २१ | ३० | दुर्विज्ञेयमिदं वक्तुम् | ५ | ३२ | २० |
| दितेः पुत्रो महावीर्यः | १ | १७ | २ | दुर्वृत्ता निहता दैत्याः | ५ | ३७ | १९ |
| दिग्वाससामयं धर्मः | ३ | १८ | ११ | दुष्टकालिय तिष्ठात्र | ५ | १३ | २७ |
| दित्याः पुत्रद्वयं जज्ञे | १ | १५ | १४० | दुष्टानां शासनाद्राजा | ३ | ८ | २९ |
| दिनानि तानि चेच्छातः | ३ | १३ | १२ | दुष्टेऽम्ब कस्मान्मम | ४ | ६ | २८ |
| दिनान्तसन्ध्यां सूर्येण | ३ | ११ | १०० | दुष्यन्ताच्चक्रवर्ती | ४ | १९ | १० |
| दिनादेर्दीर्घह्रस्वत्वम् | २ | ८ | ४६ | दुस्स्वप्नोपशमं नृणाम् | १ | १३ | ९५ |
| दिने दिने कलालेशैः | १ | १२ | ३४ | दुहितृत्वे चास्य गंगाम् | ४ | ७ | ६ |
| दिलीपस्य भगीरथः | ४ | ४ | ३५ | दुःखान्येव सुखानीति | ५ | २३ | ३९ |
| दिलीपात् प्रतीपः | ४ | २० | ८ | दुःखोत्तराः स्मृता होते | १ | ७ | ३५ |
| दिवसस्य रविर्मध्ये | २ | ८ | १२ | दुःखं यद्वैकशारीरजन्म | ४ | २ | १२१ |
| दिवसपतिर्महावीर्यः | ३ | २ | ३९ | दुःशीला दुष्टशीलेषु | ६ | १ | ३१ |
| दिवसः को विना सूर्यम् | ५ | ७ | २७ | दुःस्वप्ननाशनं नृणाम् | ६ | ८ | ४२ |
| दिवातिथौ तु विमुखे | ३ | ११ | १०८ | दूतं च प्रेषयामास | ५ | ३४ | ६ |
| दिवा स्वप्ने च स्कन्दन्ते | २ | ६ | २९ | दूरस्तैस्तु सम्पर्कः | ३ | १८ | १०२ |
| दिवावृत्पञ्चमश्चात्रा | २ | ४ | ५१ | दूरप्रणष्टनयनः | ६ | ५ | २८ |
| दिवार्करश्मयो यत्र | २ | ५ | ८ | दूरायतनोदकमेव तीर्थहेतुः | ४ | २४ | ९१ |
| दिवीव चक्षुराततम् | २ | ८ | १०३ | दूरे स्थितं महाभागम् | २ | १६ | ३ |
| दिवोदासस्य पुत्रो मित्रायुः | ४ | १९ | ६९ | दृढाश्वाद्दूर्यश्वः | ४ | २ | ४३ |
| दिव्यमाल्याम्बरधरा | १ | ९ | १०५ | दृढाश्वचन्द्राश्वकपिलाश्वाश्च | ४ | २ | ४२ |
| दिव्यज्ञानोपपन्नास्ते | ५ | ३७ | ९ | दृष्टमात्रे ततः कान्ते | ५ | ३२ | २५ |
| दिव्ये वर्षसहस्रे तु | २ | १५ | ८ | दृष्टमात्रश्च तेनासौ | ५ | २३ | २१ |
| दिव्यैर्वर्षसहस्रैस्तु | १ | ३ | ११ | दृष्टमात्रे च तस्मिन्नपहाय | ४ | ६ | ३६ |
| दिव्यं हि रूपं तव वेत्ति नान्यः | ५ | ९ | २८ | दृष्टसूर्यं हि यद्वारि | २ | ९ | १४ |
| दिशि दक्षिणपूर्वस्याम् | ४ | १० | ३१ | दृष्टस्ते भगवन् | ४ | २ | १११ |
| दिशः श्रोत्रात्क्षितिः पद्भ्याम् | १ | १२ | ६४ | दृष्ट्वा च स जगद्द्ध्यः | १ | २० | ७ |
| दिष्टपुत्रस्तु नाभागः | ४ | १ | १९ | दृष्ट्वा निदाघं स ऋभुः | २ | १६ | ४ |
| दिष्ट्या दिष्ट्येति | ४ | १३ | ६० | दृष्ट्वा ममत्वादृतचित्तमेकम् | ४ | २४ | १३५ |