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विवेकचूड़ामणि (हिन्दी अनुवाद सहित)

Viveka Chudamani with Hindi Translation - Gita Press

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished153 पृष्ठ

१६ विवेक-चूडामणि विद्वान्स तस्मा उपसत्तिमियुषे मुमुक्षवे साधु यथोक्तकारिणे। प्रशान्तचित्ताय शमान्विताय तत्त्वोपदेशं कृपयैव कुर्यात् ॥ ४४॥ शरणागतिकी इच्छावाले उस मुमुक्षु, आज्ञाकारी, शान्तचित्त, शमादि- संयुक्त साधु शिष्यको गुरु कृपया [ इस प्रकार ] तत्त्वोपदेश करे— श्रीगुरुरुवाच मा भैष्ट विद्वंस्तव नास्त्यपायः संसारसिन्धोस्तरणेऽस्त्युपायः । येनैव याता यतयोऽस्य पारं तमेव मार्गं तव निर्दिशामि ॥ ४५ ॥ गुरु—हे विद्वन्! तू डर मत, तेरा नाश नहीं होगा। संसार-सागरसे तरनेका उपाय है। जिस मार्गसे यतिजन इसके पार गये हैं, वही मार्ग मैं तुझे दिखाता हूँ। अस्त्युपायो महान्कश्चित्संसारभयनाशनः। येन तीर्त्वा भवाम्भोधिं परमानन्दमाप्स्यसि ॥ ४६ ॥ संसाररूपी भयका नाश करनेवाला कोई एक महान् उपाय है जिसके द्वारा तू संसार-सागरको पार करके परमानन्द प्राप्त करेगा। वेदान्तार्थविचारेण जायते ज्ञानमुत्तमम्। तेनात्यन्तिकसंसारदुःखनाशो भवत्यनु ॥ ४७ ॥ वेदान्त-वाक्योंके अर्थका विचार करनेसे उत्तम ज्ञान होता है, जिससे फिर संसार-दुःखका आत्यन्तिक नाश हो जाता है। श्रद्धाभक्तिध्यानयोगान्मुमुक्षो- र्मुक्तेर्हेतून्वक्ति साक्षाच्छ्रुतेर्गीः। यो वा एतेष्वेव तिष्ठत्यमुष्य मोक्षोऽविद्याकल्पिताद्देहबन्धात् ॥ ४८ ॥

प्रश्न-निरूपण १७ श्रद्धा, भक्ति, ध्यान और योग इनको भगवती श्रुति मुमुक्षुकी मुक्तिके साक्षात् हेतु बतलाती है। जो इन्हींमें स्थित हो जाता है उसका अविद्याकल्पित देह-बन्धनसे मोक्ष हो जाता है। अज्ञानयोगात्परमात्मनस्तव ह्यनात्मबन्धस्तत एव संसृतिः। तयोर्विवेकोदितबोधवह्नि- रज्ञानकार्यं प्रदहेत्समूलम् ॥ ४९ ॥ तुझ परमात्माका अनात्म-बन्धन अज्ञानके कारण ही है और उसीसे तुझको [जन्म-मरणरूप] संसार प्राप्त हुआ है। अतः उन (आत्मा और अनात्मा) के विवेकसे उत्पन्न हुआ बोधरूप अग्नि अज्ञानके कार्यरूप संसारको मूलसहित भस्म कर देगा। प्रश्न-निरूपण शिष्य उवाच कृपया श्रूयतां स्वामिन्प्रश्नोऽयं क्रियते मया। तदुत्तरमहं श्रुत्वा कृतार्थः स्यां भवन्मुखात् ॥ ५० ॥ शिष्य—हे स्वामिन्! कृपया सुनिये; मैं यह प्रश्न करता हूँ। उसका उत्तर आपके श्रीमुखसे सुनकर मैं कृतार्थ हो जाऊँगा। को नाम बन्धः कथमेष आगतः कथं प्रतिष्ठास्य कथं विमोक्षः। कोऽसावनात्मा परमः क आत्मा तयोर्विवेकः कथमेतदुच्यताम् ॥ ५१ ॥ बन्ध क्या है ? यह कैसे हुआ ? इसकी स्थिति कैसे है ? और इससे मोक्ष कैसे मिल सकता है ? अनात्मा क्या है ? परमात्मा किसे कहते हैं ? और उनका विवेक (पार्थक्य-ज्ञान) कैसे होता है ? कृपया यह सब कहिये।

