संग्रह पर लौटें




















विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
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५०९
| श्लोकाः | अंशाः | अध्या० | श्लो० | श्लोकाः | अंशाः | अध्या० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| तासां चाप्सरसामुर्वशी | ४ | ६ | ६८ | तृतीयेऽप्यन्तरे ब्रह्मन् | ३ | १ | १३ |
| तासां च रुक्मिणीसत्यभामा० | ४ | १५ | ३५ | तृप्तये जायते पुंसः | ३ | १८ | २९ |
| तासु चाष्टावयुतानि | ४ | १५ | ३६ | तृप्तेष्वेतेषु विकिरेत् | ३ | १५ | ३८ |
| तासु क्षीणास्वशेषाषु | १ | ६ | १७ | तृष्णा लक्ष्मीर्जगन्नाथः | १ | ८ | ३३ |
| तासु देवास्तथादैत्याः | १ | १५ | ७८ | ते च यदुसैनिकास्तत्र | ४ | १३ | ४७ |
| तास्विमे कुरुपाञ्चालाः | २ | ३ | १५ | ते च गोपा महद्दृष्ट्वा | ५ | ५ | २३ |
| तां च भार्गवः | ४ | ७ | १३ | ते चापि तेन | ४ | ९ | २० |
| तां च गान्दिनीं कन्याम् | ४ | १३ | १२५ | तेजसा नागराजानम् | १ | ९ | ९१ |
| तां च पाण्डुरुवाह | ४ | १४ | ३४ | तेजसी भास्कराग्नये | २ | ८ | २३ |
| तां चाक्रूरकृतवर्म० | ४ | १३ | ६५ | तेजसो भवतां देवाः | १ | ९ | ७६ |
| तां चान्तःप्रसवाम् | ४ | ६ | २० | तेजोबलैश्वर्यमहावबोध० | ६ | ५ | ८५ |
| तां चामृतस्राविणीम् | ४ | २ | ६२ | ते तस्य मुखनिःश्वास० | १ | ९ | ८६ |
| तां चापश्यन् | ४ | ६ | ६२ | ते तथैव ततश्चक्रुः | १ | १८ | ४ |
| तां तुष्टुवुर्मुदा युक्ताः | १ | ९ | १०१ | ते तु तद्वचनं श्रुत्वा | १ | १५ | ९५ |
| तां पिता दातुकामोऽभूत् | ३ | १८ | ६४ | तेन द्वारेण तत्पापम् | १ | १३ | ३७ |
| तां प्रलापवतीमेवम् | १ | १२ | २२ | तेन सप्तर्षयो युक्ताः | ४ | २४ | १०६ |
| तां रेवतीं रैवतभूपकन्याम् | ४ | १ | ९६ | तेन सह कन्यान्तः० | ४ | २ | ८७ |
| तांश्चापि नष्टान् विज्ञाय | १ | १५ | १०१ | तेन च प्रीतिमतातम्पुत्रः | ४ | ८ | १३ |
| तांश्च सर्वानैव कंसः | ४ | १५ | २७ | तेन व्यस्ता यथा वेदाः | ३ | ४ | ६ |
| तांश्चिच्छेद हरिः पाशान् | ५ | २९ | १७ | तेन प्रीणात्यशेषाणि | २ | ११ | २५ |
| ताः कन्यास्तांस्तथा नागान् | ५ | २९ | ३३ | तेन यज्ञान्यथाप्रोक्तान् | २ | ९ | २० |
| ताः पिबन्ति मुदा युक्ताः | २ | ४ | ६७ | तेन वृद्धिं परां नीतः | २ | ९ | १९ |
| तितिक्षोरपि रुशद्रथः | ४ | १८ | ११ | तेन संप्रेरितं ज्योतिः | २ | ८ | ५६ |
| तिर्यक्स्रोतास्तु यः प्रोक्तः | १ | ५ | २२ | तेन मायासहस्रं तत् | १ | १९ | २० |
| तिर्यङ्मनुष्यदेवादि० | ३ | १७ | ३० | तेन च क्रोधाश्रितेनाम्बुना | ४ | ४ | ५७ |
| तिलगन्धोदकैर्युक्तम् | ३ | १३ | २८ | तेन विक्षिभितश्चाब्धिः | ५ | ३६ | ८ |
| तिलैस्सप्ताष्टभिर्वापि | ३ | १४ | २७ | तेन विप्र कृतं सर्वम् | ५ | ३६ | १० |
| तिष्ठन्न मूत्रयेत्तद्वत् | ३ | १२ | २८ | तेनास्या गर्भस्सप्तवर्षाणि | ४ | ३ | २८ |
| तिस्रः कोट्यस्सहस्राणाम् | ४ | १५ | ४५ | तेनाविष्टमथात्मानम् | १ | १९ | २३ |
| तीरम्मृत्तद्रसं प्राप्य | २ | २ | २३ | तेनाख्यातंमिदं सर्वम् | ३ | ७ | १० |
| तुतोष परमप्रीतया | ५ | ३० | ३३ | तेनानुयातः कृष्णोऽपि | ५ | २३ | १८ |
| तुभ्यं यथावन्मैत्रेय | ६ | ८ | ४ | तेनान्नेन प्रजारतात | १ | १३ | ८८ |
| तुरंगस्यास्य शक्रोऽपि | ५ | १६ | २२ | तेनातिपतता तत्र | ५ | ७ | १२ |
| तुल्यवेषास्तु मनुजाः | २ | ४ | ८२ | तेनाप्युषिणा वरुणः | ४ | ७ | १५ |
| तुषाः कणाश्च सन्तो वै | २ | ७ | ३८ | तेनेयमशेषद्वीपवती | ४ | ११ | १३ |
| तुष्टात्मनस्तृतीयस्तु | १ | ५ | १४ | तेनेयं दूषिता सर्वा | ५ | ७ | ७ |
| तुष्टाव च पुनर्धीमान् | १ | २० | ८ | तेनेयं नागवर्येण | २ | ५ | २७ |
| तुष्टुवुर्निहते तस्मिन् | ५ | १४ | १४ | तेनैवोक्तं पठेद्देवम् | ३ | ९ | ५ |
| तृणबिन्दोः प्रसादेन | ४ | १ | ६१ | तेनैव च भगवता | ४ | ३ | ३४ |
| तृणैरास्तीर्य वसुधाम् | ३ | ११ | १५ | तेनैव चाग्निविधिना | ४ | ६ | ९३ |
| तृतीये चोशना व्यासः | ३ | ३ | १२ | तेनैव मुखनिःश्वास० | १ | ९ | ८७ |
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५०२
| श्लोकाः | अंशाः | अध्या० | श्लो० | श्लोकाः | अंशाः | अध्या० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| तेनैव सह गन्तव्यम् | ५ | ३७ | ६१ | ते सम्प्रयोगाल्लोभस्य | २ | ८ | ९६ |
| तेऽप्यन्येषां तथैवोचुः | ३ | १८ | २२ | ते सुखप्रीतिबहुलाः | १ | ५ | १३ |
| तेऽप्युचुर्न वयं विद्मः | ६ | ६ | १५ | ते हि दुष्टविषज्वालाः | ४ | ७ | १३ |
| ते ब्राह्मणा वेदवेदानु० | ४ | २० | २५ | तैजसानीन्द्रियाण्याहुर्देवाः | १ | २ | ४७ |
| तेभ्योऽपि नागगन्धर्व० | ६ | ७ | ६६ | तैरप्येकैकेन प्रत्याख्यातः | ४ | १० | १४ |
| तेभ्यः स्वधा सुते | १ | १० | १९ | तैरप्यन्ये परे तैश्च | ३ | १८ | १५ |
| तेभ्यः पूर्वतराश्च | ४ | २४ | १२५ | तैरन्तःस्थैरनन्तोऽसौ | ५ | २ | १८ |
| ते वाह्यन्तस्त्वन्योन्य० | ५ | ९ | १५ | तैरस्याप्यतितेजोमतेः | ४ | २० | २२ |
| तेषामपीह सततम् | १ | १५ | १३८ | तैरियं पृथिवी सर्वा | १ | २२ | १५ |
| तेषामिन्द्रश्च भविता | ३ | २ | २६ | तैलपीडा यथा चक्रम् | २ | १२ | २७ |
| तेषामिन्द्रो महावीर्यः | ३ | २ | २२ | तैलस्त्रीमांससम्भोगी | ३ | ११ | ११९ |
| तेषामुत्सादनार्थाय | ४ | १५ | ४८ | तैश्च गन्धर्ववीर्यावधूतैः | ४ | ३ | ५ |
| तेषामभावे सर्वेषाम् | ३ | १३ | ३२ | तैश्च विमिश्रा जनपदाः | ४ | २४ | ७२ |
| तेषामभावे मौर्याः | ४ | २४ | २७ | तैश्चापि सामवेदोऽसौ | ३ | ६ | ८ |
| तेषामन्ते पृथिवीम् | ४ | २४ | ३३ | तैश्चोकं पुरुकुत्साय | १ | २ | ९ |
| तेषामपत्यं विन्ध्यशक्तिः | ४ | २४ | ५६ | तैस्तु द्वादशसाहस्रैः | ६ | ३ | ११ |
| तेषामुदीर्णवेगानाम् | १ | १३ | ३२ | तैः षड्भिरयनं वर्षम् | १ | ३ | १० |
| तेषां तु सन्ततावन्ये | १ | १० | १६ | तोयान्तःस्थां महीं ज्ञात्वा | १ | ४ | ७ |
| तेषां मध्ये महाभाग | १ | १५ | १४३ | तौ च मृगयामुपयातौ | ४ | १९ | ६७ |
| तेषां नद्यस्तु सप्तैव | २ | ४ | १० | तौ च दृष्ट्वा विकसद्वक्त्र० | ५ | १७ | २५ |
| तेषां वंशप्रसूतैश्च | २ | १ | ४२ | तौ बाहू स च मे मुष्टिः | ५ | ३८ | ३२ |
| तेषां गणश्च देवानाम् | ३ | २ | १६ | तौ समुत्पन्नविज्ञानः | ५ | २१ | १ |
| तेषां स्वागतदानादि | ३ | ९ | १४ | तौ हत्वा वसुदेवं च | ५ | १५ | १८ |
| तेषां कुशाम्बः शत्रुतुल्यः | ४ | ७ | ९ | तं कालयवनं नाम | ५ | २३ | ५ |
| तेषां च बहूनि कौशिकगोत्राणि | ४ | ७ | ३९ | तं च पिता शशाप | ४ | १० | १२ |
| तेषां च पृथुश्रवाः | ४ | १२ | ६ | तं च स्यमन्तकाभिलषित० | ४ | १३ | ४४ |
| तेषां वृकदेवोपदेवा | ४ | १४ | १८ | तं च भगवान् | ४ | ६ | ७ |
| तेषां च प्रद्युम्नचारुदेष्णः | ४ | १५ | ३७ | तं चोग्रतपसमवलोक्य | ४ | ७ | १० |
| तेषां प्रधानः काम्पिल्याधिपतिः | ४ | १९ | ४० | तं तत्र पतितं दृष्ट्वा | ५ | ७ | १८ |
| तेषां यवीयान् पृषतः | ४ | १९ | ७३ | तं तादृशमसंस्कारम् | २ | १३ | ४८ |
| तेषां च द्रौपदीं पञ्चैव | ४ | २० | ४१ | तं तादृशं महात्मानम् | २ | १३ | ५२ |
| तेषां च बीजभूतानाम् | ४ | २४ | १०० | तं तुष्टुवुस्तोषपरीतचेतसः | १ | ४ | ३० |
| तेषां मुनीनां भूयश्च | ६ | २ | ७ | तं तु ब्रूहि महाभाग | ६ | ७ | २६ |
| तेषां प्रधानभूतास्तु | १ | २१ | २१ | तं ददर्श हरिर्दूरात् | ५ | ३४ | १६ |
| तेषु पुण्या जनपदाः | २ | ४ | ९ | तं दृष्ट्वा साधकं सर्गम् | १ | ५ | ८ |
| तेषु दानवदैतेयाः | २ | ५ | ४ | तं दृष्ट्वा ते तदा देवाः | १ | ९ | ६७ |
| तेषूत्सन्नेषु कैकिलाः | ४ | २४ | ५५ | तं दृष्ट्वा कुपितं पुत्रम् | १ | ११ | १२ |
| तेष्वहं मित्रभावेन | १ | १८ | ४३ | तं दृष्ट्वा गृहमानानाम् | ५ | ३८ | ८० |
| ते समेत्य जगद्योनिम् | १ | १२ | ३२ | तं दृष्ट्वैव महाभागम् | ३ | १८ | ६६ |
| ते सर्वे सर्वदा भद्रे | ५ | १ | ८७ | तं पाञ्चजन्यमापूर्य | ५ | २१ | ३० |
| ते सर्वे समवर्तन्त | १ | ७ | २ | तं पिता मूर्न्युपाघ्राय | १ | २० | ३० |
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५०३
| श्लोकाः | अंशाः | अध्या० | श्लो० | श्लोकाः | अंशाः | अध्या० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| तं प्रजाः पृथिवीनाथम् | १ | १३ | ६६ | त्रैलोक्यं च श्रियाजुष्टम् | १ | ९ | ११५ |
| तं बालं यातनासंस्थम् | ५ | २१ | ३१ | त्रैलोक्ययज्ञभागाश्च | ३ | १७ | ३७ |
| तं ब्रह्मभूतमात्मानम् | १ | १२ | ५४ | त्रैलोक्यं त्रिदशश्रेष्ठ | १ | ९ | १३८ |
| तं भुक्तवन्तमिच्छातः | २ | १५ | १६ | त्रैलोक्यादधिके स्थाने | १ | १२ | ९० |
| तं समुद्राश्च नद्यश्च | १ | १३ | ४३ | त्रैलोक्याश्रयतां प्राप्तम् | १ | १२ | १०१ |
| तं वन्दमानं चरणौ | ५ | ३८ | ३६ | त्रैलोक्यमेतत्कथितम् | २ | ७ | ११ |
| तं विभुग्नशिरोग्रीवम् | ५ | ७ | ४७ | त्रैलोक्यमेतत्कृतकम् | २ | ७ | १९ |
| तं वृक्षा जगृहुर्गर्भम् | १ | १५ | ४९ | त्रैलोक्यमखिलं ग्रस्त्वा | ३ | २ | ५१ |
| तं शोणितपुरं नीतम् | ५ | ३३ | ११ | त्रैवर्गिकांस्त्यजेत्सर्वान् | ३ | ९ | २६ |
| तं सा प्राह महाभाग | १ | १५ | १४ | त्वक् चक्षुर्नासिका जिह्वा | १ | २ | ४८ |
| त्यक्ता सापि तनुस्तेन | १ | ५ | ३४ | त्वत्तोऽमरास्सपितरः | ५ | २३ | ३५ |
| त्रयस्त्रिंशत्सहस्राणि | २ | १२ | ७ | त्वत्तो हि वेदाध्ययनम् | १ | १ | २ |
| त्रयी वार्ता दण्डनीति० | २ | ४ | ८३ | त्वतः ऋचोऽथ सामानि | १ | १२ | ६० |
| त्रयी समस्तवर्णानाम् | ३ | १७ | ६ | त्वत्प्रसादादिदमशेषम् | ४ | २ | १०६ |
| त्रयीधर्मसमुत्सर्गम् | ३ | १८ | १४ | त्वत्प्रसादान्मुनिश्रेष्ठ | १ | १ | ३ |
| त्रयोदशार्द्धमह्ना तु | २ | ८ | ३८ | त्वत्प्रसादान्मया ज्ञातम् | ६ | ८ | ८ |
| त्रयोदशी रुचिनर्मा | ३ | २ | ३७ | त्वद्धृतं चास्य राष्ट्रस्य | ४ | १३ | १६० |
| त्रय्यारुणेस्सत्यव्रतः | ४ | ३ | २१ | [त्वद्भक्तिप्रवणं ह्येतत् | १ | १२] | |
| त्रय्यारुणः पञ्चदशे | ३ | ३ | १५ | त्वद्रूपधारिणश्चान्त० | १ | १२ | ५९ |
| त्रसदस्युतस्सम्भूतः | ४ | ३ | १७ | त्वन्नो वृत्तिप्रदो धात्रा | १ | १३ | ६८ |
