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विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
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५४२
| श्लोकाः | अंशा० | अध्या० | श्लो० | श्लोकाः | अंशा० | अध्या० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| सोऽयं यः कालियं नागम् | ५ | २० | ४६ | स्त्रीभिर्नैरैश्च सानन्दम् | ५ | १९ | १३ |
| सोऽवगाहत निःशंकः | ५ | ९ | १० | स्त्रीवधे त्वं महापापम् | १ | १३ | ७३ |
| सोऽहमिच्छामि तच्छ्रोतुम् | ३ | ७ | ७ | स्त्रीसहस्राण्यनेकानि | ५ | ३८ | ५१ |
| सोऽहमिच्छामि धर्मज्ञ | १ | १ | ४ | स्थानभ्रंशं न चाप्नोति | १ | १२ | १०३ |
| सोऽहं त्वां शरणमपारमप्रमेयम् | ५ | २३ | ४७ | स्थानात्स्थानं दशगुणम् | ६ | ३ | ४ |
| सोऽहं गन्ता न चागन्ता | २ | १५ | २५ | स्थानेनेह न नः कार्यम् | ५ | ६ | २२ |
| सोऽहं न पापमिच्छामि | १ | १९ | ७ | स्थाप्यः कुवलयापीडः | ५ | २० | २३ |
| सोऽहं तथा यतिष्यामि | १ | ११ | २६ | स्थालीस्थमग्निसंयोगात् | २ | ४ | ८९ |
| सोऽहं वदाम्यशेषं ते | १ | १ | ३० | स्थावरान्ताः सुराद्यास्तु | १ | ५ | २९ |
| सोऽहं ते देवदेवेश | ५ | ७ | ७० | स्थावराः कृमयोऽब्जाश्च | २ | ६ | ३४ |
| सोऽहं यास्यामि गोविन्द | ५ | १६ | २७ | स्पर्शमात्रं तु वै वायुः | १ | २ | ४१ |
| सोऽहं साम्प्रतमायात: | ५ | २९ | ७ | स्थिते तिष्ठेद्व्रजेद्याते | ३ | ९ | ४ |
| सौम्यासौम्यैस्तदा शान्ता० | १ | ७ | १५ | स्थितौ स्थितस्य मे वध्याः | ३ | १७ | ४३ |
| सौराष्ट्रावन्ति० | ४ | २४ | ६८ | स्थूला मध्यास्तथा सूक्ष्माः | ५ | ३० | १३ |
| संख्यानं यादवानाम् | ४ | १५ | ४६ | स्थूलैः सूक्ष्मैस्तथा सूक्ष्मः | ३ | ७ | ३ |
| संजायते येन तदस्तदोषम् | ६ | ५ | ८७ | स्नातस्त्रग्गन्धधृक्प्रीतः | ३ | ११ | ११७ |
| संज्ञेयमित्यर्थकश्च | ३ | २ | ४ | स्नातस्य सलिले यस्याः | २ | ८ | ११६ |
| संवरणात्कुरुः | ४ | १९ | ७६ | स्नातो नांगानि सम्मार्जैत् | ३ | १२ | २४ |
| संवत्सरं क्रियाहानिः | ३ | १८ | ४१ | स्नातो यथावत्कृत्वा | ३ | ११ | ७७ |
| संवत्सरस्तु प्रथमः | २ | ८ | ७२ | स्नानमेव प्रसाधनहेतुः | ४ | २४ | ८७ |
| संवत्सरादयः पञ्च | २ | ८ | ७१ | स्नानाद्विधूतपापाश्च | २ | ८ | ११९ |
| संशोषकं तथा वायुम् | १ | १९ | २१ | स्नानावसानं ते तस्य | ६ | २ | ५ |
| संसारपतितस्यैकः | ५ | २३ | ३१ | स्नुषां सुतां चापि गत्वा | २ | ६ | १२ |
| संसिद्धायां तु वार्तायाम् | १ | ६ | ३२ | स्पृष्टे स्नानं सचैलस्य | ३ | १८ | ४२ |