१८ विवेक-चूडामणि शिष्य-प्रशंसा श्रीगुरुरुवाच धन्योऽसि कृतकृत्योऽसि पावितं ते कुलं त्वया। यदविद्याबन्धमुक्त्या ब्रह्मीभवितुमिच्छसि ॥ ५२ ॥ गुरु—तू धन्य है, कृतकृत्य है, तेरा कुल तुझसे पवित्र हो गया, क्योंकि तू अविद्यारूपी बन्धनसे छूटकर ब्रह्मभावको प्राप्त होना चाहता है। स्व-प्रयत्नकी प्रधानता ऋणमोचनकर्तारः पितुः सन्ति सुतादयः। बन्धमोचनकर्ता तु स्वस्मादन्यो न कश्चन ॥ ५३ ॥ पिताके ऋणको चुकानेवाले तो पुत्रादि भी होते हैं, परन्तु भवबन्धनसे छुड़ानेवाला अपनेसे भिन्न और कोई नहीं है। मस्तकन्यस्तभारादेर्दुःखमन्यैर्निवार्यते । क्षुदादिकृतदुःखं तु विना स्वेन न केनचित् ॥ ५४ ॥ [ जैसे ] सिरपर रखे हुए बोझेका दुःख और भी दूर कर सकते हैं, परन्तु भूख-प्यास आदिका दुःख अपने सिवा और कोई नहीं मिटा सकता। पथ्यमौषधसेवा च क्रियते येन रोगिणा। आरोग्यसिद्धिर्दृष्टास्य नान्यानुष्ठितकर्मणा ॥ ५५ ॥ अथवा जैसे जो रोगी पथ्य और औषधका सेवन करता है उसीको आरोग्य-सिद्धि होती देखी जाती है, किसी औरके द्वारा किये हुए कर्मोंसे कोई नीरोग नहीं होता। वस्तुस्वरूपं स्फुटबोधचक्षुषा स्वेनैव वेद्यं ननु पण्डितेन। चन्द्रस्वरूपं निजचक्षुषैव ज्ञातव्यमन्यैरवगम्यते किम् ॥ ५६ ॥ [ वैसे ही ] विवेकी पुरुषको वस्तुका स्वरूप भी स्वयं अपने ज्ञान-

आत्मज्ञानका महत्त्व १९ नेत्रोंसे ही जानना चाहिये, [ किसी अन्यके द्वारा नहीं ] । चन्द्रमाका स्वरूप अपने ही नेत्रोंसे देखा जाता है, दूसरोंके द्वारा क्या जाना जा सकता है? अविद्याकामकर्मादिपाशबन्धं विमोचितुम्। कः शक्नुयाद्विनात्मानं कल्पकोटिशतैरपि॥ ५७॥ अविद्या, कामना और कर्मादिके जालके बन्धनोंको सौ करोड़ कल्पोंमें भी अपने सिवा और कौन खोल सकता है? आत्मज्ञानका महत्त्व न योगेन न सांख्येन कर्मणा नो न विद्यया। ब्रह्मात्मैकत्वबोधेन मोक्षः सिद्ध्यति नान्यथा॥ ५८॥ मोक्ष न योगसे सिद्ध होता है, न सांख्यसे, न कर्मसे और न विद्यासे। वह केवल ब्रह्मात्मैक्य-बोध (ब्रह्म और आत्माकी एकताके ज्ञान)-से ही होता है और किसी प्रकार नहीं। वीणाया रूपसौन्दर्यं तन्त्रीवादनसौष्ठवम्। प्रजारञ्जनमात्रं तन्न साम्राज्याय कल्पते॥ ५९॥ वाग्वैखरी शब्दझरी शास्त्रव्याख्यानकौशलम्। वैदुष्यं विदुषां तद्वद्भुक्तये न तु मुक्तये॥ ६०॥ जिस प्रकार वीणाका रूप-लावण्य तथा तन्त्रीको बजानेका सुन्दर ढंग मनुष्योंके मनोरंजनका ही कारण होता है, उससे कुछ साम्राज्यकी प्राप्ति नहीं हो जाती; उसी प्रकार विद्वानोंकी वाणीकी कुशलता, शब्दोंकी धारावाहिकता, शास्त्र- व्याख्यानकी कुशलता और विद्वत्ता भोगहीका कारण हो सकती हैं, मोक्षका नहीं। अविज्ञाते परे तत्त्वे शास्त्राधीतिस्तु निष्फला। विज्ञातेऽपि परे तत्त्वे शास्त्राधीतिस्तु निष्फला॥ ६१॥ परमतत्त्वको यदि न जाना तो शास्त्राध्ययन निष्फल (व्यर्थ) ही है और यदि परमतत्त्वको जान लिया तो भी शास्त्राध्ययन निष्फल (अनावश्यक) ही है। शब्दजालं महारण्यं चित्तभ्रमणकारणम्। अतः प्रयत्नाज्ज्ञातव्यं तत्त्वज्ञात्तत्त्वमात्मनः॥ ६२॥

२० विवेक-चूडामणि शब्दजाल तो चित्तको भटकानेवाला एक महान् वन है, इसलिये किन्हीं तत्त्वज्ञानी महात्मासे प्रयत्नपूर्वक आत्मतत्त्वको जानना चाहिये। अज्ञानसर्पदष्टस्य ब्रह्मज्ञानौषधं विना। किमु वेदैश्च शास्त्रैश्च किमु मन्त्रैः किमौषधैः ॥ ६३ ॥ अज्ञानरूपी सर्पसे डँसे हुएको ब्रह्मज्ञानरूपी ओषधिके बिना वेदसे, शास्त्रसे, मन्त्रसे और औषधसे क्या लाभ ? अपरोक्षानुभवकी आवश्यकता न गच्छति विना पानं व्याधिरौषधशब्दतः। विनापरोक्षानुभवं ब्रह्मशब्दैर्न मुच्यते ॥ ६४ ॥ औषधको बिना पिये केवल औषध-शब्दके उच्चारणमात्रसे रोग नहीं जाता, इसी प्रकार अपरोक्षानुभवके बिना केवल 'ब्रह्म, ब्रह्म' कहनेसे कोई मुक्त नहीं हो सकता। अकृत्वा दृश्यविलयमज्ञात्वा तत्त्वमात्मनः। बाह्यशब्दैः कुतो मुक्तिरुक्तिमात्रफलैर्नृणाम् ॥ ६५ ॥ बिना दृश्य-प्रपंचका विलय किये और आत्मतत्त्वको जाने केवल बाह्य शब्दोंसे, जिनका फल केवल उच्चारणमात्र ही है, मनुष्योंकी मुक्ति कैसे हो सकती है ? अकृत्वा शत्रुसंहारमगत्वाखिलभूश्रियम्। राजाहमिति शब्दान्नो राजा भवितुमर्हति ॥ ६६ ॥ बिना शत्रुओंका वध किये और बिना सम्पूर्ण पृथिवीमण्डलका ऐश्वर्य प्राप्त किये, 'मैं राजा हूँ'—ऐसा कहनेसे ही कोई राजा नहीं हो जाता। आप्तोक्तिं खननं तथोपरिशिलाद्युत्कर्षणं स्वीकृतिं निक्षेपः समपेक्षते न हि बहिः शब्दैस्तु निर्गच्छति। तद्वद् ब्रह्मविदोपदेशमननध्यानादिभिर्लभ्यते मायाकार्यतिरोहितं स्वममलं तत्त्वं न दुर्युक्तिभिः ॥ ६७॥