| त्रातास्ताश्च त्वया गावः | ५ | १२ | ९ | त्वन्मयाहं त्वदाधारा | १ | ४ | २० |
| त्राहि त्राहि गोविन्दः | ५ | १६ | ४ | त्वन्मायामूढमनसः | ५ | २३ | ४४ |
| त्रिकूटः शिशिरश्चैव | २ | २ | २७ | त्वमर्जुनेन सहितः | ५ | ३७ | ६३ |
| त्रिगुणं तज्जगद्योनिः | १ | २ | २१ | त्वमप्येतच्छिनीकाय | ६ | ८ | ५१ |
| त्रिनाभिमति पञ्चारे | २ | ८ | ४ | त्वमव्यक्तमनिर्देश्यम् | ५ | १ | ४० |
| त्रिणाचिकेतस्त्रिमधुः | ३ | १५ | २ | त्वमन्तः सर्वभूतानाम् | ५ | २० | ९६ |
| त्रिभिः क्रमैरिमाँल्लोकान् | ३ | १ | ४३ | त्वमासीर्ब्राह्मणः पूर्वम् | १ | १२ | ८३ |
| त्रिरपः प्रीणनार्थाय | ३ | ११ | २८ | त्वमुर्वी सलिलं वह्निः | ३ | १७ | १४ |
| त्रिविधा भावना भूप | ६ | ७ | ४८ | त्वमेव जगतो नाभिः | ५ | ७ | ३६ |
| त्रिविधोऽयमहंकारः | १ | २ | ३६ | त्वया विलोकिता सद्यः | १ | ९ | १३० |
| त्रिशंकोर्हरिश्चन्द्रः | ४ | ३ | २५ | त्वयाहमुद्धृता पूर्वम् | १ | ४ | १३ |
| त्रिशृंगो जारुधिश्चैव | २ | २ | ४४ | त्वया देवि परित्यक्तम् | १ | ९ | १२३ |
| त्रीणि श्राद्धे पवित्राणि | ३ | १५ | ५२ | त्वया यदभयं दत्तम् | ५ | ३३ | ४७ |
| त्रीणि लक्षाणि वर्षाणाम् | ४ | २४ | ११४ | त्वया नाथेन देवानाम् | ५ | २९ | ३ |
| त्रिष्वेतेष्वथ भुक्तेषु | २ | ८ | २९ | त्वया धृतेयं धरणी बिभर्त्ति | ५ | ९ | २९ |
| त्रिंशत्कोट्यस्तु सम्पूर्णाः | १ | ३ | २० | त्वयि भक्तिमतो द्वेषात् | १ | २० | २४ |
| त्रिंशन्मुहूर्तं कथितम् | २ | ८ | ६९ | त्वयैकेन हता भीष्म० | ५ | ३८ | ६४ |
| त्रेतायुगसमः कालः | ४ | ४ | १४ | त्वयोढा शिबिका चेति | २ | १३ | ६५ |
| त्रैराज्यमुषिकजनपदान् | ४ | २४ | ६७ | त्वयोक्तोऽयं गृहस्सत्यम् | ५ | २८ | २० |
| त्रैलोक्येश न ते युक्तम् | ५ | ३० | ७१ | त्वय्यस्ति भगवान् विष्णुः | १ | १९ | ३८ |
| त्रैलोक्यनाथो योऽयम् | ४ | २ | २९ | त्वर्यतां त्वर्यतां हे हे | १ | १८ | ९ |
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५०४
| श्लोकाः | अंशाः | अध्या० | श्लो० | श्लोकाः | अंशाः | अध्या० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त्वष्टाथ जमदग्निश्च | २ | १० | १६ | दत्तो हि वार्षिकस्सर्वः | ५ | ५ | ३ |
| त्वष्टा त्वष्टुश्च विरजः | २ | १ | ४० | दत्त्वा काम्योदकम् | ३ | ११ | ३९ |
| त्वष्टैव तेजसा तेन | ३ | २ | ११ | दत्त्वा च भिक्षात्रितयम् | ३ | ११ | ६६ |
| त्वामणाराध्य जगताम् | ५ | २३ | ४३ | दत्त्वा चैकां निशां तेन | ४ | ६ | ७४ |
| त्वामाराध्य परं ब्रह्म | १ | ४ | १८ | दत्त्वा च दक्षिणां तेभ्यः | ३ | १५ | ४५ |
| त्वामार्त्ताः शरणं विष्णो | १ | ९ | ७२ | ददर्श च सुगन्धाढ्यम् | ५ | ३० | ३१ |
| त्वामृते यादवाश्चैते | ५ | १५ | २० | ददर्श रामकृष्णौ च | ५ | १९ | ४ |
| त्वं कर्ता च विकर्ता च | ५ | २९ | २६ | ददर्श तत्र चैवोभौ | ५ | १८ | ४५ |
| त्वं कर्ता सर्वभूतानाम् | ५ | २० | १०० | ददर्श चाश्वसमवेतम् | ४ | १३ | ३७ |
| त्वं कर्ता सर्वभूतानाम् | १ | ४ | १५ | ददाह सवनान्देशान् | ५ | ३६ | ६ |
| त्वं किमेतच्छिरः किं नु | २ | १३ | १०२ | ददौ यथाभिलषिताम् | १ | ११ | ५७ |
| त्वं च शुम्भनिशुम्भादीन् | ५ | १ | ८२ | ददौ स दश धर्माय | १ | १५ | १०३ |
| त्वं चाप्ययोनिजा साध्वी | १ | १५ | ७१ | ददौ च शिशुपालाय | ५ | २६ | ३ |
| त्वं परस्त्वं परस्याद्यः | ५ | ७ | ६२ | ददृशे वारुणं छत्रम् | ५ | २९ | ३४ |
| त्वं पयोनिधयश्शैल० | ५ | २३ | ३२ | ददृशे च प्रबुद्धा सा | ५ | ३ | २२ |
| त्वं प्रसादं प्रसन्नात्मन् | १ | ९ | ७४ | ददृशुस्ते मुनिं तत्र | ६ | २ | ४ |
| त्वं ब्रह्मा पशुपतिरर्यमा विधाता | ५ | १८ | ५६ | ददृशुश्चापि ते तत्र | ५ | ७ | २३ |
| त्वं भूतिः सन्नतिः क्षान्तिः | ५ | १ | ८३ | दधानमसिते वस्त्रे | ५ | १८ | ३८ |
| त्वं माता सर्वलोकानाम् | १ | ९ | १२६ | दधिमण्डोदकश्चापि | २ | ४ | ५८ |
| त्वं यज्ञस्त्वं वषट्कारः | १ | ९ | ७१ | दध्ना यवैः सबदरैः | ३ | १० | ६ |
| त्वं राजा शिबिका चेयम् | २ | १३ | ९२ | दध्यक्षतैस्सबदरैः | ३ | १३ | ३ |
| त्वं राजा सर्वलोकस्य | २ | १३ | १०१ | दन्ता गजानां कुलिशाग्रनिष्ठुराः | १ | १७ | ४४ |
| त्वं राजेव द्विजश्रेष्ठ | २ | १६ | १४ | दमस्य पुत्रो राजवर्द्धनः | ४ | १ | ३६ |
| त्वं विश्वनाभिर्भुवनस्य गोप्ता | ५ | १ | ४३ | दमिते कालिये नागे | ५ | १५ | २ |
| त्वं वेदास्त्वं त्वदंगानि | १ | ४ | २३ | दम्भप्रायमसम्बोधि | ३ | १७ | १८ |
| त्वं सिद्धिस्त्वं स्वधा स्वाहा | १ | ९ | ११९ | दया समस्तभूतेषु | ३ | ८ | ३६ |
| त्वं स्वाहा त्वं स्वधा विद्या | ५ | २ | २० | दर्शनान्मात्रेणाहल्याम् | ४ | ४ | ९१ |
| त्वां पातु दिक्षु वैकुण्ठः | ५ | ५ | २१ | दर्शितो मानुषो भावः | ५ | ७ | ४२ |
| त्वां योगिनश्चिन्तयन्ति | १ | १९ | ७३ | दश चाष्टौ च सङ्ग्रामम् | ५ | २२ | ११ |
| त्वां हत्वा वसुधे बाणैः | १ | १३ | ७६ | दशलक्षसंख्याश्च | ४ | १२ | ५ |
| द० | दशयज्ञसहस्राणि | ४ | ११ | १४ | |||
| दक्षकोपाच्च तत्याज | १ | ८ | १३ | दशमो ब्रह्मसावर्णिः | ३ | २ | २५ |
| दक्षिणाग्रेषु दर्भेषु | ३ | १५ | ४१ | दशपञ्चमुहूर्त्तं वै | २ | ८ | ६५ |
| दक्षिणस्यां दिशि तथा | १ | २२ | १२ | दशसाहस्रमेकैकम् | २ | ५ | २ |
| दक्षिणे त्वयने चैव | २ | ८ | ४७ | दशवर्षसहस्राणि | २ | ४ | ७९ |
| दक्षिणोत्तरभूम्यर्द्धं | २ | ८ | २४ | दशवर्षसहस्राणि | १ | १४ | १९ |
| दक्षिणं दन्तमुत्पाट्य | ५ | २० | ३९ | दशभ्यस्तु प्रचेतोभ्यः | १ | १५ | ७४ |
| दक्षिणं चोत्तरं चैव | २ | ८ | ७४ | दशाननाविक्षतराघवाणाम् | ४ | २४ | १४७ |
| दक्षो मरीचिरत्रिश्च | १ | ७ | ३७ | दशोत्तराणि पञ्चैव | २ | ४ | ९१ |
| दत्तं प्रमतिना चैतत् | ६ | ८ | ४९ | दशोत्तरेण पयसा | २ | ७ | २३ |
| दत्ताः पितृभ्यो यत्रापः | २ | ८ | ११७ | दह्यमानं तु तैर्दीप्तैः | ६ | ३ | २२ |
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५०५
| श्लोकाः | अंशाः | अध्या० | श्लो० | श्लोकाः | अंशाः | अध्या० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| दह्यमानस्त्वमस्माभिः | १ | १८ | २९ | दीनामेकां परित्यक्तुम् | १ | १२ | १६ |
| दातव्योऽनुदिनं पिण्डः | ३ | १३ | ११ | दीप्तिमान् गालवो रामः | ३ | २ | १७ |
| दानपते जानीम एव वयम् | ४ | १३ | १३९ | दीप्तिमत्ताप्रपक्षाद्याः | ५ | ३२ | २ |
| दानमेव धर्महेतुः | ४ | २४ | ८८ | दीर्घसत्रेण देवेशम् | १ | १३ | १७ |
| दानानि दद्यादिच्छातः | ३ | ८ | २६ | दीर्घायुरप्रतिहतः | १ | १८ | ४५ |
| दानं दद्याद्यजेद्देवान् | ३ | ८ | २२ | दुरात्मा वध्यतामेषः | १ | १७ | ३१ |
| दानं च दद्याच्छूद्रोऽपि | ३ | ८ | ३४ | दुरात्मा क्षिप्यतामस्मात् | १ | १९ | ११ |
| दामोदरोऽसौ गोविन्दः | ५ | २४ | १८ | दुर्नीतमेतद्गोविन्द | ५ | २९ | १२ |
| दाम्ना मध्ये ततो बद्ध्वा | ५ | ६ | १४ | दुर्बुद्धे विनिवर्तस्व | १ | १७ | ३५ |
| दाराः पुत्रस्तथागार० | १ | ९ | १२४ | दुर्भिक्षमेव सततम् | ६ | १ | २६ |
| दारिते मत्स्यजठरे | ५ | २७ | ८ | दुर्भिक्षकरपीडाभिः | ६ | १ | ३८ |
| दारुण्यग्निर्यथा तैलम् | २ | ७ | २८ | दुर्वसोर्वह्निनरात्मजः | ४ | १६ | ३ |
| दिगन्तिनां दन्तभूमिम् | १ | १६ | ८ | दुर्वासाः शंकरस्यांशः | १ | ९ | २ |
| दितिर्विनष्टपुत्रा वै | १ | २१ | ३० | दुर्विज्ञेयमिदं वक्तुम् | ५ | ३२ | २० |
| दितेः पुत्रो महावीर्यः | १ | १७ | २ | दुर्वृत्ता निहता दैत्याः | ५ | ३७ | १९ |
| दिग्वाससामयं धर्मः | ३ | १८ | ११ | दुष्टकालिय तिष्ठात्र | ५ | १३ | २७ |
| दित्याः पुत्रद्वयं जज्ञे | १ | १५ | १४० | दुष्टानां शासनाद्राजा | ३ | ८ | २९ |
| दिनानि तानि चेच्छातः | ३ | १३ | १२ | दुष्टेऽम्ब कस्मान्मम | ४ | ६ | २८ |
| दिनान्तसन्ध्यां सूर्येण | ३ | ११ | १०० | दुष्यन्ताच्चक्रवर्ती | ४ | १९ | १० |
| दिनादेर्दीर्घह्रस्वत्वम् | २ | ८ | ४६ | दुस्स्वप्नोपशमं नृणाम् | १ | १३ | ९५ |
| दिने दिने कलालेशैः | १ | १२ | ३४ | दुहितृत्वे चास्य गंगाम् | ४ | ७ | ६ |
| दिलीपस्य भगीरथः | ४ | ४ | ३५ | दुःखान्येव सुखानीति | ५ | २३ | ३९ |
| दिलीपात् प्रतीपः | ४ | २० | ८ | दुःखोत्तराः स्मृता होते | १ | ७ | ३५ |
| दिवसस्य रविर्मध्ये | २ | ८ | १२ | दुःखं यद्वैकशारीरजन्म | ४ | २ | १२१ |
| दिवसपतिर्महावीर्यः | ३ | २ | ३९ | दुःशीला दुष्टशीलेषु | ६ | १ | ३१ |
| दिवसः को विना सूर्यम् | ५ | ७ | २७ | दुःस्वप्ननाशनं नृणाम् | ६ | ८ | ४२ |
| दिवातिथौ तु विमुखे | ३ | ११ | १०८ | दूतं च प्रेषयामास | ५ | ३४ | ६ |
| दिवा स्वप्ने च स्कन्दन्ते | २ | ६ | २९ | दूरस्तैस्तु सम्पर्कः | ३ | १८ | १०२ |
| दिवावृत्पञ्चमश्चात्रा | २ | ४ | ५१ | दूरप्रणष्टनयनः | ६ | ५ | २८ |
| दिवार्करश्मयो यत्र | २ | ५ | ८ | दूरायतनोदकमेव तीर्थहेतुः | ४ | २४ | ९१ |
| दिवीव चक्षुराततम् | २ | ८ | १०३ | दूरे स्थितं महाभागम् | २ | १६ | ३ |
| दिवोदासस्य पुत्रो मित्रायुः | ४ | १९ | ६९ | दृढाश्वाद्दूर्यश्वः | ४ | २ | ४३ |
| दिव्यमाल्याम्बरधरा | १ | ९ | १०५ | दृढाश्वचन्द्राश्वकपिलाश्वाश्च | ४ | २ | ४२ |
| दिव्यज्ञानोपपन्नास्ते | ५ | ३७ | ९ | दृष्टमात्रे ततः कान्ते | ५ | ३२ | २५ |
| दिव्ये वर्षसहस्रे तु | २ | १५ | ८ | दृष्टमात्रश्च तेनासौ | ५ | २३ | २१ |
| दिव्यैर्वर्षसहस्रैस्तु | १ | ३ | ११ | दृष्टमात्रे च तस्मिन्नपहाय | ४ | ६ | ३६ |
| दिव्यं हि रूपं तव वेत्ति नान्यः | ५ | ९ | २८ | दृष्टसूर्यं हि यद्वारि | २ | ९ | १४ |
| दिशि दक्षिणपूर्वस्याम् | ४ | १० | ३१ | दृष्टस्ते भगवन् | ४ | २ | १११ |
| दिशः श्रोत्रात्क्षितिः पद्भ्याम् | १ | १२ | ६४ | दृष्ट्वा च स जगद्द्ध्यः | १ | २० | ७ |
| दिष्टपुत्रस्तु नाभागः | ४ | १ | १९ | दृष्ट्वा निदाघं स ऋभुः | २ | १६ | ४ |
| दिष्ट्या दिष्ट्येति | ४ | १३ | ६० | दृष्ट्वा ममत्वादृतचित्तमेकम् | ४ | २४ | १३५ |
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५०६
