विवेकचूड़ामणि (हिन्दी अनुवाद सहित)
Viveka Chudamani with Hindi Translation - Gita Press
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 13, कुल 153 में से
संदर्भ में पढ़ें१६ विवेक-चूडामणि विद्वान्स तस्मा उपसत्तिमियुषे मुमुक्षवे साधु यथोक्तकारिणे। प्रशान्तचित्ताय शमान्विताय तत्त्वोपदेशं कृपयैव कुर्यात् ॥ ४४॥ शरणागतिकी इच्छावाले उस मुमुक्षु, आज्ञाकारी, शान्तचित्त, शमादि- संयुक्त साधु शिष्यको गुरु कृपया [ इस प्रकार ] तत्त्वोपदेश करे— श्रीगुरुरुवाच मा भैष्ट विद्वंस्तव नास्त्यपायः संसारसिन्धोस्तरणेऽस्त्युपायः । येनैव याता यतयोऽस्य पारं तमेव मार्गं तव निर्दिशामि ॥ ४५ ॥ गुरु—हे विद्वन्! तू डर मत, तेरा नाश नहीं होगा। संसार-सागरसे तरनेका उपाय है। जिस मार्गसे यतिजन इसके पार गये हैं, वही मार्ग मैं तुझे दिखाता हूँ। अस्त्युपायो महान्कश्चित्संसारभयनाशनः। येन तीर्त्वा भवाम्भोधिं परमानन्दमाप्स्यसि ॥ ४६ ॥ संसाररूपी भयका नाश करनेवाला कोई एक महान् उपाय है जिसके द्वारा तू संसार-सागरको पार करके परमानन्द प्राप्त करेगा। वेदान्तार्थविचारेण जायते ज्ञानमुत्तमम्। तेनात्यन्तिकसंसारदुःखनाशो भवत्यनु ॥ ४७ ॥ वेदान्त-वाक्योंके अर्थका विचार करनेसे उत्तम ज्ञान होता है, जिससे फिर संसार-दुःखका आत्यन्तिक नाश हो जाता है। श्रद्धाभक्तिध्यानयोगान्मुमुक्षो- र्मुक्तेर्हेतून्वक्ति साक्षाच्छ्रुतेर्गीः। यो वा एतेष्वेव तिष्ठत्यमुष्य मोक्षोऽविद्याकल्पिताद्देहबन्धात् ॥ ४८ ॥