भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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८४ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १७


श्रीपराशर उवाच ततस्तैश्शतशो दैत्यैः शस्त्रौघैराहतोऽपि सन्। नावाप वेदनामल्पामभूच्चैव पुनर्नवः॥ ३४

हिरण्यकशिपुरुवाच दुर्बुद्धे विनिवर्तस्व वैरिपक्षस्तवादतः। अभयं ते प्रयच्छामि मातिमूढमतिर्भव॥ ३५

प्रह्लाद उवाच भयं भयानामपहारिणि स्थिते मनस्यनन्ते मम कुत्र तिष्ठति। यस्मिन्स्मृते जन्मजरान्तकादि- भयानि सर्वाण्यपयान्ति तात॥ ३६

हिरण्यकशिपुरुवाच भो भो सर्पाः दुराचारमेनमत्यन्तदुर्मतिम्। विषज्वालाकुलैर्वक्त्रैः सद्यो नयत सङ्क्षयम्॥ ३७

श्रीपराशर उवाच इत्युक्तास्ते ततः सर्पाः कुहकास्तक्षकादयः। अदशन्त समस्तेषु गात्रेष्वतिविषोल्बणाः॥ ३८ स त्वासक्तमतिः कृष्णे दश्यमानो महोरगैः। न विवेदात्मनो गात्रं तत्स्मृत्याह्लादसुस्थितः॥ ३९

सर्पा ऊचुः दंष्ट्रा विशीर्णा मणयः स्फुटन्ति फणेषु तापो हृदयेषु कम्पः। नास्य त्वचः स्वल्पमपीह भिन्नं प्रशाधि दैत्येश्वर कार्यमन्यत्॥ ४०

हिरण्यकशिपुरुवाच हे दिग्गजाः सङ्कटदन्तमित्रा घ्नैतन्मस्मद्रिपुपक्षभिन्नम्। तज्जा विनाशाय भवन्ति तस्य यथारणेः प्रज्वलितो हुताशः॥ ४१

श्रीपराशर उवाच ततः स दिग्गजैर्बालो भूभृच्छिखरसन्निभैः। पातितो धरणीपृष्ठे विषाणैर्वावपीडितः॥ ४२ स्मरतस्तस्य गोविन्दमभिदन्ताः सहस्रशः। शीर्णा वक्षःस्थलं प्राप्य स प्राह पितरं ततः॥ ४३


**श्रीपराशरजी बोले—**तब तो उन सैकड़ों दैत्योंके शस्त्र-समूहका आघात होनेपर भी उनको तनिक-सी भी वेदना न हुई, वे फिर भी ज्यों-के-त्यों नवोन बल-सम्पन्न ही रहे॥ ३४॥

**हिरण्यकशिपु बोला—**रे दुर्बुद्धे! अब तू विपक्षीकी स्तुति करना छोड़ दे; जा, मैं तुझे अभयदान देता हूँ, अब और अधिक नादान मत हो॥ ३५॥

**प्रह्लादजी बोले—**हे तात! जिनके स्मरणमात्रसे जन्म, जरा और मृत्यु आदिके समस्त भय दूर हो जाते हैं, उन सकल-भयहारी अनन्तके हृदयमें स्थित रहते मुझे भय कहाँ रह सकता है॥ ३६॥

**हिरण्यकशिपु बोला—**अरे सर्पो! इस अत्यन्त दुर्बुद्धि और दुराचारीको अपने विषाग्नि-सन्तप्त मुखोंसे काटकर शीघ्र ही नष्ट कर दो॥ ३७॥

**श्रीपराशरजी बोले—**ऐसी आज्ञा होनेपर अतिक्रूर और विषधर तक्षक आदि सर्पोंने उनके समस्त अंगोंमें काटा॥ ३८॥ किन्तु उन्हें तो श्रीकृष्णचन्द्रमें आसक्तचित्त रहनेके कारण भगवत्स्मरणके परमानन्दमें डूबे रहनेसे उन महासर्पोंके काटनेपर भी अपने शरीरकी कोई सुधि नहीं हुई॥ ३९॥

**सर्प बोले—**हे दैत्यराज! देखो, हमारी दाढ़ें टूट गयीं, मणियाँ चटकने लगीं, फणोंमें पीड़ा होने लगी और हृदय काँपने लगा, तथापि इसकी त्वचा तो जरा भी नहीं कटी। इसलिये अब आप हमें कोई और कार्य बताइये॥ ४०॥

**हिरण्यकशिपु बोला—**हे दिग्गजो! तुम सब अपने संकीर्ण दाँतोंको मिलाकर मेरे शत्रु-पक्षद्वारा [बहकाकर] मुझसे विमुख किये हुए इस बालकको मार डालो। देखो, जैसे अरणीसे उत्पन्न हुआ अग्नि उसीको जला डालता है उसी प्रकार कोई-कोई जिससे उत्पन्न होते हैं उसीके नाश करनेवाले हो जाते हैं॥ ४१॥

**श्रीपराशरजी बोले—**तब पर्वत-शिखरके समान विशालकाय दिग्गजोंने उस बालकको पृथिवीपर पटककर अपने दाँतोंसे खूब रौंदा॥ ४२॥ किन्तु श्रीगोविन्दका स्मरण करते रहनेसे हाथियोंके हजारों दाँत उनके वक्षःस्थलसे टकराकर टूट गये; तब उन्होंने पिता हिरण्यकशिपुसे कहा—॥ ४३॥

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