| श्लोकाः | अंशा० | अध्या० | श्लो० | श्लोकाः | अंशा० | अध्या० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| दृष्ट्वा गोपीजनस्त्रासः | ५ | १८ | १३ | देवादीनां तथा सृष्टिः | ३ | १ | २ |
| दृष्ट्वा कलिंगराजन्तम् | ५ | २८ | १७ | देवा यक्षासुराः सिद्धाः | १ | १९ | ६७ |
| दृष्ट्वा बलस्य निर्याणम् | ५ | ३७ | ५७ | देवा मनुष्याः पशवः | १ | १९ | ४७ |
| देवदर्शस्य शिष्यास्तु | ३ | ६ | १० | देवानामात्र सान्निध्यम् | २ | ४ | ३२ |
| देवतिय्र्यङ्मनुष्येषु | ५ | ३३ | ४२ | देवानामेकमेकं वा | ३ | १५ | १५ |
| देवदेव जगन्नाथ | ५ | ३१ | ८ | देवानां दानवानां च | १ | १५ | ८५ |
| देवराजो भवानिन्द्रः | ५ | ३१ | २ | देवासुरसंग्रामम् | ४ | ९ | २ |
| देवराजो मुखप्रेक्षी | ५ | ३० | ४२ | देवाः स्वर्गं परित्यज्य | १ | १७ | ५ |
| देवसिद्धासुरादीनाम् | ५ | २९ | ९ | देविकायास्तटे वीर | २ | १५ | ६ |
| देवलोकगतिं प्राप्तः | ५ | २३ | ४२ | देवी जाम्बवती चापि | ५ | २८ | ४ |
| देवकस्य सुतां पूर्वम् | ५ | १ | ५ | देवैर्विज्ञायते देव | ५ | ३७ | २१ |
| देवभूतिं तु शुंगराजानम् | ४ | २४ | ३९ | देवैश्च प्रहितो वायुः | ५ | ३७ | १६ |
| देवगर्भस्यापि शूरः | ४ | १४ | २५ | देवैश्च छन्दितोऽसौ | ४ | ५ | १५ |
| देववानुपदेवः सहदेवः | ४ | १४ | १७ | देवो वा दानवो वा त्वम् | ५ | १३ | ८ |
| देववानुपदेवश्च | ४ | १४ | १० | देवौ धातृविधातारौ | १ | ८ | १५ |
| देववानुपदेवश्च | ३ | २ | ३६ | देह्यानुज्ञां महाराज | १ | १३ | २५ |
| देवतापितृभूतानि | ३ | १८ | ४७ | दैतेयाः सकलैः शैलैः | १ | १९ | ५८ |
| देवर्षिपितृभूतानि | ३ | १८ | ४३ | दैत्यराज विषं दत्तम् | १ | १८ | ८ |
| देवर्षिपूजकस्सम्प्यक् | ३ | १२ | ३३ | दैत्यादानवकन्याभिः | २ | ५ | ७ |
| देवगोब्राह्मणान्सिद्धान् | ३ | १२ | १ | दैत्येन्द्रदीपितो वह्निः | १ | १५ | १४४ |
| देवताभ्यर्चनं होमः | ३ | ९ | २१ | दैत्येन्द्रसूदोपहृतम् | १ | १५ | १५४ |
| देवद्विजगुरूणां च | ३ | ८ | १६ | दैत्येश्वर न कोपस्य | १ | १७ | १८ |
| देवद्विजपितृद्वेष्टा | २ | ६ | १५ | दैत्येश्वरस्य वधायाखिल० | ४ | १५ | ४ |
| देवतारोधनं कृत्वा | २ | १४ | १३ | दैत्यः पञ्चजनो नाम | ५ | २१ | २७ |
| देवर्षिपितृगन्धर्व० | १ | २२ | ९० | दोषहेतूनशेषांश्च | ३ | १२ | ४० |
| देवमानुषपश्वादि० | १ | २२ | ८२ | दौर्बल्यमेवावृत्तिहेतुः | ४ | २४ | ८४ |
| देव प्रपन्नार्त्तिहर | १ | २० | १६ | दंष्ट्राग्रविन्यस्तमशेषमेतत् | १ | ४ | ३६ |
| देवदेव जगन्नाथ | १ | १२ | ३३ | दंष्ट्रा विशीर्णा मणयः स्फुटन्ति | १ | १७ | ४० |
| देवतिय्र्यङ्मनुष्यादौ | १ | ८ | ३५ | दंष्ट्रिणश्शृंगिणश्चैव | ३ | १२ | १८ |
| देवर्षिपार्थिवानां च | १ | १ | ९ | द्यावापृथिव्योरतुलप्रभाव | १ | ४ | ३७ |
| देवत्वे देवदेहेऽयम् | १ | ९ | १४५ | द्युतिमन्तं च राजानम् | २ | १ | १४ |
| देवावृधस्यापि | ४ | १३ | ३ | द्रक्ष्यामि तेषामिति चेत्प्रसूतिम् | ४ | २ | ११८ |
| देवासुरे हता ये तु | ४ | १५ | ४७ | द्रव्यनाशे तथोत्पत्तौ | ६ | ५ | ५४ |
| देवापिर्बाल एवारण्यम् | ४ | २० | १० | द्रव्यावयवनिर्द्धतम् | ५ | ६ | २७ |
| देवापिः पौरवो राजा | ४ | २४ | ११८ | द्रुमक्षयमथो दृष्ट्वा | १ | १५ | ५ |
| देवासुरमहायुद्धे | ५ | २३ | ३० | द्रुह्योस्तु तनयो बभ्रुः | ४ | १७ | १ |
| देवा दैत्यास्तथा यक्षाः | ५ | ३० | ११ | द्वादशवार्षिक्यामनावृष्ट्याम् | ४ | ३ | २३ |
| देवादिनीःश्वासहतम् | ३ | १८ | ४५ | द्वापरे द्वापरे विष्णुः | ३ | ३ | ५ |
| देवासुरमभूद्युद्धम् | ३ | १७ | ९ | द्वापरे प्रथमे व्यस्तः | ३ | ३ | ११ |
| देवा मनुष्याः पशवो वयांसि | ३ | ११ | ५१ | द्वारकां च मया त्यक्ताम् | ५ | ३७ | ३६ |
| देवासुरास्तथा यक्षाः | ३ | ११ | ३४ | द्वारवत्या विनिष्क्रान्ताः | ५ | ३८ | ६ |
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५०७
| श्लोकाः | अंशा० | अध्या० | श्लो० | श्लोकाः | अंशा० | अध्या० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| द्वारवत्यां स्थिते कृष्णे | ५ | २९ | १ | धर्मात्मनि महाभागे | १ | १६ | १४ |
| द्वारकावासी जनस्तु | ४ | १३ | २० | धर्मे मनश्च ते भद्र | ५ | १९ | २७ |
| द्वारवत्यां क्व यातोऽसौ | ५ | ३३ | १० | धर्मोत्कर्षमतीवात्र | ६ | २ | १८ |
| द्विजमीढस्य तु यवीनरसंज्नः | ४ | १९ | ४८ | धर्मो विमुक्तेर्होऽयम् | ३ | १८ | ६ |
| द्विजशुश्रूषयैवैकः | ६ | २ | २३ | धर्मांश्च ब्राह्मणादीनाम् | १ | १ | १० |
| द्विजातिसंश्रितं कर्म | ३ | ८ | २२ | धाता क्रतुस्थला चैव | २ | १० | ३ |
| द्विजांश्च भोजयामासुः | ५ | १० | ४५ | धाता प्रजापतिः शक्रः | ३ | ११ | ६९ |
| द्वितीयं विष्णुसंज्ञस्य | ६ | ७ | ६९ | धाराभिरतिमात्राभिः | ६ | ३ | ३९ |
| द्वितीयस्य परार्द्धस्य | १ | ३ | २८ | धिक्त्वां यस्त्वमेव | ४ | १३ | १०१ |
| द्वितीयोऽपि प्रतिक्रियां | ४ | ४ | ४४ | धीमान्हीमाञ्क्षमायुक्तः | ३ | १२ | ३५ |
| द्विपरार्द्धात्मकः कालः | ६ | ४ | ४७ | धूतपापा शिवा चैव | २ | ४ | ४३ |
| द्विपादे पृष्ठपुच्छाद्धं | ५ | १६ | १५ | धृतराष्ट्रोऽपि गान्धार्याम् | ४ | २० | ३९ |
| द्विषष्टिपण्येवम् | ४ | १३ | ११० | धृतव्रतात्सत्यकर्मा | ४ | १८ | २६ |
| द्वे कोटी तु जनो लोकः | २ | ७ | १३ | धृतकेतुर्दीप्तिकेतुः | ३ | २ | २४ |
| द्वे चैव बहुपुत्राय | १ | १५ | १०४ | धृते गोवर्धने शैले | ५ | १२ | १ |
| द्वे ब्रह्मणो वेदितव्ये | ६ | ५ | ६४ | धृष्टस्यापि धार्ष्टकम् | ४ | २ | ४ |
| द्वे ब्रह्मणो त्वणीयोऽति० | ५ | १ | ३६ | धृष्टकेतोर्हर्यश्वः | ४ | ५ | २७ |
| द्वे रूपे ब्रह्मणस्तस्य | १ | २२ | ५५ | धेनुकोऽयं मया क्षिप्तः | ५ | १३ | २९ |
| द्वे लक्षे चोत्तरे ब्रह्मन् | २ | ७ | ७ | ध्यायन्कृते यजन्यज्ञैः | ६ | २ | १७ |
| द्वे विद्ये त्वमनाम्नाय | ५ | १ | ३५ | ध्यानं चैवात्मनो भूप | २ | १४ | २६ |
| द्वे वै विद्ये वेदितव्ये | ६ | ५ | ६५ | ध्रुवस्य जननी चेयम् | १ | १२ | १०० |
| ध० | ध्रुवसूर्यान्तरं यच्च | २ | ७ | १८ | |||
| धनधान्यर्द्धिमत्तुलाम् | ४ | २४ | १४० | ध्रुवप्रह्लादचरितम् | ३ | १ | ३ |
| धनानामधिपः सोऽभूत् | १ | १७ | ४ | ध्रुवमेकाक्षरं ब्रह्म | ३ | ३ | २२ |
| धनुर्महमहायोंग० | ५ | १५ | ८ | ध्रुवाच्छिष्टं च भव्यं च | १ | १३ | १ |
| धनुर्महो ममाप्यत्र | ५ | १५ | १५ | ध्रुवादूर्ध्वं महर्लोकः | २ | ७ | १२ |
| धन्वन्तरिस्तु दीर्घतपसः | ४ | ८ | ८ | ध्वजवज्रांकुशाब्जांक० | ५ | १३ | ३२ |
| धन्यास्ते पार्थ ये कृष्णम् | ५ | १८ | २५ | न० | |||
| धरित्रीपालनेनैव | ३ | ८ | २८ | न कशेरुर्न चैवाहम् | ६ | ६ | १७ |
| धर्मज्ञश्च कृतज्ञश्च | १ | १३ | ६२ | न कल्पनामुतेऽर्थस्य | ५ | १८ | ५४ |
| धर्ममर्थं च कामं च | १ | १४ | १६ | न कुर्याद्दन्तसङ्घर्षम् | ३ | १२ | ९ |
| धर्मस्य पुत्रो द्रविणः | १ | १५ | ११३ | न कुत्सिताह्वतं नैव | ३ | ११ | ८१ |
| धर्मध्रुवाद्यास्तिष्ठन्ति | २ | ८ | १०१ | नकुलैतन्ममाख्यातम् | ३ | ७ | ३६ |
| धर्मध्वजो वै जनकः | ६ | ६ | ७ | न कृष्टे सस्यमध्ये वा | ३ | ११ | १२ |
| धर्महानिर्न तेष्वस्ति | २ | ४ | ६८ | न केवलं तात मम प्रजानाम् | १ | १७ | २४ |
| धर्माय त्यज्यते किन्नु | २ | १४ | १७ | न केवलं मद्धृदयं स विष्णुः | १ | १७ | २६ |
| धर्माधर्मौ न सन्देहः | २ | १३ | ८३ | न केवलं रवेः शक्तिः | २ | ११ | १२ |
| धर्मायैतदधर्माय | ३ | १८ | ९ | न केवलं द्विजश्रेष्ठ | ६ | ५ | ५० |
| धर्मार्थकामैः किं तस्य | १ | २० | २७ | नक्काहतमनुच्छिन्नम् | ३ | १६ | १० |
| धर्मार्थकाममोक्षाश्च | १ | १८ | २१ | नक्षत्रग्रहपीडासु | ३ | १४ | ६ |
| धर्मात्मा सत्यशौर्यादि० | १ | १५ | १५६ | नक्षत्रग्रहविप्राणाम् | १ | २२ | २ |
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५०८
| श्लोकाः | अंशाः | अध्या० | श्लो० | श्लोकाः | अंशाः | अध्या० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| नखादिना चोपपन्नम् | ३ | १६ | १५ | नन्दोपनन्दकृतकाद्याः | ४ | १५ | २३ |
| नखांकुरविनिर्भिन्न० | ५ | ५ | १६ | नन्दोऽपि गृह्यतां पापः | ५ | २० | ८३ |
| नगरस्य बहिः सोऽथ | २ | १६ | २ | नन्दं च दीनमत्वर्थम् | ५ | ७ | ३४ |
| नग्नस्वरूपमिच्छामि | ३ | १७ | ४ | न पपाठ गुरूप्रोक्तम् | २ | १३ | ३९ |
| नग्नां परस्त्रियं चैव | ३ | १२ | १२ | न प्रार्थितं त्वया कस्मात् | ६ | ७ | १ |
| न घर्घरस्वरां क्षामाम् | ३ | १० | १९ | न प्रीतिर्वेदवादेषु | ६ | १ | ४९ |
| न च कश्चित्त्रयोविंशति० | ४ | २४ | ९७ | न बबन्धाम्बरे स्थैर्यम् | ५ | ६ | ४२ |
| न चलति निजवर्णधर्मतो यः | ३ | ७ | २० | न ब्रह्मा नेन्द्ररुद्राश्वि० | ५ | १७ | ८ |
| न चान्यैर्नीयते कश्चित् | १ | १७ | ८९ | नभशिररस्तेऽम्बुवहाश्च केशाः | ५ | ९ | २६ |
| न चासौ राजा ममार | ४ | २ | ५८ | नभसोऽब्धं भुवः पंकम् | ५ | १० | १४ |
| न चापि सर्गसंहार० | ५ | ३० | ७८ | न भिन्नं विविधैः शस्त्रैः | १ | १५ | १४६ |
| न चिन्त्यं भवतः किञ्चित् | १ | ११ | ३५ | नमस्ते परमात्मत्मन् | १ | ४ | १४ |
| न चिन्तयति को राज्यम् | १ | १९ | ४३ | नमस्ते सर्वलोकानाम् | १ | ९ | ११७ |
| न जातु कामः कामानाम् | ४ | १० | २३ | न मन्त्रादिकृतं तात | १ | १९ | ४ |
| न तद्बलं यादवानाम् | ५ | २२ | १३ | नमस्ते पुण्डरीकाक्ष | ५ | ३० | ६ |
| न तद्योगयुजा शक्यम् | ६ | ७ | ५५ | नमस्ते पुण्डरीकाक्ष | १ | १९ | ६४ |
| न ताडयति नो हन्ति | ३ | ८ | १५ | नमस्ते पुण्डरीकाक्ष | १ | ४ | १२ |
| नताः स्म सर्ववचसाम् | १ | १४ | २३ | नमस्तस्मै नमस्तस्मै | १ | १९ | ७९ |
| न तु सा वाग्यता देवी | ३ | १५ | ५९ | नमस्कृत्याप्रमेयाय | १ | २२ | ६७ |
| न तु स तस्मिन्ननादिनिधने | ४ | १५ | ८ | नमस्सवित्रे द्वाराय | ३ | ५ | १६ |
| न तेषु वर्षते देवः | २ | २ | ५५ | नमस्ते चक्रहस्ताय | ५ | ३० | २२ |
| न ते वर्णयितुं शक्ताः | १ | ९ | १३३ | नमामि सर्वं सर्वेशम् | १ | ९ | ४० |
| न त्यक्ष्यति हरेः पक्षम् | १ | १७ | ५२ | न मायाभिर्न चैवोच्चात् | १ | १९ | ६० |
