विष्णुधर्मोत्तर पुराण (तृतीय खण्ड - चित्रसूत्र, वास्तु, शिल्प व प्रतिमा लक्षण)
Vishnudharmottara Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (सम्पादक: डॉ. प्रियबाला शाह) द्वारा
स्रोत: Sri Vishnu Dharmottara Mahapuranam 1000p Classic Edition (उद्गम)
पृष्ठ 166, कुल 1001 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्र० खं०
अ० १५
॥ ५१ ॥
तदाधारं देवदेवं हुताशनम् ॥ १७ ॥ एह्येहि सर्वदेवेश सर्वदेवसुखाच्युत ॥ सर्वत्रस्थ महाभाग सर्वभूतहिते रत ॥ १८ ॥ आवाहयिष्ये
वरदं सहस्रांशुं दिवाकरम् ॥ तेजोमूर्तिं दुराधर्षं भक्तानामभयप्रदम् ॥ १९ ॥ एहि देव जगन्नाथ ऋक्सामयजुषां पते ॥
त्रैलोक्यमण्डलेदीप सर्वव्याधिविनाशन ॥ २० ॥ आवाहयाम्यहं देवमादित्यसुदकोरशम् ॥ स्निग्धवैदूर्यसङ्काशं वरुणं सुमहाद्युतिम् ॥ २१ ॥
एहि देव जलाध्यक्ष यादोगणमहेश्वर ॥ नागदैत्योरगगणैस्सततं सेविताच्युत ॥ २२ ॥ आवाहयाम्यहं चन्द्रं शीतांशुममृतप्रभम् ॥
ओषधीनां द्विजाऽध्यक्षं नयनानन्दकारकम् ॥ २३ ॥ एहि मे भगवंश्चन्द्र पाहि मे मृगलान्छन ॥ भक्तोकुकम्पिनस्सततं सर्वतक्षत्रपूजित ॥ २४ ॥
स्कन्दमावाहयिष्यामि षण्मुखं वरदं शिशुम् ॥ द्वारिसेनानथेनं पार्वत्यानन्दवर्द्धनम् ॥ २५ ॥ एहि देवतमाराध्य महिषासुरतस्कर ॥
कार्तिक्य जगन्नाथ मयूरवरवाहन ॥ २६ ॥ भौममावाहयिष्यामि तेजोमूर्त्ति दुरासदम् ॥ रुद्रसूतिमानंदम्यवकं रुद्रियसप्रभम् ॥ २७ ॥
एहि मे भगवन्भौम अङ्गारक महाप्रभ ॥ त्वयि सर्व समायुक्तं भूतलेस्मिन्सुभाशुभम् ॥ २८ ॥ विष्णुमावाहयिष्यामि शङ्खचक्रगदाधरम् ॥
अतसीकुसुमश्यामं पीतवाससमच्युतम् ॥ २९ ॥ एहि मे देवदेवेश प्रजानिर्माणकारक ॥ नारायण सुरूपार महाशार्ङ्गधुर्धर ॥ ३० ॥
बुधमावाहयिष्यामि बोधकं जगदीश्वरम् ॥ चान्द्रि ग्रहगणाध्यक्षं तेजोमूर्त्तिं दुरासदम् ॥ ३१ ॥ एहि शीतांशुजाचिन्त्य जगद्विष्णो जनार्दन ॥
महाबल महासत्त्व महावाहो महाद्युते ॥ ३२ ॥ शक्रमावाहयिष्यामि देवं सुरगणेश्वरम् ॥ वज्रपाणिं महाबाहुं गोब्राह्मणहिते रतम् ॥ ३३ ॥
एहि देव सहस्राक्ष दैत्यविबलसूदन ॥ ऐरावतस्थ धर्मज्ञ शचीहृदयनन्दन ॥ ३४ ॥ जीवमावाहयिष्यामि देवर्षिपुरोहितम् ॥
बृहस्पतिं वृद्धक्षं वेदवेदाङ्गपारगम् ॥ ३५ ॥ एहि जीव महाभाग जीवभूत महीतले ॥ सत्यबुद्धिस्त्वयावत्ता मततं भूमिवर्धन ॥ ३६ ॥ देवीं
मावाहयिष्यामि पार्वतीं वरदाशुभाम् ॥ हरस्य दयितां भार्या चार्वाङ्गीं प्रतिवर्धिनीम् ॥ ३७ ॥ एहि देवि जगद्धात्रे मनाहृदयनन्दिनि ॥
पवित्रे वरदे सौम्ये नित्यं भक्तजनप्रिये ॥ ३८ ॥ शुक्रमावाहयिष्यामि भार्गवं जगदीश्वरम् ॥ नित्यं सर्वजनाध्यक्षं तपसा द्योतितप्रभम् ॥ ३९॥
एहि शुक्र महाभाग षोडशार्चिष्वरप्रद ॥ प्रसुस्त्वं वरदाचिन्त्य वर्षावर्ष्यस्य निग्रह ॥ ४० ॥ आवाहयाम्यहं देवं प्रजाध्यक्षमकल्मषम् ॥
भक्तानुकम्पिनं देवं प्रजानिर्माणकारकम् ॥ ४१ ॥ एहि देव प्रजाध्यक्ष प्रजानिर्माणकारक ॥ त्वयि देव समायुक्तं प्रजानमभवोद्भवम् ॥ ४२ ॥
एहि मे भगवन्ब्रह्मन्प्रजापतिमहाद्युते ॥ सौरिमावाहयिष्यामि शनैश्चारिणमच्युतम् ॥ ४३ ॥ तपस्विनमनाधृष्यं भक्तानामभयप्रदम् ॥ एहि
वि० ध०
॥ ५१ ॥