| संस्तुतो भगवानित्थम् | ५ | ३१ | १ | स्पृष्टो नखाम्भसा वाथ | ५ | ३८ | ४१ |
| संस्तूयमानो गोपैस्तु | ५ | ९ | ३८ | स्पृष्टो यदंशुभिर्लोकः | ३ | ५ | २३ |
| संस्मृत्य प्रणिपत्यैनम् | ५ | २३ | २६ | स्फटिकगिरिशिलामलः क्व विष्णुः... | ३ | ७ | २३ |
| संहितात्रितयं चक्रे | ३ | ४ | २३ | स्मरतस्तस्य गोविन्दम् | १ | १७ | ४३ |
| संहादपुत्र आयुष्मान् | १ | २१ | १ | स्मराशेषजगद्वीज० | ५ | ९ | २४ |
| स्तम्भस्थदर्पणस्येव | २ | ११ | १९ | स्मर्यतां तन्महाराज | ३ | १८ | ६९ |
| स्तवं प्रचेतसो विष्णुः | १ | १४ | २१ | स्मारितेन यदा त्यक्तः | ३ | १८ | ७९ |
| स्तुतोऽहं यत्त्वया पूर्वम् | ५ | ३ | १४ | स्मृतजन्मक्रमस्सोऽथ | ३ | १८ | ८७ |
| स्तुवन्ति मुनयः सूर्यम् | २ | १० | २० | स्मृते सकलकल्याण० | ५ | १७ | १७ |
| स्तुवन्ति चैनं मुनयः | २ | ११ | १६ | स्यमन्तकमणिरत्नमपि | ४ | १३ | ५६ |
| स्तूयतामेष नृपतिः | १ | १३ | ५३ | स्यमन्तकं च सत्राजिते | ४ | १३ | ६२ |
| स्तोत्रस्य चावसाने ते | ३ | १७ | ३५ | स्रग्धरां पीतवसनम् | ५ | ३४ | १७ |
| स्तोत्रेण यस्तथैतेन | १ | ९ | १३७ | स्रष्टा सृजति चात्मानम् | १ | २ | ६७ |
| स्त्रियोऽनुकम्प्यास्साधूनाम् | ५ | ७ | ५४ | स्रष्टा विष्णुरियं सृष्टिः | १ | ८ | १९ |
| स्त्रियः कलौ भविष्यन्ति | ६ | १ | २१ | स्रुकुण्ड सामस्वरधीरनाद | १ | ४ | ३४ |
| स्त्रीत्वमेवोपभोगहेतुः | ४ | २४ | ७७ | स्वकीयं च यौवनम् | ४ | १० | १७ |
| स्त्रीत्वादगुरुचित्ताहम् | ५ | ३० | ७५ | स्वधर्मकवचं तेषाम् | ३ | १८ | ३५ |
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५४३
| श्लोका: | अंशा० | अध्या० | श्लो० | श्लोका: | अंशा० | अध्या० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स्वधर्मस्याविरोधेन | ६ | २ | २५ | हतेषु तेषु बाणोऽपि | ५ | ३३ | ८ |
| स्वपुरुषमभिवीक्ष्य पाशहस्तम् | ३ | ७ | १४ | हते तु नरके भूमि: | ५ | २९ | २२ |
| स्वपोषणपरा: क्षुद्रा: | ६ | १ | ३० | हत्वा च लवणं रक्ष: | १ | १२ | ४ |
| स्वयंवरे कृते सा तम् | ३ | १८ | ८९ | हत्वा तु केशिनं कृष्ण: | ५ | १६ | १६ |
| स्वयं शुश्रूषणाद्धर्म्यात् | १ | १२ | ९७ | हत्वादाय च वस्त्राणि | ५ | १९ | १७ |
| स्वर्गस्थधर्मिसङ्घर्म० | ३ | १७ | २१ | हत्वा कुवलयापीडम् | ५ | २० | ४२ |
| स्वर्गार्थं यदि वो वाञ्छा | ३ | १८ | १७ | हत्वा बलं सनागाश्वम् | ५ | २६ | १० |
| स्वर्गापवर्गव्यासेध० | १ | १ | १९ | हत्वा चिक्षेप चैवैनम् | ५ | २७ | ४ |
| स्वर्गापवर्गौ मानुष्यात् | १ | ६ | १० | हत्वा सैन्यमशेषं तु | ५ | २७ | १९ |
