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विवेकचूड़ामणि (हिन्दी अनुवाद सहित)

Viveka Chudamani with Hindi Translation - Gita Press

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished153 पृष्ठ

आत्म-चिन्तनका विधान १११ आत्म-चिन्तनका विधान चित्तमूलो विकल्पोऽयं चित्ताभावे न कश्चन। अतश्चित्तं समाधेहि प्रत्यग्रूपे परात्मनि॥ ४०८॥ यह विकल्प चित्त-मूलक है, चित्तका अभाव होनेपर इसका कहीं नाम- निशान भी नहीं रहता। इसलिये चित्तको प्रत्यक् चैतन्य-स्वरूप आत्मामें स्थिर करो। किमपि सततबोधं केवलानन्दरूपं निरुपममतिवेलं नित्यमुक्तं निरीहम्। निरवधि गगनाभं निष्कलं निर्विकल्पं हृदि कलयति विद्वान्ब्रह्म पूर्णं समाधौ ॥ ४०९ ॥ किसी नित्यबोध-स्वरूप, केवलानन्दरूप, उपमारहित, कालातीत, नित्य- मुक्त, निश्चेष्ट, आकाशके समान निःसीम, कलारहित, निर्विकल्प पूर्ण ब्रह्मका विद्वान् समाधि-अवस्थामें अपने अन्तःकरणमें साक्षात् अनुभव करते हैं। प्रकृतिविकृतशून्यं भावनातीतभावं समरसमसमानं मानसम्बन्धदूरम्। निगमवचनसिद्धं नित्यमस्मत्प्रसिद्धं हृदि कलयति विद्वान्ब्रह्म पूर्णं समाधौ ॥ ४१० ॥ कारण और कार्यसे रहित, मानवी भावनासे अतीत, समरस, उपमारहित, प्रमाणोंकी पहुँचसे परे, वेद-वाक्योंसे सिद्ध, नित्य, अस्मत् (मैं) रूपसे स्थित पूर्ण ब्रह्मका विद्वान् समाधि-अवस्थामें अपने अन्तःकरणमें अनुभव करते हैं। अजरममरमस्ताभासवस्तुस्वरूपं स्तिमितसलिलराशिप्रख्यमाख्याविहीनम्। शमितगुणविकारं शाश्वतं शान्तमेकं हृदि कलयति विद्वान्ब्रह्म पूर्णं समाधौ ॥ ४११ ॥ अजर, अमर, आभासशून्य, वस्तुस्वरूप, निश्चल जल-राशिके समान, नाम-रूपसे रहित, गुणोंके विकारसे शून्य, नित्य, शान्तस्वरूप और अद्वितीय पूर्ण ब्रह्मका विद्वान् समाधि-अवस्थामें हृदयमें साक्षात् अनुभव करते हैं।

११२ विवेक-चूडामणि समाहितान्तःकरणः स्वरूपे विलोकयात्मानमखण्डवैभवम् । विच्छिन्धि बन्धं भवगन्धगन्धितं यत्नेन पुंस्त्वं सफलीकुरुष्व ॥ ४१२ ॥ अपने स्वरूपमें चित्तको स्थिर करके अखण्ड ऐश्वर्य-सम्पन्न आत्माका साक्षात्कार करो, संसार-गन्धसे युक्त बन्धनको काट डालो और यत्नपूर्वक अपने मनुष्य-जन्मको सफल करो। सर्वोपाधिविनिर्मुक्तं सच्चिदानन्दमद्वयम्। भावयात्मानमात्मस्थं न भूयः कल्पसेऽध्वने ॥ ४१३ ॥ समस्त उपाधियोंसे रहित अद्वितीय सच्चिदानन्दस्वरूप अपने अन्तःकरणमें स्थित आत्माका चिन्तन करते रहो; इससे तुम फिर संसार-चक्रमें नहीं पड़ोगे। दृश्यकी उपेक्षा छायेव पुंसः परिदृश्यमान- माभासरूपेण फलानुभूत्या । शरीरमाराच्छववन्निरस्तं पुनर्न सन्धत्त इदं महात्मा ॥ ४१४ ॥ मनुष्यकी छायाके समान केवल आभासरूपसे दिखलायी देनेवाले, इस शरीरका, इसके फलका विचार करके, शवके समान एक बार बाध कर देनेपर महात्मगण इसे फिर स्वीकार नहीं करते। सततविमलबोधानन्दरूपं समेत्य त्यज जडमलरूपोपाधिमेतं सुदूरे। अथ पुनरपि नैष स्मर्यतां वान्तवस्तु स्मरणविषयभूतं कल्पते कुत्सनाय ॥ ४१५ ॥ अपने नित्य और निर्मल चिदानन्दमय स्वरूपको प्राप्त करके इस मलरूप जड उपाधिको दूरहीसे सर्वथा त्याग दो और फिर कभी इसकी

आत्मज्ञानका फल ११३ याद भी मत करो, क्योंकि उगली हुई वस्तु तो याद करनेपर उलटी जी बिगाड़नेवाली ही होती है। समूलमेतत्परिदह्य वह्नौ सदात्मनि ब्रह्मणि निर्विकल्पे। ततः स्वयं नित्यविशुद्धबोधा- नन्दात्मना तिष्ठति विद्वरिष्ठः ॥ ४१६ ॥ विचारवानोंमें श्रेष्ठ महात्माजन इस स्थूल-सूक्ष्म जगत्‌को इसके मूल- कारण मायाके सहित निर्विकल्प सत्स्वरूप ब्रह्माग्निमें भस्म करके फिर स्वयं नित्य विशुद्ध बोधानन्दस्वरूपसे स्थित रहते हैं। प्रारब्धसूत्रग्रथितं शरीरं प्रायातु वा तिष्ठतु गोरिव स्रक्। न तत्पुनः पश्यति तत्त्ववेत्ता- नन्दात्मनि ब्रह्मणि लीनवृत्तिः ॥ ४१७ ॥ गौ अपने गलेमें पड़ी हुई मालाके रहने अथवा गिरनेकी ओर जैसे कुछ भी ध्यान नहीं देती, इसी प्रकार प्रारब्धकी डोरीमें पिरोया हुआ यह शरीर रहे अथवा जाय, जिसकी चित्तवृत्ति आनन्दस्वरूप ब्रह्ममें लीन हो गयी है, वह तत्त्ववेत्ता फिर इसकी ओर नहीं देखता। अखण्डानन्दमात्मानं विज्ञाय स्वस्वरूपतः। किमिच्छन् कस्य वा हेतोर्देहं पुष्णाति तत्त्ववित् ॥ ४१८ ॥ अखण्ड आनन्दस्वरूप आत्माको ही अपना स्वरूप जान लेनेपर किस इच्छा अथवा किस कारणसे तत्त्ववेत्ता इस शरीरका पोषण करे ? आत्मज्ञानका फल संसिद्धस्य फलं त्वेतज्जीवन्मुक्तस्य योगिनः। बहिरन्तः सदानन्दरसास्वादनमात्मनि ॥ ४१९ ॥

