भारतकोश
विष्णुधर्मोत्तर पुराण (तृतीय खण्ड - चित्रसूत्र, वास्तु, शिल्प व प्रतिमा लक्षण)

विष्णुधर्मोत्तर पुराण (तृतीय खण्ड - चित्रसूत्र, वास्तु, शिल्प व प्रतिमा लक्षण)

Vishnudharmottara Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (सम्पादक: डॉ. प्रियबाला शाह) द्वारा

स्रोत: Sri Vishnu Dharmottara Mahapuranam 1000p Classic Edition (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,001 पृष्ठ

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पृष्ठ 678

शरामावाहयिष्यामि मोहनं रिपुमोहनम् ॥ ७१ ॥ एहि विद्याब्धिवेळज्ञ गच्छारिखिसुधनेश्वर ॥ चर्म चावाहयिष्यामि ख्यातामावरणोत्तितैः युतं ॥७२॥ चर्माभ्येहि विशाल त्वं सर्वस्यावरणं स्मृतम् ॥ खङ्गमावाहयिष्यामि नन्दकं नाम नामतः ॥ ७३ ॥ एहि खड्ग ममाशेषदैत्यनाथकुलान्तक ॥ अह्रमावाहयिष्यामि वनमालां सुखावहाम् ॥ ७४ ॥ वनमाले त्वमभ्येहि बुद्धारोपिजगत्पते ॥ मणिमावाहयिष्यामि कौस्तुभं केशवाङ्गजम् ॥७५॥ कौस्तुभ त्वमिहाभ्येहि मरीचिविकटोद्भव ॥ देवमावाहयिष्यामि हरिं हयशिराेरुचम् ॥ ७६ ॥ शशाङ्कशतासङ्काशा वेदोद्धरणनिश्चित ॥ हयग्रीव त्वमभ्येहि शङ्खचक्रगदाधर ॥ ७७ ॥ बेदा हरन्पुनःस्वातेन्समाध्वासितपद्मज ॥ अहमावाहयिष्यामि ऋग्वेदं पद्मसम्मितम् ॥ ७८ ॥ ऋग्वेद त्वमिहाभ्येहि ब्रह्मसूतं वरप्रद ॥ अहमावाहयिष्यामि यजुर्वेदं सर्वकर्मफलप्रदम् ॥ ७९ ॥ यजुर्वेदं त्वमभ्येहि देवेशगणनायक ॥ अहमावाहयिष्यामि देवमथर्वणं शुभम् ॥ ८० ॥ आगच्छथर्ववेदेह सर्वकर्मफलप्रद ॥ देवमावाहयिष्यामि योगिभोगासनस्थितम् ॥ ८१ ॥ भोगिभोगासनासीन समागच्छ जगद्गुरो ॥ देवमावाहयिष्यामि भोगिभोगाशयं प्रभुम् ॥ ८२ ॥ लक्ष्मीनसहागं वरदं लोकसाक्षिणमव्ययम् ॥ एह्येहि पुण्डरीकाक्ष भोगिभोगाशयाच्युत ॥ ८३ ॥ त्रैलोक्यनाथ गोविन्द मधुकैटभसूदन ॥ देवमावाहयिष्यामि विष्णुदेवं त्रिविक्रमम् ॥ ८४ ॥ समस्तभुवनातीत पादाक्रान्तजगत्त्रय ॥ त्रिविक्रम त्वमभ्येहि दैत्यदानवदिक्षित ॥ ८५ ॥ विकचोत्फुल्लनयन विप्रदोषः शतमीक्षित ॥ अहमावाहयिष्यामि विश्वरूपधरं विभुम् ॥ ८६ ॥ श्वसनस्तनमनिर्श चक्रैतुर्य्यामसमर्पतः ॥ सुजीतं च महाराज सर्वभूतत्वनेकशः ॥ ८७ ॥ धारयन्तं शरीरेण सर्वं जगदिदं तथा ॥ विश्वरूप त्वमभ्येहि सर्वार्थाविद्यधर्षित ॥ ८८ ॥ सर्वभूतेन तातेन नानावरणधारपह ॥ देहस्थोशेषभुवन जगतकारणकारण॥८९॥दुर्निरीक्ष्यातिमगम्भीर मायादर्शनविग्रह ॥ देवमावाहयिष्यामि मत्स्यं सलिलगोचरम्॥९०॥मत्स्यदेव त्वमभ्येहि लोकजी वधराच्युत ॥ हंसमावाहयिष्यामि देवं ज्ञानप्रदं विभुम्॥९१॥हंस शीघ्रम त्वमभ्येहि सर्वज्ञानविनाशन॥कूर्ममावाहयिष्यामि धृतमन्दरपर्वतम् ॥९२॥ एह्येहि भगवन्कूर्म श्यामलोत्पलिकराच्युत ॥ देवमावाहयिष्यामि बौद्दरूपं धर्ममीश्वरम् ॥ ९३ ॥ बौद्धरूपात्रिमभ्येहि सुरसोमप्रदायक ॥ नरमा वाहयिष्यामि देवं तपसि निष्ठितम् ॥ ९४ ॥ नराभ्येहि महाभाग धर्ममूर्ते जगत्पते ॥ देवमावाहयिष्यामि तथा नारायणं प्रभुम् ॥ ९५ ॥ नारायण समाभ्येहि सर्वपापहरान्यय ॥ हरिमावाहयिष्यामि देवेशं कनकप्रभम् ॥ ९६ ॥ हरे देव त्वमभ्येहि परदुर्पविनाशक ॥ कृष्णमावा हयिष्यामि सजलाम्वुदसन्निभम् ॥ ९७ ॥ कृष्णाभ्येहि महाभाग देवदेव जगत्पिय ॥ देवमावाहयिष्यामि दत्तात्रेयं तपोन्वितम् ॥ ९८ ॥ दत्तात्रेय