प्रश्न-विचार २१ [पृथ्वीमें गड़े हुए धनको प्राप्त करनेके लिये जैसे] प्रथम किसी विश्वसनीय पुरुषके कथनकी और फिर पृथिवीको खोदने, कंकड़- पत्थर आदिको हटाने तथा [प्राप्त हुए धनको] स्वीकार करनेकी आवश्यकता होती है—कोरी बातोंसे वह बाहर नहीं निकलता, उसी प्रकार समस्त मायिक-प्रपंचसे शून्य निर्मल आत्मतत्त्व भी ब्रह्मवित् गुरुके उपदेश तथा उसके मनन और निदिध्यासनादिसे ही प्राप्त होता है, थोथी बातोंसे नहीं। तस्मात्सर्वप्रयत्नेन भवबन्धविमुक्तये । स्वैरेव यत्नः कर्तव्यो रोगादाविव पण्डितैः ॥ ६८ ॥ इसलिये रोग आदिके समान भव-बन्धकी निवृत्तिके लिये विद्वान्को अपनी सम्पूर्ण शक्ति लगाकर स्वयं ही प्रयत्न करना चाहिये। प्रश्न-विचार यस्त्वयाद्य कृतः प्रश्नो वरीयाञ्छास्त्रविन्मतः । सूत्रप्रायो निगूढार्थो ज्ञातव्यश्च मुमुक्षुभिः ॥ ६९ ॥ तूने आज जो प्रश्न किया है, शास्त्रज्ञ जन उसको बहुत श्रेष्ठ मानते हैं। वह प्रायः सूत्ररूप (संक्षिप्त) है, तो भी गम्भीर अर्थयुक्त और मुमुक्षुओंके जाननेयोग्य है। शृणुष्वावहितो विद्वन्यन्मया समुदीर्यते । तदेतच्छ्रवणात्सद्यो भवबन्धाद्विमोक्ष्यसे ॥ ७० ॥ हे विद्वन्! जो मैं कहता हूँ, सावधान होकर सुन; उसको सुननेसे तू शीघ्र ही भवबन्धनसे छूट जायगा। मोक्षस्य हेतुः प्रथमो निगद्यते वैराग्यमत्यन्तमनित्यवस्तुषु । ततः शमश्चापि दमस्तितिक्षा न्यासः प्रसक्ताखिलकर्मणां भृशम् ॥ ७१ ॥

२२ विवेक-चूड़ामणि ततः श्रुतिस्तन्मननं सततत्व- ध्यानं चिरं नित्यनिरन्तरं मुनेः । ततोऽविकल्पं परमेत्य विद्वा- निहैव निर्वाणसुखं समृच्छति ॥ ७२ ॥ मोक्षका प्रथम हेतु अनित्य वस्तुओंमें अत्यन्त वैराग्य होना कहा है, तदनन्तर शम, दम, तितिक्षा और सम्पूर्ण आसक्तियुक्त कर्मोंका सर्वथा त्याग है। तदुपरान्त मुनिको श्रवण, मनन और चिरकालतक नित्य-निरन्तर आत्म-तत्त्वका ध्यान करना चाहिये। तब वह विद्वान् परम निर्विकल्पावस्थाको प्राप्त होकर निर्वाण-सुखको पाता है। यद्बोद्धव्यं तवेदानीमात्मानात्मविवेचनम् । तदुच्यते मया सम्यक् श्रुत्वात्मन्यवधारय ॥ ७३ ॥ जो आत्मानात्मविवेक अब तुझे जानना चाहिये वह मैं समझाता हूँ, तू उसे भलीभाँति सुनकर अपने चित्तमें स्थिर कर।

