विवेकचूड़ामणि (हिन्दी अनुवाद सहित)
Viveka Chudamani with Hindi Translation - Gita Press
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 12, कुल 153 में से
संदर्भ में पढ़ेंउपदेश-विधि १५ करनेमें प्रवृत्त होते हैं। सूर्यके प्रचण्ड तेजसे सन्तप्त पृथ्वीतलको चन्द्रदेव स्वयं ही शान्त कर देते हैं। ब्रह्मानन्दरसानुभूतिकलितैः पूतैः सुशीतैः सितै- र्युष्मद्वाक्कलशोज्झितैः श्रुतिसुखैर्वाक्यामृतैः सेचय। संतप्तं भवतापदावदहनज्वालाभिरेनं प्रभो धन्यास्ते भवदीक्षणक्षणगतेः पात्रीकृताः स्वीकृताः ॥ ४१ ॥ हे प्रभो! प्रचण्ड संसार-दावानलकी ज्वालासे तपे हुए इस दीन- शरणापन्नको आप अपने ब्रह्मानन्दरसानुभवसे युक्त परम पुनीत, सुशीतल, निर्मल और वाक्-रूपी स्वर्णकलशसे निकले हुए श्रवणसुखद वचनामृतोंसे सींचिये [ अर्थात् इसके तापको शान्त कीजिये ]। वे धन्य हैं, जो आपके एक क्षणके करुणामय दृष्टिपथके पात्र होकर अपना लिये गये हैं। कथं तरेयं भवसिन्धुमेतं का वा गतिर्मे कतमोऽस्त्युपायः। जाने न किञ्चित्कृपयाव मां भो संसारदुःखक्षतिमातनुष्व ॥ ४२ ॥ 'मैं इस संसार-समुद्रको कैसे तरूँगा ? मेरी क्या गति होगी ? उसका क्या उपाय है ?'—यह मैं कुछ नहीं जानता। प्रभो! कृपया मेरी रक्षा कीजिये और मेरे संसार-दुःखके क्षयका आयोजन कीजिये। उपदेश-विधि तथा वदन्तं शरणागतं स्वं संसारदावानलतापतप्तम् । निरीक्ष्य कारुण्यरसार्द्रदृष्ट्या दद्यादभीतिं सहसा महात्मा ॥ ४३ ॥ इस प्रकार कहते हुए, अपनी शरणमें आये संसारानल-सन्तप्त शिष्यको महात्मा गुरु करुणामयी दृष्टिसे देखकर सहसा अभय प्रदान करे।