विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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| श्लोकाः | अंशा० | अध्या० | श्लो० | श्लोकाः | अंशा० | अध्या० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| सकृदुच्चारिते वाक्ये | ६ | ५ | ३२ | सचैलस्य पितुः स्नानम् | ३ | १३ | १ |
| स कैश्चित्सम्परिष्वक्तः | ५ | २४ | १० | स चैनं स्वामिनं हत्वा | ४ | २४ | २ |
| सकुयावकवाट्यानाम् | २ | १५ | १२ | स चैकच्छत्राम् | ४ | २४ | २२ |
| स खुरक्षतभूपृष्ठः | ५ | १६ | २ | स चोत्सृष्टमात्रः | ४ | ६ | २३ |
| सख्यः पश्यत कृष्णस्य | ५ | २० | ५४ | सच्छास्त्रादिविनोदेन | ३ | ११ | ९९ |
| सख्यः पश्यत चाणूरम् | ५ | २० | ५९ | स जगाम तदा भूयः | ६ | ६ | ४० |
| स गत्वा त्रिदशैः सर्वैः | १ | ९ | ३९ | स जगामाथ कालिन्दीम् | ५ | ७ | २ |
| सगरः प्रणिपत्यैनम् | ३ | ८ | ४ | स ज्ञात्वा वासुदेवम् | ५ | २३ | १७ |
| सगरोऽपि स्वमधिष्ठानम् | ४ | ३ | ४९ | सञ्चितस्यापि महता | १ | १ | १८ |
| सगरोऽप्यवगम्याश्वानुसारि० | ४ | ४ | २३ | सञ्चिन्त्यागतमारुह्य | ५ | २९ | १४ |
| सगरोऽप्यश्वमासाद्य | ४ | ४ | ३२ | स तथा सह गोपीभिः | ५ | १३ | ५८ |
| स गाधिर्नामपुत्रः | ४ | ७ | ११ | स तत्रैव च तस्थौ | ४ | १३ | १०४ |
| संकर्षणं तु स्कन्धेन | ५ | ९ | १६ | स तत्पादं मृगाकारम् | ५ | ३७ | ६९ |
| संकर्षणस्तु तं दृष्ट्वा | ५ | ९ | १८ | स तथेति गृहीताज्ञः | ४ | २ | १६ |
| सङ्घातान्तर्गतैर्वापि | २ | १३ | ३४ | स तस्य वैश्वदेवान्ते | २ | १५ | ९ |
| संक्षेपात्कथितः सर्गः | १ | ५ | २७ | स तामादाय कस्येयम् | ४ | १ | ६७ |
| स च प्रणिपत्य पुनरप्येनम् | ४ | १३ | ५५ | स तां प्रणम्य शुक्रेण | ५ | ३० | ४ |
| स च तं स्यमन्तकमणिम् | ४ | १३ | २४ | स तु सगरतनयखातमार्गेण | ४ | ४ | २४ |
| स च राजसूयमकरोत् | ४ | ६ | ८ | स तु तेनापचारेण | ३ | १८ | ६२ |
| स च तस्मै वरं प्रादात् | १ | २१ | ३२ | स तु परितुष्टेन | ४ | ३ | २४ |
| स च तं शैलसङ्घातम् | १ | २० | ६ | स तु दक्षो महाभागः | १ | १५ | ७५ |
| स च विष्णुः परं ब्रह्म | २ | ७ | ४० | स तु राजा तया सार्द्धम् | ३ | १८ | ५५ |
| स च बाहुर्युद्धभावात् | ४ | ३ | २९ | स तु वीर्यमदोन्मत्तः | ५ | २३ | ६ |
| स च मद्रेण्यवंशविनाशनात् | ४ | ८ | १२ | सतूक्ष्पीनावयवः | २ | १३ | ४७ |
| स च तां स्नुषाम् | ४ | १२ | ३६ | सतोयतोयदच्छायः | ५ | १४ | २ |
| स च तदेव मणिरत्नम् | ४ | १३ | १७ | सत्कर्मयोग्यो न जनः | ३ | ५ | २२ |
| स च गत्वा तदाचष्ट | ५ | ३७ | ६५ | सत्पुत्रेणैव जातेन | १ | १३ | ४२ |
| स चाह तं व्रजाम्येषः | ६ | ६ | १८ | सत्त्वमात्रात्मिकामेव | १ | ५ | ३५ |
| स चाग्निः सर्वतो व्याप्य | ४ | ६ | १९ | सत्त्वादयो न सन्तीशे | १ | ९ | ४४ |
| स चापि तस्मै तद्दत्त्वा | ४ | १३ | १८ | सत्त्वेन सत्यशौचाभ्याम् | १ | ९ | १२९ |
| स चातिप्रवणमतिः | ४ | १० | १६ | सत्त्वोद्रिक्तोऽसि भगवन् | १ | ४ | ४३ |
| स चापि राजा प्रहस्याह | ४ | ९ | १२ | सत्यवाग्दानशीलोऽयम् | १ | १३ | ६१ |
| स चापत्यस्पर्शोपचीयमान० | ४ | २ | ७२ | सत्यवत्यपि कौशिकी | ४ | ७ | ३४ |
| स चापि देवस्तं दत्त्वा | १ | १४ | ४९ | सत्यवतीनियोगाच्च | ४ | २० | ३८ |
| स चापि भगवान् कण्डुः | १ | १५ | ५२ | सत्यपरतया ऋतध्वजसंज्ञाम् | ४ | ८ | १४ |
| स चाटव्यां मृगयार्थी | ४ | ४ | ४१ | सत्यकर्मणस्त्वतिरथः | ४ | १८ | २७ |
| स चाप्यचिन्तयदेहो अस्य | ४ | ४ | ५० | सत्यधृतेर्वरराप्सरसम् | ४ | १९ | ६५ |
| स चाण्डालतामुपगतश्च | ४ | ३ | २२ | सत्यवत्यां च चित्रांगद० | ४ | २० | ३४ |
| स चाचष्ट यथान्यायम् | ६ | ६ | ३४ | सत्यानृते न तत्रास्ताम् | २ | ४ | ८१ |
| स चितः पर्वतैरन्तः | १ | १९ | ६३ | सत्याभिध्यायिनः पूर्वम् | १ | ६ | ३ |
| स चेश्वाकुरपष्टकायाः | ४ | २ | १५ | सत्ये सत्यं ममैवैषापहासना | ४ | १३ | ७५ |