स्थूल शरीरका वर्णन मज्जास्थिमेदःपलरक्तचर्म- त्वगाह्वयैर्धातुभिरेभिरन्वितम् । पादोरुवक्षोभुजपृष्ठमस्तकै- रङ्गैरुपाङ्गैरुपयुक्तमेतत् ॥ ७४ ॥ अहम्ममेति प्रथितं शरीरं मोहास्पदं स्थूलमितीर्यते बुधैः। मज्जा, अस्थि, मेद, मांस, रक्त, चर्म और त्वचा—इन सात धातुओंसे बने हुए तथा चरण, जंघा, वक्षःस्थल (छाती), भुजा, पीठ और मस्तक आदि अंगोपांगोंसे युक्त, 'मैं और मेरा' रूपसे प्रसिद्ध इस मोहके आश्रयरूप देहको विद्वान् लोग 'स्थूल शरीर' कहते हैं। नभोनभस्वद्दहनाम्बुभूमयः सूक्ष्माणि भूतानि भवन्ति तानि ॥ ७५ ॥ परस्परांशैर्मिलितानि भूत्वा स्थूलानि च स्थूलशरीरहेतवः । मात्रास्तदीया विषया भवन्ति शब्दादयः पञ्च सुखाय भोक्तुः ॥ ७६ ॥ आकाश, वायु, तेज, जल और पृथिवी—ये सूक्ष्म भूत हैं। इनके अंश परस्पर मिलनेसे स्थूल होकर स्थूल शरीरके हेतु होते हैं और इन्हींकी तन्मात्राएँ भोक्ता जीवके भोगरूप सुखके लिये शब्दादि पाँच विषय हो जाती हैं। य एषु मूढा विषयेषु बद्धा रागोरुपाशेन सुदुर्दमेन। आयान्ति निर्यान्त्यध ऊर्ध्वमुच्चैः स्वकर्मदूतेन जवेन नीताः ॥ ७७ ॥

२४ विवेक-चूड़ामणि जो मूढ इन विषयोंमें रागरूपी सुदृढ़ एवं विस्तृत बन्धनसे बँध जाते हैं, वे अपने कर्मरूपी दूतके द्वारा वेगसे प्रेरित होकर अनेक उत्तमाधम योनियोंमें आते-जाते हैं। विषय-निन्दा शब्दादिभिः पञ्चभिरेव पंच पञ्चत्वमापुः स्वगुणेन बद्धाः। कुरङ्गमातङ्गपतङ्गमीन- भृङ्गा नरः पञ्चभिरञ्चितः किम् ॥ ७८ ॥ अपने-अपने स्वभावके अनुसार शब्दादि पाँच विषयोंमेंसे केवल एक-एकसे बँधे हुए हरिण, हाथी, पतंग, मछली और भौंरे मृत्युको प्राप्त होते हैं, फिर इन पाँचोंसे जकड़ा हुआ मनुष्य कैसे बच सकता है? दोषेण तीव्रो विषयः कृष्णसर्पविषादपि। विषं निहन्ति भोक्तारं द्रष्टारं चक्षुषाप्ययम् ॥ ७९ ॥ दोषमें विषय काले सर्पके विषसे भी अधिक तीव्र है, क्योंकि विष तो खानेवालेको ही मारता है, परन्तु विषय तो आँखसे देखनेवालेको भी नहीं छोड़ते। विषयाशामहापाशाद्यो विमुक्तः सुदुस्त्यजात्। स एव कल्पते मुक्त्यै नान्यः षट्शास्त्रवेद्यपि ॥ ८० ॥ जो विषयोंकी आशारूप कठिन बन्धनसे छूटा हुआ है वही मोक्षका भागी होता है और कोई नहीं; चाहे वह छहों दर्शनोंका ज्ञाता क्यों न हो। आपातवैराग्यवतो मुमुक्षून् भवाब्धिपारं प्रतियातुमुद्यतान्। आशाग्रहो मज्जयतेऽन्तराले विगृह्य कण्ठे विनिवर्त्य वेगात् ॥ ८१ ॥ संसार-सागरको पार करनेके लिये उद्यत हुए क्षणिक वैराग्यवाले मुमुक्षुओंको आशारूपी ग्राह अति वेगसे बीचहीमें रोककर गला पकड़कर डुबो देता है।

देहासक्तिकी निन्दा २५ विषयाख्यग्रहो येन सुविरक्त्यसिना हतः। स गच्छति भवाम्भोधेः पारं प्रत्यूहवर्जितः ॥८२॥ जिसने वैराग्यरूपी खड्गसे विषयैषणारूपी ग्राहको मार दिया है, वही निर्विघ्न संसार-समुद्रके उस पार जा सकता है। विषमविषयमार्गैर्गच्छतोऽनच्छबुद्धेः प्रतिपदमभियातो मृत्युरप्येष विद्धि। हितसुजनगुरूक्त्या गच्छतः स्वस्य युक्त्या प्रभवति फलसिद्धिः सत्यमित्येव विद्धि ॥८३॥ विषयरूपी विषम मार्गमें चलनेवाले मलिनबुद्धिको पद-पदपर मृत्यु आती है—ऐसा जानो। और यह भी बिलकुल ठीक समझो कि हितैषी, सज्जन अथवा गुरुके कथनानुसार अपनी युक्तिसे चलनेवालेको फल- सिद्धि हो ही जाती है। मोक्षस्य काङ्क्षा यदि वै तवास्ति त्यजातिदूराद्विषयान् विषं यथा। पीयूषवत्तोषदयाक्षमार्जव- प्रशान्तिदान्तीर्भज नित्यमादरात् ॥८४॥ यदि तुझे मोक्षकी इच्छा है तो विषयोंको विषके समान दूरहीसे त्याग दे। और सन्तोष, दया, क्षमा, सरलता, शम और दमका अमृतके समान नित्य आदरपूर्वक सेवन कर। देहासक्तिकी निन्दा अनुक्षणं यत्परिहृत्य कृत्य- मनाद्यविद्याकृतबन्धमोक्षणम्। देहः परार्थोऽयममुष्य पोषणे यः सज्जते स स्वमनेन हन्ति ॥८५॥ जो अनादि अविद्याकृत बन्धनको छुड़ाणारूप अपना कर्तव्य त्यागकर

