विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
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७८ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १५
| आगच्छत द्रुतं देवा अदितिं सम्प्रविश्य वै।<br>मन्वन्तरे प्रसूयामस्तन्नः श्रेयो भवेदिति ॥ १२८ | "हे देवगण! आओ, हमलोग शीघ्र ही अदितिके गर्भमें प्रवेश कर इस वैवस्वत-मन्वन्तरमें जन्म लें, इसमें हमारा हित है" ॥ १२८ ॥ इस प्रकार चाक्षुष-मन्वन्तरमें निश्चयकर उन सबने मरीचिपुत्र कश्यपजीके यहाँ दक्षकन्या अदितिके गर्भसे जन्म लिया ॥ १२९ ॥ वे अति तेजस्वी उससे उत्पन्न होकर विष्णु, इन्द्र, अर्यमा, धाता, त्वष्टा, पूषा, विवस्वान्, सविता, मैत्र, वरुण, अंशु और भग नामक द्वादश आदित्य कहलाये ॥ १३०-१३१ ॥ इस प्रकार पहले चाक्षुष-मन्वन्तरमें जो तुषित नामक देवगण थे वे ही वैवस्वत-मन्वन्तरमें द्वादश आदित्य हुए ॥ १३२ ॥ |
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| एवमुक्त्वा तु ते सर्वे चाक्षुषस्यान्तरे मनोः।<br>मारीचात्कश्यपाज्जाता आदित्या दक्षकन्यया ॥ १२९ | |
| तत्र विष्णुश्च शक्रश्च जज्ञाते पुनरेव हि।<br>अर्यमा चैव धाता च त्वष्टा पूषा तथैव च ॥ १३० | |
| विवस्वान्सविता चैव मित्रो वरुण एव च।<br>अंशुर्भगश्चातितेजा आदित्या द्वादश स्मृताः ॥ १३१ | |
| चाक्षुषस्यान्तरे पूर्वमासन्ये तुषिताः सुराः।<br>वैवस्वतेऽन्तरे ते वै आदित्या द्वादश स्मृताः ॥ १३२ | |
| याः सप्तविंशतिः प्रोक्ताः सोमपत्न्योऽथ सुव्रताः।<br>सर्वा नक्षत्रयोगिन्यस्तन्नाम्यश्चैव ताः स्मृताः ॥ १३३ | सोमकी जिन सत्ताईस सुव्रता पत्नियोंके विषयमें पहले कह चुके हैं वे सब नक्षत्रयोगिनी हैं और उन नामोंसे ही विख्यात हैं ॥ १३३ ॥ उन अति तेजस्विनियोंसे अनेक प्रतिभाशाली पुत्र उत्पन्न हुए। अरिष्टनेमिकी पत्नियोंके सोलह पुत्र हुए। बुद्धिमान् बहुपुत्रकी भार्या [ कपिला, अतिलोहिता, पीता और असिता *नामक ] चार प्रकारकी विद्युत् कही जाती हैं ॥ १३४-१३५ ॥ ब्रह्मर्षियोंसे सत्कृत ऋचाओंके अभिमानी देवश्रेष्ठ प्रत्यंगिरासे उत्पन्न हुए हैं तथा शास्त्रोंके अभिमानी देवप्रहरण नामक देवगण देवर्षि कृशाश्वकी सन्तान कहे जाते हैं ॥ १३६ ॥ हे तात ! [ आठ वसु, ग्यारह रुद्र, बारह आदित्य, प्रजापति और वषट्कार] ये तैंतीस वेदोक्त देवता अपनी इच्छानुसार जन्म लेनेवाले हैं। कहते हैं, इस लोकमें इनके उत्पत्ति और निरोध निरन्तर हुआ करते हैं। ये एक हजार युगके अनन्तर पुनः-पुनः उत्पन्न होते रहते हैं ॥ १३७-१३८ ॥ हे मैत्रेय ! जिस प्रकार लोकमें सूर्यके अस्त और उदय निरन्तर हुआ करते हैं उसी प्रकार ये देवगण भी युग-युगमें उत्पन्न होते रहते हैं ॥ १३९ ॥ |
| तासामपत्यान्यभवन्दीप्तान्यमिततेजसाम्।<br>अरिष्टनेमिपत्नीनामपत्यानीह षोडश ॥ १३४ | |
| बहुपुत्रस्य विदुषश्चतस्रो विद्युतस्स्मृताः ॥ १३५ | |
| प्रत्यङ्गिरसजाः श्रेष्ठा ऋचो ब्रह्मर्षिसत्कृताः।<br>कृशाश्वस्य तु देवर्षेर्देवप्रहरणाः स्मृताः ॥ १३६ | |
| एते युगसहस्रान्ते जायन्ते पुनरेव हि।<br>सर्वे देवगणास्तात त्रयस्त्रिंशत्तु छन्दजाः ॥ १३७ | |
| तेषामपीह सततं निरोधोत्पत्तिरुच्यते ॥ १३८ | |
| यथा सूर्यस्य मैत्रेय उदयास्तमनाविह।<br>एवं देवनिकायास्ते सम्भवन्ति युगे युगे ॥ १३९ | |
| दित्या पुत्रद्वयं जज्ञे कश्यपादिति नः श्रुतम्।<br>हिरण्यकशिपुश्चैव हिरण्याक्षश्च दुर्जयः ॥ १४० | हमने सुना है दितिके कश्यपजीके वीर्यसे परम दुर्जय हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष नामक दो पुत्र तथा सिंहिका नामकी एक कन्या हुई जो विप्रचित्तिको विवाही गयी ॥ १४०-१४१ ॥ हिरण्यकशिपुके अति तेजस्वी और महापराक्रमी अनुह्लाद, ह्लाद, बुद्धिमान् प्रह्लाद और संह्लाद नामक चार पुत्र हुए जो दैत्यवंशको बढ़ानेवाले थे ॥ १४२ ॥ |
| सिंहिका चाभवत्कन्या विप्रचित्तेः परिग्रहः ॥ १४१ | |
| हिरण्यकशिपोः पुत्राश्चत्वारः प्रथितौजसः।<br>अनुह्लादश्च ह्लादश्च प्रह्लादश्चैव बुद्धिमान्।<br>संह्लादश्च महावीर्या दैत्यवंशविवर्द्धनाः ॥ १४२ |
* ज्योतिःशास्त्रमें कहा है— वातं कपिला विद्युद्दातपायातिलोहिता। पीता वर्षाय विज्ञेया दुर्भिक्षाय सिता भवेत् ॥
अर्थात् कपिल (भूरी) वर्णकी बिजली वायु लानेवाली, अत्यन्त लोहित धूप निकालनेवाली, पीतवर्णा वृष्टि लानेवाली और सिता (श्वेत) दुर्भिक्षकी सूचना देनेवाली होती है।