| स्वर्गाक्षयत्वमतुलम् | ३ | १८ | ९५ | हत्वा मुरं हयग्रीवम् | ५ | २९ | १९ |
| स्वर्गे च कृतप्रियै: | ४ | ४ | ७७ | हत्वा तं पौण्ड्रकं शौरि: | ५ | ३४ | २७ |
| स्वर्भानोस्तुरगा ह्यष्टौ | २ | १२ | २१ | हत्वा गर्वसमारूढ: | ५ | ३८ | १६ |
| स्वर्याते तु रजौ | ४ | ९ | १५ | हन्तव्यो हि महाभाग | ५ | २० | ३४ |
| स्वर्लोकादपि रम्याणि | २ | ५ | ५ | हन्ति यावच्च यत्किञ्चित् | १ | २२ | ३९ |
| स्वल्पमेतत्कारणं यदयम् | ४ | १३ | १३२ | हन्यतां हन्यतामेष: | १ | १२ | २७ |
| स्वल्पाम्बुवृष्टि: पर्जन्य: | ६ | १ | ५२ | हयाश्च सप्तच्छन्दांसि | २ | ८ | ५ |
| स्वल्पेनैव हि कालेन | ३ | १८ | २४ | हरति परधनं निहन्ति जन्तून् | ३ | ७ | २८ |
| स्वल्पेन हि प्रयत्नेन | ६ | २ | ३४ | हरश्च बहुरूपश्च | १ | १५ | १२२ |
| स्वल्पेनैव तु कालेन | ५ | ६ | १० | हरिणाक्रीडनं नाम | ५ | ९ | १२ |
| स्ववर्णधर्माभिरता: | ३ | १७ | ३९ | हरिशंकरयोर्युद्धम् | ५ | ३३ | २२ |
| स्वस्त्रीयं बालकं सोऽथ | ३ | ५ | ६ | हरिममवरचारिष्टाङ्घ्रिपद्मम् | ३ | ७ | १८ |
| स्वस्त्यस्तु ते गमिष्यामि | ५ | १६ | २४ | हरिणीं तां विलोक्याथ | २ | १३ | १८ |
| स्वस्थ: प्रशान्तचित्तस्तु | ३ | ११ | ९१ | हरिता रोहिता देवा: | ३ | २ | ३४ |
| स्वस्था: प्रजा निरातंका: | २ | २ | ५४ | हर्षश्वेष्वथ नष्टेषु | १ | १५ | ९६ |
| स्वाचान्तस्तु तत: कुर्यात् | ३ | ११ | २२ | हर्य्यङ्गाद्द्रथरथ: | ४ | १८ | २२ |
| स्वादूदकेनोदधिना | २ | ४ | ८६ | हर्षप्रायमसंसर्गि | ३ | १७ | २२ |
| स्वादूदकस्य परित: | २ | ४ | ९३ | हलं च बलभद्रस्य | ५ | २२ | ७ |
| स्वाध्यायगोत्राचरणम् | ३ | ११ | ६३ | हविर्धानात् षडाग्नेयी | १ | १४ | २ |
| स्वाध्यायसंयमाभ्यां स | ६ | ६ | १ | हविष्मान्सुकृतस्सत्य: | ३ | २ | २७ |
| स्वाध्यायाद्योगमासीत | ६ | ६ | २ | हविष्यमत्स्यमांसांस्तु | ३ | १६ | १ |
| स्वाध्यायशौचसन्तोष० | ६ | ७ | ३७ | हस्तसंस्पर्शमात्रेण | ५ | १३ | ३९ |
| स्वायम्भुवो मनु: पूर्वम् | ३ | १ | ६ | हस्तन्यस्ताग्रहस्तेयम् | ५ | १३ | ३८ |
| स्वायम्भुवं तु कथितम् | ३ | १ | ८ | हस्ते तु दक्षिणे चक्रम् | १ | १३ | ४५ |
| स्वारोचिषश्चोत्तमश्च | ३ | १ | २४ | हस्तेन गृह्य चैकैकाम् | ५ | १३ | ५० |
| स्वीकरणमेव विवाहेहेतु: | ४ | २४ | ८९ | हालाहलाप्तललक: | ४ | २४ | ४७ |
| स्वेनैव कृष्णो रूपेण | ५ | १० | ४८ | हालाहलं विषमहो | १ | १६ | १० |
| स्वं स्वं वै भुञ्जतां तेषाम् | ५ | ३७ | ४१ | हालाहलं विषं तस्य | १ | १८ | ३ |
| ह० | हालाहलं विषं घोरम् | १ | १८ | ५ | |||