२६ विवेक-चूड़ामणि प्रतिक्षण इस परार्थ (अन्यके भोग्यरूप) देहके पोषणमें ही लगा रहता है, वह [अपनी इस प्रवृत्तिसे] स्वयं अपना घात करता है। शरीरपोषणार्थी सन् य आत्मानं दिदृक्षति। ग्राहं दारुधिया धृत्वा नदीं तर्तुं स इच्छति॥८६॥ जो शरीरपोषणमें लगा रहकर आत्मतत्त्वको देखना चाहता है, वह मानो काष्ठ-बुद्धिसे ग्राहको पकड़कर नदी पार करना चाहता है। मोह एव महामृत्युर्मुमुक्षोर्वपुरादिषु। मोहो विनिर्जितो येन स मुक्तिपदमर्हति॥८७॥ शरीरादिमें मोह रखना ही मुमुक्षुकी बड़ी भारी मौत है; जिसने मोहको जीता है वही मुक्तिपदका अधिकारी है। मोहं जहि महामृत्युं देहदारसुतादिषु। यं जित्वा मुनयो यान्ति तद्विष्णोः परमं पदम्॥८८॥ देह, स्त्री और पुत्रादिमें मोहरूप महामृत्युको छोड़; जिसको जीतकर मुनिजन भगवान्के उस परम पदको प्राप्त होते हैं। स्थूल शरीर त्वङ्मांसरुधिरस्नायुमेदोमज्जास्थिसंकुलम् । पूर्णं मूत्रपुरीषाभ्यां स्थूलं निन्द्यमिदं वपुः॥८९॥ त्वचा, मांस, रक्त, स्नायु (नस), मेद, मज्जा और अस्थियोंका समूह तथा मल-मूत्रसे भरा हुआ यह स्थूल देह अति निन्दनीय है। पञ्चीकृतेभ्यो भूतेभ्यः स्थूलेभ्यः पूर्वकर्मणा। समुत्पन्नमिदं स्थूलं भोगायतनमात्मनः। अवस्था जागरस्तस्य स्थूलार्थानुभवो यतः॥९०॥ पंचीकृत स्थूल भूतोंसे पूर्व-कर्मानुसार उत्पन्न हुआ यह शरीर आत्माका स्थूल भोगायतन है; इसकी [ प्रतीतिकी ] अवस्था जाग्रत् है, जिसमें कि स्थूल पदार्थोंका अनुभव होता है।

दस इन्द्रियाँ २७ बाह्येन्द्रियैः स्थूलपदार्थसेवां स्रक्चन्दनस्त्र्यादिविचित्ररूपाम् । करोति जीवः स्वयमेतदात्मना तस्मात्प्रशस्तिर्वपुषोऽस्य जागरे ॥ ९१ ॥ इससे तादात्म्यको प्राप्त होकर ही जीव माला, चन्दन तथा स्त्री आदि नाना प्रकारके स्थूल पदार्थोंको बाह्येन्द्रियोंसे सेवन करता है, इसलिये जाग्रत्-अवस्थामें इस (स्थूल) देहकी प्रधानता है। सर्वोऽपि बाह्यसंसारः पुरुषस्य यदाश्रयः। विद्धि देहमिदं स्थूलं गृहवद्गृहमेधिनः ॥ ९२ ॥ जिसके आश्रयसे जीवको सम्पूर्ण बाह्य जगत् प्रतीत होता है, गृहस्थके घरके तुल्य उसे ही स्थूल देह जानो। स्थूलस्य सम्भवजरामरणानि धर्माः स्थौल्यादयो बहुविधाः शिशुताद्यवस्थाः। वर्णाश्रमादिनियमा बहुधा यमाः स्युः पूजावमानबहुमानमुखा विशेषाः ॥ ९३ ॥ स्थूल देहके ही जन्म, जरा, मरण तथा स्थूलता आदि धर्म हैं; बालकपन आदि नाना प्रकारकी अवस्थाएँ हैं; वर्णाश्रमादि अनेक प्रकारके नियम और यम हैं; तथा इसीकी पूजा, मान, अपमान आदि विशेषताएँ हैं। दस इन्द्रियाँ बुद्धीन्द्रियाणि श्रवणं त्वगक्षि घ्राणं च जिह्वा विषयावबोधनात्। वाक्पाणिपादं गुदमप्युपस्थः कर्मेन्द्रियाणि प्रवणेन कर्मसु ॥ ९४ ॥ श्रवण, त्वचा, नेत्र, घ्राण और जिह्वा ये पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं, क्योंकि