| न त्वां करोम्यहं भस्म | १ | १५ | ४१ | न मे जाम्बवती तादृक् | ५ | ३० | ३५ |
| न त्वं वृको महाभाग | ३ | १८ | ७८ | न मेऽस्ति वित्तं न धनं च नान्यत् | ३ | १४ | ३० |
| नदस्वरूपी भगवान् | १ | ८ | ३२ | नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः | ५ | १ | ५५ |
| नदीनदतटाकेषु | ३ | ११ | २५ | नमो ब्रह्मण्यदेवाय | १ | १९ | ६५ |
| नदीमैत्रेय ते तत्र | २ | ४ | ५४ | नमो विवस्वते ब्रह्म | ३ | ११ | ४० |
| न दुष्टां दुष्टवाक्यां वा | ३ | १० | १८ | नमो हिरण्यगर्भाय | १ | २ | २ |
| न भ्रश्यन्ति यतस्तेभ्यः | २ | ९ | १० | नमो नमोऽविशेषस्त्वम् | १ | ९ | ६१ |
| नद्यो नदाः समुद्राश्च | १ | १२ | ११ | नमोऽग्निशोमभूताय | ३ | ५ | १७ |
| नद्यः समुद्रा गिरयः | ५ | ३८ | ५६ | नमोऽस्तु विष्णवे तस्मै | १ | १९ | ८२ |
| न द्वारबन्धावरणाः | ५ | १० | ३३ | नर्मदा सुरसाद्याश्च | २ | ३ | ११ |
| न नूनं कार्तवीर्यस्य | ४ | १९ | १६ | नमः सवित्रे सूर्याय | ३ | ५ | २४ |
| नन्दगोपादयो गोपाः | ५ | २० | २८ | न यज्ञाः समवर्त्तन्त | १ | ९ | २७ |
| नन्दगोपमुखा गोपाः | ५ | १८ | २३ | न यष्टव्यं न दातव्यम् | १ | १३ | १४ |
| नन्दगोपस्सदुर्बुद्धिः | ५ | ११ | ३ | न यक्षैर्न च दैत्येन्द्रैः | १ | १७ | ८७ |
| नन्दगोपस्य वचनम् | ५ | १० | २५ | न यस्य जन्मने धाता | ५ | ७ | ५२ |
| नन्दगोपश्च गोपाश्च | ५ | ७ | २२ | न यत्र नाथ विद्यन्ते | ५ | १८ | ५३ |
| नन्दगोपोऽपि निश्चेष्टः | ५ | ७ | २४ | न याच्ञा क्षत्रबन्धूनाम् | ६ | ७ | ६ |
| नन्दिना सङ्गृहीताश्वम् | ५ | ३३ | २८ | नरकेषु समस्तेषु | ३ | ११ | ३६ |
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५०९
| श्लोकाः | अंशाः | अध्या० | श्लो० | श्लोकाः | अंशाः | अध्या० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| नरस्य संकृतिस्संकृतेः | ४ | १९ | २२ | नहुषक्षत्रवृद्धरम्भरजि० | ४ | ८ | ३ |
| नरकस्यासुरेन्द्रस्य | ५ | ३६ | २ | न ह्यनुल्लङ्घ्य वरपादपम् | ४ | १३ | ७६ |
| नरके यानि दुःखानि | ६ | ५ | ४९ | न ह्याप्तवादा नभसः | ३ | १८ | ३१ |
| नरकिन्नररक्षांसि | १ | ५ | ५९ | न ह्यादिमध्यान्तमजस्य यस्य | ४ | १ | ८३ |
| नरकेणास्य तत्राभूत् | ५ | २९ | २० | न ह्येतादृगन्यत् | ४ | ५ | १७ |
| नरकं कर्मणां लोपात् | ६ | ५ | २६ | नाकारणात्कारणाद्वा | ५ | १ | ५१ |
| नराधिपोऽत्र कतमः | २ | १६ | ६ | नागरीयोषितां मध्ये | ५ | २० | २९ |
| नरेन्द्र स्मर्यतामात्मा | ३ | १८ | ८० | नागद्वीपास्तथा सौम्यः | २ | ३ | ७ |
| नरेन्द्र कस्मात् | ४ | २ | ८१ | नागवीथ्युत्तरं यच्च | २ | ८ | ९० |
| न रेजेऽन्तरितश्चन्द्रः | ५ | ६ | ३९ | नागपत्न्यश्च शतशः | ५ | ७ | १६ |
| नरः ख्यातिः केतुरूपः | ३ | १ | १९ | नाग्निर्दहति नैवायम् | १ | १९ | ५९ |
| नर्मदायै नमः | ४ | ३ | १३ | नाडिका तु प्रमाणेन | ६ | ३ | ७ |
| न लयं तत्र तेनैव | ४ | १५ | २ | नाडिकाभ्यामथ द्वाभ्याम् | ६ | ३ | ९ |
| न वयं कृषिकर्त्तारः | ५ | १० | २६ | नातिक्रान्तुमलं ब्रह्मन् | ५ | ३८ | १० |
| नवयोजनसाहस्रः | २ | ३ | २ | नातिदूरेऽवस्थितं च | ४ | ४ | २० |
| नवस्त्र्यक्षैष्षमावास्या | ३ | १४ | १० | नानिरूक्तच्छविं पाण्डु० | ३ | १० | २१ |
| नववर्षं तु मैत्रेय | २ | ३ | २७ | नातिदीर्घं नातिह्रस्वम् | ३ | १० | ११ |
| नवसाहस्रमेकैकम् | २ | २ | १५ | नातिज्ञानवहा यस्मिन् | ३ | १७ | १९ |
| नव ब्रह्माण इत्येते | १ | ७ | ६ | नातिक्लेशेन महता | ६ | २ | २१ |
| नवमो दक्षसावर्णिः | ३ | २ | २० | नात्र भवता प्रत्याख्यानम् | ४ | १० | ११ |
| न वयमन्यथा वदिष्यामः | ४ | ९ | ८ | नात्र स्थेयं त्वया सर्प | ५ | ७ | ७७ |
| न वामनां नातिदीर्घाम् | ३ | १० | २२ | नाथ योनिसहस्रेषु | १ | २० | १८ |
| न विद्मः किं स शक्रत्वम् | १ | १२ | ३६ | नादक्षिणां नान्यकामाम् | ३ | ११ | ११६ |
| नवोद्गतालपदन्तांशु० | ५ | ६ | १९ | नाद्यूनां तु श्रियं गच्छेत् | ३ | ११ | ११५ |
| न शब्दगोचरं यस्य | १ | १७ | २२ | नानावीर्याः पृथग्भूताः | १ | २ | ५२ |
| न शान्ता नापि घोरास्ते | १ | २ | ४६ | नानार्यानाश्रयेत्कांश्चित् | ३ | १२ | १६ |
| न श्मश्रु भक्षयेल्लोष्ठम् | ३ | १२ | ११ | नानाप्रकारवचनम् | ३ | १८ | २१ |
| नष्टे चाग्नौ च सततम् | ६ | ३ | ३८ | नानौषधीः समानीय | १ | ९ | ८३ |
| न सहति परसम्पदं विनिन्दाम् | ३ | ७ | २९ | नान्तोऽस्ति यस्य न च यास्य समुद्भवोऽस्ति | ६ | ८ | ६० |
| न सस्यानि न गोरक्ष्यम् | १ | १३ | ८४ | नान्दीमुखः पितृगणः | ३ | १३ | ४ |
| न समर्थाः सुरास्तोतुम् | ५ | ७ | ४९ | नान्यपिष्टं हि कंसस्य | ५ | २० | ५ |
| न सन्ति यत्र सर्वेशे | ६ | ४ | ३७ | नान्यस्त्रियं तथा वैरम् | ३ | १२ | ५ |
| न सेहे देवकीं द्रष्टुम् | ५ | २ | ५ | नान्ययोनावयोनौ वा | ३ | ११ | १२१ |
| न स्थूलं न च सूक्ष्मं यत् | १ | ९ | ५२ | नान्यस्याद्वैतसंस्कार० | २ | १६ | १६ |
| न स्नायान्न स्वपेन्नग्नः | ३ | १२ | १९ | नान्यदत्तमभीप्सामि | १ | ११ | २९ |
| न स्वेदो न च दौर्गन्ध्यम् | २ | २ | २२ | नाप्सु नैवाम्भसस्तीरे | ३ | ११ | १३ |
| न हन्तव्या महाभाग | ५ | १ | १० | नाभागस्यात्मजः | ४ | २ | ५ |
| न हि कश्चिद्भगवता | ४ | १३ | ८५ | नाम रूपं च भूतानाम् | १ | ५ | ६३ |
| न हि पूर्वविसर्गे वै | १ | १३ | ८३ | नाम देहीति तं सोऽथ | १ | ८ | ४ |
| न हि कौतूहलं तत्र | १ | १६ | १२ | नारदे तु गते कृष्णः | ५ | १६ | २८ |
| न हि पालनसामर्थ्यम् | १ | २२ | २१ |
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५१०
| श्लोकाः | अंशाः | अध्या० | श्लो० | श्लोकाः | अंशाः | अध्या० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| नारदेनैवमुक्ता सा | ५ | २७ | १२ | निमेरपि तच्छरीरमतिमनोहर | ४ | ५ | १३ |
| नारभेत कलिं प्राज्ञः | ३ | १२ | २३ | नियुद्धे तद्विनाशेन | ५ | २० | २० |
| नारायणात्मजस्सुशर्मा | ४ | २४ | ४१ | नियुद्धप्राश्निकानां तु | ५ | २० | ६२ |
| नारायणभुजाघात० | ५ | ३३ | १७ | निरवद्यः परः प्राप्तेः | ५ | १ | ४९ |
| नारायणमणीयांसम् | १ | ९ | ४१ | निरतिशयपुण्यसमुद्भूतम् | ४ | १५ | ६ |
| नारायणः परोऽचिन्त्यः | १ | ४ | ४ | निरस्तातिशयाह्लाद० | ६ | ५ | ५९ |
| नार्थहीनं न चाशस्तम् | ३ | १० | १० | निरीक्ष्य तं तदा देवी | १ | ४ | ११ |
| नार्हसि स्त्रीधर्मसुखाभिज्ञः | ४ | ४ | ६३ | निरुच्छ्वासः सचैतन्यः | ६ | ५ | १३ |
| नावगाहेज्जलोद्घस्य | ३ | १२ | ८ | निरुद्धकण्ठो दोर्पाथैः | ६ | ५ | ४१ |
| नाविशालां न वै भग्नाम् | ३ | ११ | ११२ | निर्गुणेनापि चापेन | ५ | ६ | ४० |
| नाशकन्मरुतो वातुम् | १ | १५ | २ | निर्गुणस्याप्रमेयस्य | १ | ३ | १ |
| नाशायास्य निमित्तानि | ५ | ३७ | ३३ | निर्मोहस्तत्त्वदर्शी च | ३ | २ | ४० |
| नाशेषं पुरुषोऽश्नीयात् | ३ | ११ | ८६ | निर्याणं बलभद्रस्य | ५ | ३७ | ५८ |
| नासमञ्जसशीलैस्तु | ३ | १२ | २१ | निर्यौगपाशस्कन्धौ तौ | ५ | ९ | ४ |
| नासस्या नातृणा भूमिः | ५ | १० | २२ | निर्विण्णचित्तस्स ततः | ६ | १८ | ७२ |
| नासन्दिसंस्थिते पात्रे | ३ | ११ | ८३ | निर्जगाम गृहान्मातुः | १ | ११ | ३० |
| नास्माभिः शक्यते हन्तुम् | १ | १९ | १५ | निर्जित्य रुक्मिणं सम्यक् | ५ | २६ | ११ |
| नाहमर्थमभीप्सामि | १ | ११ | ४१ | निर्जितश्च भगवता | ४ | १३ | ५२ |
| नाहो न रात्रिर्न नभो न भूमिः | १ | २ | २३ | निर्मलाः सर्वकालन्तु | २ | १ | १० |
| नाहं मन्ये लोकजयात् | ६ | ६ | ३० | निर्मार्जमाना गात्राणि | १ | १५ | ४७ |
| नाहं कृपालुहृदयः | १ | ९ | २० | निर्वाणमय एवायम् | ६ | ७ | २२ |
| नाहं क्षमिष्ये बहुना | १ | ९ | २४ | निर्वापारमनाख्येयम् | १ | २२ | ५० |
| नाहं पीवान चैवोढा | २ | १३ | ६२ | निर्द्वन्द्वा निरभिमानाः | २ | ८ | ८४ |
| नाहं वहामि शिबिकाम् | २ | १४ | ४ | निर्धूतदोषपंकानाम् | २ | ८ | ९९ |
| नाहं प्रसूता पुत्रेण | ४ | १२ | २९ | निर्यौवना गतश्रीका | ५ | ३८ | ४८ |
| नाहं बलदेववासुदेवाभ्याम् | ४ | १३ | ८३ | निवारयामास हरिः | ५ | ३७ | ४८ |
| नाहं देवो न गन्धर्वः | ५ | १३ | १२ | निवापेन पितॄनर्चन् | ३ | ९ | ९ |
| निकुम्भस्यामिताश्वः | ४ | २ | ४५ | निवृत्तास्तदा गोप्यः | ५ | १३ | ४२ |
| निघ्नस्य प्रसेनस्त्राजितौ | ४ | १३ | १० | निवेष्टुकामोऽस्मि नरेन्द्र कन्याम् | ४ | २ | ७७ |
| निजेन तस्य मानेन | १ | ३ | ५ | निशम्य तस्येति वचः | २ | १४ | १ |
| नित्यनैमित्तिकाः काम्याः | ३ | १० | २ | निशम्य तद्वचः सत्यम् | १ | १५ | ३५ |
| नित्यानित्यप्रपञ्चात्मन् | १ | २० | १२ | निशम्यैतदशेषेण | १ | १२ | १ |
| नित्यानां कर्मणां विप्र | ३ | १८ | ३९ | निशासु च जगत्स्रष्टा | ५ | ३१ | २० |
| नित्यैवैषा जगन्माता | १ | ८ | १७ | निशेयं नीयतां वीर | ५ | १८ | १० |
| निद्रे गच्छ ममादेशात् | ५ | १ | ७२ | निश्रीकता न मे चित्रम् | ५ | ३८ | ५३ |
| निभृतोऽभवदत्यर्थम् | ५ | १० | १० | निषधस्याप्यनलः | ४ | ४ | १०६ |
| निमग्नश्च समुत्थाय | ६ | २ | ८ | निषधः पारियात्रश्च | २ | २ | ४३ |
| निमग्नश्च पुनस्तोये | ५ | १८ | ४६ | निष्कास्यतामयं पापः | १ | १७ | २७ |
| निमित्तमात्रमेवाऽसौ | १ | ४ | ५१ | निष्क्रम्याल्पपरीवारा० | ५ | २२ | ४ |
| निमित्तमात्रं मुक्त्वैवम् | १ | ४ | ५२ | निष्क्रम्य स मुखातस्य | ५ | ३७ | ५५ |
| निमेषो मानुषो योऽसौ | ६ | ३ | ६ | निष्पादितो मया यागः | ६ | ६ | ४३ |
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५११
| श्लोकाः | अंशाः | अध्या० | श्लो० | श्लोकाः | अंशाः | अध्या० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| निष्पादितोरुकार्यस्य | ५ | २५ | २ | पञ्चवर्षसहस्राणि | २ | ४ | १५ |
| निष्पादिताङ्घ्रि शौचस्तु | ३ | ११ | २० | पञ्चमी मातृपक्षाच्च | ३ | १० | २३ |
| निष्पाद्यन्ते नरैस्तैस्तु | १ | ६ | ९ | पञ्चमे वापि मैत्रेय | ३ | १ | २० |
| निसर्गतोऽधिकांगीं वा | ३ | १० | १७ | पञ्चरूपा तु या माला | १ | २२ | ७२ |
| निस्तेजसो वदस्येनान् | ३ | ५ | १० | पञ्चधावस्थितो देहे | १ | १४ | ३१ |
