विवेकचूड़ामणि (हिन्दी अनुवाद सहित)
Viveka Chudamani with Hindi Translation - Gita Press
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 26, कुल 153 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूक्ष्म शरीर वागादिपञ्च श्रवणादिपञ्च प्राणादिपञ्चाभ्रमुखानि पञ्च। बुद्ध्याद्यविद्यापि च कामकर्मणी पुर्यष्टकं सूक्ष्मशरीरमाहुः॥ ९८॥ वागादि पाँच कर्मेन्द्रियाँ, श्रवणादि पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, प्राणादि पाँच प्राण, आकाशादि पाँच भूत, बुद्धि आदि अन्तःकरण-चतुष्टय, अविद्या तथा काम और कर्म यह पुर्यष्टक अथवा सूक्ष्म शरीर कहलाता है। इदं शरीरं शृणु सूक्ष्मसंज्ञितं लिङ्गं त्वपञ्चीकृतभूतसम्भवम्। सवासनं कर्मफलानुभावकं स्वाज्ञानतोऽनादिरुपाधिरात्मनः॥ ९९॥ यह सूक्ष्म अथवा लिंगशरीर अपंचीकृत भूतोंसे उत्पन्न हुआ है; यह वासनायुक्त होकर कर्मफलोंका अनुभव करानेवाला है। और स्वस्वरूपका ज्ञान न होनेके कारण आत्माकी अनादि उपाधि है। स्वप्नो भवत्यस्य विभक्त्यवस्था स्वमात्रशेषेण विभाति यत्र। स्वप्ने तु बुद्धिः स्वयमेव जाग्रत्- कालीननानाविधवासनाभिः। कर्त्रादिभावं प्रतिपद्य राजते यत्र स्वयंज्योतिरयं परात्मा॥ १००॥ स्वप्न इसकी अभिव्यक्तिकी अवस्था है, जहाँ यह स्वयं ही बचा हुआ भासता है। स्वप्नमें, जहाँ यह स्वयंप्रकाश परात्मा शुद्ध चेतन ही [ भिन्न- भिन्न पदार्थोंके रूपमें ] भासता है, बुद्धि जाग्रत्कालीन नाना प्रकारकी वासनाओंसे, कर्ता आदि भावोंको प्राप्त होकर स्वयं ही प्रतीत होने लगती है।