भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 97, कुल 558 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 97
८६* श्रीविष्णुपुराण *[ अ० १७ ]
प्रह्लाद उवाचप्रह्लादजी बोले—हे दैत्यकुलोत्पन्न असुर-बालको!
श्रूयतां परमार्थो मे दैतेया दितिजात्मजाः।<br>न चान्यथैतन्मन्तव्यं नात्र लोभादिकारणम् ॥ ५५सुनो, मैं तुम्हें परमार्थका उपदेश करता हूँ, तुम इसे अन्यथा न समझना, क्योंकि मेरे ऐसा कहनेमें किसी प्रकारका लोभादि कारण नहीं है॥ ५५॥
जन्म बाल्यं ततः सर्वो जन्तुः प्राप्नोति यौवनम्।<br>अव्याहतैव भवति ततोऽनुदिवसं जरा॥ ५६सभी जीव जन्म, बाल्यावस्था और फिर यौवन प्राप्त करते हैं, तत्पश्चात् दिन-दिन वृद्धावस्थाकी प्राप्ति भी अनिवार्य ही है॥ ५६॥
ततश्च मृत्युमभ्येति जन्तुर्दैत्येश्वरात्मजाः।<br>प्रत्यक्षं दृश्यते चैतदस्माकं भवतां तथा॥ ५७और हे दैत्यराजकुमारो! फिर यह जीव मृत्युके मुखमें चला जाता है, यह हम और तुम सभी प्रत्यक्ष देखते हैं॥ ५७॥
मृतस्य च पुनर्जन्म भवत्येतच्च नान्यथा।<br>आगमोऽयं तथा यच्च नोपादानं विनोद्भवः॥ ५८मरनेपर पुनर्जन्म होता है, यह नियम भी कभी नहीं टलता। इस विषयमें [ श्रुति-स्मृतिरूप ] आगम भी प्रमाण है कि बिना उपादानके कोई वस्तु उत्पन्न नहीं होती* ॥ ५८॥
गर्भवासादि यावत्तु पुनर्जन्मोपपादनम्।<br>समस्तावस्थकं तावद्दुःखमेवावगम्यताम् ॥ ५९पुनर्जन्म प्राप्त करानेवाली गर्भवास आदि जितनी अवस्थाएँ हैं उन सबको दुःखस्वरूप ही जानो॥ ५९॥
क्षुत्तृष्णोपशमं तद्वच्छीताद्युपशमं सुखम्।<br>मन्यते बालबुद्धिस्त्वाह्दुःखमेव हि तत्पुनः ॥ ६०मनुष्य मूर्खतावश क्षुधा, तृष्णा और शीतादिकी शान्तिको सुख मानते हैं, परन्तु वास्तवमें तो वे दुःखमात्र ही हैं॥ ६०॥
अत्यन्तस्तिमिताङ्गानां व्यायामेन सुखैषिणाम्।<br>भ्रान्तिज्ञानावृताक्षाणां दुःखमेव सुखायते ॥ ६१जिनका शरीर [ वातादि दोषसे ] अत्यन्त शिथिल हो जाता है उन्हें जिस प्रकार व्यायाम सुखप्रद प्रतीत होता है उसी प्रकार जिनकी दृष्टि भ्रान्तिज्ञानसे ढँकी हुई है उन्हें दुःख ही सुखरूप जान पड़ता है॥ ६१॥
क्व शरीरमशेषाणां श्लेष्मादीनां महाचयः।<br>क्व कान्तिशोभासौन्दर्यरमणीयादयो गुणाः ॥ ६२अहो! कहाँ तो कफ आदि महाघृणित पदार्थोंका समूहरूप शरीर और कहाँ कान्ति, शोभा, सौन्दर्य एवं रमणीयता आदि दिव्य गुण? [ तथापि मनुष्य इस घृणित शरीरमें कान्ति आदिका आरोप कर सुख मानने लगता है ] ॥ ६२॥
मांसासृक्पूयविण्मूत्रस्नायुमज्जास्थिसंहतौ।<br>देहे चेत्प्रीतिमान् मूढो भविता नरकेऽप्यसौ ॥ ६३यदि किसी मूढ पुरुषकी मांस, रुधिर, पीब, विष्ठा, मूत्र, स्नायु, मज्जा और अस्थियोंके समूहरूप इस शरीरमें प्रीति हो सकती है तो उसे नरक भी प्रिय लग सकता है॥ ६३॥
अग्नेः शीतेन तोयस्य तृषा भक्तस्य च क्षुधा।<br>क्रियते सुखकर्तृत्वं तद्विलोमस्य चेतरैः ॥ ६४अग्नि, जल और भात क्रमशः शीत, तृषा और क्षुधाके कारण ही सुखकारी होते हैं और इनके प्रतियोगी जल आदि भी अपनेसे भिन्न अग्नि आदिके कारण ही सुखके हेतु होते हैं॥ ६४॥
करोति हे दैत्यसुता यावन्मात्रं परिग्रहम्।<br>तावन्मात्रं स एवास्य दुःखं चेतसि यच्छति ॥ ६५हे दैत्यकुमारो! विषयोंका जितना-जितना संग्रह किया जाता है उतना-उतना ही वे मनुष्यके चित्तमें दुःख बढ़ाते हैं॥ ६५॥
यावतः कुरुते जन्तुः सम्बन्धान्मनसः प्रियान्।<br>तावन्तोऽस्य निखन्यन्ते हृदये शोकशाङ्कवः॥ ६६जीव अपने मनको प्रिय लगनेवाले जितने ही सम्बन्धियोंको बढ़ाता जाता है उतने ही उसके हृदयमें शोकरूपी शल्य (काँटे) स्थिर होते जाते हैं॥ ६६॥
यद्यद्गृहे तन्मनसि यत्र तत्रावतिष्ठतः।<br>नाशदाहोपकरणं तस्य तत्रैव तिष्ठति ॥ ६७घरमें जो कुछ धन धान्यादि होते हैं मनुष्यके जहाँ-तहाँ (परदेशमें) रहनेपर भी वे पदार्थ उसके चित्तमें बने रहते हैं, और उनके नाश और दाह आदिकी सामग्री भी उसीमें मौजूद रहती है। [ अर्थात् घरमें स्थित पदार्थोंके सुरक्षित रहनेपर भी मनःस्थिति पदार्थोंके नाश आदिकी भावनासे पदार्थ-नाशका दुःख प्राप्त हो जाता है ] ॥ ६७॥

* यह पुनर्जन्म होनेमें युक्ति है क्योंकि जबतक पूर्व-जन्मके किये हुए शुभाशुभ कर्मरूप कारणका होना न माना जाय तबतक वर्तमान जन्म भी सिद्ध नहीं हो सकता। इसी प्रकार, जब इस जन्ममें शुभाशुभका आरम्भ हुआ है तो इसका कार्यरूप पुनर्जन्म भी अवश्य होगा।