११४ विवेक-चूडामणि आत्मज्ञानमें सम्यक् सिद्धि प्राप्त किये हुए जीवन्मुक्त योगीको यही फल मिलता है कि अपने आत्माके नित्यानन्दरसका बाहर-भीतर निरन्तर आस्वादन किया करे। वैराग्यस्य फलं बोधो बोधस्योपरतिः फलम्। स्वानन्दानुभवाच्छान्तिरेषैवोपरतेः फलम्॥ ४२०॥ वैराग्यका फल बोध है और बोधका फल उपरति (विषयोंसे उदासीनता) है तथा उपरतिक़ा फल यही है कि आत्मानन्दके अनुभवसे चित्त शान्त हो जाय। यद्युत्तरोत्तराभावः पूर्वपूर्वं तु निष्फलम्। निवृत्तिः परमा तृप्तिरानन्दोऽनुपमः स्वतः॥ ४२१॥ यदि पिछली-पिछली वस्तुओंकी प्राप्ति न हो तो पहली बातें निष्फल हैं [ अर्थात् आत्मशान्तिके बिना उपरति, उपरतिके बिना बोध और बोधके बिना वैराग्य निष्फल हैं ]। विषयोंसे निवृत्त हो जाना ही परम तृप्ति है और वही साक्षात् अनुपम आनन्द है। दृष्टदुःखेष्वनुद्वेगो विद्यायाः प्रस्तुतं फलम्। यत्कृतं भ्रान्तिवेलायां नाना कर्म जुगुप्सितम्। पश्चान्नरो विवेकेन तत्कथं कर्तुमर्हति॥ ४२२॥ प्रारब्धवश प्राप्त हुए दुःखोंसे विचलित न होना ही आत्मज्ञानका सबसे पहला फल है। भ्रान्तिके समय पुरुषने जो नाना प्रकारके निन्दनीय कर्म किये हैं उन्हींको ज्ञान हो जानेके उपरान्त वह विवेकपूर्वक कैसे कर सकता है ? विद्याफलं स्यादसतो निवृत्तिः प्रवृत्तिरज्ञानफलं तदीक्षितम्। तज्ज्ञाज्ञयोर्यन्मृगतृष्णिकादौ नो चेद्विदो दृष्टफलं किमस्मात्॥ ४२३॥ विद्याका फल असत्से निवृत्त होना और अविद्याका उसमें प्रवृत्त होना है। ये दोनों फल ज्ञानी और अज्ञानी पुरुषोंकी मृगतृष्णा आदिकी प्रतीतिमें उसे

जीवन्मुक्तके लक्षण ११५ जानने या न जाननेवालोंमें देखे गये हैं। नहीं तो [ यदि मूढ पुरुषके समान विद्वान्‌को भी असत् पदार्थोंमें प्रवृत्ति बनी रही तो ] विद्याका प्रत्यक्ष फल ही क्या हुआ ? अज्ञानहृदयग्रन्थेर्विनाशो यद्यशेषतः । अनिच्छोर्विषयः किन्नु प्रवृत्तेः कारणं स्वतः ॥ ४२४॥ यदि अज्ञानरूप हृदयकी ग्रन्थिका सर्वथा नाश हो जाय तो उस इच्छारहित पुरुषके लिये सांसारिक विषय क्या स्वतः ही प्रवृत्तिके कारण हो जायँगे ? वासनानुदयो भोग्ये वैराग्यस्य परोऽवधिः । अहंभावोदयाभावो बोधस्य परमोऽवधिः । लीनवृत्तेरनुत्पत्तिर्मर्यादोपरतेस्तु सा ॥ ४२५ ॥ भोग्य वस्तुओंमें वासनाका उदय न होना वैराग्यकी चरम अवधि है, चित्तमें अहंकारका सर्वथा उदय न होना ही बोधकी चरम सीमा है और लीन हुई वृत्तियोंका पुनः उत्पन्न न होना—यह उपरामताकी सीमा है। जीवन्मुक्तके लक्षण ब्रह्माकारतया सदा स्थिततया निर्मुक्तबाह्यार्थधी- रन्यावेदितभोग्यभोगकलनो निद्रालुवद्बालवत् । स्वप्नालोकितलोकवज्जगदिदं पश्यन्क्वचिल्लब्धधी- रास्ते कश्चिदनन्तपुण्यफलभुग्धन्यः स मान्यो भुवि ॥ ४२६ ॥ निरन्तर ब्रह्माकार-वृत्तिसे स्थित रहनेके कारण जिसकी बुद्धि बाह्य विषयोंमेंसे निकल गयी है और जो निद्रालु अथवा बालकके समान, दूसरोंके निवेदन किये हुए ही भोग्य पदार्थोंका सेवन करता है तथा कभी विषयोंमें बुद्धि जानेपर जो इस संसारको स्वप्न-प्रपंचके समान देखता है, वह अनन्त पुण्योंके फलका भोगनेवाला कोई ज्ञानी महापुरुष इस पृथिवीतलमें धन्य है और सबका माननीय है। स्थितप्रज्ञो यतिरयं यः सदानन्दमश्नुते । ब्रह्मण्येव विलीनात्मा निर्विकारो विनिष्क्रियः ॥ ४२७॥ जो यति परब्रह्ममें चित्तको लीनकर विकार और क्रियाका त्याग करके सदा आनन्दस्वरूप ब्रह्ममें मग्न रहता है, वह स्थितप्रज्ञ कहलाता है।

