विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 90, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० १५ ] * प्रथम अंश * ७९
तेषां मध्ये महाभाग सर्वत्र समदृग्वशी।
प्रह्लादः परमां भक्तिं य उवाच जनार्दने ॥ १४३
दैत्येन्द्रदीपितो वह्निः सर्वाङ्गोपचितो द्विज।
न ददाह च यं विप्र वासुदेवे हृदि स्थिते ॥ १४४
महार्णवान्तःसलिले स्थितस्य चलतो मही।
चचाल सकला यस्य पाशबद्धस्य धीमतः ॥ १४५
न भिन्नं विविधैः शस्त्रैर्यस्य दैत्येन्द्रपातितैः।
शरीरमद्रिकठिनं सर्वत्राच्युतचेतसः ॥ १४६
विषानलोज्ज्वलमुखा यस्य दैत्यप्रचोदिताः।
नान्ताय सर्पपतयो बभूवुरुरुतेजसः ॥ १४७
शैलैराक्रान्तदेहोऽपि यः स्मरन्पुरुषोत्तमम्।
तत्याज नात्मनः प्राणान् विष्णुस्मरण दंशितः ॥ १४८
पतन्तमुच्चादवनिर्मुपेत्य महामतिम्।
दधार दैत्यपतिना क्षिप्तं स्वर्गनिवासिना ॥ १४९
यस्य संशोषको वायुर्देहे दैत्येन्द्रयोजितः।
अवाप सङ्क्षयं सद्यश्चित्तस्थे मधुसूदने ॥ १५०
विषाणभङ्गमुन्मत्ता मदहानिं च दिग्गजाः।
यस्य वक्षःस्थले प्राप्ता दैत्येन्द्रपरिणामिताः ॥ १५१
यस्य चोत्पादिता कृत्या दैत्यराजपुरोहितैः।
बभूव नान्ताय पुरा गोविन्दासक्तचेतसः ॥ १५२
शम्बरस्य च मायानां सहस्रमतिमायिनः।
यस्मिन्प्रयुक्तं चक्रेण कृष्णस्य वितथीकृतम् ॥ १५३
दैत्येन्द्रसूदोपहृतं यस्य हालाहलं विषम्।
जरयामास मतिमानविकारममत्सरी ॥ १५४
समचेता जगत्यस्मिन्यः सर्वेष्वेव जन्तुषु।
यथात्मनि तथान्येषां परं मैत्रगुणान्वितः ॥ १५५
धर्मात्मा सत्यशौर्यादिगुणानामाकरः परः।
उपमानमशेषाणां साधूनां यः सदाभवत् ॥ १५६
हे महाभाग! उनमें प्रह्लादजी सर्वत्र समदर्शी और जितेन्द्रिय थे, जिन्होंने श्रीविष्णुभगवान्की परम भक्तिका वर्णन किया था ॥ १४३ ॥ जिनको दैत्यराजद्वारा दीप्त किये हुए अग्निने उनके सर्वांगमें व्याप्त होकर भी, हृदयमें वासुदेव भगवान्के स्थित रहनेसे नहीं जला पाया ॥ १४४ ॥ जिन महाबुद्धिमान्के पाशबद्ध होकर समुद्रके जलमें पड़े-पड़े इधर-उधर हिलने-डुलनेसे सारी पृथिवी हिलने लगी थी ॥ १४५ ॥ जिनका पर्वतके समान कठोर शरीर, सर्वत्र भगवच्चित्त रहनेके कारण दैत्यराजके चलाये हुए अस्त्र-शस्त्रोंसे भी छिन्न-भिन्न नहीं हुआ ॥ १४६ ॥ दैत्यराजद्वारा प्रेरित विषाग्निसे प्रज्वलित मुखवाले सर्प भी जिन महातेजस्वीका अन्त नहीं कर सके ॥ १४७ ॥ जिन्होंने भगवत्स्मरणरूपी कवच धारण किये रहनेके कारण पुरुषोत्तम भगवान्का स्मरण करते हुए पत्थरोंकी मार पड़नेपर भी अपने प्राणोंको नहीं छोड़ा ॥ १४८ ॥ स्वर्गनिवासी दैत्यपतिद्वारा ऊपरसे गिराये जानेपर जिन महामतिको पृथिवीने पास जाकर बीचहीमें अपनी गोदमें धारण कर लिया ॥ १४९ ॥ चित्तमें श्रीमधुसूदनभगवान्के स्थित रहनेसे दैत्यराजका नियुक्त किया हुआ सबका शोषण करनेवाला वायु जिनके शरीरमें लगनेसे शान्त हो गया ॥ १५० ॥ दैत्येन्द्रद्वारा आक्रमणके लिये नियुक्त उन्मत्त दिग्गजोंके दाँत जिनके वक्षःस्थलमें लगनेसे टूट गये और उनका सारा मद चूर्ण हो गया ॥ १५१ ॥ पूर्वकालमें दैत्यराजके पुरोहितोंकी उत्पन्न की हुई कृत्या भी जिन गोविन्दासक्तचित्त भक्तराजके अन्तका कारण नहीं हो सकी ॥ १५२ ॥ जिनके ऊपर प्रयुक्त की हुई अति मायावी शम्बरासुरकी हजारों मायाएँ श्रीकृष्णचन्द्रके चक्रसे व्यर्थ हो गयीं ॥ १५३ ॥ जिन मतिमान् और निर्मत्सरने दैत्यराजके रसोइयोंके लाये हुए हलाहल विषको निर्विकार-भावसे पचा लिया ॥ १५४ ॥ जो इस संसारमें समस्त प्राणियोंके प्रति समानचित्त और अपने समान ही दूसरोंके लिये भी परमप्रेमयुक्त थे ॥ १५५ ॥ और जो परम धर्मात्मा महापुरुष, सत्य एवं शौर्य आदि गुणोंकी खानि तथा समस्त साधु-पुरुषोंके लिये उपमानस्वरूप हुए थे ॥ १५६ ॥
इति श्रीविष्णुपुराणे प्रथमेऽंशे पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