विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 96, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० १७ ] * प्रथम अंश * ८५
दन्ता गजानां कुलिशाग्रनिष्ठुराः शीर्णा यदेते न बलं ममैतत् । महाविपत्तापविनाशनोऽयं जनार्दनानुस्मरणानुभावः ॥ ४४
हिरण्यकशिपुरुवाच ज्वाल्यतामसुरा वह्निरपसर्पंत दिग्गजाः। वायो समेधयाग्निं त्वं दह्यतामेष पापकृत् ॥ ४५
श्रीपराशर उवाच महाकाष्ठचयस्थं तमसुरेन्द्रसुतं ततः। प्रज्वाल्य दानवा वह्निं ददहुः स्वामिनोदिताः ॥ ४६
प्रह्लाद उवाच तातैष वह्निः पवनेरितोऽपि न मां दहत्यत्र समन्ततोऽहम् । पश्यामि पद्मास्तरणास्तृतानि शीतानि सर्वाणि दिशामुखानि ॥ ४७
श्रीपराशर उवाच अथ दैत्येश्वरं प्रोचुर्भार्गवस्यात्मजा द्विजाः। पुरोहिता महात्मानः साम्ना संस्तूय वाग्मिनः ॥ ४८
पुरोहिता ऊचुः राजनियम्यतां कोपो बालेऽपि तनये निजे। कोपो देवनिकायेषु तेषु ते सफलो यतः ॥ ४९ तथातथैनं बालं ते शासितारो वयं नृप। यथा विपक्षनाशाय विनीतस्ते भविष्यति ॥ ५० बालत्वं सर्वदोषाणां दैत्यराजास्पदं यतः। ततोऽत्र कोपमत्यर्थं योक्तुमर्हसि नार्भके ॥ ५१ न त्यक्ष्यति हरेः पक्षमस्माकं वचनाद्यदि । ततः कृत्यां वधायास्य करिष्यामोऽनिवर्त्तिनीम् ॥ ५२
श्रीपराशर उवाच एवमभ्यर्थितस्तैस्तु दैत्यराजः पुरोहितैः। दैत्यैर्निष्कासयामास पुत्रं पावकसञ्चयात् ॥ ५३ ततो गुरुगृहे बालः स वसन्बालदानवान् । अध्यापयामास मुहुरुपदेशान्तरे गुरोः ॥ ५४
"ये जो हाथियोंके वज्रके समान कठोर दाँत टूट गये हैं इसमें मेरा कोई बल नहीं है; यह तो श्रीजनार्दनभगवान्के महाविपत्ति और क्लेशोंके नष्ट करनेवाले स्मरणका ही प्रभाव है" ॥ ४४ ॥
हिरण्यकशिपु बोला-अरे दिग्गजो! तुम हट जाओ। दैत्यगण! तुम अग्नि जलाओ, और हे वायु! तुम अग्निको प्रज्वलित करो जिससे इस पापीको जला डाला जाय ॥ ४५ ॥
श्रीपराशरजी बोले-तब अपने स्वामीकी आज्ञासे दानवगण काष्ठके एक बड़े ढेरमें स्थित उस असुर राजकुमारको अग्नि प्रज्वलित करके जलाने लगे ॥ ४६ ॥
प्रह्लादजी बोले-हे तात! पवनसे प्रेरित हुआ भी यह अग्नि मुझे नहीं जलाता। मुझको तो सभी दिशाएँ ऐसी शीतल प्रतीत होती हैं मानो मेरे चारों ओर कमल बिछे हुए हों ॥ ४७ ॥
श्रीपराशरजी बोले-तदनन्तर, शुक्रजीके पुत्र बड़े वाग्मी महात्मा [ षण्डामर्क आदि ] पुरोहितगण सामनीतिसे दैत्यराजकी बड़ाई करते हुए बोले ॥ ४८ ॥
पुरोहित बोले-हे राजन्! अपने इस बालक पुत्रके प्रति अपना क्रोध शान्त कीजिये; आपको तो देवताओंपर ही क्रोध करना चाहिये, क्योंकि उसकी सफलता तो वहीं है ॥ ४९ ॥ हे राजन्! हम आपके इस बालकको ऐसी शिक्षा देंगे जिससे यह विपक्षके नाशका कारण होकर आपके प्रति अति विनीत हो जायगा ॥ ५० ॥ हे दैत्यराज! बाल्यावस्था तो सब प्रकारके दोषोंका आश्रय होती ही है, इसलिये आपको इस बालकपर अत्यन्त क्रोधका प्रयोग नहीं करना चाहिये ॥ ५१ ॥ यदि हमारे कहनेसे भी यह विष्णुका पक्ष नहीं छोड़ेगा तो हम इसको नष्ट करनेके लिये किसी प्रकार न टलनेवाली कृत्या उत्पन्न करेंगे ॥ ५२ ॥
श्रीपराशरजीने कहा-पुरोहितोंके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर दैत्यराजने दैत्योंद्वारा प्रह्लादको अग्निसमूहसे बाहर निकलवाया ॥ ५३ ॥ फिर प्रह्लादजी, गुरुजीके यहाँ रहते हुए उनके पढ़ा चुकनेपर अन्य दानवकुमारोंको बार-बार उपदेश देने लगे ॥ ५४ ॥