भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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८० * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १६


सोलहवाँ अध्याय

नृसिंहावतारविषयक प्रश्न


श्रीमैत्रेय उवाचश्रीमैत्रेयजी बोले—
कथितो भवता वंशो मानवानां महात्मनाम् ।<br>कारणं चास्य जगतो विष्णुरेव सनातनः ॥ १आपने महात्मा मनुपुत्रोंके वंशोंका वर्णन किया और यह भी बताया कि इस जगत्के सनातन कारण भगवान् विष्णु ही हैं ॥ १ ॥
यत्त्वेतद् भगवानाह प्रह्लादं दैत्यसत्तमम् ।<br>ददाह नाग्निर्नार्स्त्रैश्च क्षुण्णस्तत्याज जीवितम् ॥ २किन्तु, भगवन् ! आपने जो कहा कि दैत्यश्रेष्ठ प्रह्लादजीको न तो अग्निने ही भस्म किया और न उन्होंने अस्त्र-शस्त्रोंसे आघात किये जानेपर ही अपने प्राणोंको छोड़ा ॥ २ ॥
जगाम वसुधा क्षोभं यत्राब्धिसलिले स्थिते ।<br>पाशैर्बद्धे विचलति विक्षिप्ताङ्गैः समाहता ॥ ३तथा पाशबद्ध होकर समुद्रके जलमें पड़े रहनेपर उनके हिलते-डुलते हुए अंगोंसे आहत होकर पृथिवी डगमगाने लगी ॥ ३ ॥
शैलैराक्रान्तदेहोऽपि न ममार च यः पुरा ।<br>त्वया चातीव माहात्म्यं कथितं यस्य धीमतः ॥ ४और शरीरपर पत्थरोंकी बौछार पड़नेपर भी वे नहीं मरे। इस प्रकार जिन महाबुद्धिमान्का आपने बहुत ही माहात्म्य वर्णन किया है ॥ ४ ॥
तस्य प्रभावमतुलं विष्णोर्भक्तिमतो मुने ।<br>श्रोतुमिच्छामि यस्यैतच्चरितं दीप्ततेजसः ॥ ५हे मुने ! जिन अति तेजस्वी माहात्माके ऐसे चरित्र हैं, मैं उन परम विष्णुभक्तका अतुलित प्रभाव सुनना चाहता हूँ ॥ ५ ॥
किन्निमित्तमसौ शस्त्रैर्विक्षिप्तो दितिजैर्मुने ।<br>किमर्थं चाब्धिसलिले विक्षिप्तो धर्मतत्परः ॥ ६हे मुनिवर ! वे तो बड़े ही धर्मपरायण थे; फिर दैत्योंने उन्हें क्यों अस्त्र-शस्त्रोंसे पीड़ित किया और क्यों समुद्रके जलमें डाला ? ॥ ६ ॥
आक्रान्तः पर्वतैः कस्माद्दष्टश्चैव महोरगैः ।<br>क्षिप्तःकिमद्रिशिखरात्किं वा पावकसञ्चये ॥ ७उन्होंने किसलिये उन्हें पर्वतोंसे दबाया ? किस कारण सर्पोंसे डँसाया ? क्यों पर्वतशिखरसे गिराया और क्यों अग्निमें डलवाया ? ॥ ७ ॥
दिग्दन्तिनां दन्तभूमिं स च कस्मान्निरूपितः ।<br>संशोषकोऽनिलश्चास्य प्रयुक्तः किं महासुरैः ॥ ८उन महादैत्योंने उन्हें दिग्गजोंके दाँतोंसे क्यों रुँधवाया और क्यों सर्व शोषक वायुको उनके लिये नियुक्त किया ? ॥ ८ ॥
कृत्यां च दैत्यगुरवो युयुजुस्तत्र किं मुने ।<br>शम्बरश्चापि मायानां सहस्रं किं प्रयुक्तवान् ॥ ९हे मुने ! उनपर दैत्यगुरुओंने किसलिये कृत्याका प्रयोग किया और शम्बरासुरने क्यों अपनी सहस्रों मायाओंका वार किया ? ॥ ९ ॥
हालाहलं विषमहो दैत्यसूदैर्महात्मनः ।<br>कस्माद्दत्तं विनाशाय यज्जीर्णं तेन धीमता ॥ १०उन महात्माको मारनेके लिये दैत्यराजके रसोइयोंने, जिसे वे महाबुद्धिमान् पचा गये थे ऐसा हलाहल विष क्यों दिया ? ॥ १० ॥
एतत्सर्वं महाभाग प्रह्लादस्य महात्मनः ।<br>चरितं श्रोतुमिच्छामि महामाहात्म्यसूचकम् ॥ ११हे महाभाग ! महात्मा प्रह्लादका यह सम्पूर्ण चरित्र, जो उनके महान् माहात्म्यका सूचक है, मैं सुनना चाहता हूँ ॥ ११ ॥
न हि कौतूहलं तत्र यद्दैत्यैर्न हतो हि सः ।<br>अनन्यमनसो विष्णौ कः समर्थो निपातने ॥ १२यदि दैत्यगण उन्हें नहीं मार सके तो इसका मुझे कोई आश्चर्य नहीं है, क्योंकि जिसका मन अनन्यभावसे भगवान् विष्णुमें लगा हुआ है उसको भला कौन मार सकता है ? ॥ १२ ॥
तस्मिन्धर्मपरे नित्यं केशवाराधनोद्यते ।<br>स्ववंशप्रभवैर्दैत्यैः कृतो द्वेषोऽतिदुष्करः ॥ १३[ आश्चर्य तो इसीका है कि ] जो नित्यधर्मपरायण और भगवदाराधनामें तत्पर रहते थे, उनसे उनके ही कुलमें उत्पन्न हुए दैत्योंने ऐसा अति दुष्कर द्वेष किया ! [ क्योंकि ऐसे समदर्शी और धर्मभीरु पुरुषोंसे तो किसीका भी द्वेष होना अत्यन्त कठिन है ] ॥ १३ ॥
धर्मात्मनि महाभागे विष्णुभक्ते विमत्सरे ।<br>दैत्यैः प्रहृतं कस्मात्तन्ममाख्यातुमर्हसि ॥ १४उन धर्मात्मा, महाभाग, मत्सरहीन विष्णु-भक्तको दैत्योंने किस कारणसे इतना कष्ट दिया, सो आप मुझसे कहिये ॥ १४ ॥