| निस्संगता मुक्तिपदं यतीनाम् | ४ | २ | १२४ | पञ्चधाऽवस्थितः सर्गः | १ | ५ | ६ |
| निस्सत्त्वानामाशौचानाम् | ६ | १ | ५८ | पञ्चभूतात्मकैर्भोगैः | ६ | ७ | १८ |
| निस्स्वाध्यायवषट्कारे | ६ | १ | ५९ | पञ्चभूतात्मके देहे | ६ | ७ | १२ |
| निस्स्रुतं तदमावास्याम् | २ | १२ | १३ | पञ्चाशद्दुहितरस्तस्याम् | ४ | २ | ६८ |
| निःसत्त्वाः सकला लोकाः | १ | ९ | २८ | पञ्चाशत्कोटिविस्तारा | २ | ४ | ९६ |
| निःस्वरश्चाग्नितेजाश्च | ३ | २ | ३१ | पठतश्चाक्षरसंख्यान्येव | ४ | ६ | ९० |
| निहतस्य पशोर्यज्ञे | ३ | १८ | २८ | पठ्यतां भवता वत्स | १ | १७ | १३ |
| नीतोऽग्निशीततां बाणैः | ५ | ३० | ६२ | पठ्यते येषु चैवेयम् | १ | ९ | १४७ |
| नीयतां पारिजातोऽयम् | ५ | ३१ | ७ | पतत्रिराजमारूढम् | १ | १४ | ४६ |
| नीलवासा मदोत्सिक्तः | २ | ५ | १७ | पतमानं जगद्धात्री | १ | १९ | १३ |
| नूनमुक्ता त्वरामीति | ५ | १३ | ४० | पतन्तमुच्चादवनिः | १ | १५ | १४९ |
| नूनं त्वया त्त्वन्मातृ० | ४ | ७ | २६ | पतत्रिणां तु गरुडम् | १ | २२ | ६ |
| नूनं ते दृष्टमाश्चर्यम् | ५ | १९ | ५ | पतता तच्छरीरेण | ५ | ३६ | २० |
| नृपाणां कथितस्सर्वः | ५ | १ | १ | पतत्रिभ्यो मृगास्तेभ्यः | ६ | ७ | ६५ |
| नेन्द्रत्वं न च सूर्यत्वम् | १ | १२ | ३८ | पतिव्रता महाभागा | ३ | १८ | ५४ |
| नैतद्राजासनं योग्यम् | १ | १२ | ८० | पतिते चाग्रजे नैव | ४ | २० | २९ |
| नैतद्युक्तिसहं वाक्यम् | ३ | १८ | २६ | पतिगर्वावलेपेन | ५ | ३० | ७४ |
| नैते ममानुरूपाः | ४ | १९ | १५ | पलीशाला मुने लक्ष्मीः | १ | ८ | २१ |
| नैमित्तिकः प्राकृतिकः | १ | ७ | ४१ | पत्नी मरीचेः सम्भूतिः | १ | १० | ६ |
| नैर्ऋत्यामिषु विक्षेपम् | ३ | ११ | ९ | पत्त्यर्थं प्रतिजग्राह | १ | ७ | २४ |
| नैवमतिसाहसाध्यवसायिनी | ४ | ३ | ३३ | पथ्यस्यापि त्रयश्शिष्याः | ३ | ६ | ११ |
| नैवास्तमनमर्कस्य | २ | ८ | १५ | पद्मक्रमाक्रान्तभुवं भवन्तम् | १ | ४ | ३५ |
| नैवाहस्तस्य न निशा | ६ | ४ | ४९ | पद्भ्यां चाश्वान्समातंगान् | १ | ५ | ४९ |
| नैष मम क्षेत्रे भवत्यान्यस्य | ४ | ६ | २१ | पद्भ्यामुभाभ्यां स तदा | ५ | ८ | ८ |
| नैषधनैमिषककाल० | ४ | २४ | ६६ | पद्भ्यां गता यौवनिनश्च जाता | ४ | २ | ११७ |
| नैषधास्तु त एव | ४ | २४ | ६० | पद्भ्यामन्याः प्रजा ब्रह्मा | १ | ६ | ५ |
| नोच्चैर्हसेत् सशब्दं च | ३ | १२ | १० | पद्मयोनेर्दिनं यत्तु | ६ | ४ | ९ |
| नोदेता नास्तमेता च | २ | ११ | १८ | पद्मालयां पद्मकराम् | १ | ९ | ११८ |
| नोद्वेगस्तात कर्तव्यः | १ | ११ | १७ | पपौ च गोपगोपीभिः | ५ | २५ | ७ |
| नोर्ध्वं न तिर्यग्दूरं वा | ३ | १२ | ३९ | पयांसि सर्वदा सर्व० | २ | ४ | ८८ |
| नोपसर्गादिकं दोषम् | ५ | १९ | २८ | परदारान गच्छेच्च | ३ | ११ | १२५ |
| न्यग्रोधः सुमहानाल्पे | १ | १२ | ६५ | परपूर्वापतिश्चैव | ३ | १५ | ७ |
| न्यग्रोधः पुष्करद्वीपे | २ | ४ | ८५ | परमात्मा च भूतात्मा | ५ | २९ | २८ |
| न्यायतोऽन्यायतो वापि | ५ | २० | २१ | परमात्मा च सर्वेषाम् | ६ | ४ | ४० |
| प० | परलोकजयस्तस्य | ६ | ६ | २९ | |||
| पक्षतृप्तिं तु देवानाम् | २ | ११ | २६ | परस्परेणाभिभवम् | ६ | ७ | ४१ |
| पक्षिणः स्थावराश्चैव | १ | ११ | ६८ | परदारपरद्रव्य० | ३ | ८ | १४ |
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५१२
| श्लोकाः | अंशाः | अध्या० | श्लो० | श्लोकाः | अंशाः | अध्या० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| परज्ञानमयोऽसद्भिः | ... २ | १४ | ३० | पाताले चाश्वं परिभ्रमन्तम् | ... ४ | ४ | १९ |
| परमात्मात्मनोर्योगः | ... २ | १४ | २७ | पातालानामधश्चास्ते | ... २ | ५ | १३ |
| परमेश्वरसंज्ञोऽज्ञ | ... १ | १७ | २३ | पातालानि समस्तानि | ... ६ | ३ | २५ |
| परमेशत्वगुणवत् | ... १ | १४ | ४३ | पातालं स मनुप्राप्तः | ... ६ | ८ | ४८ |
| परमार्थस्त्वमेवैकः | ... १ | ४ | ३८ | पात्रं प्रेतस्य तत्रैकम् | ... ३ | १३ | २९ |
| परमार्थोऽयमत्यर्थम् | ... ३ | १८ | १० | पतितं तत्र चैवैकः | ... ५ | २७ | ५ |
| परस्य ब्रह्मणो रूपम् | ... १ | २ | १५ | पादशौचादिना गेहम् | ... ३ | १५ | १३ |
| परमब्रह्मणे तस्मै | ... ३ | ३ | २८ | पादगम्यन्तु यत्किञ्चित् | ... २ | ७ | १६ |
| परमसुहृदि बान्धवे कलत्रे | ... ३ | ७ | ३० | पादप्रणामावनतम् | ... १ | १७ | १२ |
| परापरात्मन्विश्वात्मन् | ... १ | ४ | २२ | पादांगुष्ठेन सम्मीड्य | ... १ | १२ | १० |
| परापवादं पैशुन्यम् | ... ३ | ८ | १३ | पादावनेजनोच्छिष्टे | ... ३ | ११ | १० |
| परावृतो रुक्मेषु | ... ४ | १२ | ११ | पादेषु वेदास्तव यूपदंष्ट्र० | ... १ | ४ | ३२ |
| परार्द्धसंख्यां भगवन् | ... ६ | ३ | ३ | पादेन नाक्रमेत्पादम् | ... ३ | १२ | २५ |
| परार्द्धद्विगुणं यत्तु | ... ६ | ३ | ५ | पादोद्धूतैः प्रमृष्टैश्च | ... ५ | २० | ६७ |
| परिवर्त्तितताराक्षः | ... ६ | ५ | ४० | पानासक्तं महात्मानम् | ... १ | १७ | ७ |
| परिमण्डलं च सुषिरम् | ... ६ | ४ | २६ | पानीयमप्यत्र तिलैर्विमिश्रम् | ... ३ | १४ | १४ |
| परितुष्टास्मि देवेश | ... १ | ९ | १३५ | पापानामनुरूपाणि | ... २ | ६ | ३७ |
| परित्यजति वत्साद्य | ... १ | १२ | २१ | पापे गुरूणि गुरुणि | ... २ | ६ | ३८ |
| परित्यजेदर्थकामौ | ... ३ | ११ | ७ | पापं हरति यत्पुंसाम् | ... ५ | १७ | ४ |
| परिनिष्ठितयज्ञे आचार्ये | ... ४ | ४ | ४६ | पायूपस्थौ करौ पादौ | ... १ | २ | ४९ |
| परित्यज्य तावप्युरणकौ | ... ४ | ६ | ६० | पारत्र्यफललाभाय | ... ३ | १८ | ४ |
| परिवृत्तिश्रमेणैका | ... ५ | १३ | ५३ | पारतन्त्र्यं समस्तेषु | ... ६ | २ | २२ |
| परित्यक्त्यान्यविषयः | ... ५ | १९ | २ | पारानीलः | ... ४ | १९ | ३८ |
| परित्यक्ष्यन्ति भर्तारम् | ... ६ | १ | १८ | पारामरीचि गर्भश्च | ... ३ | २ | २१ |
| परीक्षितो जनमेजय० | ... ४ | २० | १ | पारावतास्स्तुतिष्टाः | ... ३ | १ | १० |
| परं ब्रह्म परं धाम | ... १ | ११ | ४६ | पारिजाततरुश्छायम् | ... ५ | ३१ | ३ |
| परः पराणां परमः | ... १ | २ | १० | पारिजाततरोः पुष्प० | ... ५ | ३५ | २५ |
| परः परस्मात्पूरुषात् | ... १ | ९ | ४३ | पारं परं विष्णुरपारपारः | ... १ | १५ | ५५ |
| परः पराणां पुरुषः | ... १ | ११ | ४४ | पार्थैतत्सर्वभूतस्य | ... ५ | ३८ | ६९ |
| पर्णमूलफलाहारः | ... ३ | ९ | १९ | पार्थः पञ्चनदे देशे | ... ५ | ३८ | १२ |
| पर्णशय्यासु संसुप्तौ | ... ५ | ६ | ४७ | पावकं पवमानं तु | ... १ | १० | १५ |
| पर्वस्वभिगमो धन्यः | ... ३ | ११ | १२४ | पाशुपाल्यं च वाणिज्यम् | ... ३ | ८ | ३० |
| पलितोद्भवश्च भविता | ... ६ | १ | ४२ | पाशं सलिलराजस्य | ... ५ | ३० | ५९ |
| पवित्रपाणि० | ... ३ | १५ | १४ | पाषण्डिनं समाभाष्य | ... ३ | १८ | ७० |
| पशवश्च मृगाश्चैव | ... ५ | ३० | १२ | पाषण्डिनो विकर्मस्थान् | ... ३ | १८ | १०१ |
| पशूनां ये च पतयः | ... १ | २२ | १९ | पिण्डः पृथग्यतः पुंसः | ... २ | १३ | ८९ |
| पश्यतां सर्वभूतानाम् | ... ५ | ७ | ८० | पिण्डैर्मातामहांस्तद्वत् | ... ३ | १५ | ४३ |
| पश्चादयस्ते विख्याताः | ... १ | ५ | १० | पितुर्युपरतं नीते | ... १ | २० | ३२ |
| पश्चिमस्यां दिशि तथा | ... १ | २२ | १३ | पितुर्युपरते सोऽथ | ... २ | १३ | ४६ |
| पाकाय योऽग्नित्वमुपैति लोकान् | ... ४ | १ | ८७ | पितुर्युपरते चासौ | ... ४ | २ | १९ |
| पाण्डोरप्यरण्ये | ... ४ | २० | ४० | पितरो ब्रह्मणा सृष्टा | ... १ | १० | १८ |
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५१३
| श्लोकाः | अंशाः | अध्या० | श्लो० | श्लोकाः | अंशाः | अध्या० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| पितामहश्च भगवान् | ... | १ | १३ | ४४ | पुत्रः पौत्रः प्रपौत्रो वा | ... | ३ |
| पिता माता तथा भ्राता | ... | ५ | २४ | १६ | पुत्रपौत्रैः परिवृतः | ... | ५ |
| पिता चास्याचिन्तयदद्यम् | ... | ४ | ४ | ९ | पुत्रश्चाजायत | ... | ४ |
| पितामहाय चैवान्यम् | ... | ३ | १५ | ४२ | पुत्रद्रव्यकलत्रेषु | ... | ३ |
| पिता पितामहश्चैव | ... | ३ | १५ | ३२ | पुत्रश्चेत्परमार्थः स्यात् | ... | २ |
| पिता पितामहश्चैव | ... | ३ | १५ | ३३ | पुत्रसङ्क्रमितश्रीस्तु | ... | २ |
| पिता पितामहश्चैव | ... | ३ | १५ | ३४ | पुत्रञ्च सुमहावीर्यम् | ... | १ |
| पिता पितामहश्चैव | ... | ३ | १५ | ३५ | पुत्रि सर्वं एवात्मपुत्रम् | ... | ४ |
| पिता गुरुर्न सन्देहः | ... | १ | १८ | १७ | पुत्रि कस्मान्न जायसे | ... | ४ |
| पिता च मम सर्वस्मिन् | ... | १ | १८ | १५ | पुनश्च प्रणम्य भगवते | ... | ४ |
| पितामहेन दत्तार्थ्यः | ... | १ | १ | २३ | पुनश्च तृतीयं रोमपादसंज्ञम् | ... | ४ |
| पितृमातृसपिण्डेस्तु | ... | ३ | १३ | ३८ | पुनरपि अक्षयवीर्य० | ... | ४ |
| पितृपूजाक्रमः प्रोक्तः | ... | ३ | १३ | ७ | पुनश्चेदिराजस्य | ... | ४ |
| पितृदेवमनुष्यादीन् | ... | २ | ११ | २१ | पुनरप्यच्युतविनिपातम् | ... | ४ |
| पितृदेवातिथींस्त्यक्त्वा | ... | २ | ६ | १६ | पुनश्च स्वपुरमाजगाम | ... | ४ |
| पितृपुत्रसुहृद्भ्रातृ० | ... | ५ | १७ | १३ | पुनरप्या जगामाथ | ... | ५ |
| पितृवधामर्षपूर्णा | ... | ४ | १३ | ७२ | पुनश्च गर्भे भवति | ... | ६ |
| पितृवचनाच्चागणि० | ... | ४ | ४ | ९५ | पुनश्चेश्वरकोपात् | ... | ४ |
| पितृभ्यः प्रथमं भक्त्या | ... | ३ | १५ | ४४ | पुनस्तयोक्तं स ज्ञात्वा | ... | ३ |
| पितृतीर्थेन सतिलम् | ... | ३ | १५ | ४० | पुनश्च रक्ताम्बरधृक् | ... | ३ |
| पितृगीतान्तथैवात्र | ... | ३ | १४ | २१ | पुनश्च पद्मादुत्पन्ना | ... | १ |
| पितॄणामपसव्यं तत् | ... | ३ | १५ | २१ | पुनश्च मधुसंज्ञेन | ... | १ |
| पितॄणां धर्मराजं तं | ... | १ | २२ | ५ | पुनर्गते वर्षशते | ... | १ |
| पितॄणां प्रीणनार्थाय | ... | ३ | ११ | २९ | पुनश्च कामासंयोगात् | ... | २ |
| पित्रर्थं चापरं विप्रम् | ... | ३ | ११ | ६४ | पुनस्तथैव शिविकाम् | ... | २ |
| पित्रा प्रचेतसः प्रोक्ताः | ... | १ | १४ | ९ | पुनः पाकमूपादाय | ... | ३ |
