विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 94, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० १७] * प्रथम अंश * ८३
प्रह्लाद उवाच
न केवलं तात मम प्रजानां
स ब्रह्मभूतो भवतश्च विष्णुः।
धाता विधाता परमेश्वरश्च
प्रसीद कोपं कुरुषे किमर्थम्॥ २४
प्रह्लादजी बोले— हे तात! वह ब्रह्मभूत विष्णु तो केवल मेरा ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण प्रजा और आपका भी कर्ता, नियन्ता और परमेश्वर है। आप प्रसन्न होइये, व्यर्थ क्रोध क्यों करते हैं॥ २४॥
हिरण्यकशिपुरुवाच
प्रविष्टः कोऽस्य हृदये दुर्बुद्धेरतिपापकृत्।
येनेदृशान्यसाधूनि वदत्याविष्टमानसः॥ २५
हिरण्यकशिपु बोला— अरे कौन पापी इस दुर्बुद्धि बालकके हृदयमें घुस बैठा है जिससे आविष्टचित्त होकर यह ऐसे अमंगल वचन बोलता है?॥ २५॥
प्रह्लाद उवाच
न केवलं मद्धृदयं स विष्णु-
राक्रम्य लोकानखिलानवस्थितः।
स मां त्वदादींश्च पितस्समस्ता-
न्समस्तचेष्टासु युनक्ति सर्वगः॥ २६
प्रह्लादजी बोले— पिताजी! वे विष्णुभगवान् तो मेरे ही हृदयमें नहीं, बल्कि सम्पूर्ण लोकोंमें स्थित हैं। वे सर्वगामी तो मुझको, आप सबको और समस्त प्राणियोंको अपनी-अपनी चेष्टाओंमें प्रवृत्त करते हैं॥ २६॥
हिरण्यकशिपुरुवाच
निष्कास्यतामयं पापः शास्यतां च गुरोर्गृहे।
योजितो दुर्मतिः केन विपक्षविषयस्तुतौ॥ २७
हिरण्यकशिपु बोला— इस पापीको यहाँसे निकालो और गुरुके यहाँ ले जाकर इसका भली प्रकार शासन करो। इस दुर्मतिको न जाने किसने मेरे विपक्षीकी प्रशंसामें नियुक्त कर दिया है?॥ २७॥
श्रीपराशर उवाच
इत्युक्तोऽसौ तदा दैत्यैर्नीतो गुरुगृहं पुनः।
जग्राह विद्यामनिशं गुरुशुश्रूषणोद्यतः॥ २८
कालेऽतीतेऽपि महति प्रह्लादमसुरेश्वरः।
समाहूयाब्रवीद्गाथा काचित्पुत्रक गीयताम्॥ २९
श्रीपराशरजी बोले— उसके ऐसा कहनेपर दैत्यगण उस बालकको फिर गुरुजीके यहाँ ले गये और वे वहाँ गुरुजीकी रात-दिन भली प्रकार सेवा-शुश्रूषा करते हुए विद्याध्ययन करने लगे॥ २८॥ बहुत काल व्यतीत हो जानेपर दैत्यराजने प्रह्लादजीको फिर बुलाया और कहा—‘बेटा! आज कोई गाथा (कथा) सुनाओ’॥ २९॥
प्रह्लाद उवाच
यतः प्रधानपुरुषौ यतश्चैतच्चराचरम्।
कारणं सकलस्यास्य स नो विष्णुः प्रसीदतु॥ ३०
प्रह्लादजी बोले— जिनसे प्रधान, पुरुष और यह चराचर जगत् उत्पन्न हुआ है वे सकल प्रपंचके कारण श्रीविष्णुभगवान् हमपर प्रसन्न हों॥ ३०॥
हिरण्यकशिपुरुवाच
दुरात्मा वध्यतामेष नानेनार्थोऽस्ति जीवता।
स्वपक्षहानिकर्तृत्वाद्यः कुलाङ्गारतां गतः॥ ३१
हिरण्यकशिपु बोला— अरे! यह बड़ा दुरात्मा है। इसको मार डालो; अब इसके जीनेसे कोई लाभ नहीं है, क्योंकि स्वपक्षकी हानि करनेवाला होनेसे यह तो अपने कुलके लिये अंगाररूप हो गया है॥ ३१॥
श्रीपराशर उवाच
इत्याज्ञप्तास्ततस्तेन प्रगृहीतमहायुधाः।
उद्यतास्तस्य नाशाय दैत्याः शतसहस्रशः॥ ३२
श्रीपराशरजी बोले— उसकी ऐसी आज्ञा होनेपर सैकड़ों-हजारों दैत्यगण बड़े-बड़े अस्त्र-शस्त्र लेकर उन्हें मारनेके लिये तैयार हुए॥ ३२॥
प्रह्लाद उवाच
विष्णुः शस्त्रेषु युष्मासु मयि चासौ व्यवस्थितः।
दैतेयास्तेन सत्येन माक्रमन्त्वायुधानि मे॥ ३३
प्रह्लादजी बोले— अरे दैत्यो! भगवान् विष्णु तो शस्त्रोंमें, तुमलोगोमें और मुझमें—सर्वत्र ही स्थित हैं। इस सत्यके प्रभावसे इन अस्त्र-शस्त्रोंका मेरे ऊपर कोई प्रभाव न हो॥ ३३॥