विवेकचूड़ामणि (हिन्दी अनुवाद सहित)
Viveka Chudamani with Hindi Translation - Gita Press
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 28, कुल 153 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रेमकी आत्मार्थता ३१ अहंकार अन्तःकरणमेतेषु चक्षुरादिषु वर्ष्मणि। अहमित्यभिमानेन तिष्ठत्याभासतेजसा ॥ १०५ ॥ शरीरके अन्दर इन चक्षु आदि इन्द्रियों (इन्द्रियके गोलकों)-में चिदाभासके तेजसे व्याप्त हुआ अन्तःकरण 'मैं-पन' का अभिमान करता हुआ स्थिर रहता है। अहङ्कारः स विज्ञेयः कर्ता भोक्ताभिमान्ययम्। सत्त्वादिगुणयोगेन चावस्थात्रयमश्नुते ॥ १०६ ॥ इसीको अहंकार जानना चाहिये। यही कर्ता, भोक्ता तथा मैं-पनका अभिमान करनेवाला है और यही सत्त्व आदि गुणोंके योगसे तीनों अवस्थाओंको प्राप्त होता है। विषयाणामानुकूल्ये सुखी दुःखी विपर्यये। सुखं दुःखं च तद्धर्मः सदानन्दस्य नात्मनः ॥ १०७ ॥ विषयोंकी अनुकूलतासे यह सुखी और प्रतिकूलतासे दुःखी होता है। सुख और दुःख इस अहंकारके ही धर्म हैं, नित्यानन्दस्वरूप आत्माके नहीं। प्रेमकी आत्मार्थता आत्मार्थत्वेन हि प्रेयान् विषयो न स्वतः प्रियः। स्वत एव हि सर्वेषामात्मा प्रियतमो यतः ॥ १०८ ॥ विषय स्वतः प्रिय नहीं होते, किन्तु आत्माके लिये ही प्रिय होते हैं, क्योंकि स्वतः प्रियतम तो सबका आत्मा ही है। तत आत्मा सदानन्दो नास्य दुःखं कदाचन। यत्सुषुप्तौ निर्विषय आत्मानन्दोऽनुभूयते। श्रुतिः प्रत्यक्षमैतिह्यमनुमानं च जाग्रति ॥ १०९ ॥ इसलिये आत्मा सदा आनन्दस्वरूप है, इसमें दुःख कभी नहीं है। तभी सुषुप्तिमें विषयोंका अभाव रहते हुए भी आत्मानन्दका अनुभव होता