विवेकचूड़ामणि (हिन्दी अनुवाद सहित)
Viveka Chudamani with Hindi Translation - Gita Press
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 27, कुल 153 में से
संदर्भ में पढ़ें३० विवेक-चूड़ामणि धीमात्रकोपाधिरशेषसाक्षी न लिप्यते तत्कृतकर्मलेशैः। यस्मादसङ्गस्तत एव कर्मभि- र्न लिप्यते किञ्चिदुपाधिना कृतैः ॥ १०१ ॥ बुद्धि ही जिसकी उपाधि है ऐसा वह सर्वसाक्षी उस (बुद्धि)-के किये हुए कर्मोंसे तनिक भी लिप्त नहीं होता; क्योंकि वह असंग है अतः उपाधिकृत कर्मोंसे तनिक भी लिप्त नहीं हो सकता। सर्वव्यापृतिकरणं लिंगमिदं स्याच्चिदात्मनः पुंसः। वास्यादिकमिव तक्षणस्तेनैवात्मा भवत्यसङ्गोयम् ॥ १०२ ॥ यह लिंगदेह चिदात्मा पुरुषके सम्पूर्ण व्यापारोंका करण है, जिस प्रकार बढ़ईका वसूला होता है। इसीलिये यह आत्मा असंग है। अन्धत्वमन्दत्वपटुत्वधर्माः . सौगुण्यवैगुण्यवशाद्धि चक्षुषः। बाधिर्यमूकत्वमुखास्तथैव श्रोत्रादिधर्मा न तु वेत्तुरात्मनः ॥ १०३ ॥ नेत्रोंके सदोष अथवा निर्दोष होनेसे प्राप्त हुए अन्धापन, धुँधलापन अथवा स्पष्ट देखना आदि नेत्रोंके ही धर्म हैं; इसी प्रकार बहरापन, गूँगापन आदि भी श्रोत्रादिके ही धर्म हैं; सर्वसाक्षी आत्माके नहीं। प्राणके धर्म उच्छ्वासनिःश्वासविजृम्भणक्षुत्- प्रस्पन्दनाद्युत्क्रमणादिकाः क्रियाः। प्राणादिकर्माणि वदन्ति तज्ज्ञाः प्राणस्य धर्मावशनापिपासे ॥ १०४ ॥ श्वास-प्रश्वास, जम्हाई, छींक, काँपना और उछलना आदि क्रियाओंको तत्त्वज्ञ प्राणादिका धर्म बतलाते हैं तथा क्षुधा-पिपासा भी प्राणहीके धर्म हैं।