भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 88, कुल 558 में से

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पृष्ठ 88

अ० १५] * प्रथम अंश * ७७

अनिलस्य शिवा भार्या तस्याः पुत्रो मनोजवः। अविज्ञातगतिश्चैव द्वौ पुत्रावनिलस्य तु ॥ ११४ अग्निपुत्रः कुमारस्तु शरस्तम्बे व्यजायत। तस्य शाखो विशाखश्च नैगमेयश्च पृष्ठजाः ॥ ११५ अपत्यं कृत्तिकानां तु कार्तिकेय इति स्मृतः ॥ ११६ प्रत्यूषस्य विदुः पुत्रमृषि नाम्नाथ देवलम्। द्वौ पुत्रौ देवलस्यापि क्षमावन्तौ मनीषिणौ ॥ ११७ बृहस्पतेस्तु भगिनी वरस्त्री ब्रह्मचारिणी। योगसिद्धा जगत्कृत्स्नमसक्ता विचरत्युत। प्रभासस्य तु सा भार्या वसूनामष्टमस्य तु ॥ ११८ विश्वकर्मा महाभागस्तस्यां जज्ञे प्रजापतिः। कर्ता शिल्पसहस्राणां त्रिदशानां च वर्द्धकी ॥ ११९ भूषणानां च सर्वेषां कर्ता शिल्पवतां वरः। यः सर्वेषां विमानानि देवतानां चकार ह। मनुष्याश्चोपजीवन्ति यस्य शिल्पं महात्मनः ॥ १२० तस्य पुत्रास्तु चत्वारस्तेषां नामानि मे शृणु। अजैकपादहिर्बुध्न्यस्त्वष्टा रुद्रश्च वीर्यवान्। त्वष्टुश्चाप्यात्मजः पुत्रो विश्वरूपो महातपाः ॥ १२१ हरश्च बहुरूपश्च त्र्यम्बकश्चापराजितः। वृषाकपिश्च शम्भुश्च कपर्दी रैवतः स्मृतः ॥ १२२ मृगव्याधश्च शर्वश्च कपाली च महामुने। एकादशैते कथिता रुद्रास्त्रिभुवनेश्वराः। शतं त्वेकं समाख्यातं रुद्राणाममितौजसाम् ॥ १२३ कश्यपस्य तु भार्या यास्तासां नामानि मे शृणु। अदितिर्दितिर्दनुश्चैवारिष्टा च सुरसा खसा ॥ १२४ सुरभिर्विनता चैव ताम्रा क्रोधवशा इरा। कद्रुर्मुनिश्छ धर्मज्ञ तदपत्यानि मे शृणु ॥ १२५ पूर्वमन्वन्तरे श्रेष्ठा द्वादशासन्सुरोत्तमाः। तुषिता नाम तेऽन्योऽन्यमूचुर्वैवस्वतेऽन्तरे ॥ १२६ उपस्थितेऽतियशसश्चाक्षुषस्यान्तरे मनोः। समवायीकृताः सर्वे समागम्य परस्परम् ॥ १२७

अनिलकी पत्नी शिवा थी; उससे अनिलके मनोजव और अविज्ञातगति—ये दो पुत्र हुए ॥ ११४ ॥ अग्नि के पुत्र कुमार शरस्तम्ब (सरकण्डे)-से उत्पन्न हुए थे, ये कृत्तिकाओंके पुत्र होनेसे कार्तिकेय कहलाये। शाख, विशाख और नैगमेय इनके छोटे भाई थे॥ ११५-११६॥ देवल नामक ऋषिको प्रत्यूषका पुत्र कहा जाता है। इन देवलके भी दो क्षमाशील और मनीषी पुत्र हुए ॥ ११७॥

बृहस्पतिजीकी बहिन वरस्त्री, जो ब्रह्मचारिणी और सिद्ध योगिनी थी तथा अनासक्त भावसे समस्त भूमण्डलमें विचरती थी, आठवें वसु प्रभासकी भार्या हुई ॥ ११८ ॥ उससे सहस्रों शिल्पों (कारीगरियों)-के कर्ता और देवताओंके शिल्पी महाभाग प्रजापति विश्वकर्माका जन्म हुआ॥ ११९॥ जो समस्त शिल्पकारोंमें श्रेष्ठ और सब प्रकारके आभूषण बनानेवाले हुए तथा जिन्होंने देवताओंके सम्पूर्ण विमानोंकी रचना की और जिन महात्माकी [ आविष्कृता ] शिल्पविद्याके आश्रयसे बहुत-से मनुष्य जीवन-निर्वाह करते हैं ॥ १२०॥ उन विश्वकर्माके चार पुत्र थे; उनके नाम सुनो। वे अजैकपाद, अहिर्बुध्न्य, त्वष्टा और परम पुरुषार्थी रुद्र थे। उनमेंसे त्वष्टाके पुत्र महातपस्वी विश्वरूप थे॥ १२१॥ हे महामुने! हर, बहुरूप, त्र्यम्बक, अपराजित, वृषाकपि, शम्भु, कपर्दी, रैवत, मृगव्याध, शर्व और कपाली—ये त्रिलोकीके अधीश्वर ग्यारह रुद्र कहे गये हैं। ऐसे सैकड़ों महातेजस्वी एकादश रुद्र प्रसिद्ध हैं ॥ १२२-१२३॥

जो [ दक्षकन्याएँ ] कश्यपजीकी स्त्रियाँ हुईं उनके नाम सुनो—वे अदिति, दिति, दनु, अरिष्टा, सुरसा, खसा, सुरभि, विनता, ताम्रा, क्रोधवशा, इरा, कद्रु और मुनि थीं। हे धर्मज्ञ! अब तुम उनकी सन्तानका विवरण श्रवण करो ॥ १२४-१२५॥

पूर्व (चाक्षुष) मन्वन्तरमें तुषित नामक बारह श्रेष्ठ देवगण थे। वे यशस्वी सुरश्रेष्ठ चाक्षुष मन्वन्तरके पश्चात् वैवस्वत-मन्वन्तरके उपस्थित होनेपर एक-दूसरेके पास जाकर मिले और परस्पर कहने लगे—॥१२६-१२७॥

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