विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
पृष्ठ 548, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 548
५३७
| श्लोकाः | अंशा० | अध्या० | श्लो० | श्लोकाः | अंशा० | अध्या० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| सत्यं तद्यदि गोविन्द | ५ | ३० | ३६ | सन्न्यासन्ध्यांशयोरन्तः | १ | ३ | १४ |
| सत्यं कथयास्माकमिति | ४ | ६ | २५ | सन्ध्या रात्रिरहो भूमिः | ५ | ३० | ९ |
| सत्यं सत्यं हरेः पादौ | ५ | १३ | ५ | सन्नतेः सुनीथस्तस्यापि | ४ | ८ | १९ |
| सत्यं भीरु वदस्यैतत्परिहासः | १ | १५ | ३३ | सन्नतिमतः कृतः | ४ | १९ | ५० |
| सत्राजिदप्यमलमणि० | ४ | १३ | १९ | सन्निधानाद्यथाकाश० | २ | ७ | ३६ |
| सत्राजिदप्यच्युतः | ४ | १३ | २९ | सन्निपातावधूतेस्तु | ५ | २० | ६६ |
| सत्राजिदपि मयास्याभूत० | ४ | १३ | ६४ | सन्मात्ररूपिणेऽचिन्त्यम् | ५ | १८ | ४८ |
| सत्राजिद्प्यधुना शतधन्वना | ४ | १३ | ७८ | स पपात हतस्तेन | ५ | २० | ४१ |
| स त्वसमञ्जसो बालः | ४ | ४ | ८ | सपलीतनयं दृष्ट्वा | १ | ११ | ६ |
| सत्वतादेते सात्वताः | ४ | १२ | ४४ | स परः परशक्तीनाम् | १ | २२ | ६३ |
| स त्वासक्तमतिः कृष्णे | १ | १७ | ३९ | स पृष्टश्च मया भूयः | ३ | ७ | ११ |
| स त्वामहं हनिष्यामि | ६ | ६ | २४ | सप्त द्वीपानि पाताल० | ३ | ७ | २ |
| स त्वेकदा प्रभूत० | ४ | १२ | १५ | सप्त मेधातिथेः पुत्राः | २ | ४ | ३ |
| स त्वं प्राप्तो न सन्देहः | ५ | २३ | २८ | सप्तर्षीणामशेषाणाम् | १ | १२ | ९२ |
| स त्वं गच्छ न सन्तापम् | ५ | १२ | २३ | सप्तर्षयः सुराः शक्रः | १ | ३ | १७ |
| स त्वं प्रसीद परमेश्वर | ५ | २० | १०३ | सप्तर्षीणां तु यत्स्थानम् | १ | ६ | ३७ |
| स त्वां कृष्णाभिषेक्ष्यामि | ५ | १२ | १२ | सप्तमे च तथैवेन्द्रः | ३ | ३ | १३ |
| स ददर्श ततो व्यासम् | ५ | ३८ | ३५ | सप्तर्षीणां तु यौ पूर्वौ | ४ | २४ | १०५ |
| स ददर्श तदा कृष्णम् | ५ | १७ | १९ | सप्तमो भोजराजस्य | ५ | १ | ७५ |
| सदसद्रूपिणो यस्य | ५ | ७ | ६५ | सप्तमे रोहिणीं गर्भे | ५ | २ | २ |
| स ददर्श मुनींस्तत्र | १ | ११ | ३१ | सप्तरात्रं महामेघाः | ५ | ११ | २२ |
| स ददर्श तमायान्तम् | १ | ९ | ७ | सप्तर्षिस्थानमाक्रम्य | ६ | ४ | १ |
| सदानुपहते वस्त्रे | ३ | १२ | २ | सप्तर्षिभिस्तथा धिष्ण्यैः | ६ | ८ | २४ |
| सदाचाररतः प्राज्ञः | ३ | १२ | ४१ | सप्तर्षयोऽथ मनवः | ३ | ११ | ४ |
| स दैवर्रचितः कृष्णः | ५ | ३० | ३ | सप्ताभीरप्रभृतयः | ४ | २४ | ५१ |
| स देवेशशरीराणि | ५ | ३८ | ६६ | सप्ताष्टदिनपर्यन्तम् | ५ | ३२ | २१ |
| सद्भाव एव भवतः | २ | १२ | ४५ | सप्तोत्तराण्यतीतानि | १ | १५ | ३२ |
| सद्यो वैगुण्यमायान्ति | १ | ९ | १३२ | स बिभ्रच्छेखरीभूतम् | २ | ५ | २० |
| सद्ग्रेष्वार्येष्व पात्रम् | ४ | २४ | ९० | स ब्रह्मकान्सुरान्सर्वान् | ५ | १ | १३ |
| स धर्मचारिणीं प्राप्य | ३ | १० | २६ | सभानलपुत्रः | ४ | १८ | २ |
| सनन्दनादयो ये तु | ६ | ७ | ५० | सभा सुधर्मा कृष्णेन | ५ | ३८ | ७ |
| सनन्दनादयो ये च | १ | ७ | ९ | स भिद्यते वेदमयस्स्ववेदमयः | ३ | ३ | ३१ |
| सनन्दनाद्यैर्मुनिभिः | ५ | १८ | ४२ | सभूभृद्भृत्यपौराँ तु | ५ | ३४ | ४२ |
| स निष्कासितमस्तिष्कः | ५ | ९ | ३६ | स भोक्ता भोज्यमप्येवम् | १ | १८ | २८ |
| सन्तस्सन्तोषमधिकम् | ५ | ३ | ४ | समस्तीर्थस्नानानि | ६ | ८ | ५३ |
| सन्ततेर्न ममोच्छेदः | १ | १ | २५ | समभ्यर्च्याच्युतं सम्यक् | ६ | ८ | ३४ |
| सन्तानकानामखिलम् | १ | ९ | ३ | समस्थितोरुजङ्घं च | ६ | ७ | ८३ |
| सन्तोषयामास च तम् | ५ | २३ | ४ | समकर्णान्तविन्यस्त० | ६ | ७ | ८९ |
| सन्देशैस्साममधुरैः | ५ | २४ | २० | समस्तशक्तिरूपाणि | ६ | ७ | ७१ |
| सन्देहनिर्णयार्थाय | ६ | २ | ३ | समस्ताः शक्तयश्चैताः | ६ | ७ | ७० |
| सन्ध्याकाले च सम्प्राप्ते | २ | ८ | ४९ | समस्तकल्याणगुणात्मकोऽसौ | ६ | ५ | ८४ |