१९६ विवेक-चूडामणि ब्रह्मात्मनोः शोधितयोरेकभावावगाहिनी। निर्विकल्पा च चिन्मात्रा वृत्तिः प्रज्ञेति कथ्यते। सुस्थिता सा भवेद्यस्य जीवन्मुक्तः स उच्यते॥ ४२८॥ [ 'तत्त्वमसि' आदि महावाक्योंसे ] शोधित ब्रह्म और आत्माकी एकताको ग्रहण करनेवाली विकल्परहित चिन्मात्र-वृत्तिको प्रज्ञा कहते हैं। यह चिन्मात्र- वृत्ति जिसकी स्थिर हो जाती है, वही जीवन्मुक्त कहा जाता है। यस्य स्थिता भवेत्प्रज्ञा यस्यानन्दो निरन्तरः। प्रपञ्चो विस्मृतप्रायः स जीवन्मुक्त इष्यते॥ ४२९॥ जिसकी प्रज्ञा स्थिर है, जो निरन्तर आत्मानन्दका अनुभव करता है और प्रपंचको भूला-सा रहता है, वह पुरुष जीवन्मुक्त कहलाता है। लीनधीरपि जागर्ति यो जाग्रद्धर्मवर्जितः। बोधो निर्वासनो यस्य स जीवन्मुक्त इष्यते॥ ४३०॥ वृत्तिके लीन रहते हुए भी जो जागता रहता है किन्तु वास्तवमें जो जागृतिके धर्मोंसे रहित है* तथा जिसका बोध सर्वथा वासनारहित है, वह पुरुष जीवन्मुक्त कहलाता है। शान्तसंसारकलनः कलावानपि निष्कलः। यः सचित्तोऽपि निश्चिन्तः स जीवन्मुक्त इष्यते॥ ४३१॥ जिसकी संसार-वासना शान्त हो गयी है, जो कलावान् होकर भी कलाहीन है अर्थात् व्यवहारदृष्टिमें ऊपरसे विकारवान् प्रतीत होता हुआ भी जो निरन्तर अपने निर्विकार-स्वरूपमें ही स्थित रहता है तथा जो चित्तयुक्त होनेपर निश्चिन्त है, वह पुरुष जीवन्मुक्त माना जाता है। वर्तमानेऽपि देहेऽस्मिञ्छायावदनुवर्तिनि। अहंताममताभावो जीवन्मुक्तस्य लक्षणम्॥ ४३२॥

  • 'वृत्तिके लीन रहते हुए भी जो जागता रहता है' इसका अभिप्राय यह है कि यद्यपि उसका चित्त सम्पूर्ण दृश्य पदार्थोंका बाध करके निरन्तर ब्रह्ममें लीन रहता है तथापि वह सोये हुए पुरुषके समान संज्ञाशून्य नहीं हो जाता, सब व्यवहार यथावत् करता रहता है। किन्तु व्यवहार करते हुए भी उसे स्वप्नवत् समझनेके कारण उसकी अन्य पुरुषोंके समान दृश्य पदार्थोंमें आस्था नहीं होती। इसलिये 'वास्तवमें वह जागृतिके धर्मोंसे रहित है।'

जीवन्मुक्तके लक्षण ११७ प्रारब्धकी समाप्तिपर्यन्त छायाके समान सदैव साथ रहनेवाले इस शरीरके वर्तमान रहते हुए भी इसमें अहं-ममभाव (मैं-मेरापन)- का अभाव हो जाना जीवन्मुक्तका लक्षण है। अतीताननुसन्धानं भविष्यदविचारणम्। औदासीन्यमपि प्राप्ते जीवन्मुक्तस्य लक्षणम्॥ ४३३॥ बीती हुई बातको याद न करना, भविष्यकी चिन्ता न करना और वर्तमानमें प्राप्त हुए सुख-दुःखादिमें उदासीनता—यह जीवन्मुक्तका लक्षण है। गुणदोषविशिष्टेऽस्मिन्स्वभावेन विलक्षणे। सर्वत्र समदर्शित्वं जीवन्मुक्तस्य लक्षणम्॥ ४३४॥ अपने आत्मस्वरूपसे सर्वथा पृथक् इस गुणदोषमय संसारमें सर्वत्र समदर्शी होना जीवन्मुक्तका लक्षण है। इष्टानिष्टार्थसम्प्राप्तौ समदर्शितयात्मनि। उभयत्राविकारित्वं जीवन्मुक्तस्य लक्षणम्॥ ४३५॥ इष्ट अथवा अनिष्ट वस्तुकी प्राप्तिमें समानभाव रखनेके कारण दोनों ही अवस्थाओंमें चित्तमें कोई भी विकार न होना जीवन्मुक्त पुरुषका लक्षण है। ब्रह्मानन्दरसास्वादासक्तचित्ततया यतेः। अन्तर्बहिरविज्ञानं जीवन्मुक्तस्य लक्षणम्॥ ४३६॥ ब्रह्मानन्दरसास्वादमें चित्तकी आसक्ति रहनेके कारण बाह्य और आन्तरिक वस्तुओंका कोई ज्ञान न होना जीवन्मुक्त यतिका लक्षण है। देहेन्द्रियादौ कर्तव्ये ममाहंभाववर्जितः। औदासीन्येन यस्तिष्ठेत्स जीवन्मुक्तलक्षणः॥ ४३७॥ देह तथा इन्द्रिय आदिमें और कर्तव्यमें जो ममता और अहंकारसे रहित होकर उदासीनतापूर्वक रहता है, वह पुरुष जीवन्मुक्तके लक्षणसे युक्त है। विज्ञात आत्मनो यस्य ब्रह्मभावः श्रुतेर्बलात्। भवबन्धविनिर्मुक्तः स जीवन्मुक्तलक्षणः॥ ४३८॥ जिसने श्रुति-प्रमाणसे अपने आत्माका ब्रह्मत्व जान लिया है और जो संसार-बन्धनसे रहित है, वह पुरुष जीवन्मुक्तके लक्षणोंसे सम्पन्न है।