| पित्रापराजिस्तास्तस्य | ... | १ | १३ | ४८ | पुनः पुनः प्रणम्योभौ | ... | ५ |
| पिपीलिकाः कीटपतंगकाद्याः | ... | ३ | ११ | ५२ | पुमान्न देवो न नरः | ... | २ |
| पिबतां तत्र चैतेषाम् | ... | ५ | ३७ | ४० | पुमान्सर्वगतो व्यापी | ... | २ |
| पिबन्ति द्विकलाकारम् | ... | २ | १२ | १२ | पुमान् स्त्री गौरजो वाजी | ... | २ |
| पीतनीलाम्बरधरौ | ... | ५ | १९ | १९ | पुरप्रवेशे प्रमथैः | ... | ५ |
| पीते वसानं वसने | ... | ५ | १८ | ४० | पुरञ्जयाज्जनमेजयः | ... | ४ |
| पीतेऽमृते च बलिभिः | ... | १ | ९ | १११ | पुरञ्जयो नाम राजर्षेः | ... | ४ |
| पीतं तं द्विक्लं सोमम् | ... | २ | ११ | २३ | पुराणसंहिताकर्ता | ... | १ |
| पीत्वाम्भांसि समस्तानि | ... | ६ | ३ | १८ | पुरा ममागतो वत्स | ... | ३ |
| पुच्छेग्निश्च महेन्द्रश्च | ... | २ | १२ | ३४ | पुरा हि त्रेतायाम् | ... | ४ |
| पुण्ड्राः कलिंगा मगधाः | ... | २ | ३ | १६ | पुरा गार्ग्यण कथितम् | ... | ५ |
| पुण्यदेशप्रभावेण | ... | २ | १३ | ५ | पुराणं वैष्णवं चैतत् | ... | ६ |
| पुण्योपचयसम्पन्नः | ... | १ | ११ | २१ | पुरुषाः षट् च षष्टिश्च | ... | ४ |
| पुण्याः प्रदेशा मेदिन्याः | ... | ६ | ८ | १६ | पुरुकुत्सो नर्मदायाम् | ... | ४ |
| पुत्रकास्मान्निवर्त्तस्व | ... | १ | १२ | १५ | पुरुकुत्साय सन्ततिविच्छेदः | ... | ४ |
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| श्लोकाः | अंशाः | अध्या० | श्लो० | श्लोकाः | अंशाः | अध्या० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| पुरुकुत्समम्बरीषम् | ४ | २ | ६७ | पृथिवी विषयं सर्वम् | १ | १५ | १०८ |
| पुरुषैर्यज्ञपुरुषः | २ | ३ | २१ | पृथिव्यापस्तथा तेजः | १ | २ | ६८ |
| पुरुषाधिष्ठितत्वाच्च | १ | २ | ५४ | पृथुविपृथुप्रमुखाश्चित्रक० | ४ | १४ | ११ |
| पूरूरवसो ज्येष्ठः पुत्रः | ४ | ८ | १ | पृथुस्ततस्ततो नक्तः | २ | १ | ३८ |
| पुरूरवास्त्वतिदानशीलः | ४ | ६ | ३५ | पृथुश्रवसश्च पुत्रः | ४ | १२ | ७ |
| पुरोधसा मन्त्रिभिश्च | ६ | ६ | ११ | पृथुस्समस्तानीवच्चार लोकान् | ४ | २४ | १४५ |
| पुरोहिताप्यायितेजाश्च | ४ | ९ | २२ | पृथुरनेनसः | ४ | २ | ३४ |
| पुरोजनमेजयस्तस्यापि | ४ | १९ | १ | पृथोर्विष्टराश्वः | ४ | २ | ३५ |
| पुलस्त्यवरदानेन | ६ | ८ | ५० | पृथोः पुत्रौ तु धर्मज्ञौ | १ | १४ | १ |
| पुष्करद्वीपवलयम् | २ | ४ | ७६ | पृथ्वी ममेयं सकला ममैषा | ४ | २४ | १३४ |
| पुष्कराः पुष्कला धन्याः | २ | ४ | ५३ | पृथ्वी ममैषाशु परित्यजैनाम् | ४ | २४ | १३६ |
| पुष्करे सवनस्यापि | २ | ४ | ७३ | पृषदश्वसुवीरकेकयमद्रकाश्च | ४ | १८ | १० |
| पुष्पबन्धनसम्मान० | ५ | १३ | ३६ | पौण्ड्रको वासुदेवस्तु | ५ | ३४ | ४ |
| पुष्पवृष्टिं ततो देवाः | ५ | ३६ | २१ | पौण्ड्रकोर्कं त्वया यत्तु | ५ | ३४ | २२ |
| पुष्पापचयमत्रोच्चैः | ५ | १३ | ३४ | पौर्णमास्याममावास्याम् | १ | २० | ३८ |
| पुष्यमित्रस्सेनापतिः | ४ | २४ | ३४ | पौषमासे वसन्त्येते | २ | १० | १५ |
| पुंसां जटाधरणमौण्ड्यवतां वृथैव | ३ | १८ | १०५ | प्रकटीभूतसर्वार्थिः | ६ | ५ | २९ |
| पूजिताश्च द्विजास्सर्वे | ६ | ६ | ३७ | प्रकृतिर्या मयाख्याता | ६ | ४ | ३१ |
| पूज्यदेवद्विजज्योतिः | ३ | १२ | १४ | प्रकृतिस्त्वं परा सूक्ष्मा | ५ | २ | ७ |
| पूतनाया विनाशश्च | ५ | ६ | २३ | प्रकृतौ संस्थितं व्यक्तम् | १ | २ | २५ |
| पूरोस्सकाशादादाय | ४ | १० | ३० | प्रक्षाल्यते यदा सोऽस्य | ६ | ७ | २० |
| पूर्णं शतसहस्रे तु | २ | ७ | ६ | प्रक्षालिताङ्घ्रिपाणिं च | २ | १५ | १० |
| पूर्णं वर्षसहस्रं मे | ४ | १० | २८ | प्रक्षीणाखिलशौचश्च | ६ | ५ | ३४ |
| पूर्वमेव महाभागम् | २ | १४ | ७ | प्रख्यातो व्यासशिष्योऽभूत् | ३ | ६ | १६ |
| पूर्वस्यां दिशि राजानम् | १ | २२ | ११ | प्रचेतसः पुत्रशतधर्मः | ४ | १७ | ५ |
| पूर्वमन्वन्तरे श्रेष्ठाः | १ | १५ | १२६ | प्रजहास तथैवोच्चैः | ५ | ३ | २७ |
| पूर्वस्तत्रोदयगिरिः | २ | ४ | ६२ | प्रजापतिकृतः शापः | २ | ८ | ५० |
| पूर्वमेवानुढायाञ्च भगवता | ४ | १४ | ३६ | प्रजानामुपकाराय | १ | १३ | ७५ |
| पूर्वमेवं मुनिगणैः | ३ | ५ | ५ | प्रजापतीनां दक्षं तु | १ | २२ | ४ |
| पूर्वमात्मजयं कृत्वा | ४ | २४ | १२९ | प्रजापतिं समुद्दिश्य | ३ | ११ | ४३ |
| पूर्वाः क्रिया मध्यमाश्च | ३ | १३ | ३४ | प्रजापतिपतिर्ब्रह्मा | ५ | १ | १५ |
| पूर्वाः क्रियाश्च कर्तव्याः | ३ | १३ | ३९ | प्रजापतिश्च | ४ | १ | २२ |
| पूर्वेण मन्दरो नाम | २ | २ | १८ | प्रजास्ता ब्रह्मणा सृष्टाः | १ | ६ | ११ |
| पूर्वेण शैलात्सीता | २ | २ | ३५ | प्रजापतिः स जग्राह | १ | ७ | २० |
| पूर्वं यत्र तु सप्तर्षीन् | १ | २१ | २९ | प्रजाः ससर्ज भगवान् | १ | ४ | २ |
| पूर्वं शान्तहयं वर्षम् | २ | ४ | ५ | प्रजाः सृजेति व्यादिष्टः | १ | १५ | ८६ |
| पूर्वं त्यक्तैस्सरोऽम्भोभिः | ५ | १० | ९ | प्रणष्टे गन्धतन्मात्रे | ६ | ४ | १५ |
| पूषा वसुरुचिर्वातः | २ | १० | ११ | प्रणतिर्या कृतास्माकम् | ५ | ३५ | १६ |
| पृथक्त्योः केचिदाहुः | ३ | १५ | १८ | प्रणष्टवज्रं देवेन्द्रम् | ५ | ३० | ७० |
| पृथग्भूतेकभूताय | १ | १२ | ६९ | प्रभवन्ति ततस्तेभ्यः | २ | ७ | ३३ |
| पृथा श्रुतदेवा श्रुतकीर्तिः | ४ | १४ | ३१ | प्रणवावस्थितं नित्यम् | ३ | ३ | २३ |
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| श्लोकाः | अंशाः | अध्या० | श्लो० | श्लोकाः | अंशाः | अध्या० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| प्रणम्य प्रणताः सर्वे | १ | ९ | ६८ | प्रयास्यन्ति यदा चैते | ४ | २४ | ११२ |
| प्रणामप्रवणा नाथ | १ | ९ | ६५ | प्रयान्ति तोयानि खुराग्रविक्षत० | १ | ४ | २८ |
| प्रणिपत्य चैनमाह | ४ | ७ | २९ | प्रयासः स्मरणे कोऽस्य | १ | १७ | ७८ |
| प्रणिपत्य पितुः पादौ | १ | १९ | ३३ | प्ररूढनवबाष्पाढ्या | ५ | ६ | ३७ |
| प्रणेतर्मनसो बुद्धेः | ५ | ३० | ७ | प्रलयोऽयमशेषस्य | ५ | ३३ | २३ |
| प्रतिदिनं तन्मणिरत्नम् | ४ | १३ | २५ | प्रलम्बकण्ठोऽतिमुखः | ५ | १४ | ५ |
| प्रतिहर्तेति विख्यातः | २ | १ | ३७ | प्रलम्बं निहतं दृष्ट्वा | ५ | ९ | ३७ |
| प्रतीकारमिमं कृत्वा | १ | ६ | २० | प्रलीने च ततस्तस्मिन् | ६ | ४ | २१ |
| प्रत्यक्षं भवता भूप | २ | १३ | ६४ | प्रविवेश च राज्ञा | ४ | १२ | ३२ |
| प्रत्यक्षं दृश्यसे पीवा० | २ | १३ | ६३ | प्रविष्टाश्च समं गोभिः | ३ | १३ | १० |
| प्रत्यक्षं भूपतिस्तस्याः | १ | ११ | ५ | प्रविष्टः कोऽस्य हृदये | १ | १७ | २५ |
| प्रत्यस्तमितभेदं यत् | ६ | ७ | ५३ | प्रविष्टः षोडशाधस्तात् | २ | २ | ९ |
| प्रत्यंगिरसजाः श्रेष्ठाः | १ | १५ | १३६ | प्रविश्य चैकं प्रासादम् | ४ | २ | १०२ |
| प्रत्युषस्यागता ब्रह्मन् | १ | १५ | ३० | प्रविश्य द्वारकां सोऽथ | ५ | २९ | २ |
| प्रत्यूपस्य विदुः पुत्रम् | १ | १५ | ११७ | प्रविष्टो गहनं कृष्णः | ५ | १३ | ४१ |
| प्रथमेऽह्नि बुधश्शस्तात् | ३ | १५ | ९ | प्रवृत्ते च निवृत्ते च | १ | १ | २७ |
| प्रथमे कृत्तिका भागे | २ | ८ | ७६ | प्रवृत्तिमार्गव्युच्छित्ति० | १ | ६ | ३१ |
| प्रथमेऽह्नि तृतीये च | ३ | १३ | १३ | प्रवृत्तं च निवृत्तं च | ६ | ४ | ४१ |
| प्रदोषाग्रे कदाचित्तु | ५ | १४ | १ | प्रवृत्तं च निवृत्तं च | ६ | ८ | १० |
| प्रद्युम्नोऽपि रुक्मिणः | ४ | १५ | ३८ | प्रवृत्त्या रजसो यच्च | ३ | १७ | २७ |
| प्रद्युम्नोऽपि महावीर्यः | ५ | २८ | ६ | प्रवेपमानां सततम् | १ | १५ | ४५ |
| प्रद्युम्नाद्या हरेः पुत्राः | ५ | ३२ | १ | प्रवेश्य च तमृषिमन्तःपुरे | ४ | २ | ८८ |
| प्रद्युम्नः प्रथमस्तेषाम् | ५ | ३२ | ६ | प्रशस्तशुद्धपात्रे तु | ३ | ११ | ८२ |
| प्रद्युम्नसाम्बप्रमुखाः | ५ | ३७ | ४६ | प्रशान्तमभयं शुद्धम् | १ | २२ | ५१ |
| प्रधानपुरुषव्यक्त० | १ | २ | १६ | प्रशान्तिकासस्नीवाराः | ३ | १६ | ५ |
| प्रधानपुरुषव्यक्त० | १ | २ | १७ | प्रशाम्यति तदा ज्योतिः | ६ | ४ | २२ |
| प्रधानतत्त्वमुद्भूतम् | १ | २ | ३४ | प्रश्नश्च तत्राभिरतिः | ३ | १३ | २५ |
| प्रधानपुरुषौ चापि | १ | २ | २९ | प्रश्रितास्तान्मुनीनूचुः | ५ | ३७ | ८ |
| प्रधानतत्त्वेन समम् | १ | २ | ३५ | प्रसन्नवदनं चारु० | ६ | ७ | ८० |
| प्रधानं च पुमांश्चैव | २ | ७ | २९ | प्रसन्नोऽहं महाभाग | ५ | ३८ | ७६ |
| प्रधानपुंसोरजयोः | १ | ९ | ३७ | प्रसन्नोऽहं गमिष्यामि | ५ | ३३ | ५० |
| प्रधानमात्मयोनिश्च | ३ | ३ | २७ | प्रसज्जन्तीं तु तां प्राह | ५ | २७ | १५ |
| प्रधानबुद्ध्यादिमयादशेषात् | ३ | १७ | ३१ | प्रसन्नश्च देवानाम् | ४ | २ | २४ |
| प्रफुल्लपद्मपत्राक्षम् | ५ | १७ | २० | प्रसन्नशुकवचनाच्च | ४ | १० | ८ |
| प्रबुद्धश्चासाववनिपतिरपि | ४ | ५ | ९ | प्रसारणाकुञ्चनादौ | ६ | ५ | १२ |
| प्रबुद्धाश्च ऋषयः | ४ | २ | ५४ | प्रसादरम्यौ नाथौ | ५ | १९ | २१ |
| प्रबुद्धश्च पुनः सृष्टिम् | १ | २ | ६५ | प्रसाद्यमानः स तदा | १ | ९ | १९ |
| प्रभा विवस्वतो रात्रौ | २ | ८ | २१ | प्रसाद इति नोक्तं ते | १ | ९ | १३ |
| प्रभासं समनुप्राप्ताः | ५ | ३७ | ३९ | प्रसीद सर्व सर्वात्मन् | १ | ४ | ४२ |
| प्रययौ सोऽव्यवच्छिन्नम् | ५ | २३ | ८ | प्रसीद सर्व सर्वात्मन् | ५ | १८ | ५१ |
| प्रयागे पुष्करे चैव | ६ | ८ | २९ | प्रसीद देवि सर्वस्य | ५ | २ | २१ |
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५१६
| श्लोकाः | अंशा० | अध्या० | श्लो० | श्लोकाः | अंशा० | अध्या० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| प्रसीद मद्धितार्थाय | ... २ | १५ | ३३ | प्रातर्निशि तथा सन्ध्या० | ... २ | ६ | ४१ |
| प्रसीदेश्वाकुकुलतिलक० | ... ४ | ४ | ६२ | प्रातश्चैवापराह्ने च | ... ५ | १ | ८५ |
| प्रसीद सीदतां दत्त: | ... ५ | २० | ९४ | प्रातस्त्वमागता भद्रे | ... १ | १५ | २८ |
| प्रसीद सर्वभूतात्मन् | ... ५ | २९ | २९ | प्रातर्गत्वातिदूरं च | ... २ | १३ | २१ |