२८ विवेक-चूड़ामणि इनसे विषयका ज्ञान होता है; तथा वाक्, पाणि, पाद, गुदा और उपस्थ— ये कर्मेन्द्रियाँ हैं, क्योंकि इनका कर्मोंकी ओर झुकाव होता है। अन्तःकरणचतुष्टय निगद्यतेऽन्तःकरणं मनोधी- रहंकृतिश्चित्तमिति स्ववृत्तिभिः। मनस्तु सङ्कल्पविकल्पनादिभि- र्बुद्धिः पदार्थाध्यवसायधर्मतः॥ ९५॥ अत्राभिमानादहमित्यहङ्कृतिः स्वार्थानुसन्धानगुणेन चित्तम्॥ ९६॥ अपनी वृत्तियोंके कारण अन्तःकरण मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार [ इन चार नामोंसे ] कहा जाता है। संकल्प-विकल्पके कारण मन, पदार्थका निश्चय करनेके कारण बुद्धि, 'अहम्-अहम्' (मैं-मैं) ऐसा अभिमान करनेसे अहंकार, और अपना इष्ट-चिन्तनके कारण यह चित्त कहलाता है। पंचप्राण प्राणापानव्यानोदानसमाना भवत्यसौ प्राणः। स्वयमेव वृत्तिभेदाद्विकृतिभेदात्सुवर्णसलिलादिवत्॥ ९७॥ अपने विकारोंके कारण सुवर्ण और जल आदिके समान स्वयं प्राण ही वृत्तिभेदसे प्राण, अपान, व्यान, उदान और समान—इन पाँच नामोंवाला होता है।

सूक्ष्म शरीर वागादिपञ्च श्रवणादिपञ्च प्राणादिपञ्चाभ्रमुखानि पञ्च। बुद्ध्याद्यविद्यापि च कामकर्मणी पुर्यष्टकं सूक्ष्मशरीरमाहुः॥ ९८॥ वागादि पाँच कर्मेन्द्रियाँ, श्रवणादि पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, प्राणादि पाँच प्राण, आकाशादि पाँच भूत, बुद्धि आदि अन्तःकरण-चतुष्टय, अविद्या तथा काम और कर्म यह पुर्यष्टक अथवा सूक्ष्म शरीर कहलाता है। इदं शरीरं शृणु सूक्ष्मसंज्ञितं लिङ्गं त्वपञ्चीकृतभूतसम्भवम्। सवासनं कर्मफलानुभावकं स्वाज्ञानतोऽनादिरुपाधिरात्मनः॥ ९९॥ यह सूक्ष्म अथवा लिंगशरीर अपंचीकृत भूतोंसे उत्पन्न हुआ है; यह वासनायुक्त होकर कर्मफलोंका अनुभव करानेवाला है। और स्वस्वरूपका ज्ञान न होनेके कारण आत्माकी अनादि उपाधि है। स्वप्नो भवत्यस्य विभक्त्यवस्था स्वमात्रशेषेण विभाति यत्र। स्वप्ने तु बुद्धिः स्वयमेव जाग्रत्- कालीननानाविधवासनाभिः। कर्त्रादिभावं प्रतिपद्य राजते यत्र स्वयंज्योतिरयं परात्मा॥ १००॥ स्वप्न इसकी अभिव्यक्तिकी अवस्था है, जहाँ यह स्वयं ही बचा हुआ भासता है। स्वप्नमें, जहाँ यह स्वयंप्रकाश परात्मा शुद्ध चेतन ही [ भिन्न- भिन्न पदार्थोंके रूपमें ] भासता है, बुद्धि जाग्रत्कालीन नाना प्रकारकी वासनाओंसे, कर्ता आदि भावोंको प्राप्त होकर स्वयं ही प्रतीत होने लगती है।

३० विवेक-चूड़ामणि धीमात्रकोपाधिरशेषसाक्षी न लिप्यते तत्कृतकर्मलेशैः। यस्मादसङ्गस्तत एव कर्मभि- र्न लिप्यते किञ्चिदुपाधिना कृतैः ॥ १०१ ॥ बुद्धि ही जिसकी उपाधि है ऐसा वह सर्वसाक्षी उस (बुद्धि)-के किये हुए कर्मोंसे तनिक भी लिप्त नहीं होता; क्योंकि वह असंग है अतः उपाधिकृत कर्मोंसे तनिक भी लिप्त नहीं हो सकता। सर्वव्यापृतिकरणं लिंगमिदं स्याच्चिदात्मनः पुंसः। वास्यादिकमिव तक्षणस्तेनैवात्मा भवत्यसङ्गोयम् ॥ १०२ ॥ यह लिंगदेह चिदात्मा पुरुषके सम्पूर्ण व्यापारोंका करण है, जिस प्रकार बढ़ईका वसूला होता है। इसीलिये यह आत्मा असंग है। अन्धत्वमन्दत्वपटुत्वधर्माः . सौगुण्यवैगुण्यवशाद्धि चक्षुषः। बाधिर्यमूकत्वमुखास्तथैव श्रोत्रादिधर्मा न तु वेत्तुरात्मनः ॥ १०३ ॥ नेत्रोंके सदोष अथवा निर्दोष होनेसे प्राप्त हुए अन्धापन, धुँधलापन अथवा स्पष्ट देखना आदि नेत्रोंके ही धर्म हैं; इसी प्रकार बहरापन, गूँगापन आदि भी श्रोत्रादिके ही धर्म हैं; सर्वसाक्षी आत्माके नहीं। प्राणके धर्म उच्छ्वासनिःश्वासविजृम्भणक्षुत्- प्रस्पन्दनाद्युत्क्रमणादिकाः क्रियाः। प्राणादिकर्माणि वदन्ति तज्ज्ञाः प्राणस्य धर्मावशनापिपासे ॥ १०४ ॥ श्वास-प्रश्वास, जम्हाई, छींक, काँपना और उछलना आदि क्रियाओंको तत्त्वज्ञ प्राणादिका धर्म बतलाते हैं तथा क्षुधा-पिपासा भी प्राणहीके धर्म हैं।