११८ विवेक-चूडामणि देहेन्द्रियेष्वहंभाव इदंभावस्तदन्यके। यस्य नो भवतः क्वापि स जीवन्मुक्त इष्यते ॥४३९॥ जिसका देह और इन्द्रिय आदिमें अहंभाव तथा अन्य वस्तुओंमें इदं (यह) भाव कभी नहीं होता, वह पुरुष जीवन्मुक्त माना जाता है। न प्रत्यग्ब्रह्मणोर्भेदं कदापि ब्रह्मसर्गयोः। प्रज्ञया यो विजानाति स जीवन्मुक्त इष्यते ॥४४०॥ जो अपनी तत्त्वावगाहिनी बुद्धिसे आत्मा और ब्रह्म तथा ब्रह्म और संसारमें कोई भेद नहीं देखता, वह पुरुष जीवन्मुक्त माना जाता है। साधुभिः पूज्यमानेऽस्मिन्पीड्यमानेऽपि दुर्जनैः। समभावो भवेद्यस्य स जीवन्मुक्त इष्यते ॥४४१॥ साधु पुरुषोंद्वारा इस शरीरके सत्कार किये जानेपर और दुष्टजनोंसे पीड़ित होनेपर भी जिसके चित्तका समानभाव रहता है, वह मनुष्य जीवन्मुक्त माना जाता है। यत्र प्रविष्टा विषयाः परेरिता नदीप्रवाहा इव वारिराशौ। लिनन्ति सन्मात्रतया न विक्रिया- मुत्पादयन्त्येष यतिर्विमुक्तः ॥४४२॥ समुद्रमें मिल जानेपर जैसे नदीका प्रवाह समुद्ररूप हो जाता है वैसे ही दूसरोंके द्वारा प्रस्तुत किये विषय आत्मस्वरूप प्रतीत होनेसे जिसके चित्तमें किसी प्रकारका क्षोभ उत्पन्न नहीं करते वह यतिश्रेष्ठ जीवन्मुक्त है। विज्ञातब्रह्मतत्त्वस्य यथापूर्वं न संसृतिः। अस्ति चेन्न स विज्ञातब्रह्मभावो बहिर्मुखः ॥४४३॥ ब्रह्मतत्त्वके जान लेनेपर विद्वान्‌को पूर्ववत् संसारकी आस्था नहीं रहती और यदि फिर भी संसारकी आस्था बनी रही तो समझना चाहिये कि वह तो संसारी ही है उसे ब्रह्मतत्त्वका ज्ञान ही नहीं हुआ। प्राचीनवासनावेगादसौ संसरतीति चेत्। न सदेकत्वविज्ञानान्मन्दीभवति वासना ॥४४४॥ यदि कहो कि पूर्ववासनाकी प्रबलतासे फिर भी इसकी संसारमें

प्रारब्ध-विचार १११ प्रवृत्ति रह सकती है, तो ऐसी बात नहीं है क्योंकि ब्रह्मके एकत्वज्ञानसे [ विषयका बाध हो जानेके कारण ] इसकी वासना मन्द हो जाती है। अत्यन्तकामुकस्यापि वृत्तिः कुण्ठति मातरि। तथैव ब्रह्मणि ज्ञाते पूर्णानन्दे मनीषिणः ॥ ४४५ ॥ जिस प्रकार अत्यन्त कामी पुरुषकी भी कामवृत्ति माताको देखकर कुण्ठित हो जाती है, उसी प्रकार पूर्णानन्दस्वरूप ब्रह्मको जान लेनेपर विद्वान्‌की संसारमें प्रवृत्ति नहीं होती। प्रारब्ध-विचार निदिध्यासनशीलस्य बाह्यप्रत्यय ईक्ष्यते। ब्रवीति श्रुतिरेतस्य प्रारब्धं फलदर्शनात् ॥ ४४६ ॥ निदिध्यासनशील (आत्मचिन्तनमें लगे हुए) पुरुषको बाह्य पदार्थोंकी प्रतीति होती देखी जाती है, फल-भोग देखा जानेके कारण श्रुति उसे उसका प्रारब्ध बतलाती है। सुखाद्यनुभवो यावत्तावत्प्रारब्धमिष्यते । फलोदयः क्रियापूर्वो निष्क्रियो न हि कुत्रचित् ॥ ४४७॥ [ युक्तिसे भी ] जबतक सुख-दुःख आदिका अनुभव है तबतक प्रारब्ध माना जाता है, क्योंकि फलका भोग क्रियापूर्वक होता है, बिना कर्मके कहीं नहीं होता। अहं ब्रह्मेति विज्ञानात्कल्पकोटिशतार्जितम् । सञ्चितं विलयं याति प्रबोधात्स्वप्नकर्मवत् ॥ ४४८ ॥ जग जानेपर जैसे स्वप्नावस्थाके कर्म लीन हो जाते हैं वैसे ही 'मैं ब्रह्म हूँ' ऐसा ज्ञान होते ही करोड़ों कल्पोंके संचित कर्म नष्ट हो जाते हैं। यत्कृतं स्वप्नवेलायां पुण्यं वा पापमुल्बणम् । सुप्तोत्थितस्य किं तत्स्यात्स्वर्गाय नरकाय वा ॥ ४४९ ॥ स्वप्नावस्थामें जो बड़े-से-बड़ा पुण्य अथवा पाप किया जाता है, क्या जग पड़नेपर वह स्वर्ग अथवा नरककी प्राप्तिका कारण हो सकता है?

१२० विवेक-चूडामणि स्वमसङ्गमुदासीनं परिज्ञाय नभो यथा। न श्लिष्यते यतिः किञ्चित्कदाचिद्भाविकर्मभिः ॥ ४५० ॥ जो यति अपनेको आकाशके समान असंग और उदासीन जान लेता है, वह किसी भी आगामी कर्मसे कभी थोड़ा-सा भी लिप्त नहीं हो सकता। न नभो घटयोगेन सुरागन्धेन लिप्यते। तथात्मोपाधियोगेन तद्धर्मैर्नैव लिप्यते ॥ ४५१ ॥ जैसे घड़ेके सम्बन्धसे घड़ेमें रखी हुई मदिराकी गन्धसे आकाशका कोई सम्बन्ध नहीं होता उसी प्रकार उपाधिके सम्बन्धसे आत्मा उपाधिके धर्मोंसे लिप्त नहीं होता। ज्ञानोदयात्पुरारब्धं कर्म ज्ञानान्न नश्यति। अदत्त्वा स्वफलं लक्ष्यमुद्दिश्योत्सृष्टबाणवत् ॥ ४५२ ॥ व्याघ्रबुद्ध्या विनिर्मुक्तो बाणः पश्चात्तु गोमतौ। न तिष्ठति छिनत्त्येव लक्ष्यं वेगेन निर्भरम् ॥ ४५३ ॥ लक्ष्यकी ओर छोड़ दिये गये बाणके समान ज्ञानके उदयसे पूर्व ही आरम्भ हुआ कर्म अपना फल दिये बिना ज्ञानसे नष्ट नहीं होता, जैसे व्याघ्र समझकर गौकी ओर छोड़ा हुआ बाण पीछे उसको गौ जान लेनेपर भी बीचमें नहीं रोका जा सकता, वह तो तुरन्त अपने लक्ष्यको वेध ही देता है। प्रारब्धं बलवत्तरं खलु विदां भोगेन तस्य क्षयः सम्यग्ज्ञानहुताशनेन विलयः प्राक्सञ्चितागामिनाम्। ब्रह्मात्मैक्यमवेक्ष्य तन्मयतया ये सर्वदा संस्थिता- स्तेषां तत्रितयं न हि क्वचिदपि ब्रह्मैव ते निर्गुणम् ॥ ४५४ ॥ विद्वान्‌का प्रारब्ध-कर्म अवश्य ही बलवान् होता है। उसका क्षय भोगनेसे ही हो सकता है। उसके अतिरिक्त पूर्वसंचित और आगामी कर्मोंका तो तत्त्वज्ञानरूप अग्निसे क्षय हो जाता है। किन्तु जो ब्रह्म और आत्माकी एकताको जानकर सदा उसी भावमें स्थित रहते हैं उनकी दृष्टिमें तो वे (प्रारब्ध, संचित और आगामी) तीनों प्रकारके ही कर्म कहीं नहीं हैं, वे तो मानो साक्षात् निर्गुण ब्रह्म ही हैं।