| प्रसूतिं च ततः सृष्ट्वा | ... १ | ७ | ८ | प्राप्नोष्याराधिते विष्णौ | ... १ | ११ | ४९ |
| प्रसूत्यां च तथा दक्षः | ... १ | ७ | २२ | प्राप्तसमयश्च दक्षिणम् | ... ४ | २ | ५७ |
| प्रसूतिः प्रकृतेर्या तु | ... १ | ७ | ४४ | प्राप्नोषि यदि भर्तारम् | ... ५ | ३२ | २८ |
| प्रसेनजितो युवनाश्वोऽभवत् | ... ४ | २ | ४८ | प्रायश्चित्तान्यशेषाणि | ... २ | ६ | ३९ |
| प्रस्निग्धामलकेशश्च | ... ३ | १२ | ३ | प्रायश्चित्तेन महता | ... ३ | १८ | ४० |
| प्रहरन्ति महात्मानः | ... १ | १६ | १५ | प्रायशश्च हैहयताल० | ... ४ | ३ | ४१ |
| प्रहस्य तानाह नृपः | ... ६ | ६ | ४६ | प्रायश्चित्तमशेषेण | ... ६ | ६ | १९ |
| प्रहृष्टस्साध्विति प्राह | ... ६ | ७ | ८ | प्रायेणैते आत्मविद्या० | ... ४ | ५ | ३४ |
| प्रह्राद सर्वमेतत्ते | ... १ | २० | २५ | प्रारम्भाश्चावसीदन्ति | ... ६ | १ | ४७ |
| प्रह्राद सुप्रभावोऽसि | ... १ | १९ | २ | प्रावृट्काले च नभसि | ... ५ | १ | ७८ |
| प्रह्रादं सकलापत्सु | ... १ | २० | ३९ | प्रावृट्कालस्ततोऽतीव० | ... ५ | ६ | ३६ |
| प्रह्रादस्य तु दैत्यस्य | ... १ | २१ | १४ | प्रांशुमुत्तुंगवाहंसम् | ... ५ | १७ | २४ |
| प्राकृता वैकृताश्चैव | ... १ | ५ | २६ | प्रियव्रतो ददौ तेषाम् | ... २ | १ | ११ |
| प्राकृतो वैकृतश्चैव | ... १ | ५ | २५ | प्रियव्रतोत्तानपादौ | ... १ | ११ | १ |
| प्राक्सर्गदग्धानखिलान् | ... १ | ४ | ४८ | प्रियव्रतोत्तानपादौ | ... २ | १ | ३ |
| प्रागुत्तरे च दिग्भागे | ... ३ | ११ | ४७ | प्रियव्रतस्य नैवोक्ता | ... २ | १ | ४ |
| प्राग्ज्योतिषपुरस्यापि | ... ५ | २९ | १६ | प्रियमयुक्तं हितं नैतत् | ... ३ | १२ | ४४ |
| प्राग्द्रवं पुरुषोऽश्नीयात् | ... ३ | ११ | ८८ | प्रियाण्यनेकान्यवदन् | ... ५ | २४ | ११ |
| प्राङ्मुखाम्भोजयेद् विप्रान् | ... ३ | १५ | १७ | प्रीतिमांश्चाभवत्तस्मिन् | ... १ | २० | ३१ |
| प्राङ्मुखोदङ्मुखो वापि | ... ३ | ११ | ८० | प्रीतिः सस्त्रीकुमारस्य | ... ५ | १३ | ६ |
| प्राचीनबर्हिर्भगवान् | ... १ | १४ | ३ | प्रीत्यभिव्यञ्जितकरतलः | ... ४ | १३ | ५४ |
| प्राचीनाग्राः कुशास्तस्य | ... १ | १४ | ४ | प्रीत्यां पुलस्त्यभार्यायाम् | ... १ | १० | ९ |
| प्राच्यां दिशि शिरश्शस्तम् | ... ३ | ११ | ११३ | प्रेक्षतस्तस्य पार्थस्य | ... ५ | ३८ | २८ |
| प्राजापत्यं ब्राह्मणानाम् | ... १ | ६ | ३४ | प्रेतदेहं शुभैः स्नानैः | ... ३ | १३ | ८ |
| प्राजापत्येन वा सर्वम् | ... ३ | १० | ७ | प्रेते पितृत्वमापन्ने | ... ३ | १३ | ३७ |
| प्राणायामेन पवने | ... ६ | ७ | ४५ | प्रोक्तश्च देवैस्संसुप्तम् | ... ५ | २३ | २३ |
| प्राणाख्यमनिलं वश्यम् | ... ६ | ७ | ४० | प्रोक्तपर्वस्वशेषेषु | ... ३ | ११ | १२३ |
| प्राणायाम इवाम्भोभिः | ... ५ | १० | १५ | प्रोक्तान्येतानि भवता | ... ३ | २ | १ |
| प्राणाः फणेऽभवंश्चास्य | ... ५ | ७ | ४५ | प्रोच्यते परमेशो हि | ... १ | ९ | ४६ |
| प्राणयात्रानिमित्तं च | ... ३ | ९ | २९ | प्लक्षद्वीपप्रमाणेन | ... २ | ४ | २० |
| प्राणप्रदाता स पृथुः | ... १ | १३ | ८९ | प्लावयामास तां शून्याम् | ... ५ | ३८ | ९ |
| प्राणश्चैव मृकण्डुश्च | ... १ | १० | ४ | फ० | |||
| प्राणस्य द्युतिमान्पुत्रः | ... १ | १० | ५ | फणामणिसहस्रेण | ... २ | ५ | १५ |
| प्राणापानसमानानाम् | ... ३ | ११ | ९४ | फणासहस्रमालाढ्यम् | ... ५ | १८ | ३६ |
| प्रणिपत्य पितुः पादौ | ... १ | १९ | ३३ | फलगर्भा त्वमेवेज्या | ... ५ | २ | ९ |
| प्राणिनामुपकाराय | ... ३ | १२ | ४५ | फलानि पश्य तालानाम् | ... ५ | ८ | ५ |
| प्राणोऽन्तः सुषिराज्जातः | ... १ | १२ | ६३ | फलानां पततां शब्दम् | ... ५ | ८ | ७ |
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५९७
| श्लोका: | अंशा० | अध्या० | श्लो० | श्लोका: | अंशा० | अध्या० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| फलं चाराधिते विष्णौ | ... ३ | ८ | ५ | बाढमित्येव तेनोक्तः | ... ६ | ६ | ४९ |
| फुल्लेन्दीवरपत्राभम् | ... ५ | ३ | ८ | बाणस्य मन्त्री कुम्भाण्डः | ... ५ | ३२ | १७ |
| ब० | बाणोऽपि प्रणिपत्याग्रे | ... ५ | ३३ | १ | |||
| बदरीफलमात्रम् | ... ४ | ९ | १८ | बालत्वं चातिवीर्यत्वम् | ... ५ | १३ | ७ |
| बद्धवैराणि भूतानि | ... १ | १७ | ८२ | बालक्रीडेयमतुला | ... ५ | १३ | ३ |
| बद्ध्वा समुद्रे यत्क्षिप्तः | ... १ | २० | २३ | बालत्वं सर्वदोषाणाम् | ... १ | १७ | ५१ |
| बद्ध्वा चाम्भोनिधिम् | ... ४ | ४ | ९७ | बालिशा बत यूयं वै | ... १ | १५ | ९३ |
| बन्धुमतो वेगवान् | ... ४ | १ | ४४ | बाले देशान्तरस्थे च | ... ३ | १३ | १७ |
| बभूव निर्मलं व्योम | ... ५ | १० | १२ | बालोऽहं तावदिच्छातः | ... १ | १७ | ७२ |
| बभ्रोस्सेतुः | ... ४ | १७ | २ | बालः कृतोपनयने | ... ३ | ९ | १ |
| बर्हिपत्रकृतापीडौ | ... ५ | ६ | ३२ | बालखिल्यास्रस्तैवैनाम् | ... २ | १० | २२ |
| बलमागतमाज्ञाय | ... ५ | ३५ | ९ | बाल्ये क्रीडनकासक्ताः | ... १ | १७ | ७५ |
| बलदेवस्ततो गत्वा | ... ५ | ३५ | ८ | बाहुमाभोगिनं कृत्वा | ... ५ | १६ | ९ |
| बलभद्रो महावीर्यः | ... ५ | ३३ | २९ | बाह्यार्थादखिलाचित्तम् | ... १ | ११ | ५३ |
| बलदेवोऽपि तत्कालम् | ... ५ | २० | ७७ | बाह्यार्थनिरपेक्षं ते | ... १ | १२ | ४३ |
| बलभद्रोऽपि चास्फोट्य | ... ५ | २० | ६४ | बाह्लीकात्सोमदत्तः | ... ४ | २० | ३१ |
| बलदेवोऽपि मैत्रेय | ... ५ | २४ | ८ | बिभर्त्ति यच्चासिरत्नमच्युतः | ... १ | २२ | ७४ |
| बलहानिर्न ते सौम्य | ... ५ | १९ | २५ | बिभर्त्ति यत्सूरगणान् | ... ३ | ५ | १९ |
| बलकृष्णौ तथाक्रूरः | ... ५ | १८ | ४३ | बिभेद प्रथमं विप्र | ... ३ | ४ | १६ |
| बलक्षयं विवृद्धिं च | ... ५ | २० | ७१ | बिभ्रती पारिजातस्य | ... ५ | ३० | ३७ |
| बलमेवाशेषधर्महेतुः | ... ४ | २४ | ७५ | बिभ्राणं वाससी पीते | ... ५ | १७ | २२ |
| बलदेवोऽपि रेवत्या | ... ४ | १५ | २० | बीजादंकुरसम्भूतः | ... १ | १२ | ६६ |
| बलभद्रशठसारणदुर्मद० | ... ४ | १५ | १९ | बीजाद्वृक्षप्ररोहेण | ... २ | ७ | ३५ |
| बलसत्यावलोकनात् | ... ४ | १३ | १५२ | बुद्धिरव्याकृतप्राणाः | ... ५ | २३ | ३३ |
| बलन्वनाद्वत्सप्रीतिः | ... ४ | १ | २० | बुभुजे च तया सार्द्धम् | ... ३ | १८ | ९० |
| बलबन्धुश्च सम्भाव्यः | ... ३ | १ | २३ | बृहद्दलस्य पुत्रः | ... ४ | २२ | २ |
| बलवानभवद्वायुस्तस्य | ... १ | २ | ३९ | बृहत्त्वाद्वृंहणत्वाच्च | ... १ | १२ | ५५ |
| बलशौर्याद्यभावश्च | ... १ | ९ | ३० | बृहस्पतेस्तु भगिनी | ... १ | १५ | ११८ |
| बलेन निहतं दृष्ट्वा | ... ५ | २८ | २७ | बृहस्पतेरपि सकलदेव० | ... ४ | ६ | १५ |
| बलेः पुत्रशतं त्वासीत् | ... १ | २१ | २ | बृहस्पतिमिन्दुं च तस्य | ... ४ | ६ | २४ |
| बहिरावासिते सैन्ये | ... ५ | २३ | १६ | बृहत्क्षत्रमहावीर्य० | ... ४ | १९ | २१ |
| बहुप्रकारमत्यर्थम् | ... ५ | २१ | ८ | बृहत्क्षत्रस्य सुहोत्रः | ... ४ | १९ | २७ |
| बहुत्वान्नामधेयानाम् | ... ४ | २४ | ११७ | बृहदिपोर्बृहद्धनुः | ... ४ | १९ | ३४ |
| बहुकालोपभुक्त० | ... ४ | १४ | ४९ | बृहद्रथस्त्वादिगोदासः | ... ४ | १९ | ६२ |
| बहुशोऽप्यभिहिता | ... ४ | ६ | २७ | बृहद्रथप्रत्यग्रकुशाम्ब० | ... ४ | १९ | ८१ |
| बहुशश्च बृहस्पति० | ... ४ | ६ | ११ | बृहद्रथात्कुशाग्र० | ... ४ | १९ | ८२ |
| बहुशो वारितोऽस्माभिः | ... १ | १९ | ५४ | बृहद्रथाच्चान्यः | ... ४ | १९ | ८३ |
| बहुनात्र किमुक्तेन | ... १ | १८ | २७ | बोधं बुद्धिस्तथा लज्जा | ... १ | ७ | ३० |
| बहुपुत्रस्य विदुषः | ... १ | १५ | १३५ | बोध्याग्निमाढकौ तद्वत् | ... ३ | ४ | १८ |
| बहूनां विप्र वर्णानाम् | ... १ | १५ | २७ | ब्रह्मचर्यमहिंसा च | ... ६ | ७ | ३६ |
| बहूनि तवात्रैव गान्धर्वम् | ... ४ | १ | ७५ | ब्रह्मसूत्रमेव विप्रत्वहेतुः | ... ४ | २४ | ८० |
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५१८
| श्लोकाः | अंशा० | अध्या० | श्लो० | श्लोकाः | अंशा० | अध्या० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ब्रह्मक्षत्रस्य यो योनिः | ... | ४ | २१ | १८ | भ० | ||
| ब्रह्मणश्च दक्षिणांगुष्ठ० | ... | ४ | १ | ६ | भक्तिच्छेदानुलिप्तांगौ | ... | ५ |
| ब्रह्मचारी गृहस्थश्च | ... | ३ | १८ | ३७ | भक्तिभेदानुलिप्तांगौ | ... | ५ |
| ब्रह्मचर्येण वा कालम् | ... | ३ | १० | १४ | भक्षयत्यथ कल्पान्ते | ... | ३ |
| ब्रह्महत्याव्रतं चीर्णम् | ... | ३ | ५ | १४ | भक्षयित्वा च भूतानि | ... | १ |
| ब्रह्मणा चोदितो व्यासः | ... | ३ | ४ | ७ | भक्ष्यभोज्यमहापान० | ... | २ |
| ब्रह्महत्याश्वमेधाभ्याम् | ... | २ | ८ | ९६ | भक्ष्याभक्ष्येषु नास्यास्ति | ... | ६ |
| ब्रह्मविष्णुशिवा ब्रह्मन् | ... | १ | २२ | ५८ | भगवद्विष्णुपादांगुष्ठ० | ... | ४ |
| ब्रह्मन्प्रसादप्रवणम् | ... | १ | १ | ११ | भगवन्नेभिस्सगरतनयैः | ... | ४ |
| ब्रह्मणो दिवसे ब्रह्मन् | ... | १ | ३ | १६ | भगवन्भूतभव्येश | ... | १ |
| ब्रह्मणोऽभून्महान् | ... | १ | ७ | ११ | भगवानपि सर्वात्मा | ... | १ |
| ब्रह्मरूपधरो देवः | ... | १ | ४ | ५० | भगवन्यदि मे तोषम् | ... | १ |
| ब्रह्मणा देवदेवेन | ... | १ | १४ | १० | भगवन्भूतभव्येश | ... | १ |
| ब्रह्मपारं मुनेः श्रोतुम् | ... | १ | १५ | ५४ | भगवन्बालवैधव्यात् | ... | १ |
| ब्रह्म प्रभूर्महा स सर्वभूतः | ... | १ | १५ | ५७ | भगवन्सम्मगाख्यातम् | ... | २ |
| ब्रह्मबन्धो किमेतत्ते | ... | १ | १७ | १७ | भगवन्सम्मगाख्यातम् | ... | २ |
| ब्रह्मत्वे सृजते विश्वम् | ... | १ | १९ | ६६ | भगवन्त्वत्तया प्रोक्तम् | ... | २ |
| ब्रह्मा नारायणाख्योऽसौ | ... | १ | ४ | १ | भगवन्भगवांदेवः | ... | ३ |
| [ब्रह्माद्यैरस्य वेदज्ञैः | ... | १ | १२] | भगवन्नन्नरैः कार्यम् | ... | ४ | |
| ब्रह्मा जनार्दनः शम्भुः | ... | १ | १३ | २१ | भगवन्नेवमवस्थिते | ... | ४ |
| ब्रह्माक्षरमजं नित्यम् | ... | १ | १५ | ५८ | भगवन् अस्मत्कुलस्थितिरियम् | ... | ४ |