प्रेमकी आत्मार्थता ३१ अहंकार अन्तःकरणमेतेषु चक्षुरादिषु वर्ष्मणि। अहमित्यभिमानेन तिष्ठत्याभासतेजसा ॥ १०५ ॥ शरीरके अन्दर इन चक्षु आदि इन्द्रियों (इन्द्रियके गोलकों)-में चिदाभासके तेजसे व्याप्त हुआ अन्तःकरण 'मैं-पन' का अभिमान करता हुआ स्थिर रहता है। अहङ्कारः स विज्ञेयः कर्ता भोक्ताभिमान्ययम्। सत्त्वादिगुणयोगेन चावस्थात्रयमश्नुते ॥ १०६ ॥ इसीको अहंकार जानना चाहिये। यही कर्ता, भोक्ता तथा मैं-पनका अभिमान करनेवाला है और यही सत्त्व आदि गुणोंके योगसे तीनों अवस्थाओंको प्राप्त होता है। विषयाणामानुकूल्ये सुखी दुःखी विपर्यये। सुखं दुःखं च तद्धर्मः सदानन्दस्य नात्मनः ॥ १०७ ॥ विषयोंकी अनुकूलतासे यह सुखी और प्रतिकूलतासे दुःखी होता है। सुख और दुःख इस अहंकारके ही धर्म हैं, नित्यानन्दस्वरूप आत्माके नहीं। प्रेमकी आत्मार्थता आत्मार्थत्वेन हि प्रेयान् विषयो न स्वतः प्रियः। स्वत एव हि सर्वेषामात्मा प्रियतमो यतः ॥ १०८ ॥ विषय स्वतः प्रिय नहीं होते, किन्तु आत्माके लिये ही प्रिय होते हैं, क्योंकि स्वतः प्रियतम तो सबका आत्मा ही है। तत आत्मा सदानन्दो नास्य दुःखं कदाचन। यत्सुषुप्तौ निर्विषय आत्मानन्दोऽनुभूयते। श्रुतिः प्रत्यक्षमैतिह्यमनुमानं च जाग्रति ॥ १०९ ॥ इसलिये आत्मा सदा आनन्दस्वरूप है, इसमें दुःख कभी नहीं है। तभी सुषुप्तिमें विषयोंका अभाव रहते हुए भी आत्मानन्दका अनुभव होता

३२ विवेक-चूडामणि है। इस विषयमें श्रुति, प्रत्यक्ष, ऐतिह्य (इतिहास) और अनुमान-प्रमाण जागृत (मौजूद) हैं। माया-निरूपण अव्यक्तनाम्नी परमेशशक्ति- रनाद्यविद्या त्रिगुणात्मिका परा। कार्यानुमेया सुधियैव माया यया जगत्सर्वमिदं प्रसूयते॥११०॥ जो अव्यक्त नामवाली त्रिगुणात्मिका अनादि अविद्या परमेश्वरकी परा शक्ति है, वही माया है; जिससे यह सारा जगत् उत्पन्न हुआ है। बुद्धिमान्, जन इसके कार्यसे ही इसका अनुमान करते हैं। सन्नाप्यसन्नाप्युभयात्मिका नो भिन्नाप्यभिन्नाप्युभयात्मिका नो। सङ्गाप्यनङ्गाप्युभयात्मिका नो महाद्भुतानिर्वचनीयरूपा ॥१११॥ वह न सत् है, न असत् है और न [ सदसत् ] उभयरूप है; न भिन्न है, न अभिन्न है और न [ भिन्नाभिन्न ] उभयरूप है; न अंगसहित है, न अंगरहित है और न [ सांगानंग ] उभयात्मिका ही है; किन्तु अत्यन्त अद्भुत और अनिर्वचनीयरूपा (जो कही न जा सके ऐसी) है। शुद्धाद्वयब्रह्मविबोधनाश्या सर्पभ्रमो रज्जुविवेकतो यथा। रजस्तमः सत्त्वमिति प्रसिद्धा गुणास्तदीयाः प्रथितैः स्वकार्यैः॥ ११२ ॥ रज्जुके ज्ञानसे सर्प-भ्रमके समान वह अद्वितीय शुद्ध ब्रह्मके ज्ञानसे ही नष्ट होनेवाली है। अपने-अपने प्रसिद्ध कार्योंके कारण सत्त्व, रज और तम—ये उसके तीन गुण प्रसिद्ध हैं।

तमोगुण ३३ रजोगुण विक्षेपशक्ती रजसः क्रियात्मिका यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी। रागादयोऽस्याः प्रभवन्ति नित्यं दुःखादयो ये मनसोविकाराः ॥ ११३ ॥ क्रियारूपा विक्षेपशक्ति रजोगुणकी है जिससे सनातनकालसे समस्त क्रियाएँ होती आयी हैं और जिससे रागादि और दुःखादि, जो मनके विकार हैं, सदा उत्पन्न होते हैं। कामः क्रोधो लोभदम्भाद्यसूया- हङ्कारेर्ष्यामत्सराद्यास्तु घोराः। धर्मा एते राजसाः पुम्प्रवृत्ति- र्यस्मादेषा तद्रजो बन्धहेतुः ॥ ११४ ॥ काम, क्रोध, लोभ, दम्भ, असूया (गुणोंमें दोष ढूँढ़ना), अभिमान, ईर्ष्या और मत्सर—ये घोर धर्म रजोगुणके ही हैं। अतः जिसके कारण जीव कर्मोंमें प्रवृत्त होता है वह रजोगुण ही उसके बन्धनका हेतु है। तमोगुण एषावृत्तिर्नाम तमोगुणस्य शक्तिर्यया वस्त्ववभासतेऽन्यथा। सैषा निदानं पुरुषस्य संसृते- र्विक्षेपशक्तेः प्रसरस्य हेतुः ॥ ११५ ॥ जिसके कारण वस्तु कुछ-की-कुछ प्रतीत होने लगती है वह तमोगुणकी आवरणशक्ति है। यही पुरुषके (जन्म-मरण-रूप) संसारका आदि-कारण है और यही विक्षेपशक्तिके प्रसारका भी हेतु है। प्रज्ञावानपि पण्डितोऽपि चतुरोऽप्यत्यन्तसूक्ष्मार्थदृक् व्यालीढस्तमसा न वेत्ति बहुधा सम्बोधितोऽपि स्फुटम्। भ्रान्त्यरोपितमेव साधु कलयत्यालम्बते तद्गुणान् हन्तासौ प्रबला दुरन्ततमसः शक्तिर्महत्यावृतिः ॥ ११६ ॥ 133 विवेक-चूडामणि—2 A