प्रारब्ध-विचार १२१ उपाधितादात्म्यविहीनकेवल- ब्रह्मात्मनैवात्मनि तिष्ठतो मुनेः। प्रारब्धसद्भावकथा न युक्ता स्वप्नार्थसम्बन्धकथैव जाग्रतः ॥ ४५५ ॥ जो मुनिश्रेष्ठ उपाधिके सम्बन्धको छोड़कर केवल ब्रह्मात्मभावसे ही अपने स्वरूपमें स्थित रहता है, उसके प्रारब्ध-कर्मोंकी स्थितिकी बात स्वप्नमें देखे हुए पदार्थोंसे जगे हुए पुरुषका सम्बन्ध बतानेके समान अनुचित है। न हि प्रबुद्धः प्रतिभासदेहे देहोपयोगिन्यपि च प्रपञ्चे। करोत्यहन्तां ममतामिदन्तां किन्तु स्वयं तिष्ठति जागरेण ॥ ४५६ ॥ जगा हुआ पुरुष स्वप्नके प्रातिभासिक देह तथा उस देहके उपयोगी स्वप्न-प्रपंचमें कभी अहंता, ममता और इदंता (मैंपन, मेरापन और यहपन) नहीं करता। वह तो केवल जाग्रत्-भावसे ही रहता है। न तस्य मिथ्यार्थसमर्थनेच्छा न सङ्ग्रहस्तज्जगतोऽपि दृष्टः। तत्रानुवृत्तिर्यदि चेन्मृषार्थे न निद्रया मुक्त इतीष्यते ध्रुवम् ॥ ४५७ ॥ उसको न तो मिथ्या वस्तुओंको सिद्ध करनेकी इच्छा होती है और न उसके पास सांसारिक पदार्थोंका संग्रह ही देखा जाता है। यदि फिर भी उसकी मिथ्या पदार्थोंमें प्रवृत्ति रहे तो यह निश्चय है कि वास्तवमें उसकी नींद टूटी ही नहीं है। तद्वत्परे ब्रह्मणि वर्तमानः सदात्मना तिष्ठति नान्यदीक्षते। स्मृतिर्यथा स्वप्नविलोकितार्थे तथा विदः प्राशनमोचनादौ ॥ ४५८ ॥

१२२ विवेक-चूडामणि इसी प्रकार सदा ब्रह्मभावमें रहनेवाला पुरुष ब्रह्मरूपसे ही स्थित रहता है, वह [ ब्रह्मके सिवा ] और कुछ नहीं देखता। जैसे स्वप्नमें देखे हुए पदार्थोंकी याद आया करती है वैसे ही विद्वान्‌की भोजन करना और छोड़ना आदि क्रियाएँ स्वभाववश अपने-आप हुआ करती हैं। कर्मणा निर्मितो देहः प्रारब्धं तस्य कल्प्यताम्। नानादेरात्मनो युक्तं नैवात्मा कर्मनिर्मितः॥ ४५९॥ देह कर्मोंहीसे बना हुआ है, अतः प्रारब्ध भी उसीका समझना चाहिये, अनादि आत्माका प्रारब्ध मानना ठीक नहीं, क्योंकि आत्मा कर्मोंसे बना हुआ नहीं है। अजो नित्य इति ब्रूते श्रुतिरेषा त्वमोघवाक्। तदात्मना तिष्ठतोऽस्य कुतः प्रारब्धकल्पना ॥ ४६०॥ 'आत्मा अजन्मा, नित्य और अनादि है' ऐसा यथार्थ कथन करनेवाली श्रुति कहती है; फिर उस आत्मस्वरूपसे ही सदा स्थित रहनेवाले विद्वान्‌के प्रारब्ध कर्म शेष रहनेकी कल्पना कैसे हो सकती है? प्रारब्धं सिध्यति तदा यदा देहात्मना स्थितिः। देहात्मभावो नैवेष्टः प्रारब्धं त्यज्यतामतः ॥ ४६१॥ प्रारब्ध तो तभीतक सिद्ध होता है जबतक देहमें आत्मभावना रहती है और देहात्मभाव मुमुक्षुके लिये इष्ट नहीं है; इसलिये प्रारब्धकी आस्थाको भी छोड़ देना चाहिये। शरीरस्यापि प्रारब्धकल्पना भ्रान्तिरेव हि। अध्यस्तस्य कुतः सत्त्वमसत्त्वस्य कुतो जनिः। अजातस्य कुतो नाशः प्रारब्धमसतः कुतः॥ ४६२ ॥ और वास्तवमें तो शरीरका भी प्रारब्ध मानना भ्रम ही है, क्योंकि वह तो स्वयं अध्यस्त (भ्रमसे कल्पित) है और अध्यस्त वस्तुकी सत्ता ही कहाँ होती है? तथा जिसकी सत्ता ही न हो, उसका जन्म भी कहाँसे आया? और जिसका जन्म ही न हो, उसका नाश भी कैसे हो सकता है। इस प्रकार जो सर्वथा सत्ताशून्य है, उस [ शरीर ]-का भी प्रारब्ध कैसे हो सकता है?

