विवेकचूड़ामणि (हिन्दी अनुवाद सहित)
Viveka Chudamani with Hindi Translation - Gita Press
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 108, कुल 153 में से
संदर्भ में पढ़ेंआत्म-चिन्तनका विधान १११ आत्म-चिन्तनका विधान चित्तमूलो विकल्पोऽयं चित्ताभावे न कश्चन। अतश्चित्तं समाधेहि प्रत्यग्रूपे परात्मनि॥ ४०८॥ यह विकल्प चित्त-मूलक है, चित्तका अभाव होनेपर इसका कहीं नाम- निशान भी नहीं रहता। इसलिये चित्तको प्रत्यक् चैतन्य-स्वरूप आत्मामें स्थिर करो। किमपि सततबोधं केवलानन्दरूपं निरुपममतिवेलं नित्यमुक्तं निरीहम्। निरवधि गगनाभं निष्कलं निर्विकल्पं हृदि कलयति विद्वान्ब्रह्म पूर्णं समाधौ ॥ ४०९ ॥ किसी नित्यबोध-स्वरूप, केवलानन्दरूप, उपमारहित, कालातीत, नित्य- मुक्त, निश्चेष्ट, आकाशके समान निःसीम, कलारहित, निर्विकल्प पूर्ण ब्रह्मका विद्वान् समाधि-अवस्थामें अपने अन्तःकरणमें साक्षात् अनुभव करते हैं। प्रकृतिविकृतशून्यं भावनातीतभावं समरसमसमानं मानसम्बन्धदूरम्। निगमवचनसिद्धं नित्यमस्मत्प्रसिद्धं हृदि कलयति विद्वान्ब्रह्म पूर्णं समाधौ ॥ ४१० ॥ कारण और कार्यसे रहित, मानवी भावनासे अतीत, समरस, उपमारहित, प्रमाणोंकी पहुँचसे परे, वेद-वाक्योंसे सिद्ध, नित्य, अस्मत् (मैं) रूपसे स्थित पूर्ण ब्रह्मका विद्वान् समाधि-अवस्थामें अपने अन्तःकरणमें अनुभव करते हैं। अजरममरमस्ताभासवस्तुस्वरूपं स्तिमितसलिलराशिप्रख्यमाख्याविहीनम्। शमितगुणविकारं शाश्वतं शान्तमेकं हृदि कलयति विद्वान्ब्रह्म पूर्णं समाधौ ॥ ४११ ॥ अजर, अमर, आभासशून्य, वस्तुस्वरूप, निश्चल जल-राशिके समान, नाम-रूपसे रहित, गुणोंके विकारसे शून्य, नित्य, शान्तस्वरूप और अद्वितीय पूर्ण ब्रह्मका विद्वान् समाधि-अवस्थामें हृदयमें साक्षात् अनुभव करते हैं।