३४ विवेक-चूडामणि तमसे ग्रस्त हुआ पुरुष अति बुद्धिमान्, विद्वान्, चतुर और शास्त्रके अत्यन्त सूक्ष्म अर्थोंको देखनेवाला भी हो तो भी वह नाना प्रकार समझानेसे भी अच्छी तरह नहीं समझता; वह भ्रमसे आरोपित किये हुए पदार्थोंको ही सत्य समझता है और उन्हींके गुणोंका आश्रय लेता है। अहो! दुरन्त तमोगुणकी यह महती आवरण-शक्ति बड़ी ही प्रबल है। अभावना वा विपरीतभावना- सम्भावना विप्रतिपत्तिरस्याः। संसर्गयुक्तं न विमुञ्चति ध्रुवं विक्षेपशक्तिः क्षपयत्यजस्रम् ॥ ११७॥ इस आवरणशक्तिके संसर्गसे युक्त पुरुषको अभावना, विपरीतभावना, असम्भावना और विप्रतिपत्ति—ये तमोगुणकी शक्तियाँ नहीं छोड़तीं और विक्षेपशक्ति भी उसे निरन्तर डावाँडोल ही रखती है।* अज्ञानमालस्यजडत्वनिद्रा- प्रमादमूढत्वमुखास्तमोगुणाः । एतैः प्रयुक्तो न हि वेत्ति किञ्चि- न्निद्रालुवत्स्तम्भवदेव तिष्ठति ॥ ११८॥ अज्ञान, आलस्य, जडता, निद्रा, प्रमाद, मूढ़ता आदि तमके गुण हैं। इनसे युक्त हुआ पुरुष कुछ नहीं समझता; वह निद्रालु या स्तम्भके समान [जडवत्] रहता है।

  • 'ब्रह्म नहीं है' जिससे ऐसा ज्ञान हो वह 'अभावना' कहलाती है। 'मैं शरीर हूँ' यह 'विपरीतभावना' है। किसीके होनेमें सन्देह 'असम्भावना' है और 'है या नहीं' इस तरहके संशयको 'विप्रतिपत्ति' कहते हैं। 'प्रपंचका व्यवहार' ही मायाकी 'विक्षेपशक्ति' है। 133 विवेक-चूडामणि—2 B

कारण-शरीर ३५ सत्त्वगुण सत्त्वं विशुद्धं जलवत्तथापि ताभ्यां मिलित्वा सरणाय कल्पते। यत्रात्मबिम्बः प्रतिबिम्बितः सन् प्रकाशयत्यर्क इवाखिलं जडम्॥ ११९॥ सत्त्वगुण जलके समान शुद्ध है, तथापि रज और तमसे मिलनेपर वह भी पुरुषकी प्रवृत्तिका कारण होता है; इसमें प्रतिबिम्बित होकर आत्मबिम्ब सूर्यके समान समस्त जड पदार्थोंको प्रकाशित करता है। मिश्रस्य सत्त्वस्य भवन्ति धर्मा- स्त्वमानिताद्या नियमा यमाद्याः। श्रद्धा च भक्तिश्च मुमुक्षुता च दैवी च सम्पत्तिरसन्निवृत्तिः॥ १२०॥ अमानित्व आदि, यम-नियमादि, श्रद्धा, भक्ति, मुमुक्षुता, दैवी-सम्पत्ति तथा असत्का त्याग—ये मिश्र (रज-तमसे मिले हुए) सत्त्वगुणके धर्म हैं। विशुद्धसत्त्वस्य गुणाः प्रसादः स्वात्मानुभूतिः परमा प्रशान्तिः। तृप्तिः प्रहर्षः परमात्मनिष्ठा यया सदानन्दरसं समृच्छति॥ १२१॥ प्रसन्नता, आत्मानुभव, परमशान्ति, तृप्ति, आत्यन्तिक आनन्द और परमात्मामें स्थिति—ये विशुद्ध सत्त्वगुणके धर्म हैं, जिनसे मुमुक्षु नित्यानन्दरसको प्राप्त करता है। कारण-शरीर अव्यक्तमेतत्त्रिगुणैर्निरुक्तं तत्कारणं नाम शरीरमात्मनः। सुषुप्तिरेतस्य विभक्त्यवस्था प्रलीनसर्वेन्द्रियबुद्धिवृत्तिः ॥१२२॥ 133 विवेक-चूडामणि—2 C