भारतकोश
विष्णुधर्मोत्तर पुराण (तृतीय खण्ड - चित्रसूत्र, वास्तु, शिल्प व प्रतिमा लक्षण)

विष्णुधर्मोत्तर पुराण (तृतीय खण्ड - चित्रसूत्र, वास्तु, शिल्प व प्रतिमा लक्षण)

Vishnudharmottara Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (सम्पादक: डॉ. प्रियबाला शाह) द्वारा

स्रोत: Sri Vishnu Dharmottara Mahapuranam 1000p Classic Edition (उद्गम)

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पृष्ठ 679

वि० ध० तृ० खं० अ० १०६ ॥३६९॥

देवमावाहयिष्यामि कपिलं तनुमाश्रितम् ॥ तेजोनियानमजितं सागरात्मजबाडबम् ॥ ४३ ॥ एहि मे कपिलश्रेष्ठ परमात्मन्सनातन ॥ ध्यानवित्तसद्भाव सांख्यमार्गप्रवर्तक ॥ ४४ ॥ देवमावाहयिष्यामि सुवराहं महाबलम् ॥ निशाञ्चरनगध्वंसं लीलोद्धृतवसुन्धरम् ॥ ४५ ॥ आगच्छ सुवराहस्त्वं हिरण्याक्षाविनाशन ॥ शेषभोगोत्थितावस्था महाचरणपङ्कज ॥ ४६ ॥ शङ्खनादोद्भव त्राहि नियन्ता सुरनायकम् ॥ देवमावाहयिष्यामि वराहं वरदर्पितम् ॥ ४७ ॥ बालेन्दुलेखावदनाश्रयोद्भासितजग्मथ ॥ विस्मयोत्फुल्लनयन भूमिवीक्षितविग्रह ॥ ४८ ॥ बालेन्दुसदृशदंष्ट्राय लीलोद्धृतवसुन्धर ॥ एहि मे भगवन्देव वराहामितविक्रम ॥ ४९ ॥ निस्तारयोधैर्दुस्त्यैर्दीनम्तेजनोद्धर ॥ धर्ममावाहयिष्यामि सर्वभूतसुखावहम् ॥ ५० ॥ दुर्विज्ञेयं बहुद्वारं खलसन्तितरासदम् ॥ एहि धर्म ममाभ्येहि भुवनत्रयपालक ॥ ५१ ॥ समस्तपापशमन सर्वबाधाविनाशन ॥ रुद्रमावाहयिष्यामि तेजोमूर्तिं दुरासदम् ॥ ५२ ॥ ऐश्वर्यमतिगम्भीरं सर्वसंहारकारकम् ॥ एहि मे भगवन्द्रुद्र जटामण्डलमूर्द्धज ॥ ५३ ॥ निर्दग्धारेषभुवनं तृतीयशिखिनेत्रसा ॥ देवमावाहयिष्यामि ब्राह्मं दीप्ततेजसम् ॥ ५४ ॥ चतुर्मुखं चतुर्बाहुं गुणार्थिनं गुणोत्तरम् ॥ देवदेव त्वमभ्येहि पितामह सुरेश्वर ॥ ५५ ॥ समस्तभुवनाध्यक्ष जगत्कारणकारण ॥ भूमिमावाहयिष्यामि धारिणीं सर्वदेहिनाम् ॥ ५६ ॥ सर्वभूतप्रतिष्ठां च क्षितिं क्षोणीं सरस्वतीम् ॥ एहि मे वरदे देवि वसुधे भूतभाविनि ॥ ५७॥ सर्वश्रये महाभागे देवहव्यधारिणि ॥ ५८ ॥ शङ्कमावाहयिष्यामि नभोमूर्तिमथाव्ययम् ॥ ५९ ॥ शब्दाद्योनिं निरालम्बं समस्तभुवनाश्रयम् ॥ एहीहि शङ्खप्रवर पाञ्चजन्य महास्वन ॥ ६० ॥ शब्दमात्रादृताशेषमहादानवमण्डल ॥ पद्ममावाहयिष्यामि समस्तभुवनाश्रयम् ॥ ६१ ॥ अपां मूर्तिमयं सौम्यं पुण्डरीकमिति स्मृतम् ॥ एहि पद्म महाभाग भूतभव्यभवप्रभो ॥ ६२ ॥ लक्ष्मीनिलय विस्तीर्णं ब्रह्मयोने जगन्मय ॥ चक्रमावाहयिष्यामि क्षरत्पावकमण्डलम् ॥ ६३ ॥ वज्रनाभं विशालाक्षं वायुमूर्तिसमन्वयम् ॥ कालचक्रे जगच्चक्रे धर्मचक्रे सुदर्शनम् ॥ ६४ ॥ नित्यं सततं देवं त्वां दानवशोणितैः ॥ एहि चक्रामितारिघ्न जगत्पालनतत्पर ॥ ६५ ॥ देवेन्द्रदृष्टहृद्यासमतोमनाशनतत्पर ॥ गदामावाहयिष्यामि तेजोमूर्ति दुरासदाम् ॥ ६६ ॥ गायत्रीं देवजननीं कालरात्रीं मधुद्रुतीम् ॥ एहि कौमोदकि गदे समस्तासुरनाशिनी ॥ ६७ ॥ यासां त्वं गददा प्रोक्ता वैष्णवी तु सुदुधरा ॥ अहमावाहयिष्यामि सावन्तं नाम लाङ्गलम् ॥ ६८ ॥ आगच्छ लाङ्गलास्येह व्याहृतौ भुवनत्रयम् ॥ अहमावाहयिष्यामि सौनन्दं मुसलं प्रभुम् ॥ ६९ ॥ आगच्छ मुसलोद्बर्हे दैत्यरिगणसूदन ॥ चापमावाहयिष्यामि शार्ङ्गं रिपुनिषूदनम् ॥ ७० ॥ आगच्छ चाप वरद देवसुरगणप्रिय ॥

॥३६९॥