| हतवीर्यो हतविष: | ५ | ७ | ७६ | हाहाकारो महाञ्जज्ञे | ५ | २० | ३३ |
| हतेषु तेषु कंसेन | ५ | १ | ७३ | हाहाकारो महाञ्जज्ञे | ५ | २० | ४४ |
| हतेषु तेषु देवेन्द्र | ५ | १२ | २२ | हा हा क्वासाविति जन: | ५ | ७ | २१ |
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५४४
| श्लोकाः | अंशाः | अध्या० | श्लो० | श्लोकाः | अंशाः | अध्या० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| हिडिम्बा घटोत्कचम् | ४ | २० | ४५ | हिंसाहिंसे मृदुक्रूरे | १ | ५ | ६१ |
| हितं मितं प्रियं काले | ३ | १२ | ३४ | हृदयस्थस्ततस्तस्य | १ | १९ | २४ |
| हिमवान्हेमकूटश्च | २ | २ | ११ | हृदि नारायणस्तस्य | २ | ९ | २४ |
| हिमालयं स्थावराणाम् | १ | २२ | ८ | हृदि यदि भगवाननादिरास्ते | ३ | ७ | २७ |
| हिमाह्वयं तु वै वर्षम् | २ | १ | २७ | हृदि संकल्प्य यद्रूपम् | ५ | ७ | ६९ |
| हिमाम्बुघर्मवृष्टीनाम् | ३ | ५ | २० | हृदि नारायणश्चास्ते | २ | १२ | ३२ |
| हिरण्यधान्यतनय० | ६ | ५ | ३८ | हे दिग्गजाः संकटदन्तमिश्राः | १ | १७ | ४१ |
| हिरण्यगर्भादिषु च | ६ | ७ | ५१ | हे दैत्यपतयो ब्रूत | ३ | १८ | ३ |
| हिरण्यकशिपोः पुत्राः | ५ | १ | ७० | हे प्रलम्ब महाबाहो | ५ | ४ | २ |
| हिरण्यकशिपोः पुत्राः | १ | १५ | १४२ | हेमचन्द्रश्च विशालस्य | ४ | १ | ५० |
| हिरण्यकशिपुत्वे च | ४ | १५ | १ | हेमकूटं तथा वर्षम् | २ | १ | १९ |
| हिरण्यनाभस्य पुत्रः | ४ | ४ | १०८ | हे राम हे कृष्ण सदा | ५ | ८ | ४ |
| हिरण्यनाभशिष्यस्तु | ३ | ६ | ७ | हे विप्रचित्ते हे राहो | १ | १९ | ५२ |
| हिरण्यनाभात्तावत्यः | ३ | ६ | ५ | हे सूदा मम पुत्रोऽसौ | १ | १८ | २ |
| हिरण्यनाभः कौसल्यः | ३ | ६ | ४ | हे हर्यश्वा महावीर्याः | १ | १५ | ९२ |
| हिरण्मयं रथं यस्य | ३ | ५ | २५ | हे हे शालिनि मद्गेहे | २ | १५ | १४ |
| हिरण्यकशिपुः श्रुत्वा | १ | १९ | १ | हैहयपुत्रो धर्मस्तस्यापि | ४ | ११ | ८ |
| हिरण्यगर्भपुरुष० | १ | ११ | ५५ | होमदेवार्चनाद्यासु | ३ | १२ | २० |
| हिरण्यगर्भवचनम् | २ | १३ | ४४ | होमैर्जपैस्तथा दानैः | ३ | १८ | ५६ |
| हिरण्यरोमा वेदश्रीः | ३ | १ | २२ | हंसकुन्देन्दुधवलम् | ५ | १७ | २३ |
| हिरण्यगर्भदेवेन्द्र० | ६ | ८ | २२ | ह्रस्वदीर्घप्लुतैर्यत्तु | ६ | ४ | ४४ |
| हिरण्यगर्भो भगवान् | ६ | ७ | ५६ | ह्रासवृद्धी त्वहर्भागैः | २ | ८ | ६० |
| हिंसा भार्या त्वधर्मस्य | १ | ७ | ३२ | ह्लादिनी सन्धिनी संवित् | १ | १२ | ६८ |
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