| ब्रह्मा दक्षादयः कालः | ... | १ | २२ | ३१ | भगवत्यासज्याखिलम् | ... | ४ |
| ब्रह्मा सृजत्यादिकाले | ... | १ | २२ | ३५ | भगवन्तोऽखिलसंसार० | ... | ४ |
| ब्रह्माद्यैरर्चितो यस्तु | ... | ५ | ७ | ६६ | भगवन्मयैतदज्ञानात् | ... | ४ |
| ब्रह्माद्यास्सकला देवाः | ... | ५ | ३० | १७ | भगवन्नस्माकमत्र | ... | ४ |
| ब्रह्मेन्द्ररुद्रनासत्य० | ... | ३ | १४ | १ | भगवन् भवन्तं द्रष्टुम् | ... | ४ |
| ब्राह्मणाम्भोजयेच्छ्राद्धे | ... | ३ | १५ | १ | भगवन्नायमादित्यः | ... | ४ |
| ब्राह्मणाद्यास्तु ये वर्णाः | ... | ३ | १८ | ४८ | भगवदागमनोद्भूत० | ... | ४ |
| ब्राह्मणक्षत्रियविशाम् | ... | ३ | ८ | २१ | भगवानपि यथानुभूतम् | ... | ४ |
| ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यः | ... | ३ | ८ | १२ | भगवन्ममैतत्स्यमन्तकरत्नम् | ... | ४ |
| ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः | ... | २ | ४ | ३९ | भगवता च स निधन० | ... | ४ |
| ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः | ... | २ | ४ | ३१ | भगवान् यदि प्रसन्नः | ... | ४ |
| ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः | ... | २ | ३ | ९ | भगवतोऽप्यत्र मर्त्यलोके | ... | ४ |
| ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः | ... | १ | ६ | ६ | भगवानप्यथोत्पातान् | ... | ५ |
| ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः | ... | ४ | २४ | ११६ | भगवन्मन्यया कार्यम् | ... | ५ |
| ब्राह्मणेभ्यः पितृभ्यश्च | ... | २ | ८ | ७९ | भगवानपि गोविन्दः | ... | ५ |
| ब्राह्मे मुहूर्ते चोत्थाय | ... | ३ | ११ | ५ | भगवंस्तमहं योगम् | ... | ६ |
| ब्राह्मो नैमित्तिकस्तेषाम् | ... | ६ | ३ | २ | भगवन्कथितं सर्वम् | ... | ६ |
| ब्राह्मो दैवस्तथैवार्षः | ... | ३ | १० | २४ | भगीरथात्सुहोत्रः | ... | ४ |
| ब्राह्मो नैमित्तिकस्तत्र | ... | १ | ७ | ४२ | भगीरथाद्धास्सगरः ककुत्स्थः | ... | ४ |
| ब्राह्मं पाद्मं वैष्णवं च | ... | ३ | ६ | २१ | भागोदये ते कौन्तेय | ... | ५ |
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५१९
| श्लोकाः | अंशाः | अध्या० | श्लो० | श्लोकाः | अंशाः | अध्या० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| भजनभजमानदिव्यान्धक० | ... | ४ | १३ | १ | भारावतारकार्यार्थम् | ... | ५ |
| भजमानस्य निमिकृकण० | ... | ४ | १३ | २ | भारावतारणार्थाय | ... | ५ |
| भजमानाच्च विदूरथः | ... | ४ | १४ | २२ | भार्यावशास्तु ये केचित् | ... | ४ |
| भद्राश्वे भगवान् विष्णुः | ... | २ | २ | ५० | भावगर्भस्मितं वाक्यम् | ... | ५ |
| भद्राश्वं पूर्वतो मेरोः | ... | २ | २ | २४ | भिक्षाभुजश्च ये केचित् | ... | ३ |
| भद्रा तथोत्तरगिरीन् | ... | २ | २ | ३८ | भिद्यमानेष्वशेषेषु | ... | ५ |
| भद्राश्वभद्रबाहु० | ... | ४ | १५ | २२ | भिन्नेष्वशेषबाणेषु | ... | ५ |
| भद्रायाश्चोपनिधिगदाद्याः | ... | ४ | १५ | २४ | भीमस्य काञ्चनः | ... | ४ |
| भयत्राणादनन्दानात् | ... | ४ | ९ | ११ | भीष्मकः कुण्डिने राजा | ... | ५ |
| भयं भयानामपहारिणे स्थिते | ... | १ | १७ | ३६ | भीष्मद्रोणकृपादीनाम् | ... | ५ |
| भरद्वाजस्स वितथे | ... | ४ | १९ | १९ | भीष्मद्रोणंगराजाद्याः | ... | ५ |
| भरतस्य पत्नीत्रये | ... | ४ | १९ | १४ | भुक्त्वा दिव्यान्महाभोगान् | ... | ५ |
| भरतोऽपि गन्धर्वविषय० | ... | ४ | ४ | १०० | भुक्त्वा सम्यगथाचम्य | ... | ३ |
| भरतः स महीपालः | ... | २ | १३ | ४ | भुक्त्वा च विपुलान्भोगान् | ... | ५ |
| भरतादृषभः | ... | २ | ११ | २५ | भुङ्क्ते कुल्माषव्रीह्यादि० | ... | २ |
| भर्तृशुश्रूषणं धर्मः | ... | १ | १३ | २४ | भुङ्क्तेऽप्रदाय विप्रेभ्यः | ... | ५ |
| भर्तृबाहुमहागवात् | ... | ५ | ३० | ४८ | भुज्यतेऽनुदिनं देवैः | ... | १ |
| भल्लाभस्तस्य चात्मत् | ... | ४ | १९ | ४७ | भुञ्जन्दनं तया सोऽन्नम् | ... | ३ |
| भवतोऽपि महाभाग | ... | ६ | २ | ३९ | भुवर्लोकं ततस्सर्वम् | ... | ६ |
| भवत्येवं यदि मे समय० | ... | ४ | ६ | ४१ | भुवनेश जगन्नाथ | ... | ५ |
| भवतो यत्परं तत्त्वम् | ... | १ | ४ | १७ | भुवो नाद्यापि भारोऽयम् | ... | ५ |
| भवत्यपध्वस्तमतिः | ... | १ | ९ | ३१ | भूतादिं ग्रसते चापि | ... | ६ |
| भवन्तु पतयः श्लाघ्याः | ... | १ | १५ | ६४ | भूतान्यनुदिनं यत्र | ... | १ |
| भवन्ति ये मनोः पुत्राः | ... | ३ | २ | ४८ | भूतादिमिन्द्रियादिं च | ... | १ |
| भवतोऽपि पुत्रमित्र० | ... | ४ | १ | ७९ | भूतात्मा चेन्द्रियात्मा च | ... | ५ |
| भवतीनां जनयिता महाराजः | ... | ४ | २ | ८९ | भूतानि सर्वाणि तथान्नमेतत् | ... | ३ |
| भवतां चोपसंहारः | ... | ५ | ३८ | ८६ | भूतानि बलिभिश्चैव | ... | ३ |
| भवद्भिर्यदभिप्रैतम् | ... | ६ | २ | ३७ | भूतादिस्तु विकुर्वाणः | ... | १ |
| भवं शर्वमथेशानम् | ... | १ | ८ | ६ | भूतेषु वसते सोऽन्तः | ... | ६ |
| भवानहं च विश्वात्मन् | ... | ५ | ९ | ३२ | भूतं भव्यं भविष्यं च | ... | ३ |
| भवांशच मया न | ... | ४ | ६ | ४५ | भूप भूतान्यशेषाणि | ... | ६ |
| भविष्यन्ति महावीर्याः | ... | १ | १५ | ६८ | भूप पृच्छसि किं श्रेयः | ... | २ |
| भविता योषितां सूतिः | ... | ६ | १ | ४१ | भूपतेर्वदतस्तस्य | ... | २ |
| भविष्ये द्वापरे चापि | ... | ३ | ३ | २१ | भूपदमस्यास्य शैलोऽसौ | ... | २ |
| भागुरिः स्तम्भमित्राय | ... | ६ | ८ | ४४ | भूपादजङ्घाकट्यूरु० | ... | २ |
| भारतस्यास्य वर्षस्य | ... | २ | ३ | ६ | भूमावास्फोटितस्तेन | ... | ५ |
| भारतं प्रथमं वर्षम् | ... | २ | २ | १३ | भूमिरापोऽनलो वायुः | ... | १ |
| भारताः केतुमालाश्च | ... | २ | २ | ३९ | भूमिसूर्यान्तरं यच्च | ... | २ |
| भारावतारणार्थाय | ... | ५ | १२ | ७ | भूमेर्योजनलक्षे तु | ... | २ |
| भारावतारणे साह्यम् | ... | ५ | १२ | १८ | भूमौ पादयुगं त्वास्ते | ... | २ |
| भारावतारणार्थाय | ... | ५ | २९ | २५ | भूयस्ततो वृको जज्ञे | ... | ३ |
पृष्ठ 531स्थायी लिंक
५२०
| श्लोकाः | अंशाः | अध्या० | श्लो० | श्लोकाः | अंशाः | अध्या० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| भूयश्च सूदवेषं कृत्वा | ... | ४ | ४ | ४७ | भ्रममारोप्य सूर्यं तु | ... | ३ |
| भूय एवाहमिच्छामि | ... | ५ | ३५ | १ | भ्रममाणौ ततो दृष्ट्वा | ... | ५ |
| भूयस्स मन्त्रिभिस्सार्द्धम् | ... | ६ | ६ | ४४ | भ्रान्तग्राहगणः सोर्मिः | ... | १ |
| भूरादीनां समस्तानाम् | ... | १ | १२ | ५३ | भ्रामयित्वा शतगुणम् | ... | ५ |
| भूर्लोकमखिलं दृष्ट्वा | ... | १ | १९ | ५७ | भ्रूणहा पुरहन्ता च | ... | २ |
| भूर्लोकोऽथ भुवर्लोकः | ... | १ | २२ | ८० | म० | ||
| भूविभागं ततः कृत्वा | ... | १ | ४ | ४९ | मखभंगविरोधेन | ... | ५ |
| भूषणास्त्रस्वरूपस्थम् | ... | १ | २२ | ६६ | मखहा ग्रामहन्ता च | ... | २ |
| भूषणानां च सर्वेषाम् | ... | १ | १५ | १२० | मखे प्रतिहते शक्रः | ... | ५ |
| भूषणान्यतिशुभ्राणि | ... | २ | ५ | ११ | मगधायां तु विश्वः | ... | ४ |
| भृगुणा पुरुकुत्साय | ... | ६ | ८ | ४५ | मग्नोऽथ जाह्नवीतोयात् | ... | ६ |
| भृगुर्भवो मरीचिश्च | ... | १ | ७ | २६ | मङ्गल्यपुष्परत्लाज्य० | ... | ३ |
| भृगुं पुलस्त्यं पुलहम् | ... | १ | ७ | ५ | मणिपुरपतिपुत्र्याम् | ... | ४ |
| भृगोः ख्यातयां समुत्पन्ना | ... | १ | १० | २ | मत्कृते पितृपुत्राणाम् | ... | ४ |
| भृगोः ख्यातयां समुत्पन्ना | ... | १ | ९ | १४१ | मत्तः कोऽभ्यधिकोऽन्योऽस्ति | ... | १ |
| भृत्यादिभरणार्थाय | ... | ३ | ८ | ३५ | मत्तः कोपेन चाघूर्णन् | ... | ५ |
| भेदं चालकनन्दाख्यम् | ... | २ | ८ | ११४ | मत्पदानि च ते सर्प | ... | ५ |
| भैक्षव्रतपराः शूद्राः | ... | ६ | १ | ३७ | मत्पुत्रेण हि सकल० | ... | ४ |
| भोक्तव्यं तैश्च तच्चित्तैः | ... | ३ | १५ | २० | मत्प्रसादान्न ते सुभ्रु | ... | ५ |
| भोक्तारं भोग्यभूतं च | ... | १ | ९ | ५० | मत्प्रसादेन भर्तारम् | ... | ५ |
| भोगैनावैष्टितस्यापि | ... | ५ | ७ | ३२ | मत्प्रीतिः परमो धर्मः | ... | १ |
| भोजनं पुष्करद्वीपे | ... | २ | ४ | ९२ | मत्सम्बन्धेन वो गोपाः | ... | ५ |
| भो नाहं तेऽपराधाय | ... | ६ | ६ | ४२ | मत्स्यरूपश्च गोविन्दः | ... | २ |
| भो भो क्षत्रियदायाद | ... | १ | ११ | ३९ | मत्स्यबन्धैश्च मत्स्योऽसौ | ... | ५ |
| भो भो राजन् शृणुष्व त्वम् | ... | १ | १३ | १६ | मत्स्यकूर्मवराहाश्व० | ... | ५ |
| भो भो सर्पाः दुराचारम् | ... | १ | १७ | ३७ | मथुरानगरीपौर० | ... | ५ |
| भो भो विसृज्य शिबिकाम् | ... | २ | १३ | ७८ | मथुरां प्राप्य गोविन्दः | ... | ५ |
| भो भो क्षत्रियवर्यस्याभिः | ... | ४ | २ | २८ | मथुरां च पुनः प्राप्तौ | ... | ५ |
| भो भो ब्रह्मंस्त्वया मत्तः | ... | ५ | १ | ५३ | मथुरावासिनं लोकम् | ... | ५ |
| भो भो मेघा निशम्यैतत् | ... | ५ | ११ | २ | मध्यता मृतं देवाः | ... | १ |
| भो भो दानपते वाक्यम् | ... | ५ | १५ | १३ | मध्यमानात्समुत्तस्थौ | ... | १ |
| भो भो किमेतद्भवता | ... | ५ | ३५ | १३ | मध्यमाने ततस्तस्मिन् | ... | १ |
| भो विप्रवर्य भोक्तव्यम् | ... | २ | १५ | ११ | मध्यमानेऽमृतं जातम् | ... | ५ |
| भो विप्र जनसम्मर्दः | ... | २ | १६ | ५ | मध्यमाने च तत्राब्धौ | ... | १ |
| भो शची देवराजस्य | ... | ५ | ३० | ३९ | मध्यमाने च तत्राभूत् | ... | १ |
| भौममेतत्पयो दुग्धम् | ... | ५ | १० | २३ | मदान्धकारिताक्षोऽसौ | ... | १ |
| भौमश्चतुर्दशश्चात्र | ... | ३ | २ | ४२ | मदाघूर्णितनेत्रोऽसौ | ... | २ |
| भौमा ह्येते स्मृताः स्वर्गाः | ... | २ | २ | ४९ | मदावलेपाच्च सकल० | ... | ४ |
| भौमोऽयं नरको नाम | ... | ५ | २९ | ८ | मद्दत्ता भवता यस्मात् | ... | १ |
| भौमं मनोरथं स्वर्गम् | ... | ३ | ८ | ६ | मद्राष्ट्रे वारिता वृष्टिः | ... | ५ |
| भ्रुकुटीकुटिलातस्य | ... | १ | ७ | १२ | मद्रूपमास्थाय सृजत्यजो यः | ... | ४ |