-नानात्व-निषेध १२३ ज्ञानेनाज्ञानकार्यस्य समूलस्य लयो यदि। तिष्ठत्ययं कथं देह इति शङ्कावतो जडान्। समाधातुं बाह्यदृष्ट्या प्रारब्धं वदति श्रुतिः॥ ४६३॥ न तु देहादिसत्यत्वबोधनाय विपश्चिताम्। यतः श्रुतेरभिप्रायः परमार्थैकगोचरः॥ ४६४॥ जिनको ऐसी शंका होती है कि यदि ज्ञानसे अज्ञानका मूलसहित नाश हो जाता है तो ज्ञानीका यह स्थूल देह कैसे रहता है, उन मूर्खोंको समझानेके लिये श्रुति ऊपरी दृष्टिसे (व्यवहारसत्ताको लेकर) प्रारब्धको उसका कारण बतला देती है। वह विद्वान्‌को देहादिका सत्यत्व समझानेके लिये ऐसा नहीं कहती; क्योंकि श्रुतिका अभिप्राय तो एकमात्र परमार्थ वस्तुका वर्णन करनेमें ही है। नानात्व-निषेध परिपूर्णमनाद्यन्तमप्रमेयमविक्रियम् । एकमेवाद्वयं ब्रह्म नेह नानास्ति किञ्चन॥ ४६५॥ [ श्रुति कहती है— ] वास्तवमें सर्वत्र परिपूर्ण, अनादि, अनन्त, अप्रमेय और अविकारी एक अद्वितीय ब्रह्म ही है; उसमें और कोई नाना पदार्थ नहीं है। सद्धनं चिद्धनं नित्यमानन्दघनमक्रियम्। एकमेवाद्वयं ब्रह्म नेह नानास्ति किञ्चन॥ ४६६॥ जो घनीभूत सत्, चित् और आनन्द है; ऐसा एक नित्य, अक्रिय और अद्वितीय ब्रह्म ही सत्य वस्तु है; उसमें कोई नाना पदार्थ नहीं है। प्रत्यगेकरसं पूर्णमनन्तं सर्वतोमुखम्। एकमेवाद्वयं ब्रह्म नेह नानास्ति किञ्चन॥ ४६७॥ जो अन्तरात्मा, एकरस, परिपूर्ण, अनन्त और सर्वव्यापक है ऐसा एक अद्वितीय ब्रह्म ही है; उसमें नाना पदार्थ कोई नहीं है। अहेयमनुपादेयमनाधेयमनाश्रयम् । एकमेवाद्वयं ब्रह्म नेह नानास्ति किञ्चन॥ ४६८॥

१२४ विवेक-चूड़ामणि जो न त्याज्य है, न ग्राह्य है और न किसीमें स्थित होने योग्य है तथा जिसका कोई अन्य आधार भी नहीं है, ऐसा एक अद्वितीय ब्रह्म ही सत्य है; उसमें नाना पदार्थ कोई नहीं है। निर्गुणं निष्कलं सूक्ष्मं निर्विकल्पं निरञ्जनम्। एकमेवाद्वयं ब्रह्म नेह नानास्ति किञ्चन ॥ ४६९ ॥ जो गुण और कलासे रहित है, सूक्ष्म, निर्विकल्प और निर्मल है, ऐसा एक अद्वितीय ब्रह्म ही सत्य है; उसमें नाना पदार्थ कुछ भी नहीं है। अनिरूप्यस्वरूपं यन्मनोवाचामगोचरम्। एकमेवाद्वयं ब्रह्म नेह नानास्ति किञ्चन ॥ ४७० ॥ जिसका रूप वर्णन नहीं किया जा सकता तथा जो मन और वाणीका भी विषय नहीं है, ऐसा एक अद्वितीय ब्रह्म ही है; उसमें नाना वस्तु कोई भी नहीं है। सत्समृद्धं स्वतःसिद्धं शुद्धं बुद्धमनीदृशम्। एकमेवाद्वयं ब्रह्म नेह नानास्ति किञ्चन ॥ ४७१ ॥ जो सत्य, वैभवपूर्ण, स्वतःसिद्ध, शुद्ध, बोधस्वरूप और उपमारहित है ऐसा एक अद्वितीय ब्रह्म ही सत्य है; उसमें नाना पदार्थ कुछ भी नहीं है। आत्मानुभवका उपदेश निरस्तरागा निरपास्तभोगाः शान्ताः सुदान्ता यतयो महान्तः। विज्ञाय तत्त्वं परमेतदन्ते प्राप्ताः परां निर्वृतिमात्मयोगात् ॥ ४७२ ॥ जिनका किसी भी वस्तुमें राग नहीं है और भोगका भी सर्वथा अन्त हो गया है तथा जिनका चित्त शान्त एवं इन्द्रियाँ संयत हैं, वे महात्मा संन्यासीजन ही इस परम तत्त्वको जानकर अन्तमें इस अध्यात्मयोगके द्वारा परम शान्तिको प्राप्त हुए हैं।

आत्मानुभवका उपदेश १२५ भवानपीदं परतत्त्वमात्मनः स्वरूपमानन्दघनं विचार्य। विधूय मोहं स्वमनःप्रकल्पितं मुक्तः कृतार्थो भवतु प्रबुद्धः ॥ ४७३ ॥ अतः हे वत्स ! तुम भी आत्माके इस परमतत्त्व और आनन्दघनस्वरूपका विचार करते हुए अपने मनःकल्पित मोहको छोड़कर मुक्त हो जाओ और इस प्रकार अज्ञान-निद्रासे जगकर कृतार्थ हो जाओ। समाधिना साधु विनिश्चलात्मना पश्यात्मतत्त्वं स्फुटबोधचक्षुषा। निःसंशयं सम्यगवेक्षितश्चे- च्छ्रुतः पदार्थो न पुनर्विकल्प्यते ॥ ४७४ ॥ समाधिके द्वारा भली प्रकार निश्चल हुए चित्त और विकसित ज्ञान- नेत्रोंसे इस आत्मतत्त्वको देखो, क्योंकि यदि सुना हुआ पदार्थ निःसन्देह होकर भली प्रकार देख लिया जाता है तो उसके विषयमें फिर कोई संशय नहीं होता। स्वस्याविद्याबन्धसम्बन्धमोक्षात् सत्यज्ञानानन्दरूपात्मलब्धौ । शास्त्रं युक्तिर्देशिकोक्तिः प्रमाणं चान्तःसिद्धा स्वानुभूतिः प्रमाणम् ॥ ४७५ ॥ अपने अज्ञानरूप बन्धनका संसर्ग छूट जानेसे जो सच्चिदानन्दस्वरूप आत्माकी प्राप्ति होती है—उसमें शास्त्र, युक्ति, गुरु-वाक्य और अन्तःकरणसे सिद्ध होनेवाला अपना अनुभव प्रमाण है। बन्धो मोक्षश्च तृप्तिश्च चिन्तारोग्यक्षुधादयः। स्वेनैव वेद्या यज्ज्ञानं परेषामानुमानिकम् ॥ ४७६ ॥ बन्धन, मोक्ष, तृप्ति, चिन्ता, आरोग्य और भूख आदि तो अपने-आप ही जाने जाते हैं, दूसरोंको उनका जो ज्ञान होता है वह तो केवल आनुमानिक ही है।

१२६ विवेक-चूडामणि तटस्थिता बोधयन्ति गुरवः श्रुतयो यथा। प्रज्ञयैव तरेद्विद्वानीश्वरानुगृहीतया ॥ ४७७ ॥ श्रुतिके समान गुरु भी ब्रह्मका केवल तटस्थरूपसे ही बोध कराते हैं; विद्वान्‌को चाहिये कि अपनी ही ईश्वरानुगृहीत* बुद्धिसे [उसका साक्षात् अनुभव करके] इस संसार-सागरके पार हो जाय। स्वानुभूत्या स्वयं ज्ञात्वा स्वमात्मानमखण्डितम्। संसिद्धः ससुखं तिष्ठेन्निर्विकल्पात्मनात्मनि ॥ ४७८ ॥ अपने अनुभवसे अखण्ड आत्माको स्वयं जानकर सिद्ध हुआ पुरुष निर्विकल्पभावसे आनन्दपूर्वक सदा आत्मामें ही स्थित रहे। वेदान्तसिद्धान्तनिरुक्तिरेषा ब्रह्मैव जीवः सकलं जगच्च। अखण्डरूपस्थितिरेव मोक्षो ब्रह्माद्वितीये श्रुतयः प्रमाणम् ॥ ४७९ ॥ वेदान्तका सिद्धान्त तो यही कहता है कि जीव और सम्पूर्ण जगत् केवल ब्रह्म ही है और उस अद्वितीय ब्रह्ममें निरन्तर अखण्डरूपसे स्थित रहना ही मोक्ष है। ब्रह्म अद्वितीय है—इस विषयमें श्रुतियाँ प्रमाण हैं।

  • ब्रह्मका साक्षात् निरूपण कोई भी नहीं कर सकता, क्योंकि वह शब्दकी शक्तिवृत्तिसे बाहर है—शब्द वहाँतक पहुँच ही नहीं सकता। उसका ज्ञान तो लक्षणा- वृत्तिसे ही हो सकता है। अतः ब्रह्मका साक्षात्कार करनेके लिये उसकी उपाधिरूप इस निखिल प्रपंचका बाध करना पड़ता है, क्योंकि इसीने उसके स्वरूपको आच्छादित किया हुआ है। किन्तु दृश्यका बाध उसमें मिथ्यात्व-बुद्धि हुए बिना हो नहीं सकता और ऐसी बुद्धि शिष्यको ईश्वर-कृपाके प्रभावसे ही प्राप्त होती है। इसलिये बोध होनेके लिये शास्त्र-कृपा और गुरु-कृपाके समान भगवत्कृपा भी अत्यन्त आवश्यक है।

बोधोपलब्धि १२७ बोधोपलब्धि इति गुरुवचनाच्छ्रुतिप्रमाणात् परमवगम्य सतत्त्वमात्मयुक्त्या । प्रशमितकरणः समाहितात्मा क्वचिदचलाकृतिरात्मनिष्ठितोऽभूत् ॥ ४८० ॥ इस प्रकार गुरुके श्रुति-प्रमाणयुक्त वचन और अपनी युक्तियोंद्वारा परमात्मतत्त्वको जानकर चित्त और इन्द्रियोंके शान्त हो जानेसे कोई एक शिष्य निश्चल वृत्तिसे आत्मस्वरूपमें स्थित हो गया। कञ्चित्कालं समाधाय परे ब्रह्मणि मानसम्। व्युत्थाय परमानन्दादिदं वचनमब्रवीत् ॥ ४८१ ॥ और कुछ देरतक परब्रह्ममें चित्तको समाहितकर फिर उस परमानन्दमयी स्थितिसे उठकर ये वचन बोला। बुद्धिर्विनष्टा गलिता प्रवृत्ति- र्ब्रह्मात्मनोरेकतयाधिगत्या । इदं न जानेऽप्यनिदं न जाने किं वा कियद्वा सुखमस्त्यपारम् ॥ ४८२ ॥ अहो! ब्रह्म और आत्माकी एकताका ज्ञान होनेपर मेरी बुद्धि तो एकदम नष्ट हो गयी, विषयोंमें मेरी सारी प्रवृत्ति दूर हो गयी, मुझे न इदं (प्रत्यक्ष वस्तु) का ज्ञान है और न अनिदं (अप्रत्यक्ष) का और न मैं यही जानता हूँ कि वह अपार आनन्द कैसा और कितना है। वाचा वक्तुमशक्यमेव मनसा मन्तुं न वा शक्यते स्वानन्दामृतपूरपूरितपरब्रह्माम्बुधेर्वैभवम् । अम्भोराशिविशीर्णवार्षिकशिलाभावं भजन्मे मनो यस्यांशांशालवे विलीनमधुनानन्दात्मना निर्वृतम् ॥ ४८३ ॥ जलराशि (समुद्र)-में पड़कर गले हुए वर्षाकालिक ओलोंकी अवस्थाको प्राप्त हुआ मेरा मन जिस आनन्दामृतसमुद्रके एक अंशके भी

१२८ विवेक-चूडामणि अंशमें लीन होकर अब अति आनन्दरूपसे स्थित हो गया है, उस आत्मानन्दरूप अमृतप्रवाहसे परिपूर्ण परब्रह्मसमुद्रका वैभव वाणीसे नहीं कहा जा सकता और मनसे मनन नहीं किया जा सकता। क्व गतं केन वा नीतं कुत्र लीनमिदं जगत्। अधुनैव मया दृष्टं नास्ति किं महदद्भुतम् ॥ ४८४ ॥ वह संसार कहाँ चला गया ? उसे कौन ले गया ? यह कहाँ लीन हो गया ? अहो ! बड़ा आश्चर्य है जिस संसारको मैं अभी देख रहा था वह कहीं दिखायी नहीं देता। किं हेयं किमुपादेयं किमन्यत्किं विलक्षणम्। अखण्डानन्दपीयूषपूर्णे ब्रह्ममहार्णवे ॥ ४८५ ॥ इस अखण्ड आनन्दामृतपूर्ण ब्रह्म-समुद्रमें कौन वस्तु त्याज्य है? कौन ग्राह्य है? कौन सामान्य है? और कौन विलक्षण है? न किञ्चिदत्र पश्यामि न शृणोमि न वेद्म्यहम्। स्वात्मनैव सदानन्दरूपेणास्मि विलक्षणः ॥ ४८६ ॥ अब मुझे यहाँ न कुछ दिखायी देता है, न सुनायी देता है और न मैं कुछ जानता ही हूँ। मैं तो अपने नित्यानन्दस्वरूप आत्मामें स्थित होकर अपनी पहली अवस्थासे सर्वथा विलक्षण हो गया हूँ। नमो नमस्ते गुरवे महात्मने विमुक्तसङ्गाय सदुत्तमाय। नित्याद्वयानन्दरसस्वरूपिणे भूम्ने सदापारदयाम्बुधाम्ने ॥४८७॥ यत्कटाक्षशशिसान्द्रचन्द्रिकापातधूतभवतापजश्रमः। प्राप्तवानहमखण्डवैभवानन्दमात्मपदमक्षयं क्षणात् ॥ ४८८ ॥ जिनके कृपाकटाक्षरूप चन्द्रकी स्निग्ध चन्द्रिकाके संसर्गसे संसार- तापजन्य श्रमके दूर हो जानेसे मैंने क्षणभरमें अखण्ड ऐश्वर्य और आनन्दमय अक्षय आत्मपद प्राप्त किया है, उन संगरहित, संतशिरोमणि,

बोधोपलब्धि १२९ नित्य-अद्वितीय-आनन्दरसस्वरूप, अति महान् और नित्य-अपार-दयासागर महात्मा गुरुदेवको बारम्बार नमस्कार है। धन्योऽहं कृतकृत्योऽहं विमुक्तोऽहं भवग्रहात्। नित्यानन्दस्वरूपोऽहं पूर्णोऽहं तदनुग्रहात् ॥ ४८९ ॥ उन श्रीगुरुदेवकी कृपासे आज मैं धन्य हूँ, कृतकृत्य हूँ, संसारबन्धनसे रहित हूँ तथा नित्यानन्दस्वरूप और सर्वत्र परिपूर्ण हूँ। असङ्गोऽहमनङ्गोऽहमलिङ्गोऽहमभङ्गुरः । प्रशान्तोऽहमनन्तोऽहमतान्तोऽहं चिरन्तनः ॥ ४९० ॥ मैं असंग हूँ, अशरीर हूँ, अलिंग हूँ और अक्षय हूँ तथा अत्यन्त शान्त, अनन्त, अतान्त (निरीह) और पुरातन हूँ। अकर्ताहमभोक्ताहमविकारोऽहमक्रियः । शुद्धबोधस्वरूपोऽहं केवलोऽहं सदाशिवः ॥ ४९१ ॥ मैं अकर्ता हूँ, अभोक्ता हूँ, अविकारी हूँ, अक्रिय हूँ, शुद्धबोधस्वरूप हूँ, एक हूँ और नित्य कल्याणस्वरूप हूँ। द्रष्टुः श्रोतुर्वक्तुः कर्तुर्भोक्तुर्विभिन्न एवाहम्। नित्यनिरन्तरनिष्क्रियनिःसीमासङ्गपूर्णबोधात्मा ॥ ४९२ ॥ द्रष्टा, श्रोता, वक्ता, कर्ता, भोक्ता—मैं इन सभीसे भिन्न हूँ, मैं तो नित्य, निरन्तर, निष्क्रिय, निःसीम, असंग और पूर्णबोधस्वरूप हूँ। नाहमिदं नाहमदोऽप्युभयोरवभासकं परं शुद्धम्। बाह्याभ्यन्तरशून्यं पूर्णं ब्रह्माद्वितीयमेवाहम् ॥ ४९३ ॥ मैं न यह हूँ, न वह हूँ, बल्कि इन दोनों (स्थूल-सूक्ष्म जगत्)- का प्रकाशक, बाह्याभ्यन्तरशून्य, पूर्ण, अद्वितीय और शुद्ध परब्रह्म ही हूँ। निरुपममनादितत्त्वं त्वमहमिदमद इतिकल्पनादूरम्। नित्यानन्दैकरसं सत्यं ब्रह्माद्वितीयमेवाहम् ॥ ४९४ ॥ जो उपमारहित अनादितत्त्व 'तू, मैं, यह, वह' आदिकी कल्पनासे अत्यन्त दूर है वह नित्यानन्दैकरसस्वरूप, सत्य और अद्वितीय ब्रह्म ही मैं हूँ। 133 विवेक-चूडामणि—5 A

१३० विवेक-चूडामणि नारायणोऽहं नरकान्तकोऽहं पुरान्तकोऽहं पुरुषोऽहमीशः । अखण्डबोधोऽहमशेषसाक्षी निरीश्वरोऽहं निरहं च निर्ममः ॥ ४९५ ॥ मैं [ क्षीरसमुद्रशायी ] नारायण हूँ, नरकासुरका विघातक हूँ, त्रिपुर- दैत्यका नाश करनेवाला हूँ, परम पुरुष हूँ और ईश्वर हूँ। मैं अखण्डबोधस्वरूप हूँ, सबका साक्षी हूँ, स्वतन्त्र हूँ तथा अहंता और ममतासे रहित हूँ। सर्वेषु भूतेष्वहमेव संस्थितो ज्ञानात्मनान्तर्बहिराश्रयः सन्। भोक्ता च भोग्यं स्वयमेव सर्वं यद्यत्पृथग्दृष्टमिदन्तया पुरा ॥ ४९६ ॥ ज्ञानस्वरूपसे सबका आश्रय होकर समस्त प्राणियोंके बाहर और भीतर मैं ही स्थित हूँ तथा पहले जो-जो पदार्थ इदंवृत्तिद्वारा भिन्न-भिन्न देखे गये थे वह भोक्ता और भोग्य सब कुछ स्वयं मैं ही हूँ। मय्यखण्डसुखाम्भोधौ बहुधा विश्ववीचयः । उत्पद्यन्ते विलीयन्ते मायामारुतविभ्रमात् ॥ ४९७ ॥ मुझ अखण्ड आनन्द-समुद्रमें विश्वरूपी नाना तरंगें मायारूपी वायुके वेगसे उठती और लीन होती रहती हैं। स्थूलादिभावा मयि कल्पिता भ्रमा- दारोपिता नु स्फुरणेन लोकैः। काले यथा कल्पकवत्सराय- नर्त्वादयो निष्कलनिर्विकल्पे ॥ ४९८ ॥ जैसे निष्कल (हानि-वृद्धि-शून्य) और निर्विकल्प कालमें स्वरूपसे कोई कल्प, वर्ष, अयन (उत्तरायण-दक्षिणायन) और ऋतु आदिका विभाग नहीं है, उसी प्रकार लोगोंने भ्रमवश केवल स्फुरणमात्रसे ही आरोपित करके मुझमें स्थूल-सूक्ष्म आदि भावोंकी कल्पना कर ली है। 133 विवेक